15 जून 2026
हमारी शादी का आज 53 वीं वर्षगांठ है और जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तब अपनी पत्नी का मेरे जीवन में सहयोग और उनका परिवार और मेरे प्रति समर्पण ही याद आता है। जब शादी के बाद पहली बार अपने ससुराल काठमांडू जा रहा था तो वह दो दिन की पहली नेपाल यात्रा, जिसमें बीरगंज में एक रात रूकना शामिल था, आज होने वाले डेट का काम कर गई। एकदम रोमेंटिक। आकर्षण इतना कि एक दूसरे के बिना रहना एक सजा एक गुनाह जैसा था और जब भी मैं छुट्टी लेकर घर जाता उन्हें सबकी नज़रों से बचना पड़ता जैसे मेरे घर बार बार आने का अपराध उसने किया हो। फिर मुझे क्वार्टर एलाट हो गया और वह मेरे पास आ गई।
नई गृहस्थी जमाने में उसकी दक्षता गजब की थी। तब गैस का जमाना नहीं आया था और उन्होंने पहले लकड़ी पर ही खाना बनाया था। क्वार्टर में बना कोयला का चुल्हा जलाना हम दोनों में से किसीको नहीं आता था। और हमने मिलकर सीखा घर बनाना और चलाना।
१९७८ हम बच्चों के साथ दक्षिण भारत घुमने गए। लौट कर आए तो मेरे ट्रांसफर रांची हो गया और एक बार फिर हम नई जगह गृहस्थी जमाने में लग गए। मेरी छोटी बहन साथ रह कर पढ़ने आ गई। श्रीमती ने उसे बहन की तरह माना और प्यार दिया । मेरी जिंदगी अच्छी जा रही थी। तभी मेरे पिता गुजर गए। घर में मैं बड़ा था अंत: कम उम्र में ही बहुत जिम्मेदारियां आ गई। हम दोनों ने एक दूसरे को संभाला और ३ भाई बहनों और मां को भी संभाला और तब दो पहिए वाली कहावत सार्थक होती दिखी।
जब जरूरत पड़ी उन्होंने हिम्मत भी दी। कुछ कहानियां हैं इस पर जो फिर कभी।जब मेरे छोटे भाई की पत्नी का अचानक देहांत हो गया। मैं तब हरियाणा के एक उपक्रम में काफी सिनियर पोजिशन पर था। और नई गृहस्थी बसा ही रहा था। भाई के दो छोटे बच्चे थे। जब श्राद्ध में गया तब इन्होंने देखा कि जो बच्चा खाने में इतने नखरे करता था मां के न रहने पर चुपचाप खाना खा रहा था। उसके बच्चे के अंदर चलने वाले तुफान को इन्होंने महसूस किया और हमें मजबूर किया कि मैं नोकरी छोड़ कर सिनियरिटी खो कर भी वापस पुरानी नौकरी पर आ जाऊं ताकि हमलोग बच्चों की देखभाल कर सकें। पता चला जीवन साथी पहिए के साथ साथ एक गाईड भी हो जाती। कई रूप हैं इनके पत्नी मित्र और गाईड तो है ही, वृद्धावस्था में तो इनका व्यवहार मातृवत हो गया है। हम दोनों कैंसर को जीत चुके हैं, और कैंसर आपको एक दूसरे के न होने का अहसास पहले ही करा देता है। एक दूसरे के लिए सेवा समर्पण भी तब सामने आ जाता है। पिछले वर्ष मेरे दिल की बीमारी मुझे जिंदगी की सीमा तक ले गई थी। मुझे अचानक
अस्पताल में ही एक वैराग्य सा हो गया था। पर आपने यह कह कर मुझमें जीवन की ओर पुनः मोड़ दिया "अपको अब मेरे लिए जीना है" । इतना ही कहना है जीवन साथी के बारे में।
नौसिखिये से चल पड़े थे हम
कई वर्षो बाद भी लगता है
कल ही तो मिले थे हम
आज नाती पोते जवान हो गए हैं
पर सीख तो अब भी रहे हैं हम