Thursday, April 23, 2026

बता भी दो

तेरे दिल में आज क्या है बता भी दो
कोई अनजाना सवाल है बता भी दो
गर फूलों का खयाल है बता भी दो
या बादलों को चुरा लाऊँ बता भी दो
तेरे दिल में आज क्या है बता भी दो

चाँद तारे भी तोड़ लाऊँ बता भी दो
जान जाती है जाँ बस यूँ चुप न रहो
कहो तो दूर चला जाऊँ बता भी दो
जो भी कहना है खुलके सुना भी दो
तेरे दिल में आज क्या है बता भी दो

तो आज सब्ज़ी क्या बनाऊँ बता भी दो
कभी मुस्कान में राज़ छुपा लेते हो तुम
कभी नज़रों से दिल को सजा देते हो तुम
अपनी दिल‌ की बातें कभी सुना भी दो
तेरे दिल में आज क्या है बता भी दो

कभी बारिश में चाय का इरादा होगा
कभी पकौड़ों का भी तो वादा होगा
दिल की फरमाइश जरा जता भी दो
तेरे दिल में आज क्या है बता भी दो

कभी रूठी हो तो मैं मना लूँ हँस के
कभी थकी हो तो पास बिठा लूँ हँस के
अपनी चाहत का रस्ता दिखा भी दो
तेरे दिल में आज क्या है बता भी दो

ना हीरे ना मोती ना दौलत चाहिए
बस तेरी हँसी की इजाज़त चाहिए
अपने होंठों से ये बात कह भी दो
तेरे दिल में आज क्या है बता भी दो

तो सुनो आज आलू या भिंडी बनाओ
या अपनी पसंद की दाल चढ़ाओं
रोज़-रोज़ यूँ मुझको सता भी दो
तेरे दिल में आज क्या है बता भी दो


अमिताभ सिन्हा, प्रगति इंक्लेव, रांची

Tuesday, April 14, 2026

अहसास 2 (वसन्त, चैत)

वसन्त

जब हो मन‌ में उमन्ग
समझो आ पहुंचा वसन्त।

डालों पर बैठे रति अनन्ग ।
मधु ले कर आ पहुँचा वसन्त।
रंगो छन्दों में भरे प्राण ‌।
हे रितुराज तुमको प्रणाम।

जब हो मन‌ में उमन्ग
समझो आ पहुंचा वसन्त

बीता जाए शीतकाल।
गृष्म ऋतु देता दस्तक।
पूछें कोयल कूक कूक।
तुम आओगे अब कबतक।

जब हो मन‌ में उमन्ग
समझो आ पहुंचा वसन्त

मन तन है अब अलसाता
दूरी तो अब सहा न जाता ।
अब आओ सब छोड़ छाड़
तन्हां अब तो रहा न जाता।

जब हो मन‌ में उमन्ग
समझो आ पहुंचा वसन्त
चैत की हवा

चैत की हवा में अजीब सा रंग है
पक्षियों के जोड़े भी उड़ते संग संग हैं
आ के छू जा मुझे जब तन में तरंग है

मन वीणा में जैसे कोई मधुर राग है
फूलों की महक में बसा चैता फाग है
डाल-डाल झूमे जैसे प्रेम का उमंग है

चैत की हवा में अजीब सा रंग है
पक्षियों के जोड़े भी उड़ते संग संग हैं
आ के छू जा मुझे जब तन में तरंग है

कोयल की कूक में मीठा सा व्यंग है
हर धड़कन में बसा तेरा ही प्रसंग है
वातावरण में हर ओर तेरी ही सुगंध है

चैत की हवा में अजीब सा रंग है
पक्षियों के जोड़े भी उड़ते संग-संग हैं
आ के छू जा मुझे जब तन में तरंग है

आम की बौरों से महका घर आंगन है
डालियों पर उतरा अलग सा मधुवन है
प्रकृति इस दिलकश नज़ारों पर दंग है

चैत की हवा में अजीब सा रंग है,
पक्षियों के जोड़े भी उड़ते संग संग हैं
आ के छू जा मुझे जब तन में तरंग है

Monday, April 6, 2026

शांति दूत खोजती है दुनिया

शांति दूत

परमाणु बम के तोपें के आगे
है आज सारा विश्व खड़ा
कोई तो अब भी आगे आए
कोई तो मध्य हो जाए खड़ा
कोई तो शांति की करे बात
कोई तो करे दिल अपना बड़ा
यह कैसी विडम्बना है भगवन
जब कोई छीनता भूमि गगन
जब त्राहि त्राहि है जग जीवन
क्यों आते नहीं कुछ करके जतन
पर कभी दूत बने थे तुम भी
रूकवा पाए महाभारत का रण?

कौन हूं मैं?

मै एक विशाल पेड़ हूं
मै छाया देता हूं
पर किसी को उगने नहीं देता
मैं सर्व शक्तिमान हूं
पर किसी को आगे बढ़ने नहीं देता

© अमिताभ सिन्हा, प्रगति इंक्लेव, रांची

Monday, March 16, 2026

अहसास 1 (हो ही जाती है, सजती क्यों हो)

मुहब्बत हो ही जाती है

कोई जो तुम सा हसीन हो
मुहब्बत हो ही जाती है

नज़र से जो मिल जाए नज़र
इबादत हो ही जाती है
तुम्हारी मुस्कुराहट में
अजब सा नूर रहता है
उस नूर के दीदार की
चाहत हो ही जाती है

कोई जो तुम सा हसीन हो
मुहब्बत हो ही जाती है

तुम्हारी बातों में कोई
जादू सा बसता है
इक बार‌ सुन लो अगर
कयामत हो ही जाती है
तुम्हारी मुस्कुराहट में
चाँदनी सी नर्मी है
उसे देख दिल को
राहत हो ही जाती है

कोई जो तुम सा हसीन हो
मुहब्बत हो ही जाती है

तुम्हारी बदन‌ की खुशबू
की बात क्या कहे 'अमित'
हवा छू के भी गुज़रे
इनायत हो ही जाती है
तुम्हारी हर अदा में
बहारों का शहर है बसता,
दिल पर कोई जोर नहीं चलता,
शरारत हो ही जाती हैl

कोई जो तुम सा हसीन हो
मुहब्बत हो ही जाती है

रूठने के अंदाज़ क्या कहने
गजब सी ख़ामोशी छा जाती है
जब खमोशी की सजा देती हो
शिकायत हो ही जाती है।
दूरी को बर्दाश्त करना
हमेशा होता है मुश्किल
जो कभी दूर रह जाएं
हरारत हो ही जाती है

कोई जो तुम सा हसीन हो,
मुहब्बत हो ही जाती है,

फिर सजती क्यों हो?

तुम तो यूं ही हसीन हो,
फिर सजती क्यों हो?

दिल पहले ही क़ाबू में नहीं,
और बेकाबू बनाती क्यों हो?
ये काजल की साज़िश कैसी,
ये लट यूँ गिराती क्यों हो?
हम कहीं और जाने वाले थे,
राह में यूँ चली आती क्यों हो?

तुम तो यूं ही हसीन हो,
फिर सजती क्यों हो?

चाँद भी तुमसे ही रोशन है,
फिर और निखरती क्यों हो?
तुम हंसो तो आफताब में
और भी चमक आ जाए
या रात दिन में बदल जाए
तुम इतना हसंती क्यों हो

तुम तो यूं ही हसीन हो,
फिर सजती क्यों हो?

तुम चल दो तो मुआ
मौसम भी बदल जाए,
तुम जो रूठो तो शायद
शाम फौरन ढल जाए,
गुलदस्ता भी बिखर जाए
तुम इत्ता रूठती क्यों हो

तुम तो यूं ही हसीन हो,
फिर सजती क्यों हो?

Sunday, February 22, 2026

घी के लड्डू टेढों भलो


चित्र विकी से साभार

आप सोच रहे होंगे इतने दिनों बाद लिख रहे हैं जाने क्या विषय चुना होगा ! और जब विषय जानेंगे तो कहेंगे ये क्या विषय चुना है ब्लॉग के लिए ? अब मैंने विधा भी लेख चुना है कविता नहीं। क्योंकि कालेज के दिनों में मैं भी अच्छी कविता लिख‌‌ लेता था, अब मैं कैसा लिखता हूं नीचे देखें‌।

"भज राम कृष्ण गोपाल रे
मेरा हुआ बुरा हाल रे
बोल राम कृष्ण हरे
राम नाम जप ले रे"

अब ऐसी कविताएं लिखूं और अपने को कवि समझने लगूं और नाम में कोई तखल्लुस जोड़ लू या नाम के आगे या पीछे "कवि" जोड़ दू जैसे "कवि आमिताभ सिन्हा" ? अच्छा है आम आदमी की तरह गद्य में ही लिखूं। ऐसे कैसी लगी मेरी कविता ?
और विषय ? मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरा लेख पढ़ने के बाद आप मानेंगे कि विषय समसामयिक है। मेरे मस्तिष्क चलने वाले अन्य विषयों जैसे ट्रंप-पुतिन या कोहली के शतकों के रिकार्ड से भी महत्वपूर्ण और समसामयिक है यह मुहावरा। कैसे? आइए समझें ।
इतिहास
सबसे पहले मैं इस शोध में जुटा कि इस मुहावरे का इतिहास क्या है? जाहिर है मियां यह बहुत पुरातन तो नहीं हो सकता। उस जमाने का तो कतई नहीं जब असली घी के बिना लड्डू बनते ही नहीं होंगे। क्योंकि तुलना के लिए कुछ दूसरा लड्डू तो होना ही चाहिए। अब सोचिए सरसों, तीसी, अलसी के तेल में तो लड्डू बनते न होंगे (और रिफाइंड तब था नहीं) तो बचा कौन? अपना सर्वमान्य शुद्ध देशी असली घी । शुद्ध देशी विशेषण लगने का मतलब ही है कि अशुद्ध घी भी होगा। हां भैया था न! हमारे बचपन यानि.. नहीं मैं अपना उम्र नहीं बताउंगा, पर भैया यह घी था और है वनस्पति घी यानि डालडा यानि । घी जैसा दिखने वाला नकली घी‌। साधारण तापक्रम पर जमा रहने वाले इस घी में बना लड्डू भी जमा जमा और गोल रह जाता है। करीब 70 वर्ष पहले एक तहलके की तरह तब असली घी के आधे दामों में बिकने वाला यह नकली घी हमारे जिंदगी को खुशहाल बनाने आ गया। अब तो रिफाइन्ड तेल भी है। अब समझते हैं यह समसामयिक कैसे है।
समसामयिकता
इस मुहावरे के सबसे ज्यादा उपयोग लड़के के जन्म पर होता है। जब लड़का दुबला, मोटा या बदसूरत हो या कोई और एब हो तब लोग अक्सर कहते मिलेंगे "घी का लड्डू है, टेढ़ो भलो" । पर आज के परिप्रेक्ष्य में यह कहावत तब बेमानी होती दिखती है जब अच्छे भले eligible or very eligible कुंवारों को कोई लड़की नहीं मिलती। कारण समाज में लड़कियों का घटता अनुपात। गुगल के अनुसार "2011 की जनगणना के अनुसार भारत का समग्र लिंग अनुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर 943 महिलाओं का था। यह आँकड़ा देश में लैंगिक असंतुलन की स्थिति को दर्शाता है, हालांकि राज्यवार स्तर पर इसमें उल्लेखनीय भिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। दक्षिण भारत का राज्य केरल इस मामले में सबसे आगे रहा, जहाँ प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,084 महिलाएँ दर्ज की गईं — जो बेहतर सामाजिक सूचकांकों और महिला सशक्तिकरण की दिशा में प्रगति को इंगित करता है।इसके विपरीत, हरियाणा में यह अनुपात 879 रहा, जबकि केंद्र शासित प्रदेश दमन और दीव में यह मात्र 618 था।"

ये आँकड़े कुछ क्षेत्रों में लंबे समय से जारी लैंगिक असंतुलन की चुनौती को उजागर करते हैं। स्पष्ट है कि भारत में लिंग अनुपात केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि सामाजिक सोच, शिक्षा, स्वास्थ्य और समान अवसरों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संकेतक है। संतुलित समाज की दिशा में निरंतर प्रयास ही इस अंतर को कम कर सकते हैं।

स्पष्ट है कि प्रति हजार लड़को में हरियाणा के 121 और दमन दीव के 382 लड़के अविवाहित रह जाने के लिए ही पैदा हुए हैं। इसके उपर आज जब समाज में लड़कियों के लिए बढ़ते शिक्षा और नौकरियों के कारण जहां कई लड़कियां विदेशी लड़कों के साथ विवाह बंधन में बंध जा रही है। पहले ज़्यादातर लड़कियों के लिए विवाह ही एक carrier option होता था। अब वो स्वावलंबी हो चुकी है और कभी कभी समाज में दिखने वाले toxic विवाह बंधन से घबराकर अविवाहित रह जाना ही पसंद कर लेती है। इस तरह कुछ और घी के लड्डू अविवाहित ही रह जाते हैं। बेटों के माता-पिता शायद मुझसे सहमत होंगे कि आजकल बहुएं ढूंढना कितना मुश्किल काम है और बेटों को घी का लड्डू कहना समझना कितना बेमानी हो गया है।

बस मित्रों आज बस इतना ही।

Monday, November 24, 2025

श्री धर्मेंद्र देओल -श्रद्धांजली

श्री धर्मेन्द्र सिंह देओल का आज 24 नवंबर 2025 को 90 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने 1961 से बोलीवुड में कदम रखा था। ये वो समय था जब मैं टीन एज की ओर अग्रसर था और फिल्म देखने का शौक होना शुरू हुआ था। पर मुझे फिल्म देखने की थोड़ी आजादी 14 की उम्र में यानि 1964 में मिली जब महीने में एक फिल्म देखने को मिलता पर जब 15 की उम्र में, हास्टल में रहने गया तो फिल्में देखना एक आवश्यक कार्य के सामान हो गया। नई फिल्म का लगना, पुरानी प्रसिद्ध फिल्म का लगना, एक टिकट में दो खेल का लगना या Exam के बाद या यदि गणित का हो तो पहले (धारना थी कि गणित के दिन रात मे जग कर नहीं पढ़ना चाहिए) यह सब बहाने होते थे। फिल्म देखने के। तब जमाना था राजकपूर, दिलिप कुमार और देवानंद का। राजेश खन्ना का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। तब उनकी एक फिल्म देखी बंदिनी और बहुत पसंद आई थी फिल्म। अन्य प्रमुख अभिनेताओ से काफी युवा, सक्षम धर्मेंद्र जी से तुरंत connect कर पाया फिर देखी काजल जिसमें राजकुमार जैसे सक्षम अभिनेता के सामने भी इस जवान अभिनेता ने बहुत impress किया। फिर देखी अनुपमा। एक upcoming कवि के कठिन भूमिका बहुत खूब निभाई थी। हकीकत के हकीकत से तो सभी वाकिफ हैं। आंखें - शायद पहली जासूसी फिल्म जिसमें हास्य भी था। उनकी कई फिल्म शिकार, आया सावन झूम के, आए दिन बहार के, नीला आकाश इत्यादि पूरी तरह मनोरंजन के लिए थी। पर बहारें फिर भी आएंगी, नया जमाना, जीवन मृत्यु, फागुन, सत्यकाम कुछ हट के थी तो सीता गीता, चुपके चुपके में उनका अलग कामिक अंदाज दिखा। मेरा नाम जोकर,शिकार, मेरा गांव मेरा देश, शोले में दिखा उनका 'ही मैन' वाला रूप। हर तरह का रूप, अभिनय के हर आयाम में महिर यह शख्स, आज अपने करोड़ों प्रशंसकों को छोड़ उस लोक में चला गया जिसके बारे में कहा या पूछा गया है "कि दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां"। उन्हें भगवद् चरण में जगह मिले‌ ओम शांति। हमारी विनम्र श्रद्धांजलि।


स्केच श्री दीपक वर्मा के फेसबुक पोस्ट से, धन्यवाद सहित

मैंने कुछ फिल्मों का जिक्र उपर किया है। धर्मेंद्र जी की कुछ और फिल्में जो मैंने देखी है, बड़े पर्दे पर या छोटे पर्दे पर वो है शोला और शबनम, बंदिनी, काजल, आकाशदीप, हकीकत, ममता, आए दिन बहार के, फूल और पत्थर, अनुपमा, देवर, आंखें, शिकार, मेरे हमदम मेरे दोस्त, मंझली दीदी, आया सावन झूम के, सत्यकाम, मेरा नाम जोकर, जीवन मृत्यु, मेरा गांव मेरा देश,नया जमाना, गुड्डी, दो चोर , समाधि, राजा जानी, सीता और गीता, जुगनू, फागुन, यादों की बारात, चुपके चुपके, शोले, बारूद,चरस, स्वामी, ड्रीम गर्ल,चाचा भतीजा, धरम वीर, शालीमार, दिल्लगी, बर्निग ट्रेन, नसीब, मै इंतकाम लूंगी, रजिया सुल्तान, नौकर बीबी का, जागीर, सल्तनत, ओम शांति ओम। मैंने कई फिल्मे और भी देखी होगी पर याद नहीं आ रहा है।

Friday, November 21, 2025

हेलेन

हेलेन

हेलन का जन्म 1938 में बर्मा में एक एंग्लो-इंडियन पिता और बर्मी माँ के घर हुआ था। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान उनके पिता की मृत्यु हो गई, जिसके बाद उनका परिवार 1943 में भारत आ गया और मुंबई में बस गया। परिवार की आर्थिक तंगी के कारण उन्होंने 13 साल की उम्र में पढ़ाई छोड़ दी और परिवार की मदद करने के लिए कोरस डांसर के रूप में अपने करियर की शुरुआत की।

हेलेन जी को फिल्मो में कक्कू ही ले कर आयी और हेलेन ने  कैबरे को फिल्मो में एक अलग ही  स्थान दिलाया १९३८ में   एंग्लो इंडियन  पिता  और बर्मी  माता  के परिवार में जन्मी हेलेन जी ने अपने पिता को द्वितीय विश्व युद्ध में  खो दिया . तब वह माँ के साथ मुंबई आ गई . कक्कु ने उन्हें कोरस डांसर का काम १९५१ में दिलवाया फिल्म थी शबिस्तां और आवारा.



सुन्दरता और मादकता की  पर्याय थी 'हेलन जी'। उनकी खूबसूरती और नृत्य का खुमार सिनेप्रेमियों के जेहन में आज भी कायम है।

  • 'अलिफ लैला' (1953) में वह पहली बार बतौर सोलो डांसर नजर आईं।
  • इसके बाद 'हूर-ए-अरब' (1955),
  • 'नीलोफर' (1957),
  • 'खजांची' (1958),
  • 'सिंदबाद', 'अलीबाबा', 'अलादीन' (1965) जैसी फिल्मों में वह नजर आईं।
  • 1958 में आई फिल्म 'हावड़ा ब्रिज' के गाना "मेरा नाम चिन चि न चू' से हेलेन का जादू चलने लगा।
  • 'ये रात फिर न आएंगी "हुज़ूरेवाला गर हो इजा़जत
  • गुमनाम'इस दूनिया में जीना है तो
  • 'तीसरी मंजिल' का 'ओ हसीना जुल्फों वाली,कारवां' पिया तू अब तो आजा
  • 'जीवन साथी' का 'आओ ना गले लगा लो ना'
  • 'डॉन' का 'ये मेरा दिल प्यार का दीवाना
  • 'इंतकाम' का ‌ 'आ जाने जा
  • 'शोले' का 'महबूबा ओ महबूबा
  • आया तूफान हम प्यार किये जायेंगे
  • फिल्म जंगली का सुक्कु सुक्कु
  • ईनकार फिल्म में मुंगडा मै गुड़ की डली

    कितना गिनाऊ अनगिनत गानों पर उनके पॉपुलर डांस है। हेलेन के ज्यादातर गाने गीता दत्त और आशा भोंसले ने गाए हैं।उन्हें दो फ़िल्म फेयर पुरस्कार मिल चुका है। गुमनाम के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस के लिए नामित भी की गयी। २००९ में पद्म श्री से सम्मानित हेलेन जी 700 ‌से ज़्यादा फ़ि्ल्में कर चुकीं हैं