Wednesday, September 15, 2021

किशोर वय का लेखन -कुछ दूर तक

मैने अपने एक ब्लॉग में अपने किशोर वय में की गई साहित्य सेवा का वर्णन किया था। कुछ महिनों पहले मुझे अपने छात्र जीवन की एक कॉपी मिली जो काफी दयनीय अवस्था में है। कभी यह मोटी कॉपी काफी दुबली हो गई है। कभी गुस्से में मैने इसके 75% पन्ने फाड़ कर फेक डाले थे। सोचता हूँ जो बचे है उनमें यदि कुछ पढ़ने लायक हो तो उसे यहाँ लिख डालू। जैसा मैने अपने अपने पुराने ब्लाग "बैठेठाले" में लिखा था मेरी कुछ रचनाएं कॉलेज मैगजीन में छपी थी। मै पहल उनसे करता हूँ। कुछ बचकाना हो तो क्षमा करें सच मे एक सतरह साल के लड़के ने लिखी है यह कहानी जिसे एक सत्तर साल का senager दुहरा भर रहा है । मैं तब दो तीन स्तरीय साहित्यिक पत्रिका पढता था और सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, मोहन राकेश कृष्णा सोबती जैसे लेखक से बहुत प्रभावित था और शायद मेरे तब के लेखन में भी उनका लहजा दिख जाय।



कुछ दूर तक-एक कहानी

आज वह बहुत थक गया था। अपनी थकान पर उसे गुस्सा भी आ रहा था हसीं भी।
लेकिन वह थका कैसे ?
उसे खुद आश्चर्य था। आज उसे दफ्तर में कोई थकाने वाला काम नहीं करना पड़ा था। अलबत्ता दफ्तर के कैंटीन में बैठा चाय और समोसे के बीच बहुत वक्त गप्पों में गुजार दिए थे। घर के नीचे, गली की शोर से उसकी थकान और बढ़ रही थी।
"शायद वह आज फिर अपनी बीबी को पीट रहा था" उसने सोचा। "बीबी" वह सचेत हो गया। वह आँखे बंद कर कुछ सोचने लगा। मोड़ पर मुड़ती कार के हेडलाईट घूमा और रौशनी खिड़की से हो कर उसके कमरे में आ गई। वह चौंका । धीरे से उठने की कोशिश की फिर लेट गया । अचानक वह उठा खिड़की बंद की । शायद उसके पैर में दर्द हो रहा था । इस बार वह लेटने के बदले कुर्सी पर बैठ गया । खिड़की बंद होने से शोर कम हो गया । कमरे में अँधेरा भी छा गया । उसने बिजली जलाई फिर बुझा कर लेट गया । उसे लगा सर में दर्द है । 'फीवर' भी हो सकता है । वह बीमार है क्षण भर के लिए यह बात उसे अच्छी लगी । शायद कल देर रात घूमता रहा इसी लिए ठण्ड लग गई होगी । कल की बात याद आने से वह अचानक हंस पड़ा । वह चौंका ।
पर इसमें उसका दोष हो क्या था ? झूठ बोलना तो इतना बड़ा अपराध नहीं जितना खून करना या चोरी करना । और यदि उसके प्रोमोशन का फेयर चांस था तो ऐसी अवस्था में थोड़ा झूठ बोल ही दिया रमेश को, तो क्या बिगड़ गया देश का ?

उसकी आँखे अब भी खुली थी । हाथ बढ़ा कर उसने लैंप जला डाला । मेज़ पर रक्खी ''नावेल'' पढ़ना चाहता था वह । तीन पेज पढ़ने पर भी वह उसका एक शब्द भी ''कैच'' न कर सका । उस नावेल का एक पात्र शायद लेखक था जो शायद अपनी कविताओं का अर्थ इन तीन पृष्ठों में अपनी प्रेमिका को समझाता रहा था । उसकी आँखे नाविल की पंक्तिया पढ़ रही थी पर उसके दिमाग में कोई और प्रक्रिया चल रही थी । ''मधुलासा" वह उसीके बारे में सोच रहा था !

पहले वह जब भी उसके बारे में सोचता उत्तेजित हो जाता, या तो अपने आप बकने लगता , या कभी बैठता कभी खड़ा हो जाता कभी लेट जाता मानों उसकी धडकनों को किसीने निचोड़ लिया हो । और इसीलिए वह बैचैन हो उठा हो । लेकिन आज वह शांत था ।

पहली बार जब मधुलासा ने उसे बुलाया था तो वह घबड़ा सा गया था । जैसे जैसे उसका घर पास आता गया, उसे लगने लगा , ज़िन्दगी अचानक बहुत तेज़ हो गयी है , ऐसा लगा मानों वह बेहोश हो जाएगा । उसे याद है उसने बिना समय गवांयें एक मुर्गे की तरह उसे दबोच लिया था । नावेल उसने टेबल पर रख दी । अचानक उठा और सामने दीवाल पर लटकी अर्धनग्न औरत की तस्वीर को उल्टा कर लटकाया और लेट गया ।

'मधुलासा' वह अब उसके नाम के बारे में सोच रहा था । एकदम निरर्थक नाम हैं । मधुराशा रहता तो कोई बात थी । "कुंती" अचानक उसे अपने बीबी का नाम याद आ गया । कुंती - कितना गावारूँ नाम हैं कल्ह ही उसकी चिट्ठी आई थी । पूछा था " मकान मिला या नहीं ? यहाँ माँ के झिक झिक से ऊब सी गयी हूँ ....!"
वह कुंती को ले आएगा एक क्षण के लिए उसने सोचा ।

कल्ह मधुलासा मिली थी । उसने उससे पूछा था "मेरे प्रोमोशन से तुम्हें ईर्ष्या तो नहीं हुई ? ... हुंह मैं तुम्हारी हर शाम ख़राब कर देता हूँ ...। कितने स्वार्थी हो जाते हैं लोग " । एक अदृश्य सा संदेह तैर रहा था उसकी बातों में । मधुलासा ने उसकी बातों पर ध्यान नहीं दिया और अपने लिपस्टिक पुते होंठों को थोड़ा दबा कर और आँखों को एक साथ नीचे करते हुए कहा था "न्न नहीं तो " । उसे याद आ रहा था किसी फिल्म में ऐसी "ना" देखी थी । और वह confirmed हो गया जब उसने अपनी बात दुहराई " No no , it is never so , I love to spend time with you ." उसके मन में आया था की वह जोर से चीखे " once more " और पारसी थिएटर के मंजनू की तरह वो इस सीन को फिर से दुहराए । लेकिन ऐसा कुछ न हुआ । उसके स्कार्फ़ को ठीक करते हुए उसने धमकी दी थी " मैं कुंती को लाने जा रहा हूँ ।" "कौन कुंती ? क्या वही गवारूँ औरत जो सिर्फ पढ़ने कॉलेज आती थी ? ऐसे सुना है तुम्हारी बीबी भी हैं । ऐसा कह उसने एक ठहाका लगाया था और उसने एक "हूँ " की थी ।
"हुंह I love to spend to spend evenings with you... I love the darkness... ..हुंह हुंह" वह तन्द्रा में बकता जा रहा था ।

Tuesday, September 14, 2021

मेरी स्वाद यात्रा - विदेश का खाना भाग- ३

विदेश का खाना

स्वाद यात्रा के इस तीसरे और अंतिम भाग में मैं विदेशों में मिलने वाले खाने और भारतीयों को खासकर शाकाहारी या सनातनी भोजन करने वालों को होने वाली दिक्कतों और सहूलतों के बारे में लिखूंगा । एक भारतीय होने के कारण विदेशों में खाने की मुश्किलें आती ही हैं, कभी बेस्वाद खाना कभी भाषा की दिक्कत और उसके ऊपर हमारे दैनिक भत्ते भी लम्बे ट्रिप (पश्चिमी देशों के टूर ) में काफी कम हुआ करते थे । कई कहानियां हैं खाने के उपर पर सब एक ब्लॉग में लिख पाना संभव नहीं हैं फिर भी उन घटनाओं को शामिल करने की कोशिश कर रहा हूँ जो मुझे बार बार याद आ जाते है । कई घटनाएं छूट सकती हैं या छोड़ रहा हूँ खास कर जिनका जिक्र मैं पहले किसी ब्लॉग में कर चूका हूँ । शुरू करता हूँ नेपाल से जो मेरी पहली विदेश यात्रा का देश होने के साथ मुझे जीवन संगिनी देने वाला देश हैं ।

नेपाल का खाना

नेपाल यात्रा मेरे लिए पहली विदेश यात्रा थी जब मैं शादी के बाद ससुराल गया । नेपाल यात्रा पर लिखे मेरे ब्लॉग में भी मैंने यहाँ के खाने का जिक्र किया है । एक बात जो मुझे याद हैं वो हैं पहली बार खाया मांस और भात । मुझे उस बार स्किन के साथ पकाया मांस पसंद नहीं आया पर बाद में मेरे लिए ऐसा कभी नहीं पकाया गया । मेरी सभी सरहज बहुत अच्छा खाना बना लेती हैं । सबसे बड़ी स्व डॉली को नॉन वेज बनाना बहुत पसंद था और जब मैं वेजिटेरियन हो गया था तो उन्हें बहुत मुश्किल होता था कि क्या खिलाए ?


एक नेवारी रेस्टोरेंट के बाहर पोस्टर

नेपाल के मोमो के अलावा जिस पाँच खाने के चीज़ो का जिक्र मैं करना चाहूंगा वह हैं सेल रोटी (हल्का मीठा चावल के आटे का तला व्यंजन), गुदपाक (एक तरह का मिल्क केक ) और उसका सूखा रूप पुष्टकारी, लाखामरी, स्वारी - जलेबी और यमरी । पुष्टकारी और गुदपाक तो पहले ट्रिप में ही खाया था । सेल रोटी रांची के BMP ग्राउंड में लगे नेपाली मेला में सबसे पहले खाया, लाखामरी और स्वारी जलेबी २०१७-२०१८ में पहली बार खाया । यमरी चावल की रोटी में filling कर भाप में पकाया एक स्वादिष्ट व्यंजन है जिसे मैने अपने ममेरे साले मिंटू और सरहज सरिता  के यहाँ सिर्फ एक बार खाया है। कही और ये व्यंजन शायद नहीं मिलेगा। काफी स्वादिष्ट तो होता है ये सब । सब्जियों का जिक्र करू तो जो 2 सब्जी जेहन में आती है वह है आलू का अचार या तिल और साईट्रिक एसिड डाल कर बनाया अचारी आलू और तामा। आलू का यह अनूठा अचार तो कई बार खा चुका हूँ पर तामा (Fermented बांस की सब्जी) मुझे कभी पसंद नहीं आई इसके तीखे गंध के कारण और मैंने कभी नहीं खाया। पर सुना है बहुत स्वादिष्ट होता है और जिसे पसंद है उसे बहुत ही पसंद आता है। तामा राँची में भी मिलता है और इसे यहाँ कहते है करील । बाजार हाट में मैं उस तरफ जाता भी नहीं जहाँ करील और सुक्ति ( सुखाई हुयी मछली) बिकती है ।


१. सेल २. लाखामरी ३. स्वारी जलेबी

स्वारी पर एक व्यंग प्रचलित हैं । एक विदेशी को जब यह खाना परोसा गया। उसने पतले लम्बे स्वारी को नैपकिन समझ कर हाथ पोछने के लिए बचा रखा था । ।


श्री लंका का खाना

होटल स्विस रेजिडेंस , कैंडी, 2009

श्री लंका का खाने और तमिलनाडु के खाने में ज्यादा फर्क नहीं दिखा। मुख्य खाना चावल से बने होते हैं । पर हम लोग कैंडी में एक होटल में रुके थे स्विस व्यू रेजीडेंसी जो कैंडी लेक के पास था यह होटल एक हिललॉक पर था और खाना जो भी खिलाया वो गजब का था । ज्यादा बार कॉन्टिनेंटल खाना खाया । पर कुछ बार लोकल खाना भी डिनर और लंच में खाया।  दक्षिण भारत के खाने से थोड़ा ही अलग था । यहाँ हर खाने में कोकोनट मिल्क डालते है और करी या दाल इससे गाढ़ी हो जाती हैं । दो शब्द जो मेनू में बहुत बार आता था वो है "कोट्टु या कोट्टु रोटी " और "पोल या पोल रोटी " । इनके साथ चिकन या वेजिटेरियन सामग्री मिला कर डिशेस बनते है । मुझे याद नहीं ऐसा कुछ खाया पर बहुत स्वादिष्ट पुडिंग खाया था वह याद हैं ।



वेजिटेरियन कोट्टु औरअप्पम

बेटोंटा नदी के किनारे रिवर व्यू रेस्त्रां, नूवरे ऐलिया और कोलोंबो के बीच एक रेस्त्रां


यूरोप का खाना/ जर्मनी

विदेशों के रेस्त्रां में कई बार बहुत मजेदार बातें हो जाती हैं और कई बार आप जिस जगह खाना खा रहे होते हैं उसका कोई न कोई इतिहास भी होता हैं । मेरे साथ भी हुआ और मैं कुछ रस्त्रों के बारे में बताना चाहूंगा । १९८३ में मुझे पहली बार एयर इंडिया से यूरोप जाने का मौका मिला और विदेशी खाना और ड्रिंक्स हवाई जहाज में ही मिलने लगे । खाना तो भारतीय ही खाया पर वाइन और शैम्पेन पहली बार चखा । तब हवाई यात्रा में ले ओवर मिलते थे और हमें भी मिला जिनेवा में । यूरोप का पहला शहर जहां मैंने 5 सितारा पेंटा होटल में रात बिताई और वही के रेस्त्रां में खाना खाया । हम थके थे फिर भी डिनर लेने  होटल के रेस्त्रां में गए । हमारे लिए रात के एक या दो बज होंगे पर लोकल लोगों के लिए और वेटर्स के लिए  अभी शाम ही था । वहाँ लोग डिनर एन्जॉय करते हैं कई घंटे खाने में लगते है और शायद इसलिए क्योंकि वो सैटरडे नाईट था । हमारा वेटर भी आर्डर लेने के बाद ड्रिंक्स दे कर चला गया और फिर करीब ३०-४० मिनट दिखा भी नहीं । हम और और मेरे कुछ भारतीय सहयात्री धैर्य खोने लगे और जब वेटर पास से गुज़रा हमने उसे अंग्रेजी में कुछ सुना दिया और बस अगले ५ मिनट में ब्रेड बास्केट और १० मिनट में हमारा बाकी का आर्डर आ गया । सुबह स्विस नाश्ता बहुत पसंद आया पहली बार नाश्ता का बुफे लगा देखा जिसमे इतने ज्यादा चॉइस थे और हमने अपने पसंद के ब्रेड, केक, क्रोइसंट, चीज़ और फ्रूट वाली दही यानि योगहर्ट बहुत पसंद से खाया । स्विस चीज़ सच में दुनिया का सबसे स्वादिष्ट चीज़ होता हैं यह बाद में पता चलने वाला था । चाय में डालने के लिए दूध के micro पाउच यहीं देखा। जिनेवा से मैं कुछ महीनों के लिए जर्मनी के डुसेलडॉर्फ शहर गया था जो हमारा गंतव्य था ।



Our flat in Germany and party in the house !

यहाँ ब्रेकफास्ट और डिनर तो खुद अपार्टमेंट में बनाना था और इसके लिए हम आपस में काम बाँट लिया करते । मैं रोटी / पूरी एक्सपर्ट था (बतर्ज अंधों में काना राजा) । मैं बेलन ले गया था और सबसे गोल रोटी बेल लेता था । जल्दी ही हमनें एशियाई मार्किट खोज निकाला जहाँ व्होल मेहेल (यानि आटा -मेहेल का हिंदी है मैदा ), पटना राइस या पाकिस्तान बासमती , परवल, भिंडी जैसे खाद्य और सब्जियां मिल जाती थी । हर हफ्ते हम यह सब खरीद लाते । ब्रेड , मिल्क , कॉर्नफ़्लेक्स,वाइन, बियर और ऑरेंज जूस पास के स्टोर्स में मिल जाते। सुबह ब्रेड, जैम, कॉर्नफ़्लेक्स , अंडा, फल का का नास्ता कर के ऑफिस जाते जहाँ हमारे कमरे में चाय कॉफ़ी और बिस्किट्स आ जाते । दोपहर का खाना ऑफिस के रेस्टोरेंट नुमा कैंटीन में करते । यहाँ भी बुफे लगा रहता और सिर्फ गर्म खाना जैसे चिकन के लिए क्यू में खड़ा होना पड़ता था । भारत में कई बिजली की कंपनियों (ABB , SIEMENS etc ) के कैंटीन में गया हूँ । ज्यादा जगहों में वर्कर्स और ऑफिसर्स के लिए अलग अलग कैंटीन या बैठने की जगहें होती थी । विदेशों में ऐसा नहीं दिखा ऑफिस चीफ और कॉमन वर्कर्स को भी एक ही कैंटीन में खाते देखा, यदि लंच पर ले जाना होता तो बाहर किसी रेस्त्रां में हमे ले जाते । वापस SMS डुसेलडॉर्फ कैंटीन की बात करता हूँ । हमें यहाँ पता ही नहीं चलता कौन सा खाना स्वादिष्ट होगा यानि हमारे देसी टेस्ट का या कौन नहीं ? किन खानों में बीफ नहीं होगा ? एक चीनी शेफ कैंटीन में था उसे पता था हम लोग बीफ या पोर्क नहीं खाएंगे । वह बता देता की आज चिकन या मटन कहाँ हैं और हम वही ले लेते पर एक बार पूरी मछली का एक डिश देख कर मन मचल गया और मैंने एक डिश उठा ली । उसका एक टुकड़ा मुंह में लेते ही उबकाई से आयी और मैं उसे खा नहीं पाया शायद कोई Sea फिश का अचार जैसा था वो । सभी डिश में ओलिव और सलाद पत्ता (lettuce ) अक्सर मिल जाता पर जो एक डिश पसंद आयी वह थी एप्पल पाई ।



German Dishes, Brot and Brötchen (breads)

डुसेलडॉर्फ से दो बार Hilechenbach गया । हमारे मेज़बान हमें एक रेस्त्रां में ले गए जो द्वितीय विश्व युद्ध में नष्टप्राय हो गया था। रेस्त्रां मालिकों ने उन ऐतहासिक यादों को संभाल सहेज कर रेस्त्रां को चला रहे थे और एक अजीब एहसास के साथ हम लंच के बाद अपने होटल आ गए । एक बार हम अपने एक शाकाहारी मित्र के साथ वहां गए थे और मेज़बान SMS की फैक्ट्री के कैंटीन में खाना खा रहे थे । उस कैंटीन में शायद शाकाहारी खाना बनता ही नहीं था । हमें जर्मन भाषा ज्ञान भी कम था । वेटर को बताया की यह मीट नहीं खातें तो वो वह मछली ले आया जब मछली मना किया तो अंडा ले आया बाद में किसी तरह उसे मैंने समझाया कि उबले आलू और चावल ले आओ तो किसी तरह काम बना । राइन नदी में दो बार (१९८३ और २००७ में ) नौका यात्रा की थी और बोट में रेस्तरां भी और हमने जर्मन खाना भी खाया था । २००७ की बोट यात्रा में लाइव संगीत भी था ।


Rhine River Cruise 1983Rhine River Cruise 2007

दूसरी घटना भी जर्मनी के १९८३ ट्रिप की ही है जब हम एक बोन के पास वाइन सेलर देखने गए थे । अंगूरों के बाग़ के बीच एक वाइनरी और रेस्त्रां था । सामने दूसरे विश्वयुद्ध में बर्बाद हुए एक पुल था जिसे स्मृति के लिए संभाल कर रखा गया  था बिना repair किये । हमारे सामने दो गिलास रखे  गए और एक लाल वाइन के बोतल को खोल कर गिलास में wine भी ढ़ाला गया । मेरा शाकाहारी मित्र वाइन भी पीना नहीं चाहता था, तब वाइनरी के मालिक ने तब बोतल को उठा कर सूंघा और उसे बताया यह अभी भी फ्रूट जूस ही हैं अभी वाइन नहीं बना आप आराम से पी लो । शायद वह आखिरी मौका होगा जब उसने वाइन पी होगी ।

Altstadt, Dusseldorf
डुसेलडॉर्फ की बात आई और Altstadt (Old town ) का जिक्र न करूँ तो ज्यादती होगी। इसे दुनिया का सबसे लम्बा बार भी कहते हैं । क्योंकि छोटे से एरिया में ३०० बार हैं । बस जैसे एक बार का दरवाज़ा दूसरे बार में खुलता है । ३-४ बार गया हूँ यहाँ पर जब २००७ में गया था तो एक ताज महल, रेस्त्रां (शायद यही नाम था ) में गया था सोचा था इंडियन रेस्टोरेंट में ज्यादा बढ़िया सर्विस मिलेगी पर बहुत ही बद्तमीज़ था वेटर और अफ़सोस हुआ किसी जर्मन रेस्त्रां में ही क्यों नहीं बैठ गया। Altstadt अपने अल्ट्बियर के लिए भी जाना जाता हैं । ALTBIER का मतलब हैं ओल्ड बियर ।


Winery Visit near Bonn-1983Restaurant near to Mozart's birth place in Salzburg, Austria 2013

Farewell dinner at Munich and breakfast at Melk (Austria) 2013
पेरिस

पेरिस मैं और जगहों से ज्यादा बार गया । १९८३ के पहले अनुभव के बाद २००८ से २०१४ के बीच कई बार। २००८ में Lyon और जगह भी घूमने गया था । कई रेस्त्रां भी खाना खाने गए थे । इंडियन रेस्त्रां के नाम पर कई जगह खाना खाया पर कई बार यह बंगलादेशी रेस्त्रां निकला और एक बार पाकिस्तानी भी। बोर्ड पर लिखा होता restaurant indien । सिर्फ एक जगह 'आशियाना'  रेस्त्रां वास्तव में एक भारतीय रेस्त्रां निकला । हमारा एक मेजबान बार बार एक दूसरे इंडियन रेस्त्रां ले जाता । कुछ ही देर में पता चला ओनर एक बांग्लादेशी हिन्दू हैं । मैंने उनसे बंगला में बात भी की । फ्रेंच फ़ूड भी यहाँ मिलता ही था और मेरा मेजबान यहाँ अपने माशूका को ले कर आता । कंपनी के खर्च में उसका एक डेट भी निपट जाता ।


Ashiana Restaurant, Paris  l Indian Restaurant, Neuly, Paris  

पर २०११-१४ के बीच ज्यादा बार पिज़्ज़ा खाया क्योंकि वह सबसे नज़दीक जगह थी जहाँ हमलोग कुछ स्वाद लेकर खा लेते थे। पर कई बार नज़दीक के एक चायनीज़ रेस्त्रां भी गए जहा WOK किया सब्जी और चावल खा लेते थे इंडियन खाने के नज़दीक वाला taste आता था । एक बार सुशी भी खाया ठंडी चावल और मछली लेकिन पचा न सका और पेट ख़राब हो गया । इसी तरह एक बार विएना के एक कोरियाई रेस्त्रां में भी टोफू के करी के साथ चावल खाये थे और वह भी नहीं पचा था क्योंकि qty बहुत ज्यादा था और मुझे खाना बर्बाद करना नहीं आता  । बाहर के देशों में जो खाना भारतीयों को पसंद आ जाता हैं वह हैं पिज़्ज़ा और चायनीज़ खाना । मैक डोनाल्ड भी एक लोकप्रिय ऑप्शन होता हैं ।


Indian restaurant at St. Etienne, France and a food stall near French Alps and restaurant @ Siene river, Paris.

मैं लगे हाथों यूरोप में मिलने वाली कॉफी के बारे में भी बता डालूं । १९८३ में पहली बार जर्मनी में कॉफ़ी पिया और बहुत ''हार्ड'' थी वो। फिर मैं सिर्फ चाय पीने लगा। एक दिन मेरे जर्मन सीनियर श्री लिटर्स ने कॉफी ऑफर की और मेरी नापसंदगी जानने के बाद कहा "What you will do in Italy ? even spoon stands vertically in coffee cup there !" अलग अलग कॉफी जो देखा और कभी न कभी पिया वो हैं :- 1. Espresso 2. Americano 3. Macchiato 4. Cappuccino 5. Mocha 6. Cafe au Lait 7. Iced Coffee. इसमें अमेरिकन कॉफी, मोचा और कैफ़े अउ लाइट ज्यादा पसंद आया और अपने २०१३ के ट्रिप में हमने सिर्फ मोचा पिया जो दूध में बना कॉफ़ी और चॉकलेट का मिश्रण हैं ।


साउथ अफ्रीका

मैं अब १९९६ की साउथ अफ्रीका की बात करना चाहूंगा मैं प्रिटोरिया के एक सर्विस अपार्टमेंट होटल में ६ महीने रुका था । रंगभेद ख़त्म हुए कुछ ही दिन हुए थे । यहाँ भी डिनर और नाश्ता तो हम खुद बनाते पर दिन का खाना का कुछ इंतेज़ाम करना था क्योंकि साइट पर कोई प्रबंध नहीं था । हमने चायनीज़ खाना ही सुबह सुबह पैक कर ले जाना उचित समझा क्योंकि हमे ८ बजे तक पहुंचना था तबतक कोई रेस्त्रां खुलता ही नहीं था पर किसी तरह एक चयनीज़ महिला अपना शॉप खोलकर साढ़े सात बजे अंडा फ्राइड राइस पैक कर देने को राजी हो गयी । दोपहर तक यह खाना ठंडा और बेस्वाद हो जाता था और सूखा सूखा खाने में दिक्कत होती थी । हमने प्रायः ३ महीने यही खाना खाया फिर एक दिन हमने एक प्लांट कैंटीन दिखा सोचा पूछ ले क्या हम यहाँ खा सकते है । पता चाला हाँ खा सकते हैं । फिर रोज हममें से एक जन जा कर सबके लिए खाना ले आता। हमारे टेस्ट का तो नहीं था पर सस्ता स्वादिष्ट होता था । एक लोकल थोड़ी उमरवाली लेडी शेफ थी जो फिश या चिकन बनने पर हमलोग के लिए छिपा कर रख देती । रविवार को हम नज़दीक के सनीपार्क मॉल में चले जाते जहाँ एक गुजरती महिला हर रविवार वेज समोसा का स्टाल लगाती । इसमें आलू के बजाय प्याज़ या कुछ और सब्जी भरी रहती पर हमें भारतीय स्वाद मिल जाता । ऐसे पिज़्ज़ा भी बहुत बार खाया यहाँ आखिर २ पर १ फ्री जो था । एक बियर फेस्टिवल भी यहाँ देखा और जगह जगह का बियर चखा भी सबसे महंगा बियर मेक्सिकन बियर था पर हमे castle , carlsberg , Amstel, Vivo और हेनकेन बियर ही ज्यादा पसंद था ।



Lunch at Mr Prasad's house, Johannesburg and Sunnypark Mall, Pretoria

हमारे कांट्रेक्टर पोर्तुगीज थे और एक दिन उन्होंने हम लोगों को खाने पर बुला लिया । क्योंकि हमारे वापस आने का वक़्त करीब था हमने उनका निमंत्रण स्वीकार कर लिया और एक शनिवार उनके यहाँ जा पहुंचे । एक हॉस्टल जैसा मकान में सभी वर्कर्स रहते थे और वहीँ उन्होंने खुद से खाना बनाया, पोर्तगीज़ तरीके से । व्हिस्की के बाद परोसा गया चावल के साथ खरगोश का मीट और शोरबा । मैंने कभी खरगोश का मांस खाया नहीं था और सोच ही रहा था की चावल किस चीज़ के साथ खाऊंगा । फिर मेरे दोस्तों ने मीट की तारीफ शुरू कर दी । खरगोश में एकदम हिंदुस्तानी तरीके से पके चिकन का स्वाद आ रहा था । पता नहीं कैसे पकाते हैं पर बहुत पसंद आया हम सब को ।


USA का खाना

१९९३ में बॉम्बे सीरियल ब्लास्ट के दो दिन बाद ही हम लोग मुंबई में थे USA जाने के क्रम में । मुंबई दो दिन में ही नार्मल हो गया था पर ब्लास्ट का असर जगह जगह दिख रहा था । हम जब पिट्सबर्ग पहुंचे तो एयरपोर्ट के पास के ही एक मोटेल नुमा होटल में रुक गए । मॉर्निंग ब्रेकफास्ट के लिए रेस्त्रां की जगह एक काउंटर भर था यहाँ  ब्रेड, बटर, कॉर्नफ़्लेक्स और दूध के सिवा रोज़ कुछ स्पेशल होता था पास्ता, बर्गर जैसा कुछ या कुछ डेजर्ट । दिन का खाना तो साइट पर खा लेते थे रात के खाना के लिए इस बियबान सी जगह में भटकना पड़ता था । हम ने ३ खाने की जगह खोज निकाली थी । एक था K -MART जहाँ होटल का वैन ड्राप कर देते था दूसरा था एक पिज़्ज़ाहट जो करीब ४ km दूर था और हम चार लोग एक बड़े या 2 छोटे पिज़्ज़ा से ही काम चला लेते थे । तीसरा था एक छोटा शॉप जो रोड के उस पर के एक गैस स्टेशन में था। एक वाकया जो याद आ रहा हैं , वो इसी छोटे शॉप से सम्बंधित है। हमारे एक सीनियर साथी वेजीटेरियन थे। उन्होंने एक दिन जब मैं यह शॉप जा रहा था अपने लिए कुछ डोनट्स मंगवा लिए । मैं ले तो आया पर इंग्रेडिएंट्स में लिखा थे "बीफ चीज़" । पता नहीं यह होता क्या हैं पर मैं बाद में एक guilt से भर गया।
१९९७ में जब मैम सालेम, ऑहियो, USA गया था तब site से होटल पैदल आ जाता था और , रोड क्रॉस करते समय मुश्किल में पड़ जाता था क्योंकि जब भी पैर बढ़ाता एक कार आती दिखती और हम पीछे हट जाते और कार भी रुक जाती और थोड़ी देर रुक कर चली जाती । कई कारों के जाने के बाद एक कार वाले ने हमारी द्विविधा समझ ली और हमें रोड क्रॉस कर लेने का इशारा किया । बाद में पता चला की पैदल क्रॉस करने वालो को "right of way " हैं और हम बेधड़क रोड क्रॉस कर सकते हैं। अपने होटल के बिलकुल पास था एक कॉफ़ी शॉप और पहली बार जाना की ''अमेरिकन'' कॉफ़ी ज्यादा strong नहीं है और पिया जा सकता हैं । नज़दीक के एक रेस्त्रां में रोज डिनर लेने जाते थे चिकन सैंडविच, पैनकेक और हेनकेन बियर के लिए । एक बार तब मुश्किल में पड़ गए जब एक लड़की हमारे टेबल पर आ कर बैठ गयी " Will you please order a drink for me ?" हमें कुछ समझ नहीं आया और हम आपस में बंगला में बात करने लगे मेरा साथी उदयन पहले पिट्सबर्ग में साल भर रह कर गया था उसीने कुछ इधर उधर की बातें की और वो दूसरे टेबल पर चली गयी और हम जल्दी बिल पे कर चल दिए ।



Oak tree street, Edison, New Jersey, thanksgiving full Turkey !

२०१० में हम न्यू जर्सी गए थे और ओक ट्री स्ट्रीट, उर्फ़ मिनी इंडिया के एक रेस्त्रां में खाना खाने गए । एक ही जगह पूरे हिंदुस्तान का खाना - इडली, दोसा, समोसा, जलेबी, छोले, रसगुल्ला, पानी पूरी, ढोकला, बटर चिकेन - सभी कुछ था इनके मेनू में और तो और बनारसी पान भी । यह एक अनोखा अनुभव था और अपने वतन से इतने दूर इस जगह में लंच लेने में कैसा लगा बता नहीं सकता। थैंक्स गिविंग्स में एक रिश्तेदार के यहाँ गया था और पहली बार  टर्की मुसल्लम भी खाया ।

Moscow

In the end I am giving an excerpt from one of my blog ! We had an interesting incident in Aeroflot flight between Moscow and Delhi. We were not able to mention food choice during booking and usual anwers to it during check in was "we will serve you Indian Veg meals, if available". We managed. However we were sure our choice - Indian Veg meals. will be available in Delhi flight at least. It was Thursday and both of us needed only veg meals. To our dismay the air hostess had only chicken rice as Indian meals. When we refused and told her we won't have anything, She was at pains to see that we donot go hungry. She offered to serve chicken rice after removing chicken.. We smiled at her. She had her own doubt whether a vegetarian will eat chicken rice with chicken removed. She was how ever at pains to make us eat something. We were famished too having spent 16 uncomfortable hours without proper food, since hardly any vegetarian food was available at the airport. She however brought some bread, butter, fruit etc which was ok with us.

Friday, September 3, 2021

शिक्षक दिवस पर विशेष - मेरे गुरु स्व सरकार साहब और स्व गोयल साहब

शिक्षक दिवस पर विशेष



शिक्षक दिवस फिर आने वाला है और मुझे वो सभी याद आ रहे है जिनसे कभी कुछ भी सीखा है। गुरु तो ईश्वर से भी पहले पूज्य माने गए है । कुछ ऐसे ही गुरुओ के बारे दो शब्द लिखना चाहूंगा। इस बार उन दो गुरुओं के बारे लिख रहा हूँ, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं और कुछ समय पहले ही हमें छोड़ कर दूर चले गए । कुछ रोचक घटनाएं भी घटी और स्कूल के दिनों कि कुछ घटनाएं जो किसी ब्लॉग में पहले भी लिख चुका हूँ फिर से बताना चाहूंगा। छठे क्लास के मेरे पहले क्लास टीचर थे कामता बाबू । न जाने उन्होंने कितनी बार मुझसे क्लास में मुझे "सुन बेटा सुन मेरी चम्पी में बड़़े बड़े गुण" गाना सुनाने को कहा होगा। एक cute छोटे बच्चे (मै सिर्फ 8 वर्ष का था) के मुंह से यह गाना उन्हें शायद बहुत मज़ा देता था। सांतवी में पढ़ाए जाने वाले किताब "शिकार" के एक कहानी जिसमें एक जंगली सुअर और शेर लड़ते लड़ते एक साथ दम तोड़ देते है के सिवा कुछ याद नहीं पर आठवें क्लास के क्लास टीचर थे अनिरुद्ध बाबू जिनके पास मैं गणित पढ़ने जाता था । उन्होंने ऐसा कुछ किया कि दिसंबर में जब रिजल्ट सुनाया गया मुझे क्लास में थर्ड सुना दिया। बाद में जब मार्क्स शीट मिला तो मैने पाया गिरिधर बालोटिया थर्ड आया था और मैं वास्तव में फोर्थ था। मै इसे उनका प्यार ही मानता हूँ। फिर बात आती है नवीं की। केस्टो बाबू से 6-7 बजे शाम को इंग्लिश ट्यूशन पढ़ने जाता था, वापस आते अंधेरा हो जाता था और हम आपस में अक्सर भूत चुडैल की बात करते लौटते और ईमली पेड़ के पास एकदम से चुप हो जाते। तब हमारे दोस्त किसी छरविन्दा (6 बिन्दी वाला) कीड़े कि बात करते थे कि वह बहुत जहरीला होता हैं और मैं कई साल लेडी बर्ड से डरता रहा था। इसी समय क्रिकेट का शौक चर्राया था और अखबार से पोली उमरीगर, नारी कोन्ट्रेक्टर और टाईगर पटौदी के फोटो काट कर जमा करने लगा था। 11वीं के बाद मुझे पटना भेज दिया गया तांकि मैं पढ़ने पर ज्यादा ध्यान दे सकूं। पटना के कॉलेजिएट स्कूल में शुरू शुरू में मेरे मुझे सहपाठी भांव नहीं देते थे। आखिर मैं एक गांव से आया लड़का था । पिछले बेंच पर बैठता था, आँखे खराब होने लगी थी और ब्लैक बोर्ड पर लिखे शब्द इतनी दूर से साफ नहीं दिखते। दोस्त नहीं बने  इससे मुझे पढ़ने पर ध्यान देने का समय मिला । तब ट्यूशन के लिए कदम कुआँ में पार्क रोड के एक इंस्टिट्यूट "साइंटिफिक" जो वास्तव में एक घर में चल रहा था में पढ़ने जाता था और 'सिंह सर' बहुत बार मुझे अपने ही क्लास को पढ़ाने के लिए खड़ा कर देते । एकबार उन्होंने क्लास लेने के बदले कुछ पैसे देने कि भी पेश कश कि थी । पर हमारी शांति दीदी (मेरी सबसे बड़ी मौसेरी बहन जो,मेरी माँ से थोड़ी ही छोटी थी) यह जान कर आग बबूला हो गयी और मुझे अपने पहली "नौकरी" से ज्वाइन करने से पहले ही इस्तीफा देना पड़ा । तब यह इंस्टीट्यूट जिस घर में चलता था वे मेरे दूर के रिश्तेदार का था और मुझे फीस नहीं देना पड़ता था। यह साइंटिफिक ट्युसन इंस्टिट्यूट अब एक हाई स्कूल हैं । खैर कुछ महिनों बाद कॉलेजिएट स्कूल में जब अर्ध वार्षिक परीक्षा हुई तब हमारे फिजिक्स के लोकप्रिय टीचर श्री शैलेन्द्र बाबू ने मुझे स्कूल लेबोरेटरी में बुला भेजा और सिर्फ यह कह कर वापस भेज दिया कि "तो तुम्ही अमिताभ हो ?" बाद में पता लगा मुझे फिजिक्स में हाईएस्ट मार्क्स से थोड़ा ही कम यानि 2nd हाईएस्ट मार्क मिले थे । इसके बाद तो मैं क्लास में अछूत न रहा । अगले बेंच पर बैठने भा लगा। और अपने क्लास के टापर्स के साथ पिकनिक पर भी गया। कॉलेज के गुरुओ के बारे में और बोकारो स्टील के गुरुओ के बारे में मैं बाद में लिखूंगा अब मैं आता हूँ १९७८ के बाद के काल में जब मैंने मेकॉन रांची ज्वाइन किया था ।



After Gradutaion 2nd Alma Mator- MECON and my 2nd school HE School at Jamui
स्व श्री भवानी सरकार

मैं 1971 से बोकारो स्टील में कार्यरत था और 1978 में मुझे बोकारो स्टील से मेकॉन में स्थानांतरित किया गया, BSL और MECON दोनों तब स्टील की दिग्गज कंपनी सेल की सहायक कंपनियां थीं। मैंने भी मेकॉन में जाने कि इच्छा जताई थी और इसके लिए होने वाली इंटरव्यू के सदस्यों में थे मथाई (श्री PV मथाई) साहेब चीफ इंजीनियर, मेकॉन (बिजली विभाग प्रमुख), और सरकार साहेब (श्री भवानी सरकार)- 2nd in command । जहाँ मथाई साहेब ने पावर साइड से सम्बंधित सवाल पूछे जैसे ट्रांसफार्मर के नाम प्लेट में क्या लिखा रहता जिसका जवाब काफी आसान था वहीँ सरकार साहेब ने DC मोटर के कंट्रोल सिस्टम के बारे में सवाल पूछा और मैंने Laplace transform का पूरा equation ही लिख डाला । लब्बो लुवाब यह है कि दोनों को मैंने अच्छा खासा impress कर दिया था। और जब मैं मेकॉन आया तो पहले पहल पावर सिस्टम डिपार्टमेंट में मथाई साहब के अंडर पोस्टिंग हो गयी थी। पर तभी BP Sarker ने बुलाया और कहा "अमिताभो तुम रामदुराई के पास बगुरोय बिल्डिंग चले जाओ " और इस तरह मैं रामदुराई साहेब और BP Goyal साहेब के अंडर आ गया । सरकार साहेब कोलकता के एक बहुत नामी और भारत के तीसरे सबसे पुराने ईंजिनियरिंग कॉलेज शिबपुर" के 1955 बैच के रैंक होल्डर थे । टेक्निकल काबिलियत और मेहनत के कद्रदान थे । सबसे पहले उनसे प्रशंसा तब मिली , जब उनके instruction पर कैलकुलेशन कर के मैंने यह साबित कर दिया कि एक 3 वाइंडिंग ट्रांसफार्मर से दो 6 पल्स थाइरिस्टर कनवर्टर को कनेक्ट करने के परिणामस्वरूप कई हार्मोनिक्स को रद्द हो जाता है और जिसके कारण प्रभावी तौर पर 12 पल्स ऑपरेशन होता है यह । इसी तरह एक बार सिंगल फेज केबल से metallic conduit के गर्म होने पर भी कैलकुलेशन उनके ही कहने पर किया था । 1980 में जब मैं सालेम में था तब बहुत कम सीनियर्स आते थे वहां, जबकि राउरकेला, दुर्गापुर, बर्नपुर , भिलाई और बोकारो सिनियर लोग जाते ही रहते थे । हमें इस कारण काफी freehand मिला। तभी एक दिन पता चला सरकार साहेब आने वाले हैं । उसके बाद जो हुआ उसे मैंने अपने एक ब्लॉग में लिखा था वो ही नीचे दे रहा हूँ । यह बता देना चाहूंगा कि यह वाकया 1980 का है जब सरकार साहब, बीसी मंडल साहब मेकॉन मे़ं चीफ इंजीनियर थे और उनका रूतबा आज के डायरेक्टर से कम न था


We were informed about Mr BP Sarkar's (then Chief Engineer's) visit one day and I was required to bring him from the station. I went there with our taxi car and received him. His very first question was did you start rolling in the mill? Since I had improvised roll force cylinder lifting using battery box, and even rolled, I said "yes". He said "Tab hum kya karenga?" This answer remained a matter of joy to me and to my colleagues. He however was furious when he found how we rolled. He started scolding me for putting the mill to peril by rolling without load cells. Such was his fear that I could nor argue with him or inform him that we are using relief valve to limit the roll force and there was no risk to the mill. He made us run around to adjust speeds of all hydraulic cylinders as per design and Sri CND Nair (Then DE, Hydraulics) was sore going up and down to cellar. His next step was to fix tensiometer which had broken bearings. Since he went inside mill housing which was full of grease, we also went inside and spoiled our clothes and shoes. He tried to fix load cell's control panel and spent whole day behind the panel. When ASEA tensiometer and load cells could not be fixed with his clear offer of a good dinner to all BHEL (Our Electrical Supplier for Salem projec)  engineers, he agreed to witness rolling using batteries as we did earlier. However he felt 100 T load being employed by us was too low, and asked us to increase it to 200 T. We doubled the system pressure as instructed. This however resulted in uncontrolled reduction of material on the two sides and thus in skew. The material will thus move to one side and fold up in the reels. Whole day we did not succeed in stable rolling. Only when Mr Sarker left site we changed back to 100 T force for successful mock rolling to be shown to the minister later on..



उनसे मै बहुत प्रभवित था और मेरे कई ब्लॉग के नायक रहे है। यदि आपने उन्हे convince कर दिया तो उनका uncondotional support आपको मिलता रहेगा, वो जज्बा जो उनके मेकन छोड़ने के बाद मुझे कम boss म मिला। इन सब के बाबजूद सरकार साहेब एक स्ट्रिक्ट बॉस थे और सभी उनसे डरते बहुत थे । बहुत सारी यादें जुडी हैं उनसे। सोशल लाइफ में बहुत एक्टिव थे वे । स्पोर्ट उनका weakness था। मजलिस (बंगाली कल्चरल सोसाइटी) के कई नाटकों में भी भाग लेते रहते थे वे । दुर्गा पूजा में भी बहुत एक्टिव रहते और हर दिन पंडाल में ही मिलते । बहुत दुःख हुआ जब जाना कि कुछ विवाद के चलते उन्होंने निर्देशक पद से इस्तीफा दे दिया । उनके फेयरवेल में कई लोगों ने जब बार बार ड्रामा में उनके एक्टिव होने कि बात छेड़ी तब उन्हें शायद अच्छा नहीं लगा और उनके स्पीच में उन्होंने यह बात बतायी भी ("if I believe you I have only done drama in Mecon") । मेकॉन छोड़ने के बाद उन्होंने एक प्राइवेट कंपनी में कुछ सालों तक काम किया । जब समय मिला तब सरकार साहब ने अपने अनुभव और ज्ञान के आधार पर दो किताबे भी लिखी वो डिज़ाइन engineers के लिए एक treasure से कम नहीं हैं । अंतिम बार उनसे बात तब हुई जब उनका बेटा रांची आने वाला था और मेकॉन गेस्ट हाउस बुकिंग में वो मेरी मदद चाहते थे । टैलेंट को पहचानने कि उनकी काबिलियत के सभी कायल थे और काम के प्रति उनका डेडिकेशन का भी ।


उन्होंने मेरा उत्साह तब बढ़ाया था जब उसकी सख्त जरुरत थी। और मैं यह सब भूल नहीं सकता । सरकार साहब को हार्दिक श्रद्धांजलि। मुझे एक कविता याद आ रही है

तुमसे मिला था प्यार ,कुछ अच्छे नसीब थे ,
हम उन दिनों अमीर थे , जब तुम करीब थे।
गुलज़ार


स्व श्री बुध प्रकाश गोयल

मैं 1978 में गोयल साहेब के संपर्क में तब आया जब मुझे बोकारो स्टील से मेकॉन में स्थानांतरित किया गया, दोनों तब स्टील की दिग्गज कंपनी सेल की सहायक कंपनियां थीं। मुझे बोकारो में बड़े या बहुत बड़े AC / DC मोटरों और 132/11 केवी सबस्टेशनों को चालू करने का व्यावहारिक अनुभव था और उस समय हम अपने-आप को बेहतर अनुभव और ज्ञान वाला समझते थेे और  मेकॉन (सीईडीबी)  और दस्तूरको इंजीनियरों जिनका हमारा बोकारो में सामना होता ही रहता था, को कागजी इंजीनियर । जब मैं मेकॉन आया और गोयल साहेब और उनके तरह कई लोगों के संपर्क में आया तब मैंने पाया कि कितना गलत था मै कि सारा ज्ञान, अनुभव सिर्फ हमारे पास है । क्योंकि कई मेकोनियन की जड़ें तत्कालीन एचएसएल संयंत्रों में थीं और उन्हें भी बहुत व्यावहारिक अनुभव था और थ्योरेटिकल ज्ञान तो था ही उनके पास । हमे बहुत कुछ सीखने की जरूरत थी और हम सभी प्रयत्न करने भी लगे। प्रारंभ में श्री गोयल का रुख एक सख्त अनुशासनवादी बॉस का था। पर मैं उनके कई तकनीकी निर्णयों, अनुमानों और गणनाओं पर सवाल उठाने वाला एक विद्रोही सबोर्डिनेट था। साल भर में वो शायद मुझसे तंग आ गए थे । उनके विचार में मैं ऑफिस का समय फालतू के कॅल्क्युलेशन्स में बर्बाद कर रहा था, उनके लिए मेरे किये कॅल्क्युलेशन्स अनावश्यक थे । श्री गोयल मुझसे बहुत नाराज थे और उन्होंने मुझे एक अन्य बॉस श्री एस.एम. गांगुली के पास स्थानांतरित कर दिया, जो सलेम परियोजना कर रहे थे और बोकारो सीआरएम के मिलों में से एक मिल भी । उनका support भी मुझे बहुत मिला मै उनको भी शिक्षक दिवस की बधाई देना चाहूंगा । गांगुली सीहब में arguements करने की महारत थी और बिना किसीका दिल दुखाए मिटिंग मे अपनी बात कह गुजरते थे। मैने और श्री बीपी गोयल ने परस्पर सम्मान और प्रशंसा विकसित करने में कई साल लगा दिए। मैं उनके बहुआयामी कौशल से चकित था। वे मिल से संबंधित इलेक्ट्रिक्स की गहरी समझ के साथ मैकेनिकल , टेक्नोलॉजी की भी अच्छी पकड़ रखते थे, उन्होंने अपने ज्ञान का इस्तेमाल हमारे सहयोगी अमरीकी कंपनी वीन यूनाइटेड द्वारा सुझाए गए तकनीक और कैलकुलेशन से इतर तरीके से किया और कई बार मोटर की रेटिंग और cost को कम भी किया । वह अलग-अलग भाषाएं बोले लेते थे - हिंदी, अंग्रेजी सभी प्रकार की बोली यानि dialect में - उत्तर भारतीय, दक्षिण भारतीय या पूर्वी भारतीय pronunciation के साथ , यूके या यूएसए कि अंग्रेजी हो या अन्य यूरोपीय pronunciation वाली अंग्रेजी । बंगाली और पंजाबी पूरी कमांड के साथ और प्रामाणिक pronunciation और स्वर में बात कर सकते थे भोजपूरी बोलते भी सुना हूँ उनको । जैसा मैंने पहले कहा है संबंधित मैकेनिकल इंजीनियरिंग और प्रक्रिया का उनका ज्ञान और समझ उत्कृष्ट था। उनका प्रोजेक्ट के लागत का एस्टीमेट यथार्थवादी होता था और उनकी अर्थशास्त्र और वित्त की समझ उत्कृष्ट थी। हम कैलकुलेटर का इस्तेमाल करते लेकिन मैनुअल कैलकुलेशन वे हमसे जल्दी कर लेते थे । मैं उनकी क्षमताओं से चकित था। उनकी याददाश्त, उनके नेगोटिएशन में दक्षता के तो सभी कायल थे ही ।
पर उन्होंने मेरी क्षमता और ज्ञान के आकलन करने में थोड़ा अधिक समय लिया और मेरे लिए उनकी पहली मुखर प्रशंसा तब हुई जब उन्होंने मुझे अपने दोस्त श्री पीसी साधु की मदद करने के लिए कहा, मुझे डीएसपी सेक्शन मिल के हॉट सॉ की कमिशनिंग के लिए बुलाया । इस बार मैंने सिर्फ 2 काम कर उनका विशवास जीत लिया । पहला) हॉट सॉ का मोटर का ब्रेकर बार बार ट्रिप हो रहा था । पावर कन्टक्टर्स के सिर्फ दो कॉन्टेक्ट्स में पिट्टिंग थी और मैं तुरंत समझ गया कि रिवर्सिंग कॉन्टैक्टर्स एक साथ थोड़ी देर ओन होने से शार्ट सर्किट हो रहा था । मैंने बीच में एक छोटे टाइमर लगाने का सुझाव दिया, जिसके परिणामस्वरूप ब्रेकर का ट्रिपिंग बंद हो गई ,दूसरा ) तब प्रोपोरशनल वाल्वस नए नए आये थे और मैंने युकेन proportional valves के लिटरेचर को पढ़ा और पल्पीट में एक कण्ट्रोल बॉक्स fix किया जिसमे वॉल्यूम कंटोल जैसे डिवाइस लगाया, इससे सॉ के मूवमेंट के गति को कण्ट्रोल कर सकते थे बड़े सेक्शन के लिए धीमा और छोटे सेक्शन के लिए तेज़ । इस तरह मोटर करंट लिमिट में ही रहता । इसके बाद जब मैं और गोयल साहेब बांकुरा-रांची पैसेंजर ट्रैन में प्रथम श्रेणी के कूप में वापस रांची की यात्रा कर रहे थे, तब उन्होंने कहा "तुम मेकॉन में क्या कर रहे हैं?"। वह तब मेकॉन से आरएमएल, ऋषिकेश जाने की योजना बना रहे थे और चाहते थे कि मैं साथ आ जाऊं। मेरे बच्चे बहुत छोटे थे और स्कूल में थे इसलिए मैं एक सुरक्षित सार्वजनिक उपक्रम की नौकरी छोड़ने और निजी उद्यम में प्रयास करने के मूड में नहीं था मैं श्री गोयल जैसे सख्त बॉस के साथ काम करने से भी तब डरता था । पर उनसे इशारे में मिली प्रशंसा मेरे लिए बहुत थी।

जिंदल स्टेनलेस में गोयल साहब के साथ

गोयल साहब पंजाब यूनिवर्सिटी के इंजिनीरिंग ग्रेजुएट थे और १९६३ में उन्होंने दुर्गापुर स्टील प्लांट में GE के रूप में ज्वाइन किया था और १९७४ में मेकॉन में आ गए । १९९३ उन्होंने मेकॉन छोड़ कर रोड मास्टर (RMIL ) ऋषिकेश ज्वाइन किया । मेकॉन ने एक मिल RMIL को supply किया था । १९९४ में उन्होंने जिंदल ज्वाइन किया और धीरे धीरे जिंदल के स्तम्भ हो गए । उनके सुझाव को हमेशा माना गया क्योंकि वे भी एक risk taker थे एकदम जिंदल ग्रुप के बाबुजी स्व ओम प्रकाश जिंदल जी के तरह। २००४ में वे हिसार से दिल्ली आ गये और इधर इसी बीच मैं भी करीब ३ साल के श्रीहरिकोटा प्रवास और लांच पैड के इरेक्शन और कमीशनिंग के बाद २००३ में रांची लौटा । तभी एक दिन मुझे गोयल साहब मेकॉन में दिखे । मैंने उनसे मिला सिर्फ नमस्ते कहने के लिए पर उन्होंने फिर अकेले में बुलाया और अपना पुराना प्रश्न फिर दुहराया, तुम मेकॉन में क्या कर रहो हो ? मैंने तब कुछ नहीं कहा। पर २००४ दिसंबर में जब मेरे पुत्र के तिलक का कार्यक्रम हो रहा था तभी उनका फ़ोन आया । शोर शराबे में सिर्फ उनकी यही बात सुनायी पड़ी बेटे की शादी में मुझे क्यों नहीं बुलाया ? तब क्या पता मैं भविष्य में उनके पुत्र नवीन की शादी attend करने वाला था । इस बार वे मुझे जाजपुर, ओडिशा प्लांट के लिए बतौर एलेक्ट्रिकल हेड लेना चाहते थे। मैंने अपनी माँ के स्वस्थ्य का हवाला दिया की जाजपुर में कोई विशेषज्ञ डॉक्टर भी नहीं मिलेगा तब उन्होंने जाजपुर जा कर देख आने को कहा । मैं  जाजपुर जा कर देख भी आया। अभी कुछ सोच ही रहा था की मेरी माँ हमें छोड़ गयी और तब मैंने गोयल साहब का ऑफर मान लिया । उन्होंने या जिंदल स्टेनलेस ने मुझे एक इंटरव्यू के बाद हिसार के कोल्ड मिल में वाईस प्रेसिडेंड और प्रोजेक्ट हेड के रूप में ले लिया। वे 2004 में हिसार छोड़ दिल्ली आ चुके थे और मुझे वही खाली जगह भरनी थी। थोड़ा घबराया और मेकन के कई सिनियर और तब के CMD श्री सेनापति के रोकने के बावजूद  मैं चला गया गोयल साहब के नीचे काम करने एक बार फिर। मैं धीरे धीरे हिसार के कोल्ड मिल के अलग अलग यूनिट्स को समझने लगा था । और लोगों का विश्वास जीतने लगा था। ऐसे स्टील प्लांट का क्लासिक झगड़ा यहाँ भी था यानि प्रोजेक्ट वाले को ऑपरेशन वालों का इलज़ाम झेलना पड़ता था। ऐसे यहाँ सेल प्लांट से इतर कैपिटल मैंटेनैंस और डिज़ाइन वर्क भी प्रजेक्ट की ही जिम्मेदारी थी । गोयल साहब यदा कदा डांट भी देते । सभी ठीक चल रहा था तभी २००५ सितम्बर में अचानक मेरे छोटे भाई की पत्नी का देहांत हो गया। जब उसके अंत्योष्टि में गए तो मेरी पत्नी उसके दो बच्चों के बारे में चिंतित हो गयी क्योंकि तब घर में कोई female सदस्य नहीं बची थी जो बच्चों का ख्याल रखती । वापस आने पर हमने विचार किया और दोनों बच्चों को हिसार ले आने को सोचने लगा । स्कूल, कॉलेज भी देख कर रख लिया पर भाई ने बच्चों के इतनी दूर भेजने से मना कर दिया । तब एक दिन मैंने मेकॉन को एक ईमेल भेज दिया की मैं राँची लौटना चाहता हूँ । करीब ४ महीने बाद जब मै भूल भी चुका था मेकॉन से फोन आ गया पर इधर एक misunderstanding के कारण गोयल साहब ने इस्तीफा दे दिया। मैंने अपने इस्तीफा देने अपनी मंशा किसी को बता भी नहीं पाया और DMD साहब ने गोयल साहब के इस्तीफे के बात सुनकर मुझे कुछ अतिरिक्त जिम्मेदारी जो गोयल साहब संभाल रहे थे मुझे सौप दी । गोयल साहब का नोटिस पिरियड चल रहा था। लेकिन एक महीने बाद तक मैं रुका रहा क्योंकि कुछ काम (दो narrow mill का AGC ) जो मुझे गोयल साहब के guidance के बिना ही करने को कहा गया था मैं वह ख़त्म करके ही इस्तीफा देना चाहता था । खैर जिंदल में सभी खासकर गोयल साहब (जिन्हे इस्तीफा वापस लेने को मना लिया गयी था) के रोकने की कोशिश के बाबजूद मैंने इस्तीफा दे दिया और २००६ में फिर से मेकॉन उसी pay और post पर ज्वाइन कर लिया । बाद में पता चला की मुझे कॉन्टिनुइटी ऑफ़ सर्विस नहीं दी गयी हैं । उधर मेरे आने के बाद गोयल साहब एक बार फिर हिसार आ गए और २००७ तक वही रहे । २००७ में वे जाजपुर कमीशनिंग के लिए चले गए और प्लांट की समस्याओं के सुलझा कर कमीशन भी करवाया । २०११ में उन्हें रक्त का कैंसर हो गया और उनका स्वस्थ्य गिरता गया पर वे कहां घर बैठने वाले थे थोड़ा ठीक होते ही २०१७ में काम पर वापस आ गए पर काल को कोई रोक पाया हैं ? मार्च २०१८ को हम सभी को दुखी छोड़ कर वे चले गए । उनके सम्मान में जिंदल ग्रुप ने जाजपुर प्लांट के पिकलिंग लाइन का नाम रख दिया "BPG पिकलिंग लाइन" । काश उनके स्वस्थ्य के बारे में पहले से पता होता तो मै कम से कम एक बार मिल तो आता । मेरी भगवान से प्रार्थना हैं कि उन्हें अपने चरणों में स्थान दे । ॐ शांति । जिंदल के एक सहकर्मी ने कभी उनके लिए यह कविता शेयर किया था । पेश हैं :


अजीब आदमी था वो
मोहब्बतों का गीत था,
बगावतों का राग था
कभी वो सिर्फ फूल था
कभी वो सिर्फ आग था
अजीब आदमी था वो
वो मुफलिसों से कहता था
कि दिन बदल भी सकते हैं
वो जाबिरों से कहता था
तुम्हारे सर पे सोने के जो ताज हैं,
कभी पिघल भी सकते हैं
वो बंदिशों से कहता था,
मैं तुमको तोड सकता हूँ
सहूलतों से कहता था ,
मैं तुमको छोड सकता हूँ
वो आरजू से कहता था,
मैं तेरा हमसफ़र हूँ ,
तेरे साथ् ही चलूँगा मैं
तू चाहे जितनी दूर भी बना ले मंज़िलें,
कभी नही थकूंगा मैं
अजीब आदमी था वो

Wednesday, September 1, 2021

मेरी स्वाद यात्रा - जगह जगह का खाना भाग-२

मेरी स्वाद यात्रा भाग-1 के आगे

सबसे पहले पिछले भाग में हुई टाईपिंग की गलतियों के लिए क्षमा करें । अब ठीक कर दिया है। कुछ तकनीकी कारणो से हो जाती है ये गलतियाँ। लैपटॉप में हिंदी टाईप करने के लिए मै online converter प्रयोग में लाता हूँ और गलतियाँ बाद में मोबाईल (जिसमें हिंदी कीबोर्ड है) से सुधारता हूँ। लेकिन कुछ बाते छूट भी गई थी, जैसे माँ का बनाया घी भात और भर्ता वास्तव में परीक्षा के दिनों का Brunch होता था क्योंकि इन दिनों स्कूल में टिफिन या Lunch break नहीं होता था। अन्य दिनों में हम लंच में घर आ कर खाना खा कर जाते थे। दूसरी बात जो बताना भूला वो था बेगुसराय के मक्की की रोटी का साईज। मै तो एक चौथाई या ज्यादा से ज्यादा आधी रोटी खा पाता था जबकि बड़ों के लिए भी पूरी एक रोटी भारी पड़ती थी। मुझे दूध रोटी का नाश्ता भाता था और दूध के साथ यह मक्की की रोटी भी पसंद थी। मक्की की रोटी चने के साग जिसमे सरसो का कच्चा तेल डाला गया हो और धूप में अचार की तरह रखा गया हो के साथ भी मजे ले कर खाया जाता था ।
मैं कोई फूडी नहीं हूँ न हीं जगह जगह के सभी तरह के व्यंजन को चख कर स्वाद लेता हूँ न ही मुझे यह पता चलता है की किस खाने में क्या डाला गया हैं । मैंने बिना कोई फरमाईश के परोसे गए सभी तरह के खाने खाये है और ज्यादातर लोगों द्वारा खाये जाने वाले खाना ही होटलों में भी खाया हैं । यह ब्लॉग मेरे द्वारा साधारणतः खाये खाने के अनुभव मात्रा हैं । कुछ गलत लिखा हो तो माफ़ करे ।

अवसरों पर बिहारी व्यंजन

सबसे पहले बताना चाहूंगा कि हमारे देश में और बिहार में भी हर मौसम / महीने के क्या खाना या क्या करना चाहिए यह हमारे शास्त्रों में बताया हुआ हैं । "चैते चना, बैसाखे बेल, जैठे शयन, आषाढ़े खेल, सावन हर्रे, भादो तीत। कुवार मास गुड़ सेवै नित, कार्तिक मूल, अगहन तेल, पूस में करे दूध से मेल। माघ मास घी-खिचड़ी खाय, फागुन उठ नित प्रात नहाय।" इसके सिवा शादी और दूसरे अवसरों पर भी क्या खाना है उसके भी नियम हैं । यहा तक कि किस महिने मे क्या नहीं खाना चाहिए वह भी बताया गया है।

बिहार/ झारखण्ड में भी अवसरों पर और हर मौसम में अलग अलग तरह के व्यंजन खाये जाते हैं । जो शायद उपर लिखे सुत्र पर आधारित है। मैं इस भाग में सबसे पहले इसी बात पर अपना अनुभव या स्वाद यात्रा शेयर करना चाहता हूँ । साल के प्रारम्भ में ही आ जाता हैं पौष का महीना और यह महीना है पिठ्ठा खाने का । माँए अवश्य अपने बच्चो को पूष में पिठ्ठा बना कर खिलाती है। पिठ्ठा चावल के आटे में फिलिंग कर बनाया जाता है और किसी न किसी रूप में पूरे भारत में बनाया खाया जाता है पर बनाने का बिहारी तरीका थोड़ा अलग है । मैंने एक ब्लॉग पिट्ठा पर लिखा था पिठ्ठा पौषाहार उसे भी पढ़ सकते हैं । दूसरा मौका तुरंत बाद माघ के महीने में आ जाता है मकर संक्रांति जिसे बिहार में कहते ही है दही चूड़ा या तिला संक्रांति यानि वो पर्व जिसमे दही चूड़ा तिल के साथ खाया जाता हैं । हम जब बच्चे तो इस पर्व का इंतज़ार करते थे क्योंकि तिलकुट के आलावा भी कई प्रकार की तिल से बनी मिठाईयां खाने को मिलता है जैसे तिल का लड्डू, तिल कतरी, तिलवा, रेवाड़ी तो खाने मिलता ही है कई और चीज़े भी मिलती है जैसे मुढ़ी, चुड़े की लाई,अनरसा , लट्ठो चिनिया बादाम (मूंगफली) के चक्की वैगेरह। इतने तरह की मिठाईया आती थी की सभी को खा भी नहीं पाते। मिथिला में चूड़ा दही खाने का एक अलग अनुभव मिला । यदि आप कही खाने पर बुलाये गए हो तो चूड़ा जितना लेना वो एक ही बार ले ले क्योंकि परसन में सिर्फ दही , मिठाई परोसी जाती हैं ।

पिठ्ठा गुड़ और दाल भरा हुआ

तीसरा अवसर जो आता हैं वो है फागुन - चैत में ( होली पर मेरा ब्लॉग भी देख सकते हैं )होली का मौका । कहना न होगा की ये मौका है पिडुकिया , मॉल पुआ, सूखा पुआ, और दही बड़े का । सभी बहुत पसंद है मुझे ।
फिर मौका आता हैं मेष संक्रांति का जिसे बिहार, झारखण्ड में कहते हैं सतुआनी और मिथिला में जुड़ शीतल । यह मौका है सत्तू (Powdered roasted Bengal gram ) में प्याज़, कच्चे आम और नमक को मिला कर पानी से सान (गूंध) कर खाने का । इसमें अचार के तेल मिला लेने से मज़ा १० गुना हो जाता हैं । ये तो स्वादिष्ट होता ही हैं पर मैं खाता था चने और जौ की सत्तू को दूध से सान कर उसमे घी, चीनी डाल कर - मजेदार होता था। सत्तू बिहार का एक फ़ास्ट फ़ूड हैं जो स्वास्थ्यकर भी हैं । अब तो यह पूरी दुनिया में मिलता हैं पर मैंने देखा था कैसे कोर्ट की तारीख पर आने वाले लोग अंगोछे में ही सत्तू सान कर मुठ्ठल्ले बना कर खा लेते थे मेरे स्कूल के कुएं की जगत पर । मिथिला में इस दिन बासी खाते कहते हैं क्योंकि इसका तासीर ठंडा होता है ।

गर्मियों में कई तरह के फल मिलते है और खाये जाते हैं और मैं भी खाता हूँ और पसंद करता हूँ । जिस चीज़ का जिक्र सबसे पहले करना चाहूंगा वो है आम । बचपन में बेगूसराय में नाना के कलम बाग़ से बैल गाड़ी भर आम आ जाते और पच्छिम वाले रूम में रखा जाता । धीरे धीरे वे पकते और एक बाल्टी आम रोज़ निकाले जाते और पानी में डाल दिए जाते । तब आम काट कर नहीं खाये जाते थे। पूरे आम को थोड़ा चूस कर और फिर मुंह से ही छील कर खाये जाते। दोपहर खाना खाने के बाद हम खाना शुरू करते ३-५ आम हर बड़ा बच्चा (मेरे मौसेरे भाई बहन) खा लेता पर मैं सबसे छोटा था और एक खाते खाते ही बाल्टी खाली हो जाता। मालदह, चौसा, जर्दालु, गुलाब खास वैगेरह तरह तरह के आम आते थे और हर महीने में अलग अलग वैरायटी। सीपिया, सुकुल के आते आते आम का मौसम ख़तम पर आ जाता । उस रूम में ताला लगा रहता एक बार हमारे मौसेरे बड़े भाई ने रूम की नाली में डंडा डाल कर फुलबारी के तरफ से आम निकलने की कोशिश के थी पर सफल नहीं हो सके थे । आम नाली के छोटे छेद में अटक गया और अगले दिन चोरी की कोशिश पकड़ी गयी । कलम बाग से ही लीची भी आता। थोड़े समय के लिए ही आता पर अत्यंत रसीला और मीठा था यह सुपरहिट फल।

आम, लीची खरीद कर खाने में कहाँ आता है वो स्वाद और वो संतोष ! जब कॉलेज में था तब दीघा का दूधिया मालदह आम का तो चस्का ही लग गया था पतला छिलका पतला आठी वाला यह आम गूदे से भरा होता है । और इसलिए लोग कहते है " आम फलों का राजा हो न हो मालदह आम आमों का राजा आवश्य हैं ।" कई आम बहुत ज्यादा मीठे होते पर सुंगध नहीं होती tang नहीं होती । मालदह और लंगड़ा आम में यह सब होता है । इसलिए यह है राजा आमों का । एक और फल जो गर्मी में अभी भी पसंद आता है वह हैं रांची के हरे छोटे साइज वाले लाल गूदे वाले मीठे तरबूज । यह पटना, जमुई में मिलने वाले तरबूज से ज्यादा मीठे होते है और ऊपर से चीनी नहीं डालनी पड़ती थी। बेल भी गर्मियों में खाये जाते पर इसके बीज निकलना एक कठिन कार्य है और इसीलिए यह उतना पसंद नहीं था मुझे । पर मेरे बच्चो को पसंद था इसलिए धीरे धीरे मुझे भी अच्छा लगने लगा । अब मेरी पोती को बहुत पसंद हैं तरबूज़ ।

बारिश के समय पकोड़ा नंबर वन पर आता हैं बहुत तरह के पकोड़े खाये पर मुझे जो पसंद आये वह है प्याज़ के पकोड़े जिसे बिहार में प्याज़ी कहते है इसके सिवा कोहरा ( PUMPKIN ) के फूल का पकोड़ा भी मझे पसंद हैं । दादू को अगस्त के फूल का पकोड़ा , सब्जी पसंद थी और मुझे भी इसका पकौड़ा पसंद था दादू अक्सर मुझे पारस बाबू के यहाँ से अगस्त का फूल लाने भेजा करती थी । दशहरा, दिवाली, भाई दूज और छठ में खाने के व्यंजन तो सभी को पता हैं । दशहरा पर तो मैंने एक ब्लॉग पहले भी लिखा था । मिठाई और मिठाई खा कर अघा जाना दशहरा ऐसा ही होता था मेरा । दिवाली के दो दिन बाद होने वाले भाई दूज का खाना हमेशा मंझली फुआ के होता था और उनके और बेबी दी लिली दी के बनाये खाने के स्वाद के क्या कहने । जैसी परंपरा है खाना परोसने के बाद घी को बहुत ऊंचाई से परोसा जाता - जितना ऊँचा उतनी होगी भाई की उम्र ।

विवाह का खाना - बिहार, दक्षिण और बंगाल का

अब एक ही है अवसर जिसका मैं जिक्र करना चाहता हूँ । वह है विवाह के अवसर पर बनाने वाला खाना । जिस दो रस्मों के बात मैं करूँगा वह हैं तिलक और कच्ची या मड़वे पर का खाना । तिलक में दाल पूरी और खीर खाया जाता है । साथ में सब्जी और मिठाई तो होती ही है । मड़वे पर कच्ची या भात (Boiled rice ) खिलाया जाता हैं । ऐसी मान्यता हैं कि भात अपने सम्बन्धियों के साथ ही खाया जाता है और विवाह के बाद तो दोनों परिवार एक सम्बन्ध में जुड़ जाते हैं । मेरे यहाँ तब नॉन वेज शादी में परोसा नहीं जाता था और कच्ची खाने में लाल साग और कोहरे (pumpkin ) कि सब्जी must होती है । तेल मसले वाले खाना खाने के बाद यह सात्विक खाना बहुत ही स्वादिष्ट लगता हैं। अब मछली भी बनता है पर मंडप पर परोसा नहीं जाता । मंडवे पर दूल्हे के नजदीकी सम्बन्धी बैठाये जाते सम्बन्धी (दूल्हे और दुल्हन के पिता) एक ही थाली में साथ साथ खाते हैं । खाना दही रसगुल्ले के साथ ख़त्म होता । कई लोग जैसे दूल्हे के जीजा फूफा मछली का लोभ छोड़ नहीं सकते और मछली खाने खाना ख़त्म होने से पहले मंडप से बहार आ कर मछली खाते है, दही मिठाई भी मंडप के बाहर ही खा लेते ।

विवाह के खाने की बात चली है तो एक बात जो जेहन में आती है वह है परोस कर खिलाने का चलन समाप्त प्राय: हो गया है। अब तो बस Buffet लगा देते है। लोग अपने पसंद का खाना ढ़ूढते रहते है। बच्चे इस कंपीटीशन में लग जाते है कि किसने कितने बोतल कोल्ड ड्रिंक पिया या कितने आईस क्रीम खाए और बड़े लोग नन भेज के स्टॉल पर भीड़ लगा देते है। किसी लेखक ने ऐसे पार्टी को नाम दिया था चील झपट्टा पार्टी। सब तरह के खाने छोटे से प्लेट में एक दूसरे में मिल भी जाते हैं । किस खाने का स्वाद कैसा था न पता चलता हैं न ही याद रहता हैं । पर लोगों के साथ मजबूरी है कि अब घर में इतने लोग नही होते जो अपना Enjoyment, सजना संवरना छोड़ कर खाना परोसे जैसा मैने अपने बहनों के विवाह में किया था । पर मै भी बिटिया की शादी में कैटरर पर आश्रित था और buffet का इंतेज़ाम ही किया । ऐसे में बंगालयों के पारंपरिक भोज की बात करूंगा जिसका आनन्द मैनें दो बार लिया है मेरे मित्र सुधांशु मुखर्जी के रिशेप्शन में और भांजे संजय की पहली शादी में। यहाँ कभी आपके प्लेट में दो से ज्यादा item नहीं होगें। यदि पूरी और दाल की सब्जी पहले आई तो जब ज्यादा लोग यह खा लेगें तब शायद माछ भात आए। फिर पुलाव मीट । इसी तरह साधारण से खाना और गरिष्ट स्वादिष्ट होता जाएंगा और यदि आपने पहले ज्यादा ले लिया तो अफसोस करेंगे जब मछेर पातुरी, चिंगरी माछ, छेना पायस, या रबड़ी परोसी जाएगी। मिष्टी दोई भी must item होता है।और अंत में आता हैं मीठी चटनी जो ज्यादातर टमाटर और खजूर कि बानी होती है ।


बागुन भाजा और रसोगुल्ला


दक्षिण भारतियों के विवाह

अक्सर सुबह या दिन में ही होता है। ज्यादा आडंबर नहीं होता है यहाँ। 2 ऐसे ही विवाह में भोज खाने का अवसर मिला है मुझे। श्री हरिकोटा में ISRO के एक ईंजिनियर के यहाँ और गुरू वीयूर में मेरी भांजी की सहेली सारण्या के विवाह में। एक प्लेट के उपर गोल कटा केले का पत्ता रखते है । ऐसा करने से पहले वाली एक मुश्किल दूर हो गयी जब साभार, रसम केले के पत्ते से टपक कर टेबल या ज़मीन पर आ जाता था । हर आइटम का जगह निश्चित है इस प्लेट पर । परोसने वाले एक एक कर आते है और ठीक ठीक जगह पर सभी आइटम डालते जाते है । जिस गति से वो परसते है वो कबीले तारीफ होता है। और खाना सही समय पर समाप्त हो जाता है । खाने में वाइट राइस (भात), येलो राइस (लेमन राइस), रेड राइस (टोमेटो राइस) या इसी तरह के चावल के डिश होते है । साभार, रसम, चटनी, अप्पम (पापड़), केला के साथ कई कटोरियों में मोर (मठ्ठा) , ३-४ सब्जी (करी), पायसम और अंत में आता हैं curd rice और पान के बीड़ा ।



अन्य राज्यों का खाना

भारत के अन्य राज्यों में खाए खाने का लंबा लिस्ट है। सक्षेप में सिर्फ कुछ बातें बताना चाहता हूँ। 1979 में पहली बार मै टूर पर तब के बंबई गया तो कई छोटे पर साफ सुथरे रेस्त्रां में नाश्ता करने जाता था तब देखा था कि वहां निगम द्वारा एक तख्ती लगाई गई थी। इस पर उस रेस्त्रां का ग्रेड लिखा होता जो शायद साफ सफाई, खानाnऔर सर्विस की quality के अनुसार दिया जाता होगा। सैंडविच एक लोकप्रिय नाश्ता था यहाँ और चटनी सैंडविच पहली बार यहीं खाया था। खार के ओरियंटल पैलेश हॉटल में २- ३ बार रुका था । जब भी यहाँ रुकता खाना बाहर सामने लगे एक स्टॉल पर जा कर खता था । पहली बार मक्की की रोटी सरसों की साग के साथ यहीं खाई थी। तब एक बार बेगुसराय की मक्की की रोटी और बूंट की साग याद आ गई थी। बंबई जो अब मुंबई है पहले 1969 में आया था और तब पहली बार एक जगह 4 course डिनर खाने गया । गोद में रखने को एक कपड़ा (नेपकिन) और चम्मच, कांटे सजे हुए थे । सभी धीरे धीरे बात कर रहे थे। हम लोगों के सिवा। बेयरा पहले बर्तनो के धोवन जैसा सूप और सूप ब्रेड स्टिक्स लाया। अगल बगल के लोंगों को देख कर पता लगा कि इसे किस चम्मच से खाना है। नमक भी नहीं था पर चिकन के छोटे टुकड़े थे इसमें। बाद में पाया नमकदानी और सॉस टेबल पर ही रखा था। फिर कुछ उबली सब्जियॉ, वाइट पास्ता और ब्रेड आया और फिर आया ब्याल्ड चिकन देख कर दिख धक से रह गया। बहुत बेस्वाद खाना। लोंगों के घूरने से पता चला कि चम्मच प्लेट से टकराने की आवाज हम ज्यादा निकाल रहे थे। इसके बाद आइस क्रीम और अंत में कॉफी SERVE गया । अजीब सा कॉम्बिनेशन ।आखिर में आया गरम पानी और निंबू। तब तक बगल वाले टेबल देख कर हम जान गए थे कि इसका करना क्या है वर्ना शायद पी गए होते। अब वैसा फार्मल रेस्त्रां 5 स्टार में भी नहीं दिखता। डिनर काफी महंगा था 110 रू शायद कुछ मेंबरसिप फीस भी था इसमें जो किसीने पहले बताया नहीं था। मुंबई की भेल पुरी सुन चुका था और 1969 में जुहू बीच पर खाया भी,मैने सोच रखा था शायद पूरी के साथ भेल नाम की सब्जी खिलाते होंगें पर ये तो अपने झाल मुढ़ी का भाई निकला। प्रसिद्द पाव भाजी और बड़ा पाव भी अलग अलग टाइम पर खाया । बड़ा पाव बहुत पसंद आया जबकि किसी लोकल स्टेशन के प्लेटफार्म पर खाया था । मुंबई और नासिक में पहली बार पोहा, शीरा और श्रीखंड भी खाया । पोहा तो अब हमारे नाश्ते में शामिल भी है, शीरा या हलवा तो पहले से ही खाते आ रहे है पर यहाँ ज्यादा घी और ज्यादा चीन डालते हैं । श्रीखंड मुझे तो पसंद है पर मेरी पत्नी को इसलिए नहीं पसंद की ज्यादा मीठा होता हैं यह ।

मालवा का खाना

मालवा यानि इंदौर के आस पास का खाना । मैंने इंदौर के दो जगह में खाने का आनंद लिया है। पहला राजवाड़ा के पास का सराफा और दूसरा छप्पन । क्योंकि मेरी बिटिया ने यही से पोस्ट ग्रेजुएशन किया मैंने इन दोनों जगह जा कर कुछ न कुछ खा आया हूँ । मालवा के खाने और सब जगह से अलग होता हैं जैसे पोहा के साथ जलेबी, हर खाने की चीज़ के ऊपर डाले गए रतलामी सेव यहाँ तक की केक के ऊपर भी । दाल बाटी से लेकर गुलाब जामुन तक, मसाला डोसा से लेकर चाट तक या आइसक्रीम से लेकर लस्सी तक इन दो जगहों में सभी कुछ मिल जाता हैं और लोग खान पान के बहुत शौक़ीन भी है यहाँ । छप्पन में मिलने वाला आग के साथ पान हो या तवा आइस क्रीम । weirdest फ़ूड आइटम यहाँ मिल जायेगा।
इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद के वैभव खंड में एक ऐसा ही फ़ूड कोर्ट हैं जहाँ नार्थ इंडियन, साउथ इंडियन, चीयनीज़, पिज़्ज़ा, बेकरी आइटम सभी मिल जाता हैं । रसगुल्ला हो या केक, वेज थाली हो या गलावटी कबाब, मोमो हो या मसाला डोसा सभी यहाँ भी मिल जाता हैं ।

कोलकाता का खाना

खाने के जिक्र हो और कलकत्ते की ना करूं ? कलकत्ते में सस्ते से महंगा सभी तरह का खाना मिल जाता हैं। हावड़ा स्टेशन के सामने वाले झोपड़ी टाइप रेस्टोरेंट से शुरू करता हूँ । यहाँ भात माछ हो या नाश्ते में कचौड़ी जलेबी गरीब लोग लोग भी खा सकते हैं, चाहे मछली के पीस की मोटाई देख आश्चर्य ही क्यों न हो कि कैसे कटा होगा इतना पतला सा । मुझे १९८८ में कोलकाता हाई कोर्ट हर महीने जाना पड़ता था । वहां देखा दो फ्लोर के छोटे छोटे दुकान थे नीचे चाय और ऊपर पान सिगरेट या मिठाई कि दुकान । ऐसा कही नहीं देखा । कोलकाता मिठाईयों के लिए प्रसिद्द हैं । रसगुल्ले कहा के हैं ? बंगाल वाले नोबिन चंद्र दास को रसोगुल्ला के अविष्कारक मानते हैं । इसके GI टैग को लेकर बंगाल और ओडिसा के बीच थोड़ी अनबन की स्थिति भी हो गयी था । पर अब दोनी को अपने अपने वैरायटी के रसगुल्ला का GI टैग मिल गया हैं । सन्देश भी बंगाल की ही देन हैं। KC दास का रसगुल्ले तो प्रसिद्द हैं ही गंगूराम, गंगूराम एंड संस, गंगूराम ब्रदर्स या गंगूराम ग्रैंडसंस इन नामों के की मिठाई दुकान पूरे कलकत्ते में मिल जाएगी ।

बंगाली मिठाई,कोलकाता और छेना पोडा मिठाई, ओडिसा

कोलकाता में चीन टाउन नाम की जगह हैं । ऐसे तो यहाँ सभी तरह के रेस्टोरेंट हैं पर चीयनीज़ रेस्टोरेंट ज्यादा हैं । इस लोकैलिटी में चीन से आये और कई पुश्तों से रह रहे चीनी जाति के भारतीय नागरिक बसें हैं । EM बाईपास के पास स्थित इस जगह में मैं दो बार खाना खाने गया । मैं तो लज़ीज़ वेज खाना खाया पर (मैं करीब १४ वर्ष वेजिटेरियन रहा था) पर जैसा मेरे दोस्तों से बताया नॉन वेज भी काफी स्वादिस्ट था । यदि अल्कोहल लेना चाहते हैं तो वैसे रेस्टॉरटैंट भी हैं यहाँ । सर्विस भी काफी अच्छा था । मेट्रो सिनेमा के पास एक रेस्त्रां जहाँ मैं जीजाजी के साथ पहली बार गया था बाद में भी कई बार गए पर अब नाम नहीं याद नहीं हैं । उड़ीसा मे एक मिठाई मिलती है छेना पोड़। ये सिर्फ यही मिलेगा । एक बात जो याद आ गयी वो हैं पुरी के जगन्नाथ मंदिर से मिले भोग प्रसाद से । २०१७ में हमने पूजा के बाद भोग प्रसाद की रसीद कटा ली । पांडा जी ने शाम को प्रसाद होटल में पहुँचा दिया । बहुत ज्यादा था हमे डिनर ऑफ करना पड़ा । जब होटल वाले से खाने का प्लेट माँगा और उसे पता चला की हम उसमे भोग खायेगे तब उसने सिर्फ पत्तल का प्लेट दे गया । पता चला भोग को उस जगह रखना भी मना हैं जहाँ प्याज़, लहसुन या नॉन वेज कभी रखा गया हो । होटल वाले ने टेबल पर रखने से भी मना किया । भगवान के छप्पन भोग का ही हिस्सा होता हैं यह । राबड़ी तो बहुत मजेदार था और सब्जिया तो वाह ।


विशाखापत्तनम

विशाखापत्तनम के बारे में दो लाइन लिख कर मैं समाप्त करता हूँ । यहाँ मैं ९० के दशक में करीब ३ साल बिताये । पहली बात जो नोटिस किया वो था यहाँ चाय-पान दुकान से ज्यादा दारु की दुकाने थी । इन दुकानों को रेस्टौरेंट / बार की तरह कुर्सी पर बैठा पिलाने का परमिशन नहीं थी । वे एक डेढ़ पेग का सैंपल देते थे पानी मिला कर और पीने वाले को जल्दी जल्दी पानी की तरह पी लेना होता था । दूसरी बात जो याद रह गया वह हैं डॉल्फिन होटल का खाना । यह कंपनी का एप्रूव्ड होटल था और हमारे कई सहकर्मी यही रुकते थे । डॉल्फिन एक ४ तारा होटल हैं और हैदराबाद के रामोजी फिल्म सिटी वालों का हैं यह होटल। ग्राउंड फ्लोर पर था वेज रेस्टोरेंट वसुंधरा ! हम सब यहाँ का खाना और आत्मीयता भरी सर्विस बहुत पसंद करते। सप्ताहांत में हम सातवे तल्ले पर स्थित होराइजन रेस्टोरेंट में नॉन वेज खाना और कुछ ड्रिंक्स लेने जरूर जाते और खाने के साथ लाइव संगीत का भी मज़ा लेते । गर्म गर्म तवा पर परोसे जाने वाले डिश सिज़्लर यही खाया और कई बार खाया । तीसरी बात जो याद हैं वह है वहाँ के हमारे स्टील प्लांट सेक्टर 8 के गेस्ट हाउस का खाना । दो ब्लॉक का गेस्ट हॉउस था और मैं मेस से दूर वाले ब्लॉक में रहता था । खाना बनते ही इसका सुगंध से पूरा मोहल्ला में फ़ैल जाता और मुझे पता चल जाता की खाना तैयार हैं । यह कमाल था कोरबा, छत्तीसगढ में उगाये जाने वाले दुबराज चावल का का जो फी प्रसिद्ध है । मुझे दो तीन बार कोरबा जाने का मौका मिला था और तब मै वहाँ से 2-4 किलो दुबराज चावल घर भी ले आता था। अपने इस ज्ञान और अनुभव का उपयोग कर मैने इस गेस्ट हाउस में भी इस चावल को introduce किया और सभी को बहुत पसंद भी आया। एक बार noida में इसी के धोखे में मै 'दूबर' राईस खरीद लाया था और पछताया था। कोरबा जिस एक चीज़ के लिए और फेमस हैं वो है कोसा सिल्क ।


अगले भाग में विदेश के खाने के बारे में लिखूंगा । पढियेगा जरूर ।

Thursday, August 26, 2021

मेरी स्वाद यात्रा - जगह जगह का खाना भाग-१

मैं बिहार में जन्मा और विद्या अर्जन पश्चात झाखंड में अपना तक़रीबन पूरा जीवन बिताया। बिहार और झारखण्ड में ऐसे तो पूर्वी भारत में बनने वाले सभी व्यंजन खाये पकाये जाते है पर कुछ विशेष भी है यहाँ जैसे : दोनों राज्यों में :
ठेकुआ , पिडुकिया ,पुआ, मखाना से बने व्यंजन , सत्तू पराठा , लिट्टी चोखा , दही - चूड़ा , मीट चूड़ा , मोटी मकई रोटी और ओल का भरता या चना के साग (कच्चे सरसो तेल के साथ थोड़ा खट्टा किया हुआ ) , बूट कलेजी , पिट्ठा, तिलकुट, अनरसा, खाजा, बारा मिठाई और झारखण्ड में
धुस्का - मीट, बांस की सब्जी , रुगडा , खुखरी ( कुकरमुत्ते ), कोईनर साग , डुबकी , उड़द दाल , कुर्थी दाल ,खपड़ा रोटी, अनरसा , मीठा पीठा , कुदुरूम की चटनी इत्यादि

बचपन - ननिहाल और घर का खाना

भारत में हर प्रान्त में अलग अलग प्रकार का खाना मिलता हैं और उसे आप या तो एन्जॉय करते हैं या फिर मजबूरी में उसके TASTE को पसंद करने की आदत डालनी पड़ती हैं । हमने बचपन में कई तरह के बिहारी खाने खाये और कुछ जैसा खाया अब मिलता भी नहीं हैं । लिट्टी चोखा को बिहार का MASCOT खाना माना जाता हैं पर मैं इससे सहमत नहीं हूँ । मैंने बचपन में रोटी चावल, पुलाओ वैगेरह की सिवा जो खाया और बहुत एन्जॉय किया वो था मक्की या मकई की मोटी मोटी रोटी और ओल का खट्टा भर्ता । बेगूसराय जहाँ मेरा बचपन बीता वहां हमारे बबा जी मामू (देखे मेरा ब्लॉग जो मैंने उन पर लिखा था ) मकई के आटे को मल मल कर गूंधते और फिर मोटी रोटी बनाते । कई बार मैंने मक्की की रोटियां खाई, पंजाबी ढाबे में भी, पर वैसा स्वाद और मिठास कभी नहीं मिला । दूसरा जो मुझे पसंद था और जिसको पकाने में ज्यादा तकनीक नहीं था वो था नेनुआ (spring gourd ) या झींगा ( ridge gourd ) की सब्जी जिसमे मूली डाला रहता था या फिर पीसी हुई तीसी (Flaxseed) । ऐसे चना दाल और बड़ी डाल कर तो अब भी घर में बनता है। बिहार के व्यंजनों में ठेकुआ बहुत लोक प्रिय हैं ।

छठ के अवसर पर यह अवश्य बनाया जाता है और जब मैं कॉलेज के दिनों में घर से बॉक्स भर ठेकुआ प्रसाद लेकर हॉस्टल जाता था तब घंटे भर में ही मेरे मित्र सारा चट कर जाते । ऐसे पिडुकिया भी बिहार में अवसरों पर, खास कर होली में जब माल पुआ भी बनता है, यु पी वाले इसे गुझिया कहते हैं । चाहे जिस नाम से पुकारे, कहीं के लोग इसे अपना कहे, मुझे बहुत पसंद हैं । बेगूसराय में मछली बहुत बार बनता और जो मछली ज़्यदातर पकाया जाता वो था रोहू और कभी कभी बुआरी मछली । मछली मेरे फुआ के यहां बहुत मजेदार बनता । तब भंसा में पीढ़े पर बैठ कर सबसे साथ खाते, कितना मज़ा आता । चूल्हे में बचे आग में शकरकंद (SWEET POTATO ) या आलू को हमारे बड़े भाई बहन खुद पका लेते और हम आनंद लेते । बेफिक्री वाला था मेरा बचपन ।

एक खाना जिसका स्वाद नैसर्गिक था वह था माँ के हाथ का बना गरम गरम घी भात और आलू का सादा (बिना प्याज़ के) भरता दो बूंद सरसों तेल के साथ क्योंकि जमुई में प्याज़ खाना वर्जित था । परीक्षा के दिनों में हमें (दीदी और मुझे) १० बजे तक स्कूल पहुंचना होता था और इन दिनों टिफिन की छुट्टी (Lunch break) नहीं होती थी। हमारा रसोईया जो दूर गॉव से आते थे तबतक नहीं आ पाते और कोयला का चूल्हा वही जलाते थे। माँ जल्दी में लकड़ी के चुल्हे पर भात पकाती और उसी में भरता के लिए आलू डाल देती और हम उस स्वादिष्ट खाने को हाथ जलने की परवाह किये बिना गरमा गरम खा लेते । यह हमारा Brunch होता। कभी कभी बिना ज्यादा भुने या बिना मसाले के खाने बहुत स्वादिष्ट बन जाते हैं - कद्दू की सादी सब्जी ऐसा ही एक डिश हैं । दादू अपने बोरसी के आग पर कभी कभी कुछ भोग पकती और खास कर उनका पकाया खिचड़ी का स्वाद मैं नहीं भूल सकता।
बचपन की स्वाद यात्रा अधूरी रह जाएगी यदि स्कूल के दिनों में बगल की कचहरी में ठेला लगा कर गुपचुप बेचने वाले का जिक्र न किया जाय। बिहार में पानी पूरी या गोल गप्पे को गुपचुप कहते हैं और बंगाल और झारखंड में उसीको फुचका कहते हैं । एक बार मैंने २ एकन्नियां (पुरानीं भारतीय करेंसी सिस्टम में १६ एकन्नियां का एक रुपये होता था ) जमीन पर गिरा पाया था और उसमे से १ एकन्नी का मैंने ६ गुपचुप खाये (अब शायद इसके कम से कम १० रूपये देने पड़े) और इसके स्वाद का कायल हो गया । उसी तरह बंगाली मिठाई वाले की रसगुल्ला और सरदारी मिठाई वाले की जलेबी बहुत लज़ीज़ होती थी । आस पास के क्षेत्र में मलयपुर का स्पंज रसगुल्ला (जिसे आप दबाकर छोटी गोली के साइज का कर सकते थे और छोड़ने पर फिर फूल जाता ) और पकरीवड़ावां का खास्ता बारा या बालुशाही प्रसिद्द था और मुझे भी पसंद था जमुई आने वाले लोग अक्सर ये मिठाईया ले कर आते ।
जमुई की स्वाद यात्रा में यदि तिलकुट की बात न करू तो ज्यादती होगी । तिल से बनने वाला ये मिठाई यो तो गया का प्रसिद्द है पर जमुई के जगदीश हलवाई की बनाई तिलकुट खा ले तो गया का तिलकुट भी भूल जाए । ये हमारे यहाँ रोज खोमचा ले कर पहुंचते और तिलकुट का मौसम न हो तो छेना की मिठाई जैसे छेना मुरकी (छोटा छोटा छेने की मिठाई) ले कर आते । एक थोड़े उमरगर हलवाई जिनका नाम झरी था मिठाई लेकर रात को आठ से नौ बजे के बीच रोज ठेले पर छेने और खोए की मिठाई जैसे रसगुल्ला, गुलाब जामुन,चमचम, पेड़ा और मैदे बेसन की मिठाई जैसे लड्डू, बालूशाही ले कर आते । हम बच्चे दोनों राह देखते रहते । जगदीश जी तो हमारे यहाँ कई शादियों में मिठाई बनाने भी आये ।


जमुई में हमारा घर


हॉस्टल - का खाना, पटना

घर का खाने का अनुभव तो मैंने लिखा पर जब पहली बार जब हॉस्टल में रहने का मौका मिला तो मैं हॉस्टल के खाने के स्वाद पर लट्टू हो गया । सबसे ज्यादा जो पसंद आया वो था छनुआ आलू का भुंजिया यानि deep fry किए महिन कटे आलू Indian फ्रेंच फ्राई । महीने में एक या दो दिन फीस्ट होता और एक्स्ट्रा पैसे देने पड़ते क्योंकि तले भुने खाने, मीट, खीर, पूरी वैगेरह बनते । रोटियां छोटी छोटी पूरी जितनी बनती और मैं १० -१५ रोटियां खा जाता । गोल्डन का आइस क्रीम पटना की खासियत थी और मुझे स्कूल के समय से पसंद था । मुझे अब तक दाम भी याद हैं १५ पैसे में दूध वाला आइस क्रीम बार, २० में ऑरेंज बार, और क्रीम वाली बार २५ पैसे में । जैसे जैसे समय बीता हॉस्टल के रूटीन खाने से ऊबने लगे और कभी कभी सोडा फाउंटेन (तब पटना का प्रसिद्द रेस्टोरेंट था) जा कर कुछ खा लेते । पहली बार मसाला डोसा इसी जगह खाया । सोडा फाउंटेन में पहली बार होटल मैं बैठ कर आइस क्रीम खाई थी । तब सोडा फाउंटेन में बाहर लॉन में ही टेबल कुर्सी लगे होते और अंदर बैठ कर गर्मी खाने के बजाय हम बाहर ही बैठना पसंद करते क्योंकि हम शाम को ही सिनेमा जाने क्रम में ही यहाँ जाते । मसाला डोसा बहुत ही अच्छा लगा और बाहर जब भी खाने का मौका मिलता मसला डोसा फर्स्ट चॉइस होता । तब पता नहीं था मैं अपने नौकरी के कई साल दक्षिण भारत में बिताने वाला था ।
पटना के हॉस्टल जीवन की बात चाली है तो मछुआ टोली के महंगू के मीट और रोटी / परांठे की याद तो आती ही है । 4th year में मुझे गिटार सीखने का शौक हुआ और मैं मछुआटोली में एक टीचर के यहाँ सीखने जाने लगा । सप्ताह में २ बार । और वहां से लौटते वक्त अक्सर मीट - पराठे खा कर आता । कॉलेज के तरफ मुड़ने वाली सड़क के कोने पर एक चाय नाश्ते की दुकान थी । समोसा की चाट बना कर देते और उनके छोटी सी दुकान में आमने सामने रखी २ बेंचों पर हम सट सट कर बैठते ताकि काफी लोग एक साथ चाट और जलेबी का लुत्फ़ उठा सके । इतने दिनों बाद उस चाट की याद आ रही है तो स्वादिष्ट तो होगा ही ।

दक्षिण भारत में खाने के कई अनुभव है और उसमें से कुछ हम शेयर करना चाहेंगे । पहली बार हमे १९६९ में दक्षिण जाने का मौका कॉलेज ट्रिप में मिला । हम तबतक सिर्फ इडली, वादा और मसाला डोसा से ही परिचित थे वो भी होटल में बैठ कर । वाल्टेयर (अब का विशाखापत्तनम) पहुंचते ही नास्ते में समोसा, कचोरी मिलना बंद हो गया और ईडली वड़ा मिलने लगा और खाने में भात के साथ दाल की जगह सांभर, रसम, चटनी मिलने लगा । हम मसाला डोसा जो हमे पसंद था से काम चलने लगे । नाश्ते में पूरी और मसाला (मसाला डोसा वाला आलू की फिलिंग) खाते या मैदे की रोटी या लच्छा पराठा । चेन्नई जो तब मद्रास पहुंचने तक हम इडली भी खाने लगे और अनियन उत्तपम भी । मद्रास सेंट्रल के सामने तब एक बुहारी होटल था और हम वही खाना खा लेते थे क्योंकि नार्थ इंडियन टाइप का खाना भी मिल जाता था । जब एर्नाकुलम पहुंचे तो एक होटल में पीढ़े पर बैठ कर सामने केले के पत्ते पर परसा हुआ राइस , सांबर, रसम तो संभालना मुश्किल हो रहा था कैसे तरल पदार्थ को बहने से रोके । पर पायसम और आम पसंद आया, लाल केला यहाँ पहली बार खाया एक से पेट भरने लायक बड़े थे । सबसे बड़ी बात जितना खाओ कोई एक्स्ट्रा नहीं । इस बात पर एक वाकया याद आ गया जब हम बंगलुरु तब बंगलौर पहुंचे तो होटल वाले ने पूरी का दाम बताया पर बोला सब्जी फ्री, जो हर बार एक छोटी कटोरी में ला देता। मेरे क्लासमेट उमेश शर्मा ने पूरी तो एक प्लेट मंगाई पर सब्जी के कटोरियों से उसका टेबल भर गया । आज की बात कहूँ तो अब तो मिनी इडली, फ्राइड और मसाला इडली भी मिलते है । रवा इडली का स्वाद बाद में मिला। सबसे स्वादिष्ट रव ईडली बैंगलुरू के रेसीडेंसी रोड में ही खाई थी। और वो रेस्टोरेंट टूर के समय नाश्ते की फेवरिट जगह थी। रवा डोसा और उपमा भी अच्छे लगने लगा । पर आंध्र में गोंगुरु की सब्जी चटनी कोई खास पसंद नहीं आई । सुलुरपेट (2003) में पत्नी जी ने एक डिश बनाना सीखा अड़ा जो बिना फरमेंट किये डोसा मिक्स से बनता है और स्वादिष्ट भी है । सालेम प्रवास (1980) के समय मेरे सीनियर स्व श्री डी डी सिन्हा साहेब आये थे और एक मजेदार घटना घाटी थी । एक बार हम दोनों शहर केे बीचों बीच स्थित वसंत विहार रेस्टुरेंट में गऐ। मैंने अपने तमिल ज्ञान को उपयोग में लाते हुए वेटर से पूछा तैयर बड़ा एरक् (दही बड़ा है?) । वेटर यह सोच कर की मुझे तमिल आती है अपने फ्लो में मेनू आइटम्स तमिल में बोलने लगा? मेरे पल्ले कुछ न पड़ा तो मैंने फिर पूछा तैयर बड़ा एरक् ? वह फिर तमिल में कुछ कह कर चला गया। शायद यह कह रहा होगा कि जो बताया बस वही है, श्री डीडी सिन्हा ने फिर कहाँ अब मेरा इशारों ( Sign Language) का कमाल देखो। उन्होंने ताली बजा कर वेटर को बुलाया। वे बोले 'मसाला दोसा' और दो ऊँगली दिखाई और वेटर दो दोसा ले आया। फिर कॉफी भी इसी तरह मंगाई गई।
सालेम में नॉन वेज खाने के लिए हम मिलिट्री होटल जाते जहाँ नॉन वेज बिरयानी मिल जाती थी, ऐसे नेशनल होटल में भी नॉन वेज के बहुत सारे डिश मिल जाते थे ।


फाइव रोड जंक्शन सालेम

पंजाब की एक हाथ वाली लस्सी का ग्लास ! 1968 के कॉलेज ट्रिप में अम्बाला के बाद एक गांव जैसी जगह पर ट्रेन रूक गई। सिग्नल नहीं थी। रेल ट्रैक के बगल में एक ढ़ाबा था जहाँ लोग गरम दूध और लस्सी पी रहे थे। जब बहुत देर ट्रेन न चली तो मै और कुछ और दोस्त, जो दरवाजे पर पैर लटका कर हवा खाते हुए सफर कर रहे थे, उतर पड़े और दूध और दही ले कर पीने लगे। दाम मात्र एक कप चाय के बराबर। पर इतने लम्बे ग्लास से पीने और पैसे देने लौटाने में इतनी देर लगी कि ट्रेन चल पड़ी। हमे 100 मिटर रेस लगा कर ट्रेन पकड़नी पड़ी थी। इतना बड़ा गिलास पहली बार देखा ! काके दा ढाबा दिल्ली के अनुभव मैं एक ब्लॉग में लिख चूका हूँ और यहाँ लिंक देता हूँ । ऐसे सबसे स्वादिष्ट और गाढ़ा लस्सी मैंने कानपूर में ही पिया या यू कहो खाया चम्मच से ।

अगले भाग में विदेशो के खाने के बारे में लिखूंगा ।