Thursday, October 19, 2023

गया - मगध और छठ महापर्व


छठ पर्व और बिहार

पिछले पोस्ट में मैंने गया (बिहार) और पिंडदान की कहानी बताई और इस पोस्ट में छठ का गया और बिहार से क्या सम्बन्ध हैं की कहानी सुना रहा हूँ। गया को गया क्यों कहते कहते है और इस क्षेत्र को मगध क्यों कहते है ये भी इसी कहानी में बताया हैं मैंने ।


छठ बिहार और बिहारी से जुड़ा एक पर्व हैं । बकौल श्वेता (मेरी बिटिया) You can take a Bihari away from Bihar, but you cannot take away chhat from them. पर छठ और बिहार क्यों ? क्या कनेक्शन हैं ?


गयासुर की कहानी

जो एक मात्र मिथक या कहानी छठ के बारे में हैं मैंने सुना है वह गया (बिहार राज्य का एक शहर) के इर्द गिर्द घूमती हैं । वैदिक काल के दौरान, "कीकत प्रदेश" जो कि मध्य भारत के अधिकांश भाग में फैला हुआ था में गयासुर नामक एक 'असुर' रहता था। गयासुर आकार में बहुत बड़ा था। ऐसा कहा जाता है कि जब वह जमीन पर लेट जाता तो उसका सिर उत्तर भारत में और उसके पैर आंध्र क्षेत्र में पड़ते । खास बात यह है कि उसका दिल (हृदय स्थल) आज के गया में पड़ जाता था।'देवता' गयासुर से बहुत डरते थे क्योंकि वह उन्हें बिना किसी कारण के परेशान करता था। वे उससे छुटकारा पाना चाहते थे। गयासुर भगवान विष्णु का परम भक्त था। देवता उसके आतंक से परेशान थे और उससे मुक्ति चाहते थे । लेकिन गयासुर विष्णु के भक्त थे और उनका वरदान भी था उनके पास । देवताओं ने विष्णु की प्रार्थना की और विष्णु ने गयासुर को उसके ह्रदय भाग पर विष्णुयज्ञ करने को राजी कर लिया । गयासुर अपने आराध्य की बात कैसे टालता अपनी अवश्यम्भावी मृत्यु जान कर भी गयासुर राजी हो गया । ये तो उसके मुक्ति और वैकुण्ठ वास को निश्चित करने वाला यज्ञ जो था । गयासुर दक्षिण के तरफ सर और उत्तर के तरफ पैर रख कर सो गया और यज्ञ के लिए प्रस्तुत हो गया। स्थानीय बाह्मणो ने इस तरह से यज्ञ करवाने से मना कर दिया। विष्णुयज्ञ में शाक्यद्वीप(आज के ईरान),से गरुड़ पर आरूढ़ कर सात ब्राम्हणों को यज्ञकार्य के लिए लाया गया। ब्राह्मण शक्लद्वीपी ब्राह्मण कहलाए। शकलद्वीपी ब्राह्मण की दो शाखाये थी भोजक और मगी । मगी ब्राह्मण ही गया क्षेत्र में बस गए और उन्होंने गयासुर के ऊपर यज्ञ करवाया। मग शब्द का ईरानी भाषा में अर्थ होता है आग का गोला। आग का गोला यानी सूर्य। ये सूर्योपासक ब्राम्हण शाक्यद्वीप से यहां आने के बाद यहीं सात स्थानों में बस गये। इन्होने इन सातों जगहों में सूर्य मंदिर भी बनाया ।
इन्हीं सूर्योपासक ब्राह्मणों ने सूर्य की उपासना शुरू की और छठ महापर्व की शुरुआत हो गयी और यह है कहानी छठ और बिहार के सम्बन्ध का। गयासुर के नाम पर इस शहर का नाम गया पड़ा और मगी ब्रह्मणों के नाम पर क्षेत्र का नाम पड़ा मगध ।




बीरुगढ़ सूर्य मंदिर (सिमडेगा), देव सूर्य मंदिर (देव, औरंगाबाद)

Monday, October 16, 2023

पितृपक्ष मेला और गया (बिहार)


गया का महत्त्व पिंडदान और सूर्य पूजन का पर्व छठ से जुड़ा है। गरुड़ पुराण में गया को सभी तीर्थों से उत्तम माना गया है। वायु पुराण में कहा गया है की गाया जी हर स्थान एक तीर्थ है और मत्स्य पुराण में इसे पितृ तीर्थ बताया गया है।

बिहार का गया जिला, जिसको लोग बहुत ही आदरपूर्वक ‘गयाजी’ के नाम से पुकारते हैं. गया जिले को धार्मिक नगरी के नाम से भी जाना जाता है. यहां हर कोने-कोने पर मंदिर हैं, जिनमें स्थापित मूर्तियां प्राचीन काल की बताई जाती हैं. हालांकि, सभी की मान्यताएं अलग-अलग हैं. भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष के 15 दिनों को ही पितृपक्ष कहा जाता है. गरुड़ पुराण के मुताबिक, गयाजी में होने वाले पिंडदान की शुरुआत भगवान राम ने की थी. मान्यता है कि भगवान राम, सीता और लक्ष्मण गया की धरती पर पधारे थे और यही अपने पिता दशरथ का पिंडदान किया था. तभी से यहां पिंडदान करने की महत्ता शुरू हो गई थी. गयाजी में पिंडदान करने से पूर्वजों की मोक्ष की प्राप्ति होती है. यहां देश-विदेश से भी अब लोग अपने पूर्वजों की मोक्ष की कामना के लिए पिंडदान करने आते हैं पंडा लोग भारत की सभी भाषाएं बोलते मिल जाएगे.


विष्णुपद मंदिर

सीता का श्राप

वाल्मीकि रामायण के अनुसार श्री राम लक्ष्मण और सीता दशरथ के पिंडदान के लिए गया आये थे। श्री राम और लक्ष्मण पिंडदान में प्रयोग होने वाली वस्तुओं के लिए नगर के तरफ गए और देर होने पर दशरथ जी की आत्मा ने सीता से पिंडदान का मांग कर दिया। सीता जी जो फल्गु के किनारे अकेली थी फल्गु , केतकी (फूल ) , गाय और वट बृक्ष के गवाही में पिंडदान कर दिया। जब राम जी और लक्ष्मण जी वापस आये तो सीता ने बताया की ये चारों गवाह है की मैंने पिंडदान कर दिया। फल्गु नदी , केतकी और गाय मुकर गए जबकि वट बृक्ष ने सिर्फ सच बोला। तब सीता ने तीनो को श्राप दिया फल्गु को "तुम सिर्फ नाम के नदी रहोगे और तुझमे पनी नहीं रहेगा , केतकी को श्राप दिया की तुम्हारे फूल कभी देवताओं पर नाही चढ़ेंगे। गाय को श्राप दिया की भले ही तू पूज्य है पर तुम जूठा खाएंगी।


फल्गु नदी पिंडदान घाट , अक्षय वट

मेरी हाल की गया यात्रा

गया जक्शन एक बहुत ही मत्वपूर्ण स्टेशन है दिल्ली - हावड़ा ग्रैंडकॉर्ड लाइन पर और बहुत सी ट्रेन वन्दे भारत और राजधानी एक्सप्रेस समेत यहाँ रूकती है और यहाँ आने का रेल सबसे सुविधाजनक साधन है। पर पटना या रांची से बस या कार से भी आया जा सकता हैं। मैं 13-15 अक्टूबर 2023 को गया में था, पिण्डदान के लिए। मैं रांची से ट्रेन से ही आया था। रांची पटना के बीच चलने वाले चार ट्रेन गया हो कर पटना जाती है। पितृ पक्ष मेले के समय गया था तो होटल बुक करने में दिक्कत हुई। बाद में पिता महेश्वर मंदिर मार्ग में मिला होटल मिला। होटल में रूम ठीक था बाथरूम भी था , कमोड और AC भी। लेकिन लोकेशन बहुत अच्छा इस लिए नहीं था क्योंकि मंदिर के कारण ट्रैफिक की हालत ख़राब थी । पार्किंग नहीं था। पहले दिन सभी गाड़िया इस रास्ते पर बंद कार दिए गए।

लेकिन गया करीब १० वर्ष पहले किये गए ट्रिप से बेहतर था साफ सफाई ठीक थी पर ट्रैफिक की हालत बिगड़ी हुई है। पितृपक्ष मेला को संभालना आसान नहीं है। पूरे देश के लोग आए थे, पन्डा लोगों को कई भाषा बोल रहे थे। पर जो बात खटकी वह थी फल्गु नदी में गंदगी।‌ फल्गु को सूखा रहने श्राप मिला था और रबर डैम बना कर पानी भर दिया गया है । अब इस पानी में बहुतायत में फूल और चावल के आंटे के बने पिण्ड फेंकें जा रहे है, फूल को तो छान लेते है पर पिण्ड तो सड़ जाते है और पानी महकने लगता है और इसी में नहाना पड़ता है। जब नदी सूखी थी तब बालू खोद साफ पानी से लोग नहा लेते है, और बालू पर पड़े पिण्ड पक्षी खा लेते। सीता जी के श्राप को झुठलाने की कोशिश से कोई पोजिटिव परिणाम नहीं निकला।
पिंडदान की विधि
मैंने पहले सभी पूर्वजों का तरपन किया और फिर जिन पूर्वजों का पिंडदान करना था उसका पिंडदान एक चादर बिछा कर किया। पंडित जी ने बताया पिंड को तीन भाग में करके एक भाग फल्गु नदी में डालना है एक भाग विष्णुपद मंदिर - जो फल्गु किनारे के पास थी देना था और अंतिम भाग अक्षय वट में जो फल्गु से कुछ दूर था । इलेक्ट्रिक ऑटो जिसे यहाँ टोटो बोलते है का किराया १००-१५० रु देने पड़े। अंत में हमने पिंडदान में पहने नए कपडे बदल कर वही छोड़ दिया।
पितृपक्ष से जुड़ी एक और कहानी
पितृ पक्ष मेला में पिण्डदान व श्राद्ध के लिए लोगो पूरे भारत और विदेश से भी यहाँ आते है । माना जाता है कि जिसका भी पिण्डदान यहां किया जाता है उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। गया तीर्थ को तर्पण, श्राद्ध व पिण्डदान के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है इसके पीछे एक और धार्मिक कथा है। प्राचीन काल में गयासुर नामक एक शक्तिशाली असुर भगवान विष्णु का बहुत बड़ा भक्त था। उसने अपनी तपस्या से देवताओं को चिंतित कर रखा था। उनकी प्रार्थना पर विष्णु व अन्य समस्त देवता गयासुर की तपस्या भंग करने उसके पास पहुंचे और वरदान मांगने के लिए कहा। गयासुर ने स्वयं को देवी-देवताओं से भी अधिक पवित्र होने का वरदान मांगा।

वरदान मिलते ही स्थिति यह हो गई कि उसे देख या छू लेने मात्र से ही घोर पापी भी स्वर्ग में जाने लगे। यह देखकर धर्मराज भी चिंतित हो गए। इस समस्या से निपटने के लिए देवताओं के अनुरोध पर विष्णु ने अपने भक्त गयासुर को अपने शरीर पर एक यज्ञ के लिए राजी कर लिया गयासुर ने अपना संपूर्ण शरीर इस यज्ञ के लिए दे दिया । गयासुर अपना शरीर देने के लिए उत्तर की तरफ पांव और दक्षिण की ओर मुख करके लेट गया। गयासुर के पुण्य प्रभाव से ही वह स्थान तीर्थ के रूप में स्थापित हो गया। गया में पहले विविधि नामों से 360 वेदियां थी लेकिन उनमें से अब केवल 48 ही शेष बची हैं। आमतौर पर इन्हीं वेदियों पर विष्णुपद मंदिर, फल्गु नदी के किनारे अक्षयवट पर पिण्डदान करना जरूरी समझा जाता है। इसके अतिरिक्त नौकुट, ब्रह्योनी, वैतरणी, मंगलागौरी, सीताकुंड, रामकुंड, नागकुंड, पांडुशिला, रामशिला, प्रेतशिला व कागबलि आदि भी पिंडदान के प्रमुख स्थल हैं।


पिंडदान पूजा

अगले दिन नवरात्र का पहला दिन था। रात चार बजे अचानक बैंड बाजा, ड्रम और लाउडस्पीकर के आवाज से नींद टूट गई। बाहर जा कर देखा तो लोग कलश और उसके उपर जले हुए दीये रख कर गाजे बाजे के साथ चले जा रहे थे। पता चला ये सभी लोग पिता माहेश्वर घाट जो मेरे होटल से १ KM की दूरी पर है जा कर स्नान कर कलश भर कर मंदिर में पूजा कर ला रहे है। इतने गाजे बजे के साथ लोग अपने घर के लिए या पूजा पंडालों के लिए कलश भर कर ला रहे थे ऐसे सभी जगह नहीं दिखता। पता चला यहाँ हर त्यौहार इसी प्रकार मनाया जाता है। धूम धाम से । मंगला गौरी मंदिर में भी लोग आज के दिन जाते है। टेकरी राज के समय से ऐसा होता आ रहा है।

छठ और गया के सम्बन्ध में मेरा आलेख अगले अंक में।

Tuesday, October 3, 2023

यात्रा के क्रम में फ़िल्मी लोगों से मुलाक़ात

यह तब की बात है जब डर्टी पिक्चर फिल्म टीवी पर दिखाई गई थी और मेरा एक पुराना ब्लॉग मेरे दिमाग में आया और उसका एक संशोधित संस्करण फिर से यहाँ इस ब्लॉग में दे रहा हूँ जो हिंदी में है। ऐसे १९६९ में जब पहली बार कालेज ट्रिप में मुंबई गया था तब कई दोस्त फिल्मी हस्तियों को देखने के लिए इधर उधर भाग रहे थे, मैं घूमने में समय दे रहा था। दोस्त बता रहे थे कि बबीता फिल्म से ज्यादा सुंदर रू बरू देखने में लगती है और राजेश खन्ना को दूर से देखे। क्या पता था आगे कई बार फिल्मी लोगों से मुलाकात होगी।
हवाई यात्राओं में सेलिब्रिटी से मुलाक़ात

हवाई यात्राओं में आप अक्सर कभी न कभी , कहीं न कहीं, किसी न किसी सेलिब्रिटी से मिलते है दूर से या करीब से यह आपकी तक़दीर या दिलचस्पी पर निर्भर करता है। मुझे जिन सेलिब्रिटी से मिलने का मौका प्रायः एयर पोर्ट पर मिला है , वे है पण्डित रवि शंकर (कोलकाता एयरपोर्ट १९८०'स ) मैंने उनका ऑटोग्राफ भी लिया झिझकते हुए। फिर कोलकाता में ही श्री देवी को देखा - पहले पहचान नहीं पाया (बिना मेक अप के जो थी )। शायद उनकी माँ साथ थी। एक दक्षिण भारतीय हवाई यात्री जब "श्री देवी श्री देवी" चिल्लाने लगा तब ही उन्हें पहचान पाया - वो चेन्नई का फ्लॉइट ले रहीं थी और मैं विज़ाग का ।

ऐसे ही चेन्नई - विज़ाग के फ्लाइट में रामायण सीरियल के पूरे कास्ट (श्री रामानंद सागर सहित ) के साथ सफर करने का मौका भी मिला और राम जी (श्री अरुण गोविल ) मेरे अगले सीट पर ही थे। अब ओटोग्राफ मांगने का काम बचकाना लग रहा था पर मैंने "मेरे बच्चों के लिए ऑटोग्राफ दे दीजिये" कह कर उनके और मेघनाद (श्री विजय अरोरा जी) का ऑटोग्राफ ले ही लिया। मन था रावण (श्री अरविन्द त्रिवेदी ) और श्री रामानंद सागर का भी ऑटोग्राफ लू पर उनकी सीट दूर थी और वे कई पंखों (फैंस ) से पहले ही घिरे थे।

एक बार और फ़िल्मी लोगों से सामना तब हुआ जब दिल्ली (पुराने टर्मिनल) से मैं कोई फ्लाइट ले रहा था । वेटिंग एरिया में मेरे सामने एक बहुत गोरी खूबसूरत औरत दो छोटी बच्चियों के साथ बैठी थी । पहचानी पहचानी लग रही थी पर नाम नहीं याद आ रही थी । पास ही अमरीश पुरी जी और आलोकनाथ जी खड़े थे जिन्हे मैं पहचान रहा था पर ऑटोग्राफ लेने की कोई इच्छा नहीं थी तब । अमरीश पुरी जी जोर शोर से किसीसे (फ़िल्मी आदमी ही होगा ) बातें कर रहे थे । आलोकनाथ अलग थलग चुप चाप खड़े थे । तभी अमरीश पुरी उस गोरी चिट्टी औरत के पास आ कर बातें करने लगे । मैंने अंदाज लगाया ये मोहतरमा भी निश्चित कोई फ़िल्मी हस्ती ही होगी । फिर जब चेन्नई की फ्लाइट की घोषणा हुयी और वह परिवार उठ खड़ा हुआ तब याद आया ये तो सारिका हसन है अपनी दो बच्चियों (श्रुति और अक्षरा के साथ )। हाल में ही इन्हे अमिताभ बच्चन वाली फिल्म ऊंचाई में देखा - एकदम बदल गयीं हैं।
1997 में राजनीतिक सेलेब्रिटी में से एक बार श्री इन्दर कुमार गुजराल साहब के साथ रांची-पटना-लखनऊ - दिल्ली फ्लाइट में पटना से दिल्ली सफर करने का मौका मिला था पर हमारा सारा सामान पटना में ही उतार लिया गया था । गुजराल साहेब के ग्रुप का सामान का वज़न ज्यादा होगा - मैंने तब ऐसा अनुमान लगाया। अगले दिन पता चला गुजराल साहब तब PM का शपथ लेने जा रहे थे । लेकिन मेरे सबसे जबरदस्त सेलिब्रिटी मुलाक़ात हुई थी कपिल देव और सिल्क स्मिता के साथ १९८० में सालेम में जहां वे उसी होटल में ठहरे थे जहां मैं रूका था। यह कहानी मैं अंग्रेजी में सिल्क स्मिता के OBITUARY के साथ भी लिख चुका हूँ। इस बार हिंदी में लिख रहा हूँ।





डर्टी पिक्चर का एक दृश्य और तमिल फिल्म मुन्द्रम पिरय का एक दृश्य
(तस्वीरें आभार सहित इंटरनेट से ली गई हैं)


1980-81 के दौरान, मैं सलेम, तमिलनाडु में तैनात था, जब मेरी मुलाकात सिल्क स्मिथ से हुई - जो उसी होटल, होटल गोकुलम के पास के एक कमरे में रुका था।
मुझे एक विशेष घटना याद आती है जब सालेम में एक तमिल फिल्म की शूटिंग हो रही थी। निर्माता थे एमजीआर के एक पुराने सहयोगी , अपने पूरे दल के साथ हमारे होटल में ठहरे थे। इस फिल्म में वैम्प मशहूर सिल्क स्मिता थीं। मैंने पहले उनकी तमिल फिल्म "मुंद्रम पिराई" देख रक्खी थी, जिसे बाद में हिंदी में सादमा के नाम से बनायी गयी था - जिसे भी मैंने देखा है और दोनों संस्करणों में उनकी उपस्थिति निश्चित रूप से कामुक थी।
बताता चलूँ सालेम में कई फिल्मों के शूटिंग होती रहती थे। कम बजट वाली फिल्मों के लिए यह आदर्श स्थान था। प्राकृतिक जगह शूट करना हो तो हिल स्टेशन यरकौड ३० km ही दूर है । सुना यहाँ स्टूडियो भी है। नृत्य शूट करना हो तो होटल नेशनल में एक बड़ा हॉल था।
जिस फिल्म की शूटिंग ही रही थी उसके हीरो विजयकांत थे जो रजनीकांत के जैसे दिखने के कारण "गरीबों के रजनीकांत" के रूप में भी प्रसिद्द थे । हीरो को पहली मंजिल पर एक डबल बेड एसी रूम दिया गया था जबकि सिल्क को एक सिंगल AC रूम और नयी आई हीरोइन को सिंगल NON AC रूम दिया गया था। मैं भी ग्राउंड फ्लोर पर एक एसी सिंगल रूम नंबर 211 में था जबकि हीरोइन 212 में और सिल्क स्मिता अपने हेयर ड्रेसर के साथ रूम नंबर 216 में थी - जो एक सिंगल एसी कमरा था। होटल का गलियारा हम सब के बीच कॉमन था।
सिल्क स्पष्ट रूप से अकेलेपन की शिकार थी और वह विजयकांत को ताश खेलने या साथ में कुछ drink लेने के लिए बार बार फोन कर रही थी। - जैसा कि होटल के रिसेप्शनिस्ट ने बताया जो टेलीफोन ऑपरेटर के रूप में भी काम करता था और उसे भी फिल्म में एक छोटा रोल दिया गया था । सिल्क गलियारे में हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए हर दिन बहुत नखरे दिखाती थी। और हम (मैं और बीएचईएल इंजीनियर-संबशिवम) उससे थोडा बाहर बातें करते जो शायद उसे अच्छा लगता था - उसे हिंदी समझ आती थी या नहीं यह नहीं पता ।
हीरोइन जो स्कूल से निकल कर सीधे शूटिंग पर आ गयी थी अपने पिता से साथ आई थी । पिता को जानबूझ कर शूटिंग में नहीं ले जाते और वो दिनभर सिगरेट फूंकता रहता । उसकी बेटी शायद मेडिकल के पढ़ाई छोड़ कर आई थी । बाद में जब फिल्म देखी तो पता चला इस नयी लड़की से कम कपड़ो में कई नृत्य कराये गए थे शायद इसीलिए पिता को शूटिंग में नहीं ले जाते थे। इस फिल्म का एक भीड़ का सीन होटल में ही फिल्माया गया और हम तीन दोस्त भी उस भीड़ का हिस्सा थे। पर जब फिल्म देखे तो अपने को ढूंढ नहीं पाए।
एक दिन आधी रात में मेरे होटल के कमरे के दरवाज़े पर तेज़ दस्तक से मेरी नींद खुल गई। मैंने दरवाज़ा खोला तो पाया कि नशे में धुत्त सिल्क स्मिता गलियारे में सभी दरवाज़े खटखटा रही थी। वह अपने हेयर ड्रेसर की बांहों पर लटक कर अपने कमरे में जाने की कोशिश कर रही थी। अक्सर वह गलियारे में नाचने लगती थी करीब करीब हर दिन नाचते नाचते ही कमरे में जाती । इतनी बड़ी फैन फॉलोइंग के बावजूद उनके एकाकी जीवन के लिए मैं केवल उन पर दया कर सकता हूं।
यह होटल तमिल फिल्म उद्योग में लोकप्रिय था और हम फिल्म शूटिंग के कुछ दृश्य भी देख सकते थे। मैं फिल्म निर्माण की कठिन प्रक्रिया से प्रभावित हुआ, जबकि वास्तव में मैंने इसमें शामिल सभी कार्यों का एक छोटा सा हिस्सा ही देखा।
एक बार एक क्रिकेट मैच के सिलसिले में कपिलदेव जी भी सालेम पहुंचे और हमारे होटल में ही रुके। लॉबी में हम लोग भी कार का इंतज़ार कर रहे थे और क्रिकेट टीम भी। मौका मिलते हे मेरे एक दोस्त कपिलदेव जी से पूछ बैठा "where is Sunil Gavaskar " और कपिलदेव का जवाब था "Gavaskar who ?"इससे पता चलता है क्रिकेट के इतिहास में ego clash हर काल में रहा है।
अब सिल्क स्मिता के बारे में...
उनका जन्म 1960 में विजयलक्ष्मी के रूप में हुआ था, और उन्हें अपना स्टेज नाम उनकी पहली हिट फिल्म वंडीचक्रम (1979) से मिला, जिसमें उनका नाम सिल्क था। वह 17 साल तक फिल्मों में सक्रिय रहीं और 450 फिल्मों में काम किया। 1996 में 35 साल की उम्र में उन्होंने आर्थिक समस्या, शराब की लत और प्यार में मोहभंग के कारण आत्महत्या कर ली। २०११ में बनी डर्टी पिक्चर एक अच्छी नावपांजलि (Obituary ) थी , मैं भी उनकी आत्मा के शांति के लिए प्रार्थना करता हूँ।