My Journey through life
Amitabhsinha ; autobiography ; travelogue; events; history; film; Bollywood Hindi stories & Poetry; Amitabh's blog !
Friday, October 16, 2026
पत्नी के जन्मदिन पर
रीत कुछबनाते हैं,
सूरज के कई नए चक्कर
चलो फिर लगाते हैं
जन्मदिन मनाते है
केक नहीं लाएं तो
ओमबरती कहां जलाएंगे हम?
आप कहेंगी मत खाना
फिर भी खाएगे हम
गिफ्ट भी लाएंगे हम
दिल भी बहलाएंगे हम
पसंद न आया अगर
रसीद भी दिखलाएंगे हम
जन्मदिन की शुभकामना
स्वास्थ्य रहे मस्त रहे
आपका गुस्ताख़
Monday, June 15, 2026
जीवनसाथी
15 जून 2026
हमारी शादी का आज 53 वीं वर्षगांठ है और जब पीछे मुड़ कर देखता हूं तब अपनी पत्नी का मेरे जीवन में सहयोग और उनका परिवार और मेरे प्रति समर्पण ही याद आता है। जब शादी के बाद पहली बार अपने ससुराल काठमांडू जा रहा था तो वह दो दिन की पहली नेपाल यात्रा, जिसमें बीरगंज में एक रात रूकना शामिल था, आज होने वाले डेट का काम कर गई। एकदम रोमेंटिक। आकर्षण इतना कि एक दूसरे के बिना रहना एक सजा एक गुनाह जैसा था और जब भी मैं छुट्टी लेकर घर जाता उन्हें सबकी नज़रों से बचना पड़ता जैसे मेरे घर बार बार आने का अपराध उसने किया हो। फिर मुझे क्वार्टर एलाट हो गया और वह मेरे पास आ गई।
नई गृहस्थी जमाने में उसकी दक्षता गजब की थी। तब गैस का जमाना नहीं आया था और उन्होंने पहले लकड़ी पर ही खाना बनाया था। क्वार्टर में बना कोयला का चुल्हा जलाना हम दोनों में से किसीको नहीं आता था। और हमने मिलकर सीखा घर बनाना और चलाना।
१९७८ हम बच्चों के साथ दक्षिण भारत घुमने गए। लौट कर आए तो मेरे ट्रांसफर रांची हो गया और एक बार फिर हम नई जगह गृहस्थी जमाने में लग गए। मेरी छोटी बहन साथ रह कर पढ़ने आ गई। श्रीमती ने उसे बहन की तरह माना और प्यार दिया । मेरी जिंदगी अच्छी जा रही थी। तभी मेरे पिता गुजर गए। घर में मैं बड़ा था अंत: कम उम्र में ही बहुत जिम्मेदारियां आ गई। हम दोनों ने एक दूसरे को संभाला और ३ भाई बहनों और मां को भी संभाला और तब दो पहिए वाली कहावत सार्थक होती दिखी।
जब जरूरत पड़ी उन्होंने हिम्मत भी दी। कुछ कहानियां हैं इस पर जो फिर कभी।जब मेरे छोटे भाई की पत्नी का अचानक देहांत हो गया। मैं तब हरियाणा के एक उपक्रम में काफी सिनियर पोजिशन पर था। और नई गृहस्थी बसा ही रहा था। भाई के दो छोटे बच्चे थे। जब श्राद्ध में गया तब इन्होंने देखा कि जो बच्चा खाने में इतने नखरे करता था मां के न रहने पर चुपचाप खाना खा रहा था। उसके बच्चे के अंदर चलने वाले तुफान को इन्होंने महसूस किया और हमें मजबूर किया कि मैं नोकरी छोड़ कर सिनियरिटी खो कर भी वापस पुरानी नौकरी पर आ जाऊं ताकि हमलोग बच्चों की देखभाल कर सकें। पता चला जीवन साथी पहिए के साथ साथ एक गाईड भी हो जाती। कई रूप हैं इनके पत्नी मित्र और गाईड तो है ही, वृद्धावस्था में तो इनका व्यवहार मातृवत हो गया है। हम दोनों कैंसर को जीत चुके हैं, और कैंसर आपको एक दूसरे के न होने का अहसास पहले ही करा देता है। एक दूसरे के लिए सेवा समर्पण भी तब सामने आ जाता है। पिछले वर्ष मेरे दिल की बीमारी मुझे जिंदगी की सीमा तक ले गई थी। मुझे अचानक
अस्पताल में ही एक वैराग्य सा हो गया था। पर आपने यह कह कर मुझमें जीवन की ओर पुनः मोड़ दिया "अपको अब मेरे लिए जीना है" । इतना ही कहना है जीवन साथी के बारे में।
नौसिखिये से चल पड़े थे हम
कई वर्षो बाद भी लगता है
कल ही तो मिले थे हम
आज नाती पोते जवान हो गए हैं
पर सीख तो अब भी रहे हैं हम
Thursday, June 11, 2026
तुम जब करीब होती हो
तुम जब करीब आती हो
दिल बाग-बाग हो उठता है
और मैं समझता था ये खुसबू तुम्हारी है
तुम जब प्यार से पुकारती हो
दिल के तार बज उठते हैं
और मैं समझता था ये संगीत तुमने छेड़ा है
तुम जब मुस्कुरा कर देखती हो
सुबह की किरणें खिल उठती हैं,
और मैं समझता था ये उजाला तुमने बिखराया है।
तुम जब चुपचाप पास बैठती हो
मेरा वक़्त ठहर-सा जाता है,
और मैं समझता था ये जादू ने तुमन किया है।
तुम जब हाथों में हाथ रखती हो
दिल को एक सुकून-सा मिलता है,
और मैं समझता था ये आसरा तुम्हारा दिया है।
अब जाना है मैंने
खुशबू प्यार की थी,
संगीत हवाओं में था,
उजाला सूरज का था
और सुकून मेरे अपने दिल में,
मगर इन सबका एहसास मुझे
सिर्फ़ तुम्हारे साथ होने से ही हुआ
जिंदगी जीने के लिए
सिर्फ तुम्हारा साथ चाहिए
अमिताभ सिन्हा, प्रगति इंक्लेव, रांची
Sunday, May 17, 2026
चाय का ग्लास
मैं कुसुमलता अपने छोटे भाई अमिताभ के माध्यम से आपको लिए चलती हूं अपने बचपन में।
आज के ब्लॉग का पात्र चाय का मध्यम आकार का ग्लास है।आप सभी ने चाय के टपरियों पर इस ग्लास को देखा होगा। जब गैस की सुविधा नहीं थी तब चाय दुकानों में एक बड़े टोपिए में कोयले के मंद जलते चूल्हे पर दूध धीमे धीमें उबलता रहता और एक मध्यम आकार के केतली में चाय । सामने एक ट्रे में करीने से आठ दस छोटे चाय के ग्लास सजे रहते। और ग्राहको को तुरंत जितने कप चाहिए उतने ग्लासों में चाय छान दी जाती। जिन्हें स्पैशल चाय चाहिए होता उनकी ग्लासों में टोपिए से सौंधा दूध डाला जाता।
इस ग्लास से मेरा परिचय तब हो गया जब मैं आठ साल की बच्ची ही थी यानि 1954 के आसपास। आज इसी ग्लास में चाय पी कर कई यादें ताजा हो गई और मै अपने बचपन में विचरण करने लगी।उस समय घर के भंसा याने रसोई में चाय सिर्फ दो बार बनती थी।बाकी समय चाय , सड़क चौराहा फुटपाथ स्थित चाय दुकान से चाय आती थी । मुंगेर में हमारा घर लल्लू पोखर के एक तिराहे पर था। बताती चलू कि हमारे पिता स्व उमेश चन्द्र प्रसाद एक व्यस्त एडवोकेट थे।
हमारे घर के नजदीक 3 दुकानें हुआ करती थी एक राधे चाय पान की दुकान दूसरी कमलेशरी पान बीड़ी सिगरेट की दुकान तीसरी गर्भे देवी की मिठाई दुकान। तीनों दुकानें मुहल्ले भर में प्रसिद्ध थी। हम लोग मिठाई के दुकान से जलेबी कचोरी बुंदिया हमेशा एक दो दिन में जरूर खाते थे। बचपन के दिन भी क्या दिन थे। तब बच्चे चाय नहीं पीते थे। तीनों दुकान मोहल्ले में बहुत लोकप्रिय थी और हमेशा भीड़ लगा ही रहता था।
जैसा उपर लिखे हैं घर में भोर ओर सांझ सिर्फ दो बार ही चाय बनती थी।बाद बाकी चाय राधा टी स्टॉल से आती थी। कोर्ट जाने से पहले बाबुजी 10 बजे तक घर के ऑफिस में ही काम करते थे।उस समय कई मुवक्किल घर में होते थे जिनका काम बाबूजी कर रहे होते थे । मुवक्किलों को राधे के दुकान से मंगाया चाय बिस्कुट सर्व होता था।ओर इसी तरह के शीशे के माध्यम आकर शीशे के ग्लास में चाय आती थी । घर में उपयोग के लिए कप प्लेट होते थे।
अब तक यह ग्लास मेरे बचपन का साथी है।और मुझे अभी भी बहुत पसंद है। पर इस तरह का चाय ग्लास फूट पथ चौराहा सड़क किनारे के दुकान में ही होते थे।अच्छे दुकान होटल में सुंदर कप प्लेट हुआ करते थे।रांची अपनी बिटिया रुमा के यहां ऐसे नए ग्लास ले आई हूं ।अभी शाम के 5 बजे है मै चली चाय पीने अपने नए बचपन के साथी ग्लास में आगे की बात अगले ब्लॉग में
Saturday, May 16, 2026
निमिया तले
निमिया तले डोली रख दे मुसाफिर
सावन की आई बहार रे
निमिया तले डोली रख दे मुसाफिर
सावन की आई बहार रे
निमिया तले डोली रख दे मुसाफिर
कौन लहंगा पटोर रे
कौन ने दिहले कथकी चुनरिया
कौन गले का हार रे
अम्मा ने दिहले नौ मन सोनवा
बाबुल लहंगा पटोर रे
भैया ने दिहले कथकी चुनरिया
भौजी गले का हार रे
सावन की आई बहार रे
निमिया तले डोली रख दे मुसाफिर
कौन के सागर पार हो
कौन के रोवला से भींगी मोरी चुनरी
कौन के खुशी अपार हो
अम्मा के रोवला से नदियां बहत है
बाबुल से सागर पार हो
भैया के रोवला से भींगी मोरी चुनरी
भौजी के खुशी अपार हो
सावन की आई बहार रे
निमिया तले डोली रख दे मुसाफिर
कौन कहे छठी मास हो
कौन कहे बहिनी अवसर अइहा
कौन कहे क्या है काज रे
अम्मा कहे बेटी निशदिन अइहा
बाबुल कहे छठी मास हो
भैया कहे बहिनी अवसर अइहा
भौजी कहे क्या है काज रे
सावन की आई बहार रे
निमिया तले डोली रख दे मुसाफिर
Monday, May 4, 2026
बर्फ और शोले
कहीं बरसा रहे हो शोले, कहीं बर्फ के गोले
मैंने यहां जन्म लिया, इसमें मेरी क्या खता रे,
कभी धूप जला देती, कभी ठंड सता दे,
ऐ मालिक तू ही बता दे, किसीको क्या सज़ा दे।
किस्मत के इन पन्नों पर, किसने लिख दी कहानी,
किसी के हिस्से सावन, किसी के हिस्से वीरानी,
मैं तो बस राह का राही, ढूंढूं अपनी मंज़िल,
कभी मिलती है खुशियां, कभी आँखों में पानी
कहीं बरसा रहे हो शोले, कहीं बर्फ के गोले,
मैंने यहां जन्म लिया, इसमें मेरी क्या खता रे,
बरफ का ढेर लगा दे, भेज रहा हूं यहां का पता,
ठंडी सी एक राहत दे दे, मिट जाए ये व्यथा,
मेरे घर को भी स्विटजरलैंड न सही तो कश्मीर बना दे
थोड़ी सी ठंडी हवाएँ, थोड़ा सा बरफ गिरा दे
कहीं बरसा रहे हो शोले, कहीं बर्फ के गोले,
मैंने यहां जन्म लिया, इसमें मेरी क्या खता रे,
जलते हैं अरमान सारे, जैसे सूखी सी लकड़ी,
थोड़ी सी बारिश कर दे, खिल जाए फिर से धरती।
ना शिकवा है किसी से, ना कोई गिला है,
बस इतना सा अरमान, और थोड़ा सा सिला है
कहीं बरसा रहे हो शोले, कहीं बर्फ के गोले,
मैंने यहां जन्म लिया, इसमें मेरी क्या खता रे,
जहां भी भेजे किस्मत, हंस के जी लेंगे,
गर साथ तेरे रहमत का, एक भी कतरा मिला है।
कहीं बरसा रहे हो शोले, कहीं बर्फ के गोले,
मैंने यहां जन्म लिया, इसमें मेरी क्या खता रे
Monday, April 27, 2026
भोजपुरी गीत
बिहार का चिन्ह प्रतीक
कौना कारण शहर भागे पिया
हमका पपिहा के बोलियां जहर लागे।।
तोहरे बिना सूना अंगनवा,
रोवे नीमवा, रोवे अमराई डार लागे।।
काहे छोड़ गइलू गाँव के गलिया,
हर मोड़ प तोहार लागि नज़र लागे।।
कौना कारण शहर भागे पिया
हमका पपिहा के बोलियां जहर लागे।।
चंदा निकले तोहर याद सतावे,
तारन के चमकियो अब कहर लागे।।
सावन अइले भी भींजे ना मनवा,
बरखा के बूंदियो सूखी लहर लागे।।
कौना कारण शहर भागे पिया
हमका पपिहा के बोलियां जहर लागे।।
रोज फोनवो नईखे करत
बिन संदेश एको दिन पूरा उमर लागे
लौट क जल्दी आव सजना,
तोहरे बिना जिनिगी बिखर लागे।।
कौना कारण शहर भागे पिया
हमका पपिहा के बोलियां जहर लागे।।
अमिताभ सिन्हा, प्रगति इंक्लेव, रांची