Thursday, April 16, 2020

बैठे ठाले


कोरोना क्या फैला कई सुधि जन साहित्य की सेवा में लग गए। मै भी कोरोना की बातें सुन सुन कर परेशान था अतः ध्यान अच्छी बातों में लगानें की सोचने लगा। पहला ख्याल धर्म के बारे में कुछ लिखने का आया। फिर उन धार्मिक face book posts जो "१० सेकंड में लाइक करने पर लाखों मिलने और ignore करने पर कष्ट का डर दिखाते हैं" पर अपनी असली प्रतिक्रिया के बारे में सोचा और ,,,,,, यह भूल कर कि अब मै ७०+ का हूँ 



 
प्रेम के बारे में सोचना ही सही समझा। प्रेम की अनुभूति जन्म के साथ ही प्रारम्भ हो जाती है। माँ और बच्चे का प्रेम एक स्वंयम्भू प्रेम है और यह किया नहीं जाता। तारूण्य काल में भी ऐसा ही अचानक होता है। किसी किसी को सिर्फ एक ही से। कभी कभी इकतरफा ओर कभी कभी अव्यक्त। इसतरह एक-ब-एक उपजा प्यार और विरह साहित्य सृजन के लिए बड़ा प्रेरणा श्रोत रहा है। ऐसे शादी के बाद एक दूसरे को लिखे और सहेजे प्रेम पत्र भी साहित्य की गुप्त धरोहर है। शायद इसलिए ही पहले शादी और गौने के बीच पर्याप्त समयावधि रक्खी जाती थी ताकि पर्याप्त पत्राचार करने का कमसे एक बार तो मौका मिले। यह सब ईमेल के जमाने मे बेमानी हो गया है।

वास्तविकता (reality) देश और मानवता का प्रेम भी साहित्य सृजन का प्रमुख कारण रहा है।



मेरा सृजन काल (Please don't laugh) कॉलेज का द्वीतीय और तृतीय वर्ष था। लोगों का मानना था इस सब का कारण स्व साधना जी थी जिनकी फिल्म आरजू मैने 6 बार देखी थी मेरे लाख मना करने पर भी कोई मानने को तैय्यार नहीं था कि यह सब मिथ्या है। खैर मै एक वाम पन्थी लेखक था और रोमेन्टिक लेखन का कट्टर विरोधी। जब सभी 3-3 छात्र एक ही रिक्शे पर बैठ कर फिल्म जा रहे होते मै इसे अत्याचार मानता कभी कभी पैदल चल लेना ही पसन्द करता। मै कई बेमानी फिल्मो को बीच मे ही छोड़ देता । राजेश खन्ना की कटी पतंग मैने जीजा जी के साथ कलकत्ते देखने गया पूरी फिल्म देखनी पड़ी पर बाद में हमारी बहस हो गई मेरा प्रश्न था इसमें समाज के लिए क्या संदेश है ? पर जीजा जी बड़े थे अत: उनकी दलील की फिल्म का महज Entertaining होना ही काफी है माननी पड़ी। अब आश्चर्य होता है की मैंने 'मेरे सनम' और 'तीसरी मंजिल' जैसी फिल्म को भी आधे में छोड़ा था जबकि तीसरी कसम दो बार देखी। अब शायद आप पूछे फिर आरज़ू क्यों देखी ६ बार ? वह first year की बात थी भई। लेखक के तौर पर वास्तविकता आधारित लेखन ही मुझे पसन्द था ।
वास्तविकता और romanticism के बीच के भ्रम में शायद मै फंसा था और ये भ्रम भी कई बार उच्च कोटि के साहित्य को जन्म देता है। उदहारण है साहिर लुधियानवी क्योंकि वे भी वास्तविकता और romanticism के बीच के भ्रम में फंसे थे । उनके ये दो गीत इस भ्रम को खूब दर्शाते है : " ये कूचे ये नीलम घर दिलकशी के ये लुटते हुए कारवां जिंदगी के , कहाँ है कहाँ है मुहाफ़िज़ खुदी के सना ख्वाने तकदिशे मशरिक कहाँ है " और "रात सुनसान थी बोझल थीं फ़ज़ा की साँसें , रूह पर छाए थे बे-नाम ग़मों के साए। दिल को ये ज़िद थी कि तू आए तसल्ली देने ,मेरी कोशिश थी कि कम्बख़्त को नींद आ जाए " ।
मै "कादम्बिनी"  "नई कहानियाँ" और 
ज्ञानोदय पढ़ा करता था और सरवेश्वर दयाल सक्सेना मेरे प्रिय लेखक। मैने उस दौर में दोहे (शेर) छोटी बड़ी कविताए और कहानियाँ, नाटक  सभी कुछ लिखे। मानो यह निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ कि मुझे कवि बनना है या लेखक । मेरी कुछ रचनांए कॉलेज मैगज़ीन मे छपती रहती। मेरी रचनाओं का अर्थ छिपा होता और कहानी का कोई अन्त नही होता। मै उसे छायावाद का एक प्रकार मानता था। मेरी एक बड़ी मौसेरी बहन स्व शान्ति सिन्हा हिन्दी की टीचर थी। मैने एक बार का अपनी दो रचनांए उन्हे दिखाई और उनकी टिपण्णी मेरी आँखें खोल गया। उन्होनें कहा लिखे तो बहुत अच्छा हो पर इसका मतलब क्या है ? तब का दिन और आज का दिन मैंनें साहित्य की कोई सेवा नहीं की है। आप बताएं मै लिखू या नहीं ?


No comments:

Post a Comment