Saturday, September 30, 2023

क्या आप होटल के साबुन - शैम्पू घर ले आते है ?

मै फेसबुक पर एक ट्रेवल ग्रुप का सदस्य हूँ। हाल में वहां एक पोस्ट आई - "क्या आप होटल के कॉम्प्लिमेंटरी साबुन , शैम्पू ले आते हैं ?" सब ने अलग अलग प्रतिक्रिया दी जैसे किसी ने लिखा "कुछ भी मुफ्त नहीं होता पैसा दिया है तो इसे ले आने का हक़ है हमें "। किसीने इसे असभ्य व्यवहार बताया। इस पोस्ट ने मुझे होटल में रुकने के मेरे पुराने से पुरातन अनुभव याद दिला दिया।



होटल - धर्मशाला का मेरा पहला अनुभव !
मेरा पहलाा होटल का अनुभव देवघर में पंडा जी के धर्मशाला में रुकने का हैं । मेरी सबसे पुरानी याद शायद पांच वर्ष के उम्र की है जब मेरी छोटी बहन का मुंडन यहाँ हुआ था। मेरे पंडा जी गिद्धौर महाराज (इसी राजवंश ने १५९६ में देवघर मंदिर का पुनः निर्माण करवाया था) के भी पंडा थे और उनका निवास था तीन तल्लों की कच्ची बाड़ी (मकान पक्का ही था, पता नहीं उसे कच्ची बाड़ी क्यों कहते थे) जो कि उनका निवास भी था और एक बहुत बड़ा धर्मशाला भी । बहुत सारे कमरे थे वहां एक बहुत बड़ा बगीचा था। हम लोग कच्चा रसद (चावल , दाल, आलू, हल्दी नमक) ले कर ही जाते क्योंकि अपना खाना खुद ही बनाना पड़ता था। लकड़ी वाले चूल्हे या तो खुद ईंटों को जोड़ कर बना लेते या पहले आये यात्रियों के छोड़े गए चूल्हे को नीप पोत कर उपयोग में लाते। लकड़ी बाजार में मिल ही जाता नहीं तो बगीचे में गिरी लकड़ी पत्ते भी काम में ले आते। रसोईया भी साथ होते । अब ऐसी जगह जिसका शायद कोई किराया भी नहीं देना पड़ता था कोई कम्प्लीमेंटरी साबुन तेल का प्रश्न ही नहीं उठता था।

मेरी प्रारंभिक ऑफिसियल टूर के होटल और मुंबई ट्रिप
कॉलेज ट्रिप (१९६६-६९) में सस्ते होटल में ही रुकते जहाँ कॉमन बाथरूम यदि हो वही बहुत बड़ा Luxury था। नौकरी के प्रांरभिक दिनों में हमारा DA होता था रु ४० जब कंपनी गेस्ट हाउस में रुकते थे और रु ५४ यदि होटल में रुकना पड़े यानि होटल के किराये के लिए सिर्फ रु १४ मिलते था। आपको आश्चर्य होता ७०'s में कही कही इस रेट में या रु २० तक होटल में रूम मिल भी जाते थे पर ज्यादा जगहों पर जहा हमें जाना पड़ता कंपनी का GH होते ही थे । लेकिन उसी दौर में मुझे मुंबई (तब बम्बई) जाना पड़ा। मुझे पता नहीं था कि मुंबई के लिए स्पेशल approval लेने पर रु १२५ तक का रूम ले सकते थे। लेकिन मुझे यह नियम तब पता नहीं था। मुंबई में मैंने पहले दादर स्टेशन के पास एक लॉज में रूम ले लिया जहाँ रु १५ में रूम मिल गया। बेड और बिछावन साफ़ नहीं थे और खटमल भी था। बगल के रूम में कोई लगातार खांस रहा था और मुझे एक हिंदी फिल्म कि याद आ रही थी। कॉमन बाथ रूम दो ही थे और अक्सर खाली नहीं मिलते थे। मै एक दिन में ही परेशान हो गया और अगले दिन परेल स्टेशन से थोड़ा पहले एक दूसरे लॉज में शिफ्ट कर गया।

यहाँ का किराया था रु २८ (यानि पॉकेट से देने पड़ते )। रूम - बिछावन और आस पास तो सफाई थी पर इसका कॉमन टॉयलेट में एक बड़ी नाली पर कई cubicle बने थे और फ्लश आटोमेटिक था और वह मुझे पसंद नहीं था क्योंकि सारी गन्दगी आपके सामने से गुज़र जाती । अगले दिन फिर हम निकल पड़े होटल खोजने और परेल स्टेशन से वर्ली के तरफ जाने वाले रोड पर एक चाल के अंदर बने एक लॉज (Sri Niwas Lodge ) में शिफ्ट कर गए। मालिक दक्षिण भारत से थे। यहाँ रूम के अंदर ही एक बाथरूम (सिर्फ बाथरूम टॉयलेट नहीं ) था और मुंह धोने और नहाने के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता जबकि कॉमन टॉयलेट चाल के हर कोने में था। साफ़ सफ़ेद चादर बिछावन पर बिछे थे और कमरा हवादार था। मन प्रसन्न हो गया पर किराया थे रु ४० यानि मेरा पूरा DA लग जाता लेकिन मेरे पास कोई चारा नहीं था। एक फायदा यह था कि Siemens का वर्ली ऑफिस यहाँ से पैदल ही जा सकते थे और टैक्सी का पैसा बच जाता। मेरे लिए वर्ली से कलवा के लिए सीमेंस की गाड़ी मिल जाती लेकिन लौटने के समय मैं हमेशा दादर के मार्किट के पास वाले होटल अरोमा के पास ही उतरता - मैं Siemens का ग्राहक था और उन्हें यह कैसे बताता की मैं एक सस्ते लॉज में रुका हूँ । SRINIWAS LODGE पहला होटल था जहाँ एक छोटी लक्स साबुन कि टिक्की कोपलेमेंटरी था। ऐसे कम्पनी GH में टिक्की साबुन मिलता था। अब जहाँ चाहे जितने दिन रुके सिर्फ एक साबुन कि टिकिया मिलती हो वहां से क्या घर ले जाना। अगले कुछ वर्षो तक GH या होटल से सिर्फ साबुन घर ले जा सकते थे ।

कुछ सालों बाद तो सारे Toiletry - प्रसाधन होटल रूम में रखे मिलते लगे। जहाँ तक मेरी बात है होटल से मैं अब सभी शैम्पू , साबुन,पेस्ट,रेजर,ब्रश ले आता हूँ। पांच तारा होटलों में तो विदेशी toiletry , बबल बाथ लिक्विड और स्किन लोशन भी मिल जाते है। उठाये गए सभी सामान अगले ट्रिप में या फिर घर में काम आ जाते है । छोटे साइज कि बोतल , पेस्ट वैगेरह यात्रा में ले जाने के लिए सही होते है। लेकिन शुरू शुरू में मैं इसे घर लाने में असहज हो जाता था। फिर कुछ टॉइलेट्री छोड़ कर बाकि ले आता था। अब तो होटल रूम चाय कॉफ़ी के पाउच इलेक्ट्रिक केतली भी रूम में रखे होते थे। और अब चाय कॉफ़ी और चीनी के पाउच भी घर ले आने लगा।

पांच तारा होटल और मैं
अब कुछ और अनुभव। पहली बार पांच तारा होटल पेंटा होटल में १९८३ में जेनेवा में रुका था । रूम में फ्रिज पहली बार देखा रूम में व्हिस्की, ब्रांडी, बियर सभी थे । मैं तुरंत समझ गया यह अलकोहल मुफ्त नहीं होगा और पीने कि इच्छा को मैंने दबा दिया। और सही ही किया। बाद में एक रेट चार्ट दिख गया सभी ड्रिंक का PER ML रेट लिखा था। पता चला चेक आउट के समय चेक करते है कि कुछ पी तो नहीं। पर देशी दिमाग कि खुराफात यदि थोड़ा पी कर थोड़ा पानी डाल देने से पता नहीं चलेगा और मैंने व्हिस्की थोड़ी चख ही ली बिना कुछ पैसे दिए ।यदि पता भी लगा होगा तो उन्होंने कुछ कहा नहीं हम लोग एयर इंडिया के गेस्ट जो थे। जानता हूं कई लोग मुझे इस काम के लिए कोसने वाले हैं कि मेरे जैसे लोगों के कारण भारत बदनाम है। उन सबों से मैं क्षमा मांगता हूं।

1983 के आस पास हमारा DA इतना बढ़ गया कि दो जन मिल कर चेन्नई के पांच तारा होटल वेलकम ग्रुप चोला में रुक सकते थे और 1984 में हम दो लोग एक बार इस होटल में रुक भी गए। यहाँ भी कमरे में फ्रिज था और उसमे कोल्ड ड्रिंक और बियर भरे थे और सोडा की बोतले भी थी। स्नैक्स भी साइड में रखे थे। क्योंकि इस होटल का खाना महंगा था हम एक नज़दीक में रेस्टुरेंट में ही खाना खा लेते । मुझे जेनेवा के होटल का अनुभव था इस लिए मैंने एक भी ड्रिंक स्नैक्स नहीं लिए पर मेरा मित्र मना करने पड़ भी सारे कोक , मिक्सचर यहाँ तक कि सोडा भी पी खा लिया। होटल वाले रोज़ फ्रिज में ख़त्म हुए ड्रिंक कि जगह नयी बोतले और नए स्नैक्स भी डाल देते । दो दिन बाद जब चेक आउट किये तो कोक को रु ७० के रेट से और मिक्सचर को रु ५० और काजू के रु २०० चार्ज कर लिया होटल वाले ने। बताता चालू तब कोक सिर्फ रु ५ का आता था और कोई मिक्सचर के पैकेट तो अब भी रु १० के आते है।
फिर आता हूँ २०१० में रिटायर होने के बाद कि बात । मैंने एक प्राइवेट कंपनी ज्वाइन कर ली। यहाँ कोई DA का रेट नहीं था। सभी खर्च के रसीद दो और पैसे लो । अब ऐसे में यदि पांच या चार तारा होटल में रुकना पड़ा तो वैसे सारी चीज़े जिसके पैसे देने पड़े जैसे काजू , मिक्सचर, ड्रिंक (एक होटल में ड्रिंक के छोटे सैंपल बोतल थे) मैं जरूर घर ले आता आखिर पैसे तो कंपनी वाले को ही देने थे। और कुछ अच्छे स्नैक्स और ड्रिंक मुफ्त में घर आ जाते ।
मेरे हाल के पतरातू और उत्तराखंड के ट्रिप में जब होटल, होम स्टे में रुकने पड़ा - साबुन छोड़ कुछ नहीं था लाने - होम स्टे में गर्म पानी भी बाल्टी में ला कर देते -- wifi फ्री था यही गनीमत थी ।

और जो काम की चीज़ होटल में मिल जाती है वह है जूता साफ़ करने के फोम, लांड्री बैग, बाथरूम स्लिपर्स, बाथिंग कैप , स्विमिंग का चश्मा। मेरे समझ से टॉवल - चादर जैसी चीज़ो के सिवा सभी आप ला सकते है। छोड़े गए प्रसाधन, कास्मेटिक इत्यादि तो होटल वाले फेंक ही देते है । लेकिंन कृपया फैन, टेलीफोन सेट, केतली , टेबल लैंप वैगेरह न लाये । आप पूछेंगे यह सब भी कोई लाता है तो नीचे दिए समाचार पढ़ ले - गेस्ट ये भी ले जाने का सोच लेते है।

MIRROR - 25 Aug 20223

guests strip room of everything they can carry - from towels to TV remote

Two hotel guests emptied their room of everything they could carry - before grinning into CCTV cameras on their way out the door with hundreds of pounds of stolen swag.
The couple arrived at the hotel without any luggage, the shocked owner recalled, but after check-in they went back to their car to grab empty holdalls to contain all their loot. The pair made off with the room’s kettle, tea caddy, lamps and the fan from the room, as well as two bath towels and two hand towels and even a power extension block with USB ports went into their bags.
They even took the remote for the room’s TV. The total value of their spree is estimated by owners to be around £200. “The only thing they didn't take were the shampoo and soaps from the bathroom," said stunned hotel landlady Natalie Newton, 43.
,
और मैंने एक लेख पढ़ा internet पर 22 Hacks if you stay in a hotel and one of the hack was:

Leave no toiletries
behind The hotel’s towels and bathrobes may not be yours for the taking, but those tiny soaps and bottles of shampoo, conditioner, hand cream, and lotion certainly are! Don’t hesitate to take as many as you can – you already paid for them, even if they don’t show up on your bill.

Friday, September 15, 2023

मेरे सफर के साथी- कैमरा


मेरा दूसरा कैमरा - आग्फा क्लिक - III , अमेजन पर फिल्म रोल के दाम


सफर के साथी ? आपके दिमाग में तुरंत आएगा उन लोगों के नाम या चेहरा जिनके साथ आपने अविस्मरणीय या भूल जाने योग्य यात्राएं की है। बचपन में माता-पिता के साथ, छात्र जीवन में अपने खास सहपाठी मित्र या मितवा के साथ। जवानी में सहकर्मी, प्रेमिका या अन्य प्रिय जन के साथ या बुढ़ापे में जीवन संगिनी के साथ। लेकिन मैं सफर के साथी व्यक्तियों की बात कर ही नहीं रहा। तो फिर? बाइकर से पूछिए वो अपने बाइक को सफर का साथी बतायेगा। ऐसे सफरियो का बाइक या पसंदीदा कार के बिना सफर संभव ही नहीं। उनके लिए सफर के साथी है बाइक या कार। पहले ट्रेन से सफर करने वालों का साथी होता था पानी की सुराही, बेडिंग, टीन का बक्सा। अब भी सभी के साथ पानी की बोतल तो होती ही है बेडिंग की जरुरत नहीं रही AC में रेलवे बेडिंग दे ही देती है , स्लीपर में भी सीट पर गद्दे लगा दिए है बस एक फुलाने वाला तकिया सफर का साथी हो जाता है । इतने सारे चीज़ों के बीच जो सबसे आवश्यक सफर का साथी है वह है कैमेरा। कल्पना कीजिये आप एक सुन्दर सी जगह घूमने गए हो और उस जगह की सुंदरता क़ैद करने के लिए आपके पास कोई कैमरा नहीं। इस ब्लॉग में मैं इसी सफर के साथी पर मेरे अनुभव साझा करूँगा ।



मेरा पहला कैमरा ( फोटो विकिपीडिया से साभार )-पापा आग्फा गेवेर्ट कैमरा के साथ


अपना पहला कैमरा मैंने कैसे खो दिया
मैं कोई फोटो उत्साही (Photo enthusiast) व्यक्ति नहीं हूँ न ही मेरे परिवार जन मुझे अच्छा फोटोग्राफर मानते है, पर कॉलेज ट्रिप पर मैं उन गिने चुने छात्रों में था जिसके पास कैमरा था, मेरे पिता का Aim and shoot आग्फा गेवेर्ट बॉक्स कैमेरा। पर इस कैमरा और मेरा साथ कुछ ही दिनों का था। 3rd ईयर (१९६७) के कॉलेज ट्रिप पर हमारा यात्रा पथ ( itinerary ) था पटना - दुर्गापुर - कलकत्ता - पूरी - जमशेदपुर - पटना। कलकत्ते में बहुत घूमे - दक्षिणेश्वर - म्यूजियम - विक्टोरिया मेमोरियल - ज़ू घुमते थक गए थे और दमदम यानि आज के Netaji Subhash Chandra Bose International Airport जाते जाते हम बस में झपक गए और जब दमदम में हड़बड़ा कर उठे कैमरा बस में ही छूट गया। जब एक बोर्ड पर नज़र पड़ी जिसपर तीन भाषाओं में लिखा था "Photography strictly prohibited" तब कैमरा की याद आई लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी थी।
यह कैमरा एक aim and shoot कैमरा था । फिक्स्ड फोकस , अपर्चर कण्ट्रोल के रूप में बस सूर्य और बादल का सेटिंग थ। इसमें १२० साइज का रील लगती थी और उस पर यह 8x6 cm की ८ फोटो लेता था।
सबसे उपर मैंने फिल्म रोल के ताजा दाम दे रहा हूं, शायद अब फिल्म कैमरा अब अपने रेंज से बाहर हो गया है।

मेरा दूसरा कैमरा
आग्फा क्लिक ३ मेरा दूसरा कैमरा था जिसे सेकंड हैंड में मैंने ऊटी में ख़रीदा था। यह भी एक AIM and SHOOT कैमरा था । इसका स्पेसिफिकेशन निम्न लिखित है।
फिल्म: 120 रोल, चित्र का आकार 6x6 सेमी x 12 फोटो
फोकसिंग: निश्चित फोकस, 4 मी से infinity तक।
शटर स्पीड लगभग 1/30 से और "B"
लेंस: एक्रोमैट 72.5 मिमी एफ/8.8; एफ/11 तक नीचे
एपर्चर सेटिंग्स: लेंस-शटर बैरल पर बादल और धूप सेटिंग आइकन
बेस प्लेट पर tripod माउंटिंग पेंच
फ़्लैश unit के लिए कनेक्शन पिन
बेंड बैक कवर एक फिल्म प्रेशर प्लेट के रूप में भूमिका निभाता है और एक स्थिर और अच्छी तीक्ष्णता प्रदान करता है,
बॉडी: प्लास्टिक
आग्फा क्लीक III के पहले एक दोस्त ने १९६८ में नेपाल से एक ९ या १२ रूपये वाला एक Chinese बॉक्स कैमरा ला दिया था। यह १२० के रील पर 4.5x 4.5 cm साइज के १६ फोट खींचता था। इस कैमेरे से भी अच्छी फोटो खींचे थे मैंने । अभी तक कलर फोटो नहीं खींचा था। मैंने ब्रश और फोटो कलर स्ट्रिप के मदद से BW फोटो कलर करने लगा और कुछ फोटो गजब के कलर किये भी।

रॉलीफ्लेक्स कैमरा - फोटोग्राफर की पसंद

इस काल में स्टूडियो वालों के पास डबल लेंस रिफ्लेक्स कैमरा होता था - रोलीफ्लेक्स का। इसमें दो लेंस होते थे एक लेंस से फोटो खींचते थे और दूसरे लेंस से व्यू फाइंडर में फोटो दिखती थी और तीक्ष्ण फोटो फोकस करने में काम आता था।

मेरा पहला सेमि आटोमेटिक कैमरा याशिका - इलेक्ट्रो ३५, TRIPOD स्टैंड यशिका इलेक्ट्रो ३५ के लिए ख़रीदा , अब मोबाइल के लिए काम आता है
मेरे अन्य फिल्म कैमरे
मैंने अपना पहला सेमि आटोमेटिक कैमरा जर्मनी में ख़रीदा १९८३ में - यशिका इलेक्ट्रो ३५ । ऐसे तब तक एसएलआर (सिंगल लेंस रिफ्लेक्स ) कैमरा आ गया था। SLR कैमरा में व्यू फाइंडर और फोटो फिल्म एक ही लेंस से एक्टिवटे होता था यानि ज्यादा शार्प फोटो। पेंटाक्स का करीब २५०-३०० मार्क्स में। मेरे बहुत सारे दोस्तों ने खरीदा भी। पर मेरे बजट में यह कैमरा नहीं था। इसलिए जहां मेरे मित्र ने कैनन का आटोमेटिक कैमरा ख़रीदा मैंने एक सेमि आटोमेटिक कैमरा ख़रीदा। इस कैमरा का अपर्चर रेंज 1.7 से 22 तक हैं । बताता चलूं 1.7 सबसे बड़ा (कम रोशनी के लिए) और 22 सबसे छोटा(अधिक रोशनी के लिए) एपर्चर है इस कैमरे में। मैंने सबसे बड़े १.२ अपर्चर वाले कैमरे देखे है। फिल्म का ASA सेट (हम अक्सर १०० ASA की या फिर high speed 400 ASA की फिल्म खरीदते) कर सकते है कैमरा स्पीड ऑटोमेटिकली सेट हो जाता है। व्यू फाइंडर में दो इमेज दिखता है जिसे एडजस्ट कर एक दूसरे पर मिला लेते है फोकस करने के लिए। कैमरा और उसका फ़्लैश ट्रिपॉड स्टैंड अभी भी पास है पर अब फिल्म कैमरा कौन व्यवहार में लाये । अमेज़न पर फिल्म के दाम का स्क्रीन शॉट दे रहा हूँ । १९९३ में अमेरिका में मिनोल्टा और १९९६ में दक्षिण अफ्रीका में चिनोन कैमरा भी खरीदा था। बिटिया जब भारतीयम में जा रही थी तो उसके लिए एक यशिका कैमरा चेन्नई के बर्मा बाजार से ख़रीदा। ओरिजिनल दिख रहा था। मैं उसे लेकर पास ही एक नार्मल कैमरा शॉप में गया तो पता चला यदि कैमरा पर याशिका खुदा हो तो ओर्जिनल और नाम पेंट किया हो तो डुप्लीकेट। मेरा डुप्लीकेट निकला पर उसने यह भी बताया की लेंस ओरिजिनल है। इस केमरे से खींचे फोटो बहुत अच्छे थे। इन सब कैमरों में ३५ mm फिल्म लगती थी और स्टैण्डर्ड फिल्म पर ३५ फोटो खींच जाते थे। पर हम कोशिश करते थे की एक - दो और फोटो खींच जाय।





मेरा पहला डिजिटल कैमरा

२००५ में जब मैंने एक सैमसंग कैमरा फ़ोन ख़रीदा तो वह मेरा पहला डिजिटल कैमरा था। मेरा दूसरा कैमरा था नोकिआ ६६०० जो उस वक़्त का बहुत लोकप्रिय और महंगा फ़ोन था। यह फ़ोन VGA फोटो खींचता था तब फ़ोन में सेल्फी नहीं होता था । जब २००७ में मैं अकेले लंदन गया तब मेरे पास यही मोबाइल था यानि NOKIA 6600 मैंने बड़ी मुश्किल से फ़ोन उल्टा करके एक दो अपनी फोटो ली थी। २००५ में ही मैंने अपना पहला 4 MP डिजिटल कैमरा लिया - Olympus। फ़िलहाल दो तीन साल से इसका शटर ख़राब हो गया है पर मैंने दूसरे कैमरा ख़रीदे इस बीच ।





सोनी और कैनन कैमरा वर्तमान समय में हमारा डिजिटल कैमरा

हमारा अगला डिजिटल कैमरा 10 MP सोनी कैमरा था और मेरी पत्नी इसे व्यवहार में लाती। फिर एक कैनन का 18 MP कैमरा उनके लिए जन्म दिन के लिए ख़रीदा। मैंने कभी DSLR कैमरा खरीदने के बारे में नहीं सोचा पर अब तो मोबाइल फ़ोन ही 50 MP फोटो खींचते है। एकदम शार्प। डिजिटल फोटो - वीडियो को कंप्यूटर / मेमोरी कार्ड पर या एक्सटर्नल डिस्क पर सेव कर रखना आसान है और वक़्त पर मिल भी जाते है। मैंने फिर भी उन सभी 'फिल्म फोटो' को एल्बमों में सहेज कर रखा है लेकिन शेयर करने के पहले उन्हें स्कैन करना पड़ता है। कुछ के निगेटिव भी है।

फ्लिप वीडियो रिकॉर्डर

घुमक्कड़ी में दो बार मैं FLIP VIDEO RECORDER भी साथ ले गए थे, और एक बार टैब पर दो तीन गजेट एक साथ संभालना और साथ में कैमरा फोन भी मुश्किल है और अब सिर्फ मोबाइल से काम चला लेता हूं। बस अभी कैमरे के बारे में इतना ही।

Friday, September 8, 2023

पतरातू - झील

पतरातू थर्मल पावर प्लांट के लिए प्रसिद्ध है अब तो जिंदल का इस्पात कारखाना भी है यहां । शहर क़स्बाई है और छोटा सा मार्किट एरिया है। थर्मल पावर प्केलांट का मध्यम साइज की कॉलोनी भी है। हम कॉलोनी एरिया भी गए और एक पुराने मंदिर में दर्शन भी किये। नलकार्नी नदी पर बना हुआ पतरातू डैम सर मोक्षगुंडम विश्वसरैय्या का बनवाया हुआ है और इससे बने लेक में ही बोटिंग होती है। बच्चों के लिए पार्क और लेक के पास JTDC का सरोवर विहार लेक रिसोर्ट है। लेक के एरिया में जाने के लिए टिकट लगता है । पर यदि आप रिसोर्ट के गेस्ट है तो एंट्री फ्री है - रिसोर्ट साइड गेट से ।



हमारा पतरातू विजिट

ऐसे तो हम पहले भी पतरातू दो बार जा चुके थे। एक बार ओवरलोडेड बस से (तब रातू रोड बस स्टैंड से ) और एक बार खुद की गाड़ी चला के। तब रोड सिंगल और सकरा था और बस जब हर यु बेंड लेती जान हलक में आ जाती। अपनी गाड़ी में डर तो नहीं लगा पर ध्यान लगातार रोड पर रखना पड़ता था और ऐसे में वैली की खूबसूरती देखने का फ़िक्र किसको होता ? अब जब ४ लेन हाई वे है तो इस वैली की बला की खूबसूरती देखते ही बनती है।



कोरोना के कारण हम दो साल कहीं जा ही नहीं पाए थे। फिर हमारा बेटा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ २०२१ में रांची आये । अभी भी मास्क , सेनिटाइज़र प्रयोग में थे। कोरोना के कारण कहीं भीड़ भाड़ में जाना खतरे से खाली न था। कोरोना के कारण रेस्टोरेंट , सिनेमा हॉल सभी बंद ही थे । बच्चे भी घर में बैठे बैठे बोर हो गए थे । ऐसे में पतरातू वैली और लेक जाने का फैसला लिया गया। मास्क पहन कर और सांइटिज़ेर के बोतल वैगेरह ले कर हम पतरातू घूमने निकल पड़े। सरकारी बोटिंग बंद थी । लौटते वक़्त एक प्राइवेट बोट वाले से बात की और लेक में बोटिंग भी की। अलबत्ता हम समझ गए थे कि वह ठग रहा था। रिसोर्ट चालू न था। लेक के पास एक प्राइवेट होटल में खाना खा कर हम रांची के पहाड़ी मंदिर होते हुए घर लौट आये।



अगले साल यानि २०२२ तक कोरोना का खतरा ख़त्म हो गया था । लोग बाग तो घूमने भी निकल पड़े थे । हम भी इटखोरी जो करीब १५० कि०मि० दूर है घूम आये थे तभी हमारे एक भूतपूर्व सहकर्मी अपने परिवार और एक पोती के साथ आ पहुंचे। उनके इसरार पर अचानक हमलोग का प्रोग्राम फिर से पतरातू घूम आने का बन गया। मैं मना न कर सका और हम छह लोग एक SUV को ले कर पतरातू चल पड़े। छोटी लड़की ने नाश्ते में कुछ बदपरहेज़ी कर दी इस लिए उसे लगातार वोमिट होने लगा। दवा देने से भी रुक नहीं रहा था। एक वही थी जिसे बोटिंग में इंटरेस्ट था इसलिए कोई बोटिंग भी नहीं हुई। हम बच्चो के पार्क एरिया में बैठ गए। एक दम जुहू चौपाटी के जैसे मेला लेक के किनारे लगा था। पाव भाजी , भेल पूरी, वड़ा पाव, चाट, फुचका, डोसा , चाऊमीन के अलावा आइस क्रीम भी बिक रहा था। हम लोगों ने आइस क्रीम खाई पर अफसोस बच्ची को आईस क्रीम भी नहीं दिया गया। लेक के किनारे किनारे चलते हम पहुंच गए JTDC के सरोवर विहार लेक रिसोर्ट में। हम यही से खाना खा कर लौट आये। वहां भी खाते ही बच्ची को उलटी हो गयी। रास्ते में उसे नींद आ गयी और हमे गाड़ी बार बार नहीं रोकना पड़ा। उस रात में बच्चे को अस्पताल ले जाना पड़ा।


अभी पतरातू जल्दी जल्दी दूसरी बार घूम कर आये बस एक महीना ही हुआ था की हमारे ससुराल का एक ग्रुप आ पंहुचा , साले सालियों को कैसे टाला जा सकता था, न हीं टालना चाहता था, और जून के महीने में हमारा एक और ट्रिप पतरातू के बन गया। रास्ते में view point पर नारियल पानी पी कर आइस्क्रीम खा कर हम पतरातु लेक पहुंच गए। इस बार भी किसी कारणवश फिर बोटिंग नहीं हुई। कुछ लोग स्पीड बोड देख कर किसी पुरानी याद के कारण कुछ अन्य कारणो से। सरकारी बोट क्लब में बुकिंग नहीं हो रही थी और सिर्फ प्राइवेट वाले ही थे। हमलोगों ने JDTC के सरोवर विहार लेक रिसोर्ट में रात बिताया । पिछली बार की गई दोस्ती / जान पहचान काम आई और सभी छह जनों के लिए छह बेड वाली डॉरमिटरी मिल गई। हम तीन रूम मांग रहे थे जो अवेलेबल नहीं थे । अच्छा हो हुआ अलग अलग रुकने में वह मज़ा कहा आता जो डॉरमिटरी में हंसी मज़ाक करते आया। लेक के पास एक पेडस्टल बनाया है और हमने वही पर डिनर लिया - बड़ा कूल था यह अनुभव।


अगले दिन हम नाश्ता कर नज़दीक का एक झरना - पालनि फॉल देखने गए, रास्ता पूछते पूछते जाना पड़ा। गांव के सकरे रास्ते पर बड़ी गाड़ी ले जाना मुश्किल था फिर भी हम गए पर झरना सूखा था, लोगों ने बताया बारिश होने पर बहुत अच्छा दिखता है । ऊपर एक बांध बनाया हुआ है जिससे पानी कम आता है। अगला पड़ाव था पतरातू डैम। एक फाटक थोड़ा खुला था और उससे पानी आ रहा था अच्छा लग रहा था । हर बार हम एक वैली व्यू पॉइंट पर रुक कर फोटोग्राफी कर चुके थे , इस बार भी की । एक साल के भीतर हम तीसरी बार हम पतरातू में एक रात बिता कर लौट कर आये।

Wednesday, August 30, 2023

बिहार और झारखण्ड के कुछ स्थानीय धर्म स्थान - भाग -२

इस भाग में बिहार

२०१८ हमारे भटक वासना (wander lust) के लिए बहुत अच्छा साल था। फरवरी में हज़ारीबाग़ -रजरप्पा , मार्च में अंगराबारी, पटना और उत्तर पूर्व इंडिया , मई में काठमांडू - चंद्रगिरि , जुलाई में मधुबनी - मंगरौनी - उच्चैठ , सेप्टेंबर में शिरडी - सप्तश्रृंगी , अक्टूबर में जमुई , लछुआर , नेतुला भवानी, दिसंबर में उदयपुर-कुम्भलगढ़ , चित्तौरगढ़। इस पोस्ट में इन जगहों में से उन धार्मिक जगहों के बारे में लिख रहा हूँ जो स्थानीय लोगों में लोकप्रिय और प्रसिद्द है पर बाहर वालों को कम ही पता हैं । जैसे अमरेश्वर धाम (अंगराबारी) - खूंटी , रजरप्पा- रामगढ , नेतुला भवानी- कुमार गावं -जमुई और मंगरौनी-कपिलेश्वर- उच्चैठ- मधुबनी ।

प्रथम भाग में झारखंड के कुछ स्थानीय प्रसिद्ध धर्म स्थान के बारे में लिखा था। इस बार बिहार के Locally revered धर्म स्थलों के बारे में बताऊंगा। सबसे पहले मैं बताना चाहूंगा नेतुला भवानी मंदिर के बारे में।

नेतुला भवानी मन्दिर को उतनी प्रसिद्धि प्राप्त नहीं है जितनी अन्य शक्ति पीठो को प्राप्त है पर स्थानीय लोगों के बीच इनका काफी महत्त्व हैं और यहाँ काफी प्रसिद्ध भी है। कहते हैं जिनकी आंखें खराब है देवी के कृपा से उनकी आंखों में भी रोशनी आ जाती है। हम इस मंदिर में पूजा अर्चना २०१८ में की थी। यह मंदिर जमुई से २५ कि०मि० की दूरी पर है जमुई नवादा मार्ग पर । हम दुर्गा पूजा में गए थे  भीड़ भाड़ स्वभाविक था। वैसे तो मां नेतुला मंदिर का इतिहास काफी पुराना है। इस मंदिर का 26 सौ साल पुराना इतिहास का रिकार्ड है। 6 सौ ई.पू. में भगवान महावीर, जिनका जन्म स्थान भी नजदीक के लछुआर ग्राम में है, गृह त्याग कर जब ज्ञान प्राप्त करने निकले थे, तब उन्होंने प्रथम दिन कुमार गांव में ही नेतुला मां की मंदिर परिसर स्थित वटवृक्ष के नीचे रात्रि विश्राम किया था और इसी स्थान पर अपना वस्त्र त्याग कर दिया था। इसका उल्लेख जैन धर्म के प्रसिद्ध ग्रंथ कल्पसूत्र में वर्णित है। नेतुला मां को चन्द्रघंटा का भी रूप बताया गया है। मन्यता है देवी सती की पीठ यही  गिरी थी। मन्दिर भव्य है पर पुन:निर्मित लगती है जबकि मुर्तियाँ पुरातन है।



नेतुला मंदिर कुमार, जमुई

मंगरौनी, मधुबनी
हमलोग २०१८ में ही यहां भी गए थे। हमारा starting point था मधुबनी शहर। सबसे पहले हम मंगरौनी गए। यह हमारे ससुराल परिवार का गुरु स्थान है। यहां पहले भी आ चुके थे। यह एक तांत्रिक स्थान है और एकादश शिवलिंग के लिए प्रसिद्ध हैं। यहां कांचीपीठ के शंकराचार्य जयेन्द्र सरस्वती, जगरनाथ पीठाधीश्वर शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती भी पहुंच चुके हैं।

भुवनेश्वरी मंदिर, मंगरौनी

कपिलेश्वर महादेव हमारा अगला stop था। यह मधुबनी से ९ कि०मी० की दूरी पर स्थित महादेव का एक प्रसिद्ध मंदिर है। दरभंगा जयनगर मार्ग में रहिका के पास स्थित यह मंदिर मिथिला के बैद्यनाथ धाम की तरह प्रसिद्ध है। कहते है कि राजा जनक रोज जल अर्पण करने रोज यहां आते थे। कपिल मुनि द्वारा स्थापित इस शिवलिंग की बहुत मान्यता है।
इस मंदिर से जुडी एक बहुत पुरानी कहानी है जो बहुत से लोगों को मालूम भी नहीं होगी। हजारो साल पहले यहां पर एक ऋषि रहा करते थे। वो ऋषि भगवान शिव के बहुत बड़े भक्त थे। उस ऋषि का नाम कर्दम ऋषि था। वह ऋषि भगवान शिव की कड़ी तपस्या करते थे और ध्यान किया करते थे लेकिन उसके लिया उन्हें जल नहीं मिल रहा था। तभी वहां पर चमत्कार हुआ, वरुण देव प्रकट हुए और उन्होंने ख़ुद एक तालाब निर्माण किया। वो तालाब आज भी वहा मौजूद है।


कपीलेश्वर मंदिर, मधुबनी

हमारा अगला पड़ाव था बेनीपट्टी के पास स्थित ऊच्चैठ भगवती मंदिर। एक बड़े क्षेत्र में यह मंदिर स्थित है। अनेकों देव देवियों की झांकी मंदिर से सजा है मंदिर कैंपस। थोड़ी विशेष भीड़ भी थी।

ऊच्चैठ भगवती मंदिर

इस मंदिर का ऐतिहासिक महत्व है, यहीं महान कवि कालिदास को माता काली ने वरदान दिया था और मूर्ख कालिदास मां का आशीर्वाद पाकर ही महान कवि के रूप में विख्यात हुए।
प्राचीन मान्यता है कि इसके पूर्व दिशा में एक संस्कृत पाठशाला थी और मंदिर तथा पाठशाला के बीच एक विशाल नदी थी। महामूर्ख कालिदास अपनी विदुषी पत्नी विद्दोतमा से तिरस्कृत होकर माँ भगवती के शरण में उच्चैठ आ गए थे और उस विद्यालय के आवासीय छात्रों के लिए खाना बनाने का कार्य करने लगे।
एक बार भयंकर बाढ़ आई और नदी का बहाव इतना ज्यादा था की मंदिर में संध्या दीप जलाने का कार्य जो कि छात्र किया करते थे , वो सब जाने में असमर्थ हो गए , कालिदास को महामूर्ख जान उसे आदेश दिया गया कि आज शाम वो दीप जला कर आये और साथ ही मंदिर की कोई निशानी लगा कर आये ताकि ये तथ्य हो सके कि वो मंदिर में पंहुचा था।
इतना सुनना था कि कालिदास झट से नदी में कूद पड़े और किसी तरह तैरते-डूबते मंदिर पहुंच कर दीपक जलाया और पूजा अर्चना की। अब मंदिर का कुछ निशान लगाने की बारी थी ताकि यह सिद्ध किया जा सके कि उन्होंने दीप जलाया। कालिदास को कुछ नहीं दिखा तो उन्होंने जले दीप के कालिख को ही हाथ पर लगा लिया। निशान की तौर पर भगवती के शुभ्र मुखमंडल पर कालिख पोत दी।
तभी माता प्रकट हुई और बोली रे मूर्ख कालिदास तुम्हे इतने बड़े मंदिर में कोई और जगह नहीं मिली और इस बाढ़ और घनघोर बारिश में जीवन जोखिम में डाल कर तुम दीप जलाने आ गए हो।
ये मूर्खता हो या भक्ति लेकिन मैं तुम्हे एक वरदान देना चाहती हूँ। कालिदास ने अपनी आपबीती सुनाई कि कैसे उनकी मूर्खता के कारण पत्नी ने तिरस्कृत कर भगा दिया। इतना सुनकर देवी ने वरदान किया कि आज सारी रात तुम जो भी पुस्तक स्पर्श करोगे तुम्हे कंठस्थ हो जाएगा। कलीदास ने सभी छात्रों की पुस्तकों को उस रात छू डाला और सभी उन्हें कंठस्थ हो गया। कालांतर में मुर्ख कालीदास एक महाकवि की तरह उभरे और कई महाकाव्य की रचना की।
अगली कहानी अगले भाग में। आप खुश रहे, स्वस्थ्य रहे।

Saturday, August 26, 2023

येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल: ओणम केरल का राज्य पर्व

सेवानिवृत्त के पहले मैं एक केंद्रीय उपक्रम में कार्यरत था तब कई केरलवासी भी सहकर्मी थे। मध्यपूर्व के आकर्षण के पहले केरलवासी उत्तर भारत में हर क्षेत्र में कार्यरत दिख जाते थे - नर्स, क्लर्क से लेकर चेयरमैन तक। पहले एक कहावत बहुत प्रसिद्ध थी कि जब नील आर्मस्ट्रांग चांद पर उतरा तो एक मलयाली होटल वाले ने काफी के साथ उसका स्वागत किया । आशा है हमारा विक्रम लैंडर भी वहां किसी मलयाली को खोज निकाले। आखिर साईकल से पहुंचा हमारा पहला राकेट केरल के ही थंबा से छोड़ा गया था। खैर अपने केरलवासी सहकर्मियों को दो पर्व धूमधाम से मनाते देखा था। अयप्पा पूजा और ओणम। ये ब्लॉग ओणम पर है जो इस वर्ष २० अगस्त २०२३ से ३१ अगस्त तक मनाया जा रहा है।



ओणम एक दान वीर भक्तवत्सल राजा बलि के धरती पर पुनः आगमन की खुशी में मनाया जाता है। महर्षि कश्यप सभी प्राणियों के पुर्वज माने जाते हैं। उनकी पत्नियां दिती और अदिति दक्ष प्रजापति की पुत्रियां थी। दिति दैत्यों की माता थी अदिति देवों की। दिति के दो पुत्र थे हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप। हिरण्याक्ष को श्रीविष्णु के वाराह अवतार और हिरण्यकश्यप को नरसिंह अवतार ने मारा। हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद विष्णु के भक्त थे। इन्हीं प्रह्लाद के पौत्र थे राजा बालि । तीनों लोक के स्वामी राजा बलि बहुत पराक्रमी थे और प्रजा वत्सल भी। इंद्र के प्रर्थना और देवों को देवलोक वापस दिलाने के लिए श्री विष्णु ५२ अंगुल के बौने वामन का रूप धर राजा बलि ९९ वें यज्ञ में पहुचें। इस यज्ञ के बाद बलि का इंद्र होना निश्चित था। वामन ने दानवीर बलि से तीन पग धरती के दान की कामना की। वामन के छोटे पैरों को देख तीन पग धरती का दान बलि को अपने यश के अनुरूप नहीं लगा और उन्होंने बहुत सारी गाएं और धरती के साथ धन का दान का प्रस्ताव रखा पर वामन ब्राह्मण अपनी तीन पग वाली बात पर अडिग रहे। बलि ने गंगा जल हाथ में लेकर तीन पग धरती दान कर दिए। तब श्री विष्णु अपने विशाल रूप में प्रकट हुए और दो पग में स्वर्ग और धरती दोनों नाप लिए। तीसरे पग के लिए बलि ने अपना सर प्रस्तुत कर दिया। विष्णु ने उसे सदा के लिए उसे पाताल भेज दिया जहां वह अब भी राज करता है। बलि सात चिरंजीवियों में से एक है। विष्णु ने बलि को वर्ष में एक बार अपने राज्य की प्रिय प्रजा के बीच वापस धरती पर आने का वरदान दिया। राजा बलि दस दिनों के लिए अपनी प्रिय प्रजा के बीच हर साल वापस आते हैं और केरल और आसपास इन्हीं दस दिनों को ओणम पर्व के रूप में मनाया जाता है। कल २७ अगस्त २०२३, यानि श्रावण की एकादशी से पूर्णिमा तक यह त्योहार बड़े धूम-धाम से मनाया जाएगा। सजे हाथी की शोभा यात्रा और नौका दौड़ इस पर्व की विशेषता है। सभी को ये कहानी तो पता है, प्रायः सब को। अब मैं कुछ बताना चाहता हूं जो शायद आपको पता न हो।

बलि ने सबकुछ दान कर दिया था जीता हुआ स्वर्ग भी, अत: भगवान विष्णु ने उससे वरदान मांगने को कहा जिस पर राजा बलि ने भगवान को अपने साथ पाताल लोक में वास करने का वरदान मांगा। वरदान से बंधे भगवान विष्णु राजा बलि के साथ पाताल लोक चले गए। परंतु इससे देवी लक्ष्मी को समस्या हुई , यदि भगवान विष्णु पाताल लोक में वास करेंगे तो बैकुंठ धाम जो उनका स्थान है वह तो रिक्त रहेगा, वो स्वयं भी अकेली रह जाएंगी। देवी लक्ष्मी अकेले नहीं रहना चाहती थीं और इसलिए वो भगवान विष्णु को लौटा लाने के लिए पाताल लोक पहुंची लेकिन अपने दिए हुए वरदान में बंधे भगवान विष्णु को पाताल लोक से लौटा लाना इतना भी आसान नहीं था।

देवी लक्ष्मी ने भगवान विष्णु को उन्हें लौटा देने के लिए राजा बलि से बहुत अनुनय विनय किया लेकिन राजा बलि नहीं माने। अतः एक रास्ता निकाला गया, राजा बलि के हाथ में देवी लक्ष्मी ने रक्षा सूत्र (राखी) बांधते हुए मंत्रोच्चारण किया ‘येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:’।
इस रक्षा सूत्र के माध्यम से देवी लक्ष्मी और राजा बलि दोनों भाई-बहन हो गए और देवी लक्ष्मी ने उपहार के रूप में राजा बलि से भगवान विष्णु को मांग लिया। अब राजा बलि के सामने नहीं कहने का कोई रास्ता ही नहीं था, उन्होंने बहन बन चुकीं देवी लक्ष्मी को उपहार स्वरूप भगवान विष्णु को उन्हें लौटा दिया। इस पूरे घटनाक्रम के बाद देवी लक्ष्मी के साथ भगवान विष्णु अपने बैकुंठ धाम लौट आए।
रक्षा बंधन के दिन पुरोहित या ब्रह्मण आपके हाथ में धागा बांधते यहीं सूत्र " येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:" दोहराते हैं जो देवी लक्ष्मी राजा बलि को राखी बांधते हुए कहती हैं और आपको राजा बलि की तरह चिरंजीवी होने की कामना करते हैं।
HappyOnam!

English Translation:

Many Malyali were our co-workers when I was working as Engineer in a Central Govt undertaking. Before the charm of the Middle East, Malyalis were omnipresent in India in all walks of life - from nurses, clerks even Chairmen of large companies. Earlier a saying was very famous that when Neil Armstrong landed on the moon, a Malayali tea shop owner welcomed him with coffee. Hope our Vikram Lander also finds a Malayali there. After all, our first rocket that carried on carts and cycle was launched from Thumba in Kerala itself. Well, I had seen my Malyali colleagues celebrating two festivals with great pomp. Ayyappa Puja and Onam. This blog is on Onam which will be is being celebrated this year from 20th August 2023 to 31st August.
Onam is celebrated to celebrate the return of the heroic Bhaktavatsala King Bali to earth. Maharishi Kashyap is considered the progenitor of all living beings. His wives were Diti and Aditi who were daughters of Daksha Prajapati. Diti was the mother of demons and Aditi was the mother of gods. Diti had two sons Hiranyaksha and Hiranyakashyap. Hiranyaksha was killed by the Varaha avatar of Sri Vishnu and Hiranyakshyap was killed by the Narasimha avatar. Prahlad, the son of Hiranyakashyap, was a devotee of Vishnu. King Bali was grandson of this bhakt Prahlad. King Bali, the master of all the three worlds, was very mighty and was loved by his subjects . During 99th yagya being performed by king bali, Vishnu appeared in the form of a dwarf Vamana Brahmin just 52 fingers tall. After this Yagya, the King Bali was sure to be Indra. Vaman asked for three steps of land from Danveer Bali as Daan. Seeing the small feet of Vamana, the Daan of just three steps of land did not match Bali's fame and he proposed a donation of many cows and money along with the land, but Vamana Brahmin remained firm on his three steps. Bali donated three steps of earth by taking Ganga water in his hand. Then Shri Vishnu appeared in his real majestic form and measured both heaven and earth in two steps. For the third step, Bali presented his head. Vishnu banished him forever to Patala where he still reigns. Bali is one of the seven Chiranjeevis. Vishnu granted Bali the boon of coming back to earth once a year among the beloved subjects of his kingdom. King Bali returns every year to his beloved subjects for ten days and these ten days are celebrated as Onam festival in and around Kerala.
Bali had donated everything, so Lord Vishnu asked him to ask for a boon. King Bali asked God for a boon to reside with him in the patal lok. Bound by the boon, Lord Vishnu accompanied King Bali to Patal Lok. But this caused a problem to Goddess Lakshmi (wife of Sri Vishnu), if Lord Vishnu resides in Patal Lok then Baikunth Dham which is his place will remain vacant, she herself will also be left alone. Goddess Lakshmi did not want to be alone and so she reached Patal Lok to bring back Sri Vishnu but it was not so easy to bring Sri Vishnu back from Patal Lok bound by the boon given by him.
Goddess Lakshmi pleaded a lot with King Bali to return Lord Vishnu to her but King Bali did not agree. So a way was found, Goddess Lakshmi tied Raksha Sutra (Rakhi) in the hand of King Bali and chanted 'येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:’
Through this Raksha Sutra both Goddess Lakshmi and King Bali became brother and sister and Goddess Lakshmi demanded Lord Vishnu from King Bali as a gift. Now there was no way to say no in front of King Bali, he returned Lord Vishnu as a gift to Goddess Lakshmi who had become his sister. After this whole incident, Lord Vishnu along with Goddess Lakshmi returned to his Baikuntha Dham.
Remember on the day of Raksha Bandhan while tying thread on your hand, the priest or Brahmin repeats the mantra "येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:" which Goddess Lakshmi says while tying Rakhi to King Bali and wishes you to live long life King Bali.

Happy Onam !

Thursday, August 24, 2023

झारखण्ड और बिहार के कुछ स्थानीय धर्म स्थान - भाग -१

इस भाग में झारखण्ड

२०१८ हमारे भटक वासना (wander lust) के लिए बहुत अच्छा साल था। फरवरी में हज़ारीबाग़ -रजरप्पा , मार्च में अंगराबारी, पटना और उत्तर पूर्व इंडिया , मई में काठमांडू - चंद्रगिरि , जुलाई में मधुबनी - मंगरौनी - उच्चैठ , सेप्टेंबर में शिरडी । सप्तश्रृंगी , अक्टूबर में जमुई , लछुआर , नेतुला भवानी, दिसंबर में उदयपुर-कुम्भलगढ़ , चित्तौरगढ़ । मैं इन जगहों में से उन धार्मिक जगहों के बारे में लिख रहा हूँ जो स्थानीय लोगों में लोकप्रिय और प्रसिद्द है पर बाहर वालों को कम ही पता हैं । जैसे अमरेश्वर धाम (अंगराबारी) - खूंटी , रजरप्पा- रामगढ , नेतुला भवानी- कुमार गावं -जमुई और उच्चैठ- मधुबनी । ऐसे ही एक धर्मस्थान अशोक धाम - लखीसराय (बिहार) पर मैं एक ब्लॉग पहले ही लिख चुका हूँ और उसका लिंक मैं नीचे दे रहा हूँ :
अशोक धाम - लखीसराय (बिहार)




आम के पेड़ को घेरकर उसके नीचे श्यंभू अमरेश्वर शिव लिंग और मंदिर, अन्य मंदिर



अमरेश्वर धाम
हम रांची - खूंटी के रास्ते में पड़ने वाले अमरेश्वर धाम दो बार गए। पहली बार सबसे छोटी बहन बहनोई के साथ और दूसरी बार मेरी दूसरी बहन बहनोई के साथ। पहली बार हम वहां से लापुंग स्थित साई मंदिर भी गए थे और पांच छह मोटर साइकिल पर काले कपड़े में शायद आतंकवादियों ने कुछ दूर हमारे जीप / SUV का पीछा भी किया। २०१८ में बहन बहनोई के साथ अचानक प्रोग्राम बन गया और हम एक टैक्सी ठीक कर चल दिए। हमारे निवास से ५० KM पर स्थित अमरेश्वर धाम हम २ घंटे से भी काम समय में पहुंच गए।

अंगराबाड़ी या अमरेश्वर धाम, झारखंड के खूंटी के पास स्थित, एक मंदिरों का समूह है जो शिव जी को समर्पित है। मंदिर का निर्माण और रखरखाव अमरेश्वर धाम प्रबंध समिति द्वारा किया जाता है। ऋषि शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती द्वारा इसका नाम बदलकर अमरेश्वर धाम कर दिया गया। एक मान्यता है कि यह शिवलिंग आम के पेड़ के नीचे अवस्थित है, इसलिए इसका नाम आमरेश्वर धाम पड़ा। रांची से खूंटी रोड या खूंटी-तोरपा रोड NH-20 होकर यहाँ पंहुचा जा सकता है। झारखंड की राजधानी रांची से लगभग ४५-५० किमी दूरी पर यह स्थित है।

इस मंदिर के पीछे एक कहानी छुपी है। रांची से सिमडेगा जाना एक ज़माने में जीवट का काम थे । कई जगह पूल नहीं थे। गाड़ियों को नदी नालों पर बने डायवर्सन होकर जाना पड़ता था। एक ही बस चलती था । और कितना समय लगता होगा इसका अनुमान आप लगा सकते है। यदि बस ख़राब हो गयी तो भागवान बचाये। कहानी है कि एक बार बस ख़राब हो गय। बस मालिक को रात में लघु शंका लगी तो वह पास के कुछ झाड़ियों में चले गए। उस रात उसे सपना आया कि उन झाड़ियों को साफ़ करवाओ। जब झाड़ियां साफ करवाई गयी तो आम के पेड़ के नीचे एक श्यंभू शिव लिंग दिखा। बस मालिक ने वहां पूजा अर्चना की । उसके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा जब बस स्टार्ट हो गयी। इसके बाद बस समय पर पहुंचने भी लगा। लोगों की आस्था जगी और एक मंदिर बन गयी। आम को पेड़ को कोई हानि नहीं पहुचाई गयी। इसे चारो तरफ से घेर दिया गया।
कालांन्तर में मंदिर स्थल में गणेश, राम, सीता और हनुमान सहित कई अन्य देवी देवताओं की मूर्तियां और मंदिर भी स्थापित हो गयी । सावन के महीने में बड़ी संख्या में कावरियों यहाँ जल अर्पित करने आते है। महा शिवरात्रि के दिन भी यहां शिव भक्तों की भारी भीड़ होती है।

रजरप्पा रजरप्पा के पास भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर मां छिन्नमस्तिका का मंदिर स्थित है।इस मंदिर को 'प्रचंडचंडिके' के रूप से भी जाना जाता है। मंदिर की उत्तरी दीवार के साथ रखे एक शिलाखंड पर दक्षिण की ओर रुख किए माता छिन्नमस्तिके का दिव्य रूप अंकित है।पुराणों में रजरप्पा मंदिर का उल्लेख सिद्धपीठ के रूप में मिलता है। मंदिर के निर्माण काल के बारे में पुरातात्विक विशेषज्ञों में मतभेद है। कई विशेषज्ञ का कहना है कि इस मंदिर को महाभारतकालीन हैं। यहाँ कई मंदिर हैं जिनमें 'अष्टामंत्रिका' और 'दक्षिण काली' प्रमुख हैं। यहां आने से तंत्र साधना का अहसास होता है। यही कारण है कि असम का कामाख्या मंदिर और रजरप्पा के छिन्नमस्तिका मंदिर में समानता दिखाई देती है।मंगलवार और शनिवार को रजरप्पा मंदिर में विशेष पूजा होती है।

मुख्य मंदिर


मंदिर , दामोदर नदी का एक दृश्य , मंदिर में स्थित बहूत बड़ा शिव लिंग

क्यों काट लिया भगवती ने अपना सर ? एक बार मां पार्वती अपनी दो सहचरियों के साथ भ्रमण पर निकलीं. इस दौरान माता पार्वती की रास्ते में मंदाकिनी नदी में स्नान करने की इच्छा हुई. मां पार्वती ने अपनी सहचारियों से भी स्नान करने को कहा, परंतु दोनों ने स्नान करने से इनकार कर दिया और कहा कि उनको भूख लग रही है.इस पर माता पार्वती ने उनको कुछ देर आराम करने को कहा और स्नान करने चली गईं. मां काफी देर तक स्नान करती रहीं, इसी बीच दोनों सहचरी कहती रही कि उनको भूख लग रही है. लेकिन माता ने दोनों की बात को अनसुना कर दिया.इस पर दोनों सहचरियों ने माता से कहा कि मां तो अपने शिशु का पेट भरने के लिए अपना रक्त तक पिला देती है. परंतु आप हमारी भूख के लिए कुछ भी नहीं कर रही हैं. यह बात सुनकर मां पार्वती को क्रोध आ जाता है और नदी से बाहर आकर खड्ग का आह्वान करके अपने सिर को काट देती हैं, जिससे उनके धड़ से रक्त की तीन धाराएं निकलती हैं. दो धाराएं दोनों सहचरों के मुख में और एक भगवती ने अपने मुख में डाल लिया। बाद में भगवान शिव कबंध का रूप धारण कर देवी के प्रचंड रूप को शांत करते हैं. तब से मां पार्वती के इस रूप को छिन्नमस्ता माता कहा जाने लगा।
हम लोग कई बार रजरप्पा जा चुके है। पिछली बार २०१८ में गए था और एक VIP साथ थे इसलिए मंदिर पूरा खाली कर के पूजा करने का अवसर भी मिला। सबसे पहले १९६६ में गया था । मेरी स्व बड़ी दीदी का ससुराल नज़दीक के शहर गोला में है। मै और मेरे बड़े फुफुरे भाई मुन्ना भैया शादी के बाद पुछारी (पगफेरे) के लिए गोला गए थे। दीदी के ससुर जी अपने समय के पुलिस इंस्पेक्टर थे और काफी रौब उनका उस क्षेत्र में था। उन्होंने छिन्मस्तिका के दर्शन पूजा और पाठा (बकरी के बच्चा ) की बलि के लिए चलने को कहा। हम स्टेट ट्रांसपोर्ट के बस से गए थे , एक बस जाती थी और शाम तक लौट जाती थे। गोला के तरफ से जाने पर भैरवी (भेरा) नदी के उस पार तक ही तब जा पाए और नदी को पार कर मंदिर तक गए।


छिन्नमस्तिका मंदिर ६० के दशक में

तब रजरप्पा प्रजेक्ट बना नहीं थे इसलिए भैरवी के पार यानि चितरपर के तरफ से कोई रास्ता ही नहीं था। अब रजरप्पा जाने का रास्ता चितरपुर हो कार ही है और इस एक ट्रिप को छोड़ हम चितरपर हो कर ही गए है। कोई मेहमान आने से यह सबसे नज़दीक और सुविधा जानका आउटिंग होता है। रांची से सिर्फ ७०-८० किलोमीटर पार है रजरप्पा। मेरी पोती का मुंडन भी रजरप्पा में ही हुआ।
बिहार के धर्मस्थान अगले भाग में
क्रमशः

Monday, August 21, 2023

चंडीगढ़ , शिमला, कुफरी #यात्रा २०१४

शिमला : हिल स्टेशन कहते ही जो पहला नाम ज़ेहन में अता है वो है शिमला। हिमांचल प्रदेश की राजधानी। दिल्ली के बाहार अकेली जगह जहां राष्ट्रपति भवन है। पहली बार मैं १९६८ में गया था कॉलेज ट्रिप में । रिटायर होने के पहले चंडीगढ़ जाने का मौका ऑफिस के काम से मिल जाता था पर इतना टाइम नहीं होता था की शिमला जा सके। २०१४ में चंडीगढ़ में मेरी छोटी बहन संगीता का गृहप्रवेश था तो हम दोनों अपने ६ साल के पोते सिद्धांत या सिड के साथ चल पड़े। पोते को बर्फबारी देखनी थी इसलिए शिमला और कुफरी भी चला गया। सबसे पहले 1968 में चडीगढ़ - शिमला आया था कॉलेज ट्रिप में। हमारे सिविल इंजीनियर मित्र कश्मीर भी गए थे, तब नहीं गए तो अब तक कश्मीर नहीं जा पाए है । तब (१९६८) के चंडीगढ़ के बारे में मैंने एक ब्लॉग में लिखा था "हमारा अगला स्टॉप था चंडीगढ़ । पंजाब में जब एक जगह ट्रेन रुकी तो हम लस्सी पीने से अपने तो नहीं रोक पाए। हाथ भर लम्बे गिलास को तो हम देखते रह गए । चडीगढ़ के बारे में पढ़ रखा था । यह भारत के पहला पूरी तरह प्लान्ड शहर था । इसके आर्किटेक्ट थे Le Carbusier । चंडीगढ़ भारत का एक अद्भुत शहर है। यह शहर किसी भी राज्य का हिस्सा नहीं माना जाता। यह शहर भारत का केंद्र शासित प्रदेश है। इस शहर का नियंत्रण भारत सरकार के हाथों में है। इस शहर पर किसी भी राज्य का अधिकार नहीं। इस शहर की खास बात यह है की यह शहर पंजाब और हरियाणा दोनों राज्य की राजधानी है पर किसी भी राज्य का हिस्सा नहीं है । हम सुखना लेक रॉक गार्डन और रोज गार्डन देखने गाये । विधान सभा भवन देखा और एक फिल्म भी देखी ।"
पिछली बार चंडीगढ़ २००९ में आया था। दिल्ली से शताब्दी एक्सप्रेस से । एक छोटी लड़की शायद दो साल की होगी को मुझमे अपने नाना जैसा क्या दिखा मुझे नाना कह कर बुलाने लगी ।

ट्रेन में मिली नातिन , हमारा पोता और सहयात्री सिद्धांत

तब भी चंडीगढ़ के प्रमुख दर्शनीय जगहे देख ली थ। एक होटल में रुके थे - किस सेक्टर में याद नहीं। मुझे मंडी गोविंदगढ़ जाना था एक पेपर प्रेजेंट करना थ। लौटने पर स्टेशन पर कबूतरों का कब्ज़ा देखा। रेलवे ने प्लेटफार्म के ऊपर नेट लगा रखा था वे रुकने वाले नहीं थे। कब आपके सर पर टपका दे -- सभी बचने के कोशिश में थे।
२०१४ में हम अपने ६ वर्षीया पोता के साथ चंडीगढ़ शिमला घूमने निकले थे। हमने पुरे दिन के लिए एक टैक्सी कर ली जिसने हमें करीब करीब सारी जगहे दिखा दी। रॉक गार्डन में सिद्धांत को बहुत मजा आया। सबसे कम मजा उसे रोज गार्डन में आया। यह गार्डन श्री श्री नेक चंद नेमी द्वारा बनवाया गया। छोटे स्तर पर बनाया गया यह गार्डन अब ४० एकड़ में फैला है। यह गार्डन कोई फूल पौधों का उद्यान नहीं है, यह "best from waste " के सिद्धांत पर बना उद्यान है। कूड़े कचरे जैसे बोतल , प्लास्टिक , टूटे फूटे बिडलिंग मटेरियल जैसे टूटे टाइल्स इत्यादि चीज़ो से बना है। मुर्तिया झरने और बहुत कुछ। अविस्मरणीय जगह थी।

रॉक गार्डन , चंडीगढ़,सुखना लेक

हम सुखना लेक , म्यूजियम और रोज गार्डन भी गए।



UNESCO सिवालिक एक्सप्रेस - कालका शिमला हिल रेलवे, शिमला प्रसिद्द चर्च

दो दिन चंडीगढ़ घूमने के बाद हमलोग कालका शिमला हेरिटेज रेलवे से शिमला के लिए रवाना हो गए। चेयर कार से । कुर्सी अलग अलग घुमने वाली थी। आप ट्रेन के डायरेक्शन या उसके विपरीत कुर्सी कर सकते थे। ट्रेन लगभग खाली थी। हम एक एक विन्डो सीट ले कर चल पड़े। दोनों तरफ पहाड़ की खूबसूरती देखते देखते सफर करने लगे। फोटो भी खींचे। एक स्टेशन आया बरोग। पता चला स्टेशन के बाद आने वाला टनेल न० ३३ को बनाने के लिए खुदाई दोनों तरफ से की गई पर टनेल मैच नहीं हुई। टनेल बनाने वाले अंग्रेज इंजीनियर बरोग ने शर्मिंदगी में खुदकुशी कर ली पर अपना नाम इस स्टेशन और जगह को दे गये। यह इस मार्गका सबसे लंबा टनेल है १ की०मी० से भी ज्यादा।
शिमला पहुंच कर हम लक्करबाज़ार होते एक होटल पहुंच गए या टैक्सी वाले ने पंहुचा दिया। होटल पसंद आ गया इसलिए हम रुक गए। मार्च का महीना था पर ठंढ बहुत थी । बेड सर्कुलर था। हम मॉल रोड तक पहुंच गए कई सीढिया चढ़ कर और रोड पर चल कर। थक गए। किसी खाने की जगह खोजने लगे । ऐसी जगह जहां बैठा जा सके और खाना ज्यादा तीखा न हो। आखिर ऐसी जगह मिल गई। सभी के पसंद का खाना आर्डर किया। अगले दिन हम घूमने निकले कुफरी। सिद्धांत की बर्फ देखना था। पता चला बर्फ तो है , कुछ दिनों काफी पड़ी थी। हम चल पड़े। एक जगह बहुत अच्छा व्यू था कुछ देर रुक कर जब आगे बढ़े याक के साथ फोटो खींचाते लोग दिखे। सिद्धांत को एक पर बैठ कर फोटो खींचना चाह रहा था। उसे डर लग रहा था। उसको मना नहीं पाए तो एक के साथ उसका फोटो लिया बाद में इस पर हमने एक बाल गीत भी लिखा था ।



याक देखने पहुंचा कुफ्री सिद्धि दादा-दादी संग।
याक बड़ा था सजा धजा था, देख रह गया दंग।
मान नहीं सकता हूँ मैं कि यह है एक गाय।
इतने सारे बाल है इसके, काया भीमकाय।
दादू ने कहा दादी से, करके कुछ उपाय।
पीते है याक दूध की एक दो कप चाय।
रुकिए पहले ले ले फोटो सिद्धि को
याक के ऊपर देते है चढ़ाय ।
डरते क्यों हो यह हैं बस एक गाय।
कुछ न करेगा इसीको कहते चंवरी गाय ।
डर गया सिद्धि तब छोटा था।
फिर फोटो लिया यूँ ही खिचाय।


कुफरी में पिछली बार एक स्कीइंग क्लब तक गए थे। स्की ट्रैक पर फिसले थे । बर्फ कोट के में चले गए और जब क्लब में खाना लगे तब जेब से पानी टपकने लगा। इस बार घोड़े वालों ने घेर लिया। पता नहीं कहा ले कर जाते। बहुत मुश्किल से पीछा छुड़ाया क्योंकि सिड और उसकी दादी घोड़े पर बैठना नही चाहते थे।


शिमला होटल के पास कुली के साथ १९६८ , कुफ्री की वादियां १९६८ - BW photo coloured by me using special colour and brush

हम लोग स्नो पर चल कर एक ज़ू गया जहाँ कुछ हिमालयन जानवर रखे गए थे। बर्फ देखने का सिद्धांत का सपना पूरा हो गया। दादी पोता के बीच स्नो फेकने का गेम शुरू हो गया। हमारी टैक्सी ललित रेस्टोरेंट तक आई। हमने रेस्टोरेंट में कुछ स्नैक्स लिया और चाय भी पी । फिर हम लौट गए और जाखू गए।


कुफ्री - सिद्धांत दादी के साथ बर्फीले रास्ते पर , जाखू हनुमान मंदिर

एक लाठी किराये पर ले कर ऊपर मंदिर तक गए। बंदरो का बहुत हुजूम यहाँ हमेशा रहता है। हमारे सामने एक टूरिस्ट का मोबाइल ले कर एक बन्दर पेड़ पर चढ़ गया। मंदिर के पुरोहित के मदद से ही बन्दर मोबाइल लौटा गया।
हम जाखू के बाद शिमला स्टेशन गए और हेरिटेज ट्रैन से कालका लौट आये और एक दिन चंडीगढ़ में रुके। संगीता के छोटा डौगी इतना पोजेसिव था की सिद्धांत को उसके पास देख कर भोकने लगा । सिद्धांत एकदम डर गया और तुरंत चलने की ज़िद करने लगा। खैर डौगी को दरबे में बंद किया गया तब की वह सो पाया। अगले दिन हम ट्रेन से दिल्ली लौट आये।

आप स्वस्थ्य रहे , सानंद रहे और यात्रायें करते रहे। कुछ और यात्रायें अगले ब्लॉग में।