

मैं अपने भाई के यहां छठ मनाने के लिए सिमडेगा आया था और मैंने
इस अवसर का लाभ उठा कर शहर से करीब २६ किलोमीटर दूर ऊंची पहाड़ी पर स्थित राम रेखा धाम के दर्शन किए। मान्यता है कि त्रेता युग में राम सीता और लक्ष्मण ने अपने वनवास के १४ दिन यहां बिताए। राम वन गमन मार्ग में पड़ने वाले २४८ चिन्हित स्थानों में इस स्थान को भी मान्यता मिली है और इस स्थान के पर्यटन, तीर्थांटन के विकास की चेष्टा भी की जा रही है जिसमें रोप वे का निर्माण भी सम्मिलित है।
समाधि मंदिर, अक्षय वट
आइए उपर्लिखित मिथक की कुछ जांच कर ली जाए। सर्वविदित है कि श्रीराम सीताजी और लक्ष्मणजी अयोध्या से ऋवेंगपुर (सिंगरौर, प्रयाग) हो कर चित्रकूट पहुचे और वनवास के ११ वर्ष ११ महीने और ११ दिन वहीं बिताए। चित्रकूट से वे दंडक वन गए। दंडक वन विंध्याचल और गोदावरी के बीच स्थित एक विशाल क्षेत्र है जो वर्तमान छत्तीसगढ़ , आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और तेलंगाना में फैला है। चित्रकूट से दंडक वन का रास्ता अब भी झारखंड के दक्षिण पश्चिम से हो कर गुजरता है और रामरेखा धाम के राम वन गमन पथ पर स्थित होना संभव है और उपर्लिखित मिथक सत्य प्रतीत होता है।
गुप्त गंगा, बाबा के साथ
रामायण के अनुसार , भगवान राम अपने भटकते वर्षों के दौरान भारत से श्रीलंका तक गए थे। अपने 'वनवास' या निर्वासन के दौरान, उन्हें किसी भी गाँव या शहर में रहने और अपना जीवन जीने की अनुमति नहीं थी। इस कारण, अयोध्या से विदा लेने के बाद, भगवान राम उत्तर प्रदेश , झारखंड , छत्तीसगढ़ , मध्य प्रदेश , ओडिशा , कर्नाटक , तेलंगाना , महाराष्ट्र और तमिलनाडु के जंगलों में भटकते रहे । सरकार ने जिन २४८ स्थानों को राम वन गमन पथ पर होने की मान्यता दी है उनमें कुछ है।
रामरेखा धाम उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़ और उड़ीसा के सीमा के आस पास ही है और यदि राम वन गमन मार्ग के मान्यता प्राप्त जगहों को एक तरतीब से रखा जाय तो जो मैप तैयार होगा वह मैं नीचे दे रहा हूं।
राम वन गमन का एक काल्पनिक चित्र
राम रेखा धाम भगवान राम और देवी सीता से जुड़ा एक पवित्र स्थान है, जो जिला राजधानी सिमडेगा से लगभग 26 किलोमीटर दूर स्थित है। अग्नि कुंड, चरण पादुका, सीता चूल्हा और गुप्त गंगा (लक्ष्मण जी ने पत्थर में वाण मार कर पानी निकाला जिसका पानी कभी नहीं सूखता) जैसी उनसे जुड़ी पुरातात्विक संरचनाएं भी वहां स्थित हैं। किंवदंती के अनुसार, भगवान राम, देवी सीता और लक्ष्मण अयोध्या से 14 साल के वनवास के दौरान यहां आए थे और कुछ समय के लिए रहे थे। एक पुरातात्विक स्थल पर छत पर कुछ रेखाएं खरोंची गई हैं, जिनके बारे में माना जाता है कि उन्हें स्वयं भगवान राम ने खींचा था। इसलिए इसे राम रेखा कहा जाता है। लोग यहां प्रार्थना करने और प्राचीन संरचनाओं के दर्शन करने आते हैं, जिनमें भगवान राम, देवी सीता, भगवान हनुमान और भगवान शिव के मंदिर शामिल हैं, जो एक घुमावदार गुफा में स्थित हैं। एक काला शंख भी है जो पुरातन काल का माना जाता है। सिमडेगा के आसपास का क्षेत्र पत्थर से बने पहाड़ियों से भरा पड़ा है। इस धाम तक टेढ़े मेढ़ चढ़ाई वाले रास्तें से कार से पहुंचा जा सकता है। कोई सरकारी शुल्क नहीं है पर स्थानीय लोग कुछ चंदा वसूल लेते हैं। एक घंटे भी मंदिर में दर्शन पुजन किया जा सकता है। कुछ साधु यहां रहते भी है। कार्तिक पूर्णिमा और माघ में यहां अच्छा खासा मेला लगता है।
देवराहा बाबा का भी नाता इस धाम से रहा है। देवराहा बाबा के एक शिष्य ने इस धाम का विकास किया जिनकी समाधि भी गुफा के उपर पहाड़ पर बनी हुई है। यह धाम सिमडेगा से 26 कि०मी० है और रांची या राउरकेला से सिमडेगा आसानी से पहुंचा जा सकता है।