Wednesday, February 14, 2024

वसंत पंचमी और सरवती पूजा

ऐसी मान्यता है की विद्या और कला की देवी का जन्म या अवतरण वसंत पंचमी के दिन हुआ था और इसलिए सरस्वती पूजा इसी दिन मनाई जाती है। बचपन में यह एक उमंगो वाला त्यौहार था और कई यादें भी जुडी है इससे। हमारे मोहल्ले में एक सरस्वती पूजा का आयोजन एक वकील साहेब के खाली पड़े मकान में हर साल मनाया जाता। इस माकन में दोनों तरफ आधे अष्टकोण के आकर के कमरे दोनों तरफ बने थे और पूजा हम इन दोनों कमरे ने बीच के बरामदे में करते थे। वे लोग पापा से एक मोटी रकम चंदे में ले जाते (और सिर्फ यही एक बाद मुझे पसंद नहीं थी )। हम तीन दोस्त थे तब मै मेरा दोस्त भोला और एक और जिसका नाम भूल रहा हूँ वह भी भोला के बगल में ही रहता था। हम लोग सरस्वती पूजा से दो दिन पहले से प्रायः पूरे समय पूजा स्थान में ही रहते। रंगीन कागज को तिकोने काटना। उसे लम्बी मूज़ के पतली रस्सी पर लेई से चिपकते। और बड़े लोग उसे पुरे आहाते में बांधते । अहाते का पर तोरण बांधे जाते तब एक ब एक माहौल खुशनुमा, उत्साह , उमंग और आनंद से भर जाता। पूजा के एक दिन पहले लाउड स्पीकर आ जाता जो बैटरी से चलता था। एक बार मुझे प्रसाद को दोने में भरने और बांटने का भी काम मिला था। प्रसाद वितरण का काम मिलना तब एक उपलब्धि थी। रात में तब पेट्रोमैक्स रखा जाता सरस्वती माता के मूर्ति के पास। घर की औरते शाम के बाद ही निकलती दर्शन करने के लिए।
एक बार हम बच्चों ने सरस्वती पूजा को खुद से भोला के बरामदे में करने का प्रोग्राम बनाया । रसीद तो अजंता प्रेस वालों ने यू ही छाप कर दे दी बिना किसी पैसे लिए। उस पर क्या नाम लिखवाया याद नहीं या शायद किसी और पूजा समिति वाला रसीद दे दिया होगा। पर बहुत कम लोगों ने चंदा दिया । पापा ने हमलोगों की हिम्मत देख कुछ ज्यादा ही दिया , पर जब चंदा बहुत कम जमा हुआ तो हमने वो पैसे भी मोहल्ले वाले पूजा समीति को दे दिया।


ज्ञान सरस्वती मंदिर , बसर , गोदावरी नदी , तेलंगाना

सभी पूजा समिति वाले अपना अपना पंडाल खूब सजाते , मोहल्ले से बेहतर सजे हुए कई पंडाल हम देख भी आते। जमुई पुरानी बाजार का पंडाल अक्सर सबसे अच्छा सजता। जब १९५७ में बिजली आ गयी तब मोटर लगा कर हंस के पंख उठने गिरने वाले लगा देते। देवी माँ के पीछे पंखा लगा कर चक्र या प्रभा मंडल बनाया जाता। चुन्नू मुन्नू बल्ब लगाए जाते। स्कूल में भी पूजा होती। हर पंडाल में जा कर प्रसाद ले कार आना भी जरूरी काम होता।
फिर हम पटना चले गए। यहाँ भी पंडाल बनते , एक तो हमारे टुइशन वाले स्कूल में भी पर वह उत्साह , उमंग तब कहाँ ? पीला वसंत का प्रतीकात्मक रंग है। पीला रंग जो प्रकाश , ऊर्जा , शांति और आशा का प्रतीक है , शायद इसीलिए लोग, खास कर स्त्रियाँ , बच्चियां इस दिन पीले वस्त्र पहनती है । कुछ फल सरवती पूजा के बाद ही खाने का भी रिवाज़ है जैसे बेर , मिश्री कंद !
आज बस इतना ही। सरस्वती पूजा की सबको शुभकामना।

Tuesday, February 13, 2024

विश्व रेडियो दिवस

मै पहले अपने एक पुराने ब्लॉग से एक पारा उद्धृत कर रहा हूँ। हमारे घर पर ५०'s में फूफा जी का एक वाल्व रेडियो था। तब हमारे शहर में बिजली नहीं आयी थी और तब यह रेडियो जो एक वाल्व वाला रेडियो था स्टैक बैटरी पर जो शायद ११० वाल्ट का था पर चलता था। छत पर एक ऐन्टेना लगाते थे जिसके पॉर्सेलेन के दो गोटिया या इंसुलेटर होता। इन गोटियों के टूट जाने पर हम चूड़ी को उपयोग में लाते और उनके बीच एक तार लगाते और तार में एक और तार जोड़ कर रेडियो के एंटेना वाले सॉकेट में डाल देते। मेरा पुराना ब्लॉग :-

First in my list is a valve radio which ran on a pile battery ( I think it was 110 V DC).The radio - probably a Murphy- was in a working condition, but many times needed battery replacement from Patna, only elders used to enjoy predominantly Sehgal songs. Later we got more modern radio working on electricity.


आज वर्ल्ड रेडियो दिवस है। गूगल पर पता चला की 13 फरवरी 1946 में संयुक्त राष्ट्र रेडियो की शुरुआत हुई थी. इस वजह से अंतरराष्‍ट्रीय रूप से रेडियो दिवस मनाने के लिए 13 फरवरी की तारीख को चुना गया. इसे संयुक्त राष्ट्र रेडियो की वर्षगांठ के तौर पर सेलिब्रेट किया जाता है. हर साल इस दिन की एक थीम निर्धारित होती है. साल 2024 की थीम है- 'Radio: A century of informing, entertaining and educating'.
ऐसे तो सबसे पहले जगदीश चंद्र बोस ने रेडियो तरंगो को ७५ फ़ीट तक भेजा (नवंबर 1895 में, बोस ने कलकत्ता के टाउन हॉल में एक सार्वजनिक प्रदर्शन प्रस्तुत किया, जहां उन्होंने 75 फीट तक एक विद्युत चुम्बकीय तरंग भेजी, जो दीवारों से होकर गुजरती हुई दूर से घंटी बजाती थी और कुछ बारूद विस्फोट करती थी) लेकिन उन्होंने इसके अविष्कार के प्रदर्शन में देर कर दी। गुग्लिल्मो मोरकोनी ने वर्ष 1896 को रेडियो का पेटेंट रिकॉर्ड लिया और इसक बाद उन्हें रेडियो का आधिकारिक अविष्कारक मान लिया गया। 24 दिसंबर 1906 को कैनेडा के वैज्ञानिक रेगिनाल्ड फेसेंडन ने रेडियो ब्रॉडकास्टिंग के द्धारा संदेश भेजकर रेडियो प्रसारण की शुरुआत की।
बिखरे हुए दर्शकों तक पहुंचने के उद्देश्य से संगीत और बातचीत का रेडियो प्रसारण प्रायोगिक तौर पर 1905-1906 के आसपास और व्यावसायिक रूप से 1920 से 1923 के आसपास शुरू हुआ। वीएचएफ स्टेशन 30 से 35 साल बाद शुरू हुए। शुरुआती दिनों में, रेडियो स्टेशन लॉन्गवेव, मीडियमवेव और शॉर्टवेव बैंड पर प्रसारण करते थे, और बाद में वीएचएफ और यूएचएफ पर प्रसारित होते थे। शुरुआत में रेडियो को वायरलेस टेलीग्राफी कहा जाता था. इसी से इसका नाम वायरलेस पड़ गया. वहीं रेडियो ट्रांसमिशन के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द 'ब्रॉडकास्टिंग' असल में कृषि से जुड़ा हुआ था जिसका मतलब था 'बीज को बिखेरना'.


  • भारत में रेडियो ब्रॉडकास्ट की शुरुआत 1923 में हुई. 1930 में 'इंडियन ब्रॉडकास्ट कंपनी' (IBC) दिवालिया हो गई और उसे बेचना पड़ा. इसके बाद 'इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस' को बनाया गया. 8 जून 1936 को 'इंडियन स्टेट ब्रॉडकास्टिंग सर्विस', 'ऑल इंडिया रेडियो' बन गया.
  • 1947 में आकाशवाणी के पास छह रेडियो स्टेशन थे और उसकी पहुंच 11 प्रतिशत लोगों तक ही थी. आज आकाशवाणी के पास 223 रेडियो स्टेशन हैं और उसकी पहुंच 99.1 फ़ीसदी भारतीयों तक है.
  • अगर आपने आकाशवाणी को सुना है, तो आप इसकी सिग्‍नेचर ट्यून से जरूर वाकिफ होंगे. इस अनूठी और असाधारण सिग्नेचर-ट्यून को चेकोस्लोवाकिया में जन्मे कंपोज़र वॉल्टर कॉफ़मैन ने बनाया था. तीस के दशक में वॉल्टर कॉफ़मैन मुम्बई आकाशवाणी के वेस्टर्न म्यूज़िक डिपार्टमेंट में कंपोज़र का काम कर रहे थे. उसी दौरान उन्होंने ये ट्यून बनाई थी. इस धुन में आपको तानपूरा, वायलिन और वायोला सुनाई देता है.
  • टेलीविज़न के आने के बाद शहरों में रेडियो के श्रोता कम होते गए, लेकिन एफएम रेडियो ने एक बार फिर से रेडियो जगत में क्रांति लाने का काम किया और आज एफएम रेडियो भी लोगों की लाइफ का अहम हिस्‍सा है.

    अमेच्योर रेडियो की शुरुआत रेडियो तरंगों के अविष्कार के साथ हो गयी। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका में इसे प्रतिबंधित कर दिया गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान जर्मनी को शंका थी की आमच्योर रेडियो को जासूसी के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है पर आमच्योर रेडियो के मानवीय कार्यो के लिए उपयोग उसके गलत उपयोग के भारी पड़ता है। आपमें से कुछ को याद होगा रेडियो और टीवी सेट के लिए पहले लाइसेंस लेना पड़ता था। अब भी लाइसेंस लेना पड़ता है आमच्योर रेडियो ऑपरेटर के लिए। भारत में 22,000 से अधिक लाइसेंस प्राप्त उपयोगकर्ताओं द्वारा एमेच्योर रेडियो या हैम रेडियो का अभ्यास किया जाता है। पहले शौकिया रेडियो ऑपरेटर को 1921 में लाइसेंस दिया गया था, और 1930 के दशक के मध्य तक, भारत में भी लगभग 20 शौकिया रेडियो ऑपरेटर थे। ये ऑपरेटर आपदाओं के समय बहुत ही उपयोगी सिद्ध होते रहे है।

Sunday, February 11, 2024

तिब्बत की खोज

तिब्बत की खोज किसने की ? यानि तिब्बत जिसके बारे में बाहरी दुनिया को कुछ पता नहीं था उसको दुनिया के सामने कौन ले कर आया ? जिन तीन लोगों का नाम सामने आता है वो है पंडित राहुल सांस्कृत्यायन 1930 's में तिब्बत , ऑस्ट्रियन हेनरिक हरेर तिब्बत में बिताया काल 1944 - 51 (7 years in Tibet fame ) और पंडित नयन सिंह रावत जो तिब्बत 1856 में गए । यानि इन सभी में सबसे पहले तिब्बत जाने वाले पहले व्यक्ति। इसी क्रम के राधानाथ सिकदर ने त्रिगुणमिति की सहायता से माउंट एवेरेस्ट की ऊंचाई १८५२ में नपा था। वे सर्वे आफ इण्डिया के कर्मचारी थे। एवरेस्ट का नाम इस कारण तब के सर्वेयर जनरल आफ इंडिया श्री जार्ज एवरेस्ट के नाम पर पड़ा। ये सभी EXPLORER थे एक अनजान जगह की।

सबसे पहले पंडित राहुल सांकृत्यायन की बात करते है। उनके धर्म और दर्शन की बात करें तो सबसे पहले वे आर्य समाजी थे। बाद में श्री लंका में उन्होंने बुद्ध धर्म में दीक्षा ली और तभी अपना नाम महात्मा बुद्ध के पुत्र के नाम पर रखा राहुल। फिर जब वे सोवियत संघ गए और उनका झुकाव मार्क्सवाद के तरफ हुआ तब वे नास्तिक हो गए।

राहुल संस्कृत्यायन की मुर्ति, दार्जिलिंग

राहुल सांकृत्यायन का यात्राएं इतिहास 1910 में शुरू हुई, जब उन्होंने हिमालय की यात्राएं की। पहले उन्होंने भिक्षुओं के साथ यात्रा की, लेकिन बाद में अकेले यात्रा की। सांकृत्यायन की यात्राएं उन्हें लद्दाख, किन्नौर और कश्मीर सहित भारत के विभिन्न हिस्सों में ले गईं। उन्होंने नेपाल, तिब्बत, श्रीलंका सहित कई अन्य देशों की भी यात्रा जैसे ईरान, चीन और पूर्व सोवियत संघ। उन्होंने बिहार में सारण जिले के परसा गढ़ गांव में भी कई साल बिताए। गांव के प्रवेश द्वार का नाम भी "राहुल गेट" है। यात्रा करते समय, उन्होंने ज्यादातर भूतल परिवहन का उपयोग किया या पैदल यात्रा की। उन्होंने बौद्ध भिक्षु के रूप गुप्त तरीके से तिब्बत में प्रवेश किया।
उन्होंने तिब्बत की कई यात्राएँ कीं और बहुमूल्य पेंटिंग और पाली और संस्कृत पांडुलिपियाँ भारत वापस लाए। इनमें से अधिकांश विक्रमशिला और नालंदा विश्वविद्यालयों के पुस्तकालयों का हिस्सा थे। इन वस्तुओं को बारहवीं शताब्दी के दौरान बौद्ध भिक्षुओं द्वारा तिब्बत ले जाया गया था, जब आक्रमणकारी मुस्लिम सेनाओं ने भारत में विश्वविद्यालयों को नष्ट कर दिया था। कहा जाता है कि राहुल सांकृत्यायन ने इन सामग्रियों को तिब्बत से लाने के लिए बाईस खच्चरों को उपयोग में लाया।
अब बात करते हैं नैन सिंह रावत की जन्म 21 अक्टूबर 1830 - मृत्यु 1 फरवरी 1882 । जिन्हें हिमालय क्षेत्र और मध्य एशिया का पता लगाने या सर्वे के लिए अंग्रेजों द्वारा नियोजित किया गया था। वे कुमाऊँ की जोहार घाटी से थे। उन्होंने लद्दाख से तिब्बत तक व्यापार मार्ग का सर्वेक्षण किया, तिब्बत में ल्हासा का स्थान और ऊंचाई निर्धारित की और ब्रह्मपुत्र के एक बड़े हिस्से का सर्वेक्षण किया। वह 1,580 मील या 3,160,000 कदम चले और प्रत्येक की गिनती की और रिकॉर्ड किया।

नयन सिंह रावत, Explorer

वे तिब्बत तब गए जब बाहरी लोग खास कर गोरे लोगों को तिब्बत जाने की अनुमति नहीं थी और उन्हें इसलिए अंग्रेज़ों ने नौकरी दी थी तांकि वे तिब्बत जा कर ल्हासा , मानसरोवर , ब्रह्मपुत्र इत्यादि का नक्शा बना सके। उनके लिए तिब्बत जाना आसान था क्योंकि वह भुटिया जाति के थे और तिब्बती भाषा भी जानते थे। कोई सर्वेइंग उपकरण ले जाना संभव नहीं था इसलिए वे एक ३३ इंच की रस्सी पैरों के बीच बांध कर चलते थे और कदम गिनते जाते , हर २००० कदम एक मील के बराबर होता। इस तरह उन्होंने करीब १६०० मील पैदल चले और तिब्बत के कई क्षेत्र का नक्शा बना डाला अंगेरजों के लिए। ऐसा करने वाले वे पहले व्यक्ति थे।
एक जानकारी जो मेरी बहन ने भेजी है वह भी add कर रहा हूँ। नयन सिंह रावत की पत्नी हर वर्ष ऊन निकाल कर उनके लिए कोट पैंट बुनती थी। जब कई वर्ष वे नहीं आये तो लोगो ने उन्हें समझाया कि अब नयन नहीं आएंगे , पर फिर भी वो हर साल कोट पैंट बुनती और १६ साल बाद जब नयन लौट आये तो उन्हें एक साथ १६ कोट पैंट दिए।

अब बात करते है 7 years in Tibet वाले‌ व्यक्तियों की, जिनके तिब्बत प्रवास पर 1997 में एक फिल्म भी बनी थी। वे थे :-
हेनरिक हैरर और पीटर औफ़श्नाइटर ।

हेनरिक हेरर, पर्वतारोही 1977 में

1939 में, ऑस्ट्रियाई पर्वतारोही हेनरिक हैरर अपनी गर्भवती पत्नी को छोड़कर ब्रिटिश शासित भारत में नंगा पर्वत पर चढ़ने की कोशिश कर रहे एक दल में पीटर औफ़श्नाइटर के साथ शामिल हो गए। जब 1939 में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ, तो जर्मन (ओस्ट्रियन) होने के कारण ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। दोनों देहरादून में Prisoner of war थे और 1944 में भाग कर तिब्बत जा पहुंचते है। जहां उसे शुरू में आने नहीं देते फिर भेष बदलकर और छिपते छिपाते और बहुत कठिनाई से ल्हासा जाने में सफल भी हो जाते है। कही रूकने जाने की अनुमति नहीं मिलती , पकड़े जाने के डर से रात में ही कठिन पहाड़ी रास्ते पर चलना पड़ता। कभी सामान ढोने के लिए याक नहीं मिलता। खैर ल्हासा में वे तिब्बती राजनयिक कुंगो त्सारोंग के घर के मेहमान बन जाते हैं। तिब्बती वरिष्ठ अधिकारी न्गावांग जिग्मे भी दोनों विदेशियों को कस्टम-मेड पश्चिमी सूट के उपहार के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं क्योंकि उनके कपड़े तब तक पहनने के लायक नहीं रहते। बाद में उनकी मुलाकात 14 वें बालक दलाई लामा से भी होती है जिनके वे शिक्षक (Tutor) भी बनते है। ये दोनों ल्हासा तक जाने वाले पहले गोरे व्यक्ति थे। हेनरिक हैरर ने तिब्बत में बिताए उन सात सालों पर एक किताब भी लिखी है।
आज बस इतना ही, अगले ब्लॉग की प्रतीक्षा करें।

Tuesday, February 6, 2024

मानस के कुछ भावुक क्षण - भाग-३ (वन गमन १)

मैं पिछले दो ब्लॉग से राम चरित मानस के भावुक क्षणों को मानस की चौपाइयों से संकलित करने की छोटी चेष्टा कर रहा हूँ । मैं पिछले ब्लॉगों का लिंक यहाँ दे रहा हूँ तांकि अपने यदि नहीं पढ़ा तो निरंतरता के लिए पढ़ सकते है। कृपया लिंक पर क्लिक करें।


आगे पढ़े आज का ब्लॉग राम का वन गमन। गणेश वंदना के बाद


विकिपीडिया को आभार सहित

ॐ गं गणपतये सर्व कार्य सिद्धि कुरु कुरु स्वाहा ॥

यह ब्लॉग राम चरित मानस के अयोध्या कांड पर आधारित है और राम के राज्याभिषेक की तैयारियों से शुरू होता है।

मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिअ थोर सबु तासू।
रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुटु सम कीन्हा।।
श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा।
नृप जुबराजु राम कहुँ देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।।

मंगल मूल श्री रामचन्द्रजी के पिता के लिए जो कुछ कहा जाए सब थोड़ा है। राजा ने स्वाभाविक ही हाथ में दर्पण ले लिया और उसमें अपना मुँह देखकर मुकुट को सीधा किया। उन्होंने देखा कानों के पास बाल सफेद हो गए हैं । मानों बुढ़ापा उपदेश कर रहा है कि हे राजन। श्री रामचन्द्रजी को युवराज पद देकर अपने जीवन और जन्म का लाभ क्यों नहीं लेते।।
पूरी अयोध्या सजाई जा रही थी , मंगलाचरण गया जा रहा था और देवी कैकयी (दशरथ की दूसरी रानी) की मंदबुद्धि दासी मंथरा पूछते चल रही थे ऐसा क्यों हो रहा है और उसे राम के राज्यभिषेक का पता चलता है।
मंथरा कैकयी संवाद :-

करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होइ अकाजु कवनि बिधि राती ।
देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती।।
भरत मातु पहिं गइ बिलखानी। का अनमनि हसि कह हँसि रानी।
ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढारइ आँसू।।

वह दुर्बुद्धि, वाली दासी विचार करने लगी कि किस प्रकार से यह काम रात ही रात में बिगड़ जाए, जैसे कोई कुटिल भीलनी शहद का छत्ता लगा देखकर घात लगाती है कि इसको किस तरह से उखाड़ लूँ । उदास होकर भरतजी की माता कैकेयी के पास गई। रानी कैकेयी ने हँसकर कहा- तू उदास क्यों है? मंथरा कुछ उत्तर नहीं देती, केवल लंबी साँस ले रही है और नारी चरित करके आँसू ढरका रही है।

भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।
देखहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।।
पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।
नीद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।।

मंथरा कहती है , कौसल्या को विधाता बहुत ही अनुकूल हुए हैं, यह देखकर उनके हृदय में गर्व समाता नहीं। तुम स्वयं जाकर सब शोभा क्यों नहीं देख लेतीं, जिसे देखकर मेरे मन में क्षोभ हुआ है। पुत्र परदेस में है, तुम्हें कुछ सोच नहीं। जानती हो कि मेरे बस में कुछ नहीं हैं। तुम्हें तो सेज पलँग पर पड़े-पड़े नींद लेना ही बहुत प्यारा लगता है, राजा की कपटभरी चतुराई तुम नहीं देखती। कैकयी ने मंथरा को बहुत खरी खोटी सुनाई। उनका राम के प्रीती भी सामने आता है ।

काने खोरे कूबरे कुटिल कुचाली जानि।
तिय बिसेषि पुनिचेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।

काने , लंगड़ों और कुबड़ों को कुटिल और कुचाली जानना चाहिए। उनमें भी स्त्री और खासकर दासी! इतना कहकर भरतजी की माता कैकेयी मुस्कुरा दीं।

जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुँ राम सिय पूत पुतोहु।
प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें।।

जो विधाता कृपा करके फिर से जन्म दें तो यह भी दे श्री रामचन्द्र पुत्र और सीता बहू हों। श्री राम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। उनके उनके तिलक की बात सुनकर तुझे क्षोभ कैसा? मंथरा के बार बार कहने पर कि कौसल्या और दशरथ ने कुटिलता से भारत को ननिहाल भेज कर यह राजतिलक का फैसला लिया। महारानी कैकयी कोप भवन में जाती है और दशरथ को उन्हें मानना आना पड़ता है।
कैकयी दशरथ संवाद :-

केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई।
मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई॥
दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई।
तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई॥

हे रानी! किसलिए रूठी हो?' यह कहकर राजा उसे स्पर्श करते हैं, तो वह उनके हाथ को झटककर हटा देती है और ऐसे देखती है मानो क्रोध में भरी हुई नागिन क्रूर दृष्टि से देख रही हो। दोनों वरदानों की उस नागिन की दो जीभें हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि राजा दशरथ होनहार के वश में होकर इसे इस प्रकार हाथ झटकने और नागिन की भाँति देखने को प्रेम क्रीड़ा ही समझ रहे हैं।

प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें।
जौं कछु कहौं कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही।।
बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता।
घरी कुघरी समुझि जियँ देखू। बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू।।

हे प्रिया , मेरी प्रजा, कुटम्बी, सम्पति , पुत्र, यहाँ तक कि मेरे प्राण भी, ये सब तेरे वश अधीन हैं। यदि मैं तुझसे कुछ कपट करके कहता होऊँ तो हे देवी मुझे सौ बार राम की सौगंध है। तू प्रसन्नतापूर्वक अपनी मनचाही बात माँग ले और अपने अंगों को आभूषणों से सजा ले । हे प्रिये! जल्दी इस बुरे वेष को त्याग दे।
राजा ने राम की सौगंध खाई है जान कैकयी उठती है गहने पहनती है और फिर राजा को उनके दिए दो वचनो कि याद दिलाई ।

झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।
रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाहुँ परु बचनु न जाई।।

मुझे झूठ-मूठ दोष मत दो। चाहे दो के बदले चार माँग लो। रघुकुल में सदा से यह रीति चली आई है कि प्राण भले ही चले जाएँ, पर वचन नहीं जाता

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का। देहु एक बर भरतहि टीका।
मागउँ दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।।
तापस बेष बिसेषि उदासी। चौदह बरिस रामु बनबास।
सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।।

वह बोली- हे प्राण प्यारे! सुनिए, मेरे मन को भाने वाला एक वर तो दीजिए, भरत का राजतिलक और हे नाथ ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर माँगती हूँ, मेरा मनोरथ पूरा कीजिए। राज्य और कुटुम्ब आदि की ओर से भलीभाँति उदासीन होकर विरक्त मुनियों की भाँति राम चौदह वर्ष तक वन में निवास करें। कैकेयी के विनययुक्त वचन सुनकर राजा के हृदय में ऐसा शोक हुआ जैसे चन्द्रमा की किरणों के स्पर्श से चकवा विकल हो जाता है।
दशरथ दुखित हो जाते है और राम जानना चाहते है कि ऐसा क्यों है और वो कैकयी के पास पिता के दुःख का कारण जानने को जाते है। राम को जब दशरथ जी के वरदानों कि बात पता चलती है तो वे कैकयी से कहते है।
राम कैकयी संवाद :-

मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर।
तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।
भरतु प्रानप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजू।
जौं न जाउँ बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा ।।

राम कैकयी से कहते है वन में विशेष रूप से मुनियों का मिलाप होगा, जिसमें मेरा सभी प्रकार से हित है। उस पर यह पिताजी की आज्ञा और हे! जननी तुम्हारी भी सम्मति है और मेरा प्राण प्रिय भरत राज्य पावेंगे ऐसा प्रतीत होता है कि आज विधाता सब प्रकार से मुझे सम्मुख हैं। यदि ऐसे काम के लिए भी मैं वन को न जाऊँ तो मूर्खों के समाज में सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिए।
राम फिर पिता के पास जाते है। उन्हें आया जान दशरथ की मुर्छा टूटती है। और वह उन्हें ढ़ाढ़स देते है।
राम दशरथ संवाद :-

अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा।।
देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता। सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता ।।

राम दशरथ से कहते है इस अत्यन्त छोटी बात के लिए आपने इतने दुःखी है। मुझे किसी ने पहले यह बात नहीं बताई। आपकी दशा देखकर मैंने माता (कैकयी) से पूछा उनसे सारी बात सुनकर मेरा मन शीतल हो गए।

अस कहि राम गवनु तब कीन्हा। भूप सोक बस उतरु न दीन्हा ।।
नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी। छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी ।।

ऐसा कहकर तब श्री रामचन्द्रजी वहाँ से चल दिए। राजा शोकवश कोई उत्तर नहीं दे पाए। और वो बहुत अप्रिय बात नगर भर में इतनी जल्दी फैल गई, मानो डंक मारते ही बिच्छू का विष सारे शरीर में चढ़ गया हो ।
नगर वासी क्या कहते है
सभी कैकयी को बुरा भला कहने लगे। तुम तो कहती थीं राम तुम्हें भरत के जैसा ही प्रिय है।

अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।।
भरतहि अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू ।।

हृदय में ऐसा विचार कर के क्रोध छोड़ दो, शोक और कलंक की कोठी मत बनो। भरत को अवश्य युवराजपद दो, पर श्री रामचंद्रजी का वन में क्या काम है?
राम राज्य के भूखे नहीं है कभी भरत के राजकाज में विघ्न नहीं डालेंगे। फिर राम माता कौशल्या के पास जा कर उन्हें समझाते है।
राम कौशल्या संवाद :-

आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता॥
जनि सनेह बस डरपसि भोरें। आनँदु अंब अनुग्रह तोरें॥

राम कहते है हे माता! तू प्रसन्न मन से मुझे आज्ञा दे, जिससे मेरी वन यात्रा में आनंद-मंगल हो। मेरे स्नेहवश भूलकर भी डरना नहीं। हे माता! तेरी कृपा से आनंद ही होगा।
राम के वन जाने के निर्णय से सीता जी भी उनके साथ जाने को उद्यत हो गयी। तब राम उन्हें भांति भांति से समझते है की महल में ही रहे।
राम सीता संवाद:-

जौं हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा।
काननु कठिन भयंकरु भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी।।
कुस कंटक मग काँकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना।
चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे।।
कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे।
भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा।।

राम कहते है हे वामांगी यदि प्रेमवश हठ करोगी, तो दुःख पाओगी। वन बड़ा क्लेशदायक और भयानक है। वहाँ की धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा सभी बड़े भयानक हैं। रास्ते में कुश, काँटे और बहुत से कंकड़ हैं। उन पर खाली पैड़ ही पैदल ही चलना होगा। तुम्हारे चरण कोमल और सुंदर हैं और रास्ते में बड़े-बड़े दुर्गम पर्वत हैं। पर्वतों की गुफाएँ, खोह , नदियाँ, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देखा तक नहीं जाता। रीछ, बाघ, भेड़िये, सिंह और हाथी भयानक शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है। सीता राम के मानाने के बाद माता कौसल्या के पास आज्ञा मांगने जाती है।
राम सीता कौशल्या संवाद :-

तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी।
सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा।।

तब जानकीजी सास के पाँव लगीं और बोलीं- हे माता! सुनिए, मैं बड़ी ही अभागिनी हूँ। आपकी सेवा करने के समय दैव ने मुझे वनवास दे दिया। मेरा मनोरथ सफल न किया। बाद में कौशल्या ने उन्हें गले लगाया और कहा।

बारहिं बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही।
अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा।।

उन्होंने सीताजी को बार-बार हृदय से लगाया और धीरज धरकर शिक्षा दी और आशीर्वाद दिया कि जब तक गंगाजी और यमुनाजी में जल की धारा बहे, तब तक तुम्हारा सुहाग अचल रहे।
लक्ष्मण का वन जाने का निर्णय

समाचार जब लछिमन पाए। ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए।।
कंप पुलक तन नयन सनीरा। गहे चरन अति प्रेम अधीरा।।

जब लक्ष्मणजी राम वन गमन का समाचार पाया तब वे व्याकुल होकर उदास मुँह उठ दौड़े। शरीर काँप रहा है, रोमांच हो रहा है, नेत्र आँसुओं से भरे हैं। प्रेम से अत्यन्त अधीर होकर उन्होंने श्री रामजी के चरण पकड़ लिए।
राम लक्ष्मण संवाद:-

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।।
भवन भरतु रिपुसूदनु नाहीं। राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं।।

राम बोले हे भाई! हृदय में ऐसा जानकर मेरी सीख सुनो और माता-पिता के चरणों की सेवा करो। भरत और शत्रुघ्न भी घर पर नहीं हैं, महाराज वृद्ध हैं और मेरे जाने से दुखी भी है।

मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा। होइ सबहि बिधि अवध अनाथा।
गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू।।

भाई इस अवस्था में मैं तुमको साथ लेकर वन जाऊँ तो अयोध्या सभी प्रकार से अनाथ हो जाएगी। गुरु, पिता, माता, प्रजा और परिवार सभी पर दुःख का दुःसह भार आ पड़ेगा। लक्ष्मण जी फिर अपने माता सुमित्रा के पास जाते है। सब बातें जानकर सुमित्रा अपना सर पीट लेती है। और सोचती है पापिनी कैकयी ने कैसा घात लगाया।
लक्ष्मण सुमित्रा संवाद:-

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुहृद बोली मृदु बानी।
तात तुम्हारि मातु बैदेही। पिता रामु सब भाँति सनेही।।

सुमित्रा ने कुसमय जानकर धैर्य धारण किया और स्वभाव से ही हित चाहने वाली सुमित्राजी कोमल वाणी से बोलीं- हे तात ! जानकीजी तुम्हारी माता सामान हैं और सब प्रकार से स्नेह करने वाले श्री रामचन्द्रजी तुम्हारे पिता सामान हैं।

अवध तहाँ जहँ राम निवासू। तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू।
जौं पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं।।

और जहाँ श्री रामजी का निवास हो वहीं अयोध्या है। जहाँ सूर्य का प्रकाश हो वहीं दिन है। यदि निश्चय ही सीता-राम वन को जाते हैं, तो अयोध्या में तुम्हारा कुछ भी काम नहीं है।
राम सीता लक्ष्मण दशरथ से आज्ञा मांगने जाना ;-

सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ।
बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ।।
सकइ न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।
नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा।।

सीता सहित दोनों सुंदर पुत्रों को देख-देखकर राजा अकुलाते हैं और स्नेह वश बारंबार उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। राजा व्याकुल हैं, बोल नहीं सकते। हृदय में शोक से उत्पन्न हुआ भयानक सन्ताप है। तब रघुकुल के वीर श्री रामचन्द्रजी ने अत्यन्त प्रेम से चरणों में सिर नवाकर उठकर विदा माँगी। वो पहले राम फिर सीता को समझने की कोशिश भी करते है।

तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही।
कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए।।
सिय मनु राम चरन अनुरागा। घरुन सुगमु बनु बिषमु न लागा।
औरउ सबहिं सीय समुझाई। कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई।।

तब राजा ने सीताजी को हृदय से लगा लिया और बहुत प्रकार की शिक्षा दी। वन के दुःसह दुःख कहकर सुनाए। फिर सास, ससुर तथा पिता के पास रहने के सुखों को समझाया। परन्तु सीताजी का मन श्री रामचन्द्रजी के चरणों में बसा था, इसलिए उन्हें घर अच्छा नहीं लगा और न ही वन भयान। फिर और लोगों ने भी वन में विपत्तियों की अधिकता बता-बताकर सीताजी को समझाया। मंत्री सुमंत की पत्नी , गुरु वशिष्ठ की पत्नी सीता को बोलती है , दशरथ जी ने तुमको वनवास नहीं दिया इसलिए तुम्हारा वन में जाना जरूरी नहीं है।

सीय सकुच बस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।
मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगें धरि बोली मृदु बानी।।
नृपहि प्रानप्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।
सुकृतु सुजसु परलोकु नसाऊ। तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ।।

सीताजी संकोचवश उत्तर नहीं देतीं। इन बातों को सुनकर कैकेयी तमककर उठी। उसने मुनियों के वस्त्र, माला, मेखला और कमंडल आदि लाकर श्री रामचन्द्रजी के आगे रख दिए और कोमल वाणी से कहा-ऐसा विचारकर जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो। माता की सीख सुनकर श्री रामचन्द्रजी ने बड़ा सुख पाया, परन्तु राजा को ये वचन बाण के समान लगे। वे सोचने लगे अब भी अभागे प्राण क्यों नहीं निकलते!

लोग बिकल मुरुछित नरनाहू। काह करिअ कछु सूझ न काहू।
रामु तुरत मुनि बेषु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई।।

राजा मूर्छित हो गए, लोग व्याकुल हैं। किसी को कुछ सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें। श्री रामचन्द्रजी तुरंत मुनि का वेष बनाकर और माता-पिता को सिर नवाकर चल दिए। राम सीता और लक्ष्मण के पीछे पीछे व्याकुल नगरवासी भी चल पड़ते है। वे कहाँ कहाँ गए और वनगमन पर अन्य चौपाई अगले ब्लॉग में।

Friday, February 2, 2024

राम चरित मानस से कुछ भावुक क्षण भाग-२ (विवाह)

मैंने पिछले ब्लॉग में लिखाा राम चरित मानस से कुछ भावुक क्षण भाग-1 (पढ़ने के लिए क्लिक करे) उसी क्रम में मैं अपना यह आलेख गणेश वंदना से शुरू करता हूँ ।

गाइये गनपति जगबंदन।
संकर -सुवन भवानी नंदन ॥ १ ॥
सिद्धि-सदन, गज बदन, बिनायक ।
कृपा -सिंधु ,सिंधुसुंदर सब-लायक ॥ २ ॥
मोदक-प्रिय, मुद -मंगल -दाता ।
बिद्या-बारिधि,बुद्धि बिधाता ॥ ३ ॥
माँगत तुलसिदास कर जोरे ।
बसहिं रामसिय मानस मोरे ॥ ४ ॥

गीता प्रेस के राम चरित मानस की सहायता मैंने ली है इस आलेख के लिए। इस भाग में राम सीता विवाह की कथा। पिछले भाग में श्री राम ने शिव धनुष की प्रत्यंचा आसानी से लगा ली और शिव धनुष खंडित हो गया।

का बरषा सब कृषी सुखानें।
समय चुकें पुनि का पछितानें॥
अस जियँ जानि जानकी देखी।
प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी॥

राम जी ने सोचा सारी खेती के सूख जाने पर वर्षा किस काम की? समय बीत जाने पर फिर पछताने से क्या लाभ? जी में ऐसा समझकर राम ने जानकी की ओर देखा और उनका विशेष प्रेम देख वे पुलकित हो गए।

गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा।
अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा॥
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ।
पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ॥

राम धनुष तोड़ने के लिए उठे और मन-ही-मन उन्होंने गुरु को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से धनुष को उठा लिया। जब उसे (हाथ में) लिया, तब वह धनुष बिजली की तरह चमका और फिर आकाश में मंडल-जैसा (मंडलाकार) हो गया।

परशुराम लक्ष्मण संवाद
राम चरित मानस में परशुराम का आगमन और लक्ष्मण से उनका संवाद भी है और श्री राम उनको शांत करते है । मानस में यह संवाद बहुत रोचक और काफी लम्बा है। मैं कुछ ही झलकियां दे रहा हूँ ।


राम कहते है।
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई॥
सुनहु राम जेहिं सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा॥

परशु राम शिव धनुष के टुकड़े देख पर उत्तेजित हो कर राजा जनक से कहते है मुझे बताओं किसने ये धनुष तोडा है बताओ नहीं तो जहां तक तुम्हारा राज्य है उसे उलट पुलट कर दूंगा। श्री राम बोले शिव धनुष को तोड़ने वाला तो आपका कोई सेवक ही होगा। परशुराम बोले सेवक का काम सेवा करना है दुश्मनी नहीं , सुनो राम जिसने भी शिव धनुष तोड़ा है वह सहस्रबाहु की तरह मेरा दुश्मन है।

सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा॥
सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने॥
बहु धनुहीं तोरीं लरिकाईं। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाईं॥
एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू॥

इसलिए जिसने भी तोड़ा है वह वह अलग हो जाय नहीं तो सारे राजा मारे जाओगे। लक्ष्मण बोले हे गोसाईं! लड़कपन में हमने बहुत सी धनुहियाँ तोड़ डालीं, किन्तु आपने ऐसा क्रोध कभी नहीं किया। इसी धनुष पर इतनी ममता किस कारण से है? यह सुनकर भृगुवंशी परशुरामजी कुपित होकर कहने लगे ।

रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥

ए नृप पुत्र काल के वश होने के कारण बोलने में कुछ भी होश नहीं है। सारे संसार में विख्यात शिवजी का यह धनुष क्या धनुही के समान है?

इसी तरह लक्ष्मण जी परशुराम को क्रोध दिलाते रहते है । कहते है पिता माता (पिता के कहने पर माता की हत्या परशुराम ने की थी ) के ऋण से मुक्त आप गुरु ऋण (शिव ) से मुक्त होने आये है और उन्हें कह डालते है की वीर बातों से नहीं अस्त्रों से युद्ध करते है इस पर परशुराम अपना फरसा उठा लेते है। राम उनकी मनाते है की बालक यदि कुछ चपलता भी करे तो माता पिता और गुरु प्रसन्न होते है। परशुराम का गुस्सा कुछ कम होता है और वे कहते है राम तुम्हारा भाई शरीर का गोरा है पर मन का काला है। बाद में परशुराम जी की बुद्धि की परते खुलती है और राम के विष्णु का अवतार होना ज्ञात होता है।

राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥
देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ


(परशुरामजी ने कहा-) हे राम ये विष्णु का धनुष हाथ में लीजिए और इसे खींचिए, जिससे मेरा संदेह मिट जाए। परशुरामजी धनुष देने लगे, तब वह आप ही आप राम जी के पास चला गया। तब परशुरामजी के मन का संदेह दूर हुआ।


राम सीता विवाह

दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहिं बोलाई॥
मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला॥


अपने पुरोहित सतानन्द जी कहा अयोध्या को दूत भेजो जो राजा दशरथ को बुला लावें। राजा ने प्रसन्न होकर कहा- हे कृपालु! बहुत अच्छा! और उसी समय दूतों को बुलाकर भेज दिया॥ सारा नगर सजाने के लिए महाजनों को सन्देश दिए गए। स्वर्ण सामान केला के खम्भों से मंडप बनाये गए जिसको देख ब्रह्मा भी आश्चर्य चकित हो गए।

जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी।
तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी॥
जो संपदा नीच गृह सोहा।
सो बिलोकि सुरनायक मोहा॥
बसइ नगर जेहिं लच्छि करि कपट नारि बर बेषु।
तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु॥

उस समय जिसने तिरहुत को देखा, उसे चौदह भुवन तुच्छ जान पड़े। जनकपुर में गरीबों के घर भी उस समय जो सम्पदा सुशोभित थी, उसे देखकर इन्द्र भी मोहित हो जाता। जिस नगर में साक्षात् लक्ष्मीजी स्त्री के सुंदर वेष बनाकर बसती हैं, उस नगर की शोभा का वर्णन करने में सरस्वती भी सकुचाते हैं॥ उधर जनकपुर के दूत अयोध्या पहुचतें है और वहां के वैभव देख कर चकित रह जाते है।

तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे॥
भैया कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज नयन निहारे॥
स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा॥
पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ॥
जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब तें आजु साँचि सुधि पाई॥
कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूत मुसुकाने॥

दूत अयोध्या जा कर महाराज दशरथ को चिट्ठी सौपता है। भारत और शत्रुघ्न जो कही खेल रहे होते है भाईयों के कुशल जानने आ जाते है। तब राजा दूतों को पास बैठाकर मन को हरने वाले मीठे वचन बाले- भैया! कहो, दोनों बच्चे कुशल से तो हैं? तुमने अपनी आँखों से उन्हें अच्छी तरह देखा है न? साँवले और गोरे शरीर वाले वे धनुष और तरकस धारण किए रहते हैं, किशोर अवस्था है, विश्वामित्र मुनि के साथ हैं। तुम उनको पहचानते हो तो उनका स्वभाव बताओ। राजा प्रेम के विशेष वश होने से बार-बार इस प्रकार पूछ रहे है। (भैया!) जिस दिन से मुनि उन्हें लिवा ले गए, तब से आज ही हमने सच्ची खबर पाई है। कहो तो महाराज जनक ने उन्हें कैसे पहचाना? ये प्रिय (प्रेम भरे) वचन सुनकर दूत मुस्कुराये।

तहाँ राम रघुबंसमनि सुनिअ महा महिपाल।
भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल॥
सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँखि देखाए॥
देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करिबहु बिनय गवनु बन कीन्हा॥

हे महाराज! सुनिए, वहाँ (जहाँ ऐसे-ऐसे योद्धा हार मान गए) रघुवंशमणि श्री रामचन्द्रजी ने बिना ही प्रयास शिवजी के धनुष को वैसे ही तोड़ डाला जैसे हाथी कमल की डंडी को तोड़ डालता है! धनुष टूटने की बात सुनकर परशुरामजी क्रोध में भरे आए और उन्होंने बहुत प्रकार से आँखें दिखलाईं। अंत में उन्होंने भी श्री रामचन्द्रजी का बल देखकर उन्हें अपना धनुष दे दिया और बहुत प्रकार से विनती करके वन को गमन किया ।

राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुना।
सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं।।

राजा ने सभी रानियों को बुलाकर जनकजी की पत्रिका पढ़ कर सुनाई। समाचार सुनकर सब रानियाँ हर्ष से भर गईं। राजा ने फिर दूसरी सब बातों का जो दूतों से मौखिक रूप से सुना था उन सब बातों को भी बताया ।

मुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए।
दिए दान आनंद समेता। चले बिप्रबर आसिष देता।।

राजा ने कहा यह सब मुनि की कृपा है ऐसा कह चले गए । तब रानियों ने ब्राह्मणों को बुलाया और आनंद सहित उन्हें दान दिए और श्रेष्ठ ब्राह्मण आशीर्वाद दे कर चले गए।

जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि।
चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के।।

भिक्षुकों को बुलाकर करोड़ों प्रकार की निछावरें उनको दीं। उन्होंने आशीर्वाद दिया 'चक्रवर्ती महाराज दशरथ के चारों पुत्र चिरंजीवी हों'। जनकपुर से आयी खबर पुरे नगर में फ़ैल जाती है। पूरा नगर तरह तरह के ध्वजा पताका इत्यादि से सज जाती है। सज धज कर नारियां मंगल गीत गा रही है।

गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंदु न जाइ बखाना।
तब सुमंत्र दुइ स्यंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी।।
दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखान।
राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा।

नाना प्रकार के मनोहर गीत गा रही हैं। उनके अत्यन्त आनंद का बखान नहीं हो सकता। तब सुमन्त्रजी ने दो रथ सजाकर उनमें सूर्य के घोड़ों को भी मात करने वाले घोड़े जोते। दोनों सुंदर रथ वे राजा दशरथ के पास ले आए, जिनकी सुंदरता का वर्णन सरस्वती से भी नहीं हो सकता। एक रथ पर राजसी सामान सजाया गया और दूसरा जो तेज का पुंज और अत्यन्त ही शोभायमान था। एक रथ पर गुरु को चढ़ा कर दशरथ दूसरे रथ पर चढ़ते है और वे बृहस्पति के साथ इंद्र जैसे लग रहे थे ।

सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई।
हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरषहिं सुमन सुमंगल दाता।।

श्री रामचन्द्रजी का स्मरण करके, गुरु की आज्ञा पाकर पृथ्वी पति दशरथजी शंख बजाकर चले। बारात देखकर देवता हर्षित हुए और सुंदर मंगलदायक फूलों की वर्षा करने लगे। बारात जनकपुर पहुँच जाती है फिर वह क्या होता वो सुनिए।

आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान।
सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान।।

जोर से बजते हुए नगाड़ों की आवाज सुनकर श्रेष्ठ बारात को आती हुई जानकर अगवानी करने वाले हाथी, रथ, पैदल और घोड़े सजाकर बारात लेने चले।

अगवानन्ह जब दीखि बराता। उर आनंदु पुलक भर गाता।
देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना।।

भावार्थ:-अगवानी करने वालों को जब बारात दिखाई दी, तब उनके हृदय में आनंद छा गया और शरीर रोमांच से भर गया। अगवानों को सज-धज के साथ देखकर बारातियों ने प्रसन्न होकर नगाड़े बजाए।

सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी॥
पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई॥

रघुनाथ यह सब सीता की महिमा जानकर और उनका प्रेम पहचानकर हृदय में हर्षित हुए। पिता दशरथ के आने का समाचार सुनकर दोनों भाइयों के हृदय में महान् आनंद समाता न था।

कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे॥
भरतु राम ही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी॥
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा॥
मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं॥

जनकपुर वासी दो और राजकुमारों को देख कर आपस में बातें करते है। एक ने कहा - मैंने आज ही उन्हें देखा है; इतने सुंदर हैं, मानो ब्रह्मा ने उन्हें अपने हाथों सँवारा है। भरत तो राम की ही शकल-सूरत के हैं। स्त्री-पुरुष उन्हें सहसा पहचान नहीं सकते। लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों का एक रूप है। दोनों के नख से शिखा तक सभी अंग अनुपम हैं। मन को बड़े अच्छे लगते हैं, पर मुख से उनका वर्णन नहीं हो सकता। उनकी उपमा के योग्य तीनों लोकों में कोई नहीं है।

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं।
जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए।।

इस प्रकार सब मनोरथ कर रही हैं और हृदय को उमंग-उमंगकर (उत्साहपूर्वक) आनंद से भर रही हैं। सीता के स्वयंवर में जो राजा आए थे, उन्होंने भी चारों भाइयों को देखकर सुख पाया। फिर सभी चार राजकुमारों का विवाह चार राजकमारियों से विवाह हुआ।

बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं।
भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनँद भरैं॥
सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो।
करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो॥

दोनों कुलों के गुरु वर और कन्या की हथेलियों को मिलाकर शाखोच्चार करने लगे। पाणिग्रहण हुआ देखकर ब्रह्मादि देवता, मनुष्य और मुनि आनंद में भर गए। सुख के मूल दूल्हे को देखकर राजा-रानी का शरीर पुलकित हो गया और हृदय आनंद से उमंग उठा। राजाओं के अलंकार स्वरूप जनक ने लोक और वेद की रीति को करके कन्यादान किया।

तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि कै॥
कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई।
सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई॥

तब वशिष्ठ की आज्ञा पाकर जनक ने विवाह का सामान सजाकर मांडवी, श्रुतकीर्ति और उर्मिला - इन तीनों राजकुमारियों को बुला लिया। कुशध्वज की बड़ी कन्या मांडवी को, जो गुण, शील, सुख और शोभा की रूप ही थीं, राजा जनक ने प्रेमपूर्वक सब रीतियाँ करके भरत को ब्याह दिया। राम का विवाह सीता से हुआ , भारत का मांडवी से , उर्मिला का लक्ष्मण से और श्रुतिकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से हो गया।

कोहबरहिं आने कुअँर कुअँरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै।
अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै॥
लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं।
रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं॥

सुहागिनी स्त्रियाँ खुश हो कर कुमारो और कुमारियों को कोहबर में लाईं और अत्यंत प्रेम से मंगल गीत गा-गाकर लौकिक रीति करने लगीं। पार्वती राम को वर-वधू का परस्पर ग्रास देना सिखाती हैं और सरस्वती सीता को सिखाती हैं। रनिवास हास-विलास के आनंद में मग्न है, राम और सीता को देख-देखकर सभी जन्म का परम फल प्राप्त कर रही हैं।
बारात चारो दूल्हे दुल्हनों को ले कर बजे गाजे के साथ अयोध्या पहुँचती है तब वह क्या हुआ सुनिए।

आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुअँर बर चारी ।
सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी ।।

नगर की स्त्रियाँ आनंदित होकर आरती कर रही हैं और सुंदर चारों कुमारों को देखकर हर्षित हो रही हैं। पालकियों के सुंदर परदे हटा-हटाकर वे दुलहिनों को देखकर सुखी होती हैं।

उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता ।
बिप्रबधू सब भूप बोलाईं। चैल चारु भूषन पहिराईं ।।

सीताजी सहित श्री रामचन्द्रजी को हृदय में रखकर गुरु वशिष्ठजी हर्षित होकर अपने स्थान को गए। राजा ने सब ब्राह्मणों की स्त्रियों को बुलवाया और उन्हें सुंदर वस्त्र तथा आभूषण पहनाए ।
सभी रीति रिवाज खत्म होने पर। विश्वामित्र जाना चाहते हैं पर जा नहीं पाते।

बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं ।
दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ ।।

विश्वामित्रजी नित्य ही चलना (अपने आश्रम जाना) चाहते हैं, पर रामचन्द्रजी के स्नेह और विनयवश रह जाते हैं। दिनोंदिन राजा का सौ गुना भाव (प्रेम) देखकर महामुनिराज विश्वामित्रजी उनकी सराहना करते हैं। अखिर मुनि अपने आश्रम लौट जाते है।

सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु ।।

सीताजी और श्री रघुनाथजी के विवाह प्रसंग को जो लोग प्रेमपूर्वक गाएँ-सुनेंगे, उनके लिए सदा उत्साह (आनंद) ही उत्साह है, क्योंकि श्री रामचन्द्रजी का यश मंगल का धाम है।
राम वन गमन अगले भाग में। ईति श्री भाग-2

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Sunday, January 28, 2024

राम चरित मानस से कुछ भावुक क्षण भाग-१ (बाल लीला )

मैंने पिछले ब्लॉग में लिखा राम , रामकथा और राम लाला (पढ़ने के लिए क्लिक करे )। उसी क्रम में मैं अपना यह आलेख गणेश वंदना से शुरू करता हूँ । गीता प्रेस के राम चरित मानस की सहायता मैंने ली है इस आलेख के लिए। इस भाग में धनुष भंजन तक



जो सुमिरत सुधि होइ गन नायक करिबर वदन।
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि राशि सुभ गुन सदन।।
मूक होही वाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन ।
जांसू कृपा हो दयाल द्रवहु सकल कलिमल दहन ।।


जिनके स्मरण मात्र से सभी कार्य सिद्ध हो जाते है उन्ही हाथी के मुंह वाले गणों के स्वामी राशि और बुद्धि के गुणों के धाम (गणेश जी ) कृपा करे। जिनके कृपा से गूंगे अच्छा बोलने लगे, लंगड़े कठिन पहाड़ चढ़ने लगें, इस कलयुग में उनकी कृपा हो ।
अब मैं कुछ लोकप्रिय दोहे चौपाई के विषय में कुछ लिखता हूं ।

बाल कांड

नौमी तिथि मधु मास पुनीता।
सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥
मध्यदिवस अति सीत न घामा।
पावन काल लोक बिश्रामा ॥


राम के जन्म का वर्णन है। न ज्यादा गरम न ज्यादा ठंडा जैसे (चैत्र) मधुमास की नवमी तिथि । फिर एक छंद देखे। प्रभु के जन्म को संत तुलसीदास कैसे वर्णित करते है।

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुजचारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥


दीनो पर दया करने वाले, कौशल्या को खुशी देने वाले, अद्भुत रूप, आंखों को आनन्द देने वाले श्याम वर्ण, विशेष अस्त्रो , आभुषण, बड़े बड़े नयनों वाले, शोभा के समुद्र और खर राक्षस को मारने वाले प्रगट हुए है। प्रभु का अवतार जान माता स्तुति करने लगती है पर मातृत्व के आनंद के लिए यह चौपाई।

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।
कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा॥
सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।
यह चरित जे गावहिं हरिपद पावहिं ते न परहिं भवकूपा॥


माता की मति बदल जाती है वह कहती है तात अत्यन्त प्रिय बाललीला करो,यह सुख परम अनुपम होगा। माता का यह वचन सुनकर भगवान ने बालक (रूप) होकर रोना शुरू कर दिया।

सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी।
संभ्रम चलि आईं सब रानी॥
हरषित जहँ तहँ धाईं दासी।
आनँद मगन सकल पुरबासी॥


बच्चे के रोने पर भी रानियां आनंदित हो चली आती है, और महल में सभी धाई दासी और पुरवासी आनन्द मगन हो जाते है।
जब राज कुमार ठुमक ठुमक चलने लगे।

कौसल्या जब बोलन जाई।
ठुमुकु ठुमुकु प्रभु चलहिं पराई॥
निगम नेति सिव अंत न पावा।
ताहि धरै जननी हठि धावा॥


दशरथ के यहाँ चार राजकुमार का जन्म हो चुका है। सभी रानियां खुश है। बालकों के बालसुलभ चुलबुलापन और चपलता से सभी हर्षित है। जब माताएं उन्हें बुलाने जाती है तो वे जान बुझ कर दूर भाग जाते है जैसे लुका छिपी खेल रहे हों। इस दृश्य को कल्पना में ला कर देखिये कैसा मनोरम दृश्य है। जिसका अंत शिव को भी नहीं पता माता उसीको पकड़ने की जिद कर रही है।

बालकों की शिक्षा दीक्षा समाप्त हो गई,तब ऋषि विश्वामित्र अयोध्या पधारे‌ । ताड़का और अन्य राक्षसों से आश्रम और यज्ञशालाओं की रक्षा के लिए राजकुमारों को ले जाने के लिए।

असुर समूह सतावहिं मोही।
मैं जाचन आयउँ नृप तोही॥
अनुज समेत देहु रघुनाथा।
निसिचर बध मैं होब सनाथा॥


असुर समुह हमें सताते हैं, मैं कुछ मांगने आया हूं। राजा दशरथ से उन्होंने छोटे भाई समेत राम को अपने साथ ले जाने की प्रार्थना की। राजा दशरथ उनकी इस मांग से घबरा गए। राम से वियोग वो भी राक्षसों से युद्ध के लिए वो तैय्यार न थे।

मागहु भूमि धेनु धन कोसा।
सर्बस देउँ आजु सहरोसा॥
देह प्रान तें प्रिय कछु नाहीं।
सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं॥


राजा कहते है पृथ्वी, गो, धन और खजाना माँग लीजिए, मैं आज बड़े हर्ष के साथ अपना सर्वस्व दे दूँगा। देह और प्राण से अधिक प्यारा कुछ भी नहीं होता, मैं उसे भी एक पल में दे दूँगा ।

ऋषि के समझाने पर दशरथ राम और लक्ष्मण को उनके साथ भेज देते है। राम और लक्ष्मण तारका और अन्य राक्षसों का नाश कर देते है, अहिल्या का उद्धार भी राम करते है। । बाद में ऋषि के साथ दोनों राजकुमार जनकपुर जाते है।



जनकपुर में

देखि अनूप एक अँवराई।
सब सुपास सब भाँति सुहाई।
कौसिक कहेउ मोर मनु माना।
इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना॥


आमों का एक अनुपम बाग देखकर, जहाँ सब प्रकार के सुभीते थे और जो सब तरह से सुहावना था, विश्वामित्रजी ने कहा- हे रघुवीर! मेरा मन कहता है कि यहीं रहा जाए। इसके बाद राम लक्ष्मण के चर्चे पूरे जनकपुर में फ़ैल जाती है। दोनों भाई जनकपुर के महल , बाग इत्यादि देख कर चकित है। फिर सीता और राम की मुलाकत इसी बाग में होती है।

राम और सीता का प्रथम मिलन

चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालीगन।
लगे लेन दल फूल मुदित मन॥
तेहि अवसर सीता तहँ आई।
गिरिजा पूजन जननि पठाई॥


राम और लक्ष्मण चारों ओर दृष्टि डालकर और मालियों से पूछकर वे प्रसन्न मन से पत्ता-पुष्प लेने लगे। संयोग से उसी समय सीता अपनी माता के आज्ञानुसार पार्वती पूजन के लिए वहाँ आईं। राम - लखन को कुछ सखियों ने देखा और उनके रूप का वर्णन सीता से किया।

तासु बचन अति सियाही सोहने।
दरस लागि लोचन अकुलाने ॥
चली अग्र करि प्रिय सखी सोई।
प्रीति पुरातन लखि न कोइ ॥


सखी के वचन सुनकर सीता जी की आंखे राम जी को देखने के लिए अकुलाने लगी। अपने सखी तो आगे कर सीता चल पड़ी , पुराने प्रीत को कोई देख नहीं पाता। राम ने सीता और सखियों को देखा और उनके रूप की चर्चा लक्ष्मण जी से भी की ।

अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा।
सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥
भए बिलोचन चारु अचंचल।
मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥


ऐसा कहकर राम ने फिर उस ओर देखा। सीता के मुखरूपी चंद्रमा के लिए उनके नेत्र चकोर बन गए। उनकी टकटकी लग गई । मानो निमि (जनक के पूर्वज) ने (जिनका सबकी पलकों में निवास माना गया है, लड़की-दामाद के मिलन-प्रसंग को देखना उचित नहीं, इस भाव से) सकुचाकर पलकें छोड़ दीं, (यानि निमि ने पलकों में रहना छोड़ दिया, जिससे राम की पलके झपक गई (बंद हो गई) ।
सीता जी शोभा का ह्रदय में वर्णन कर और कुछ सोच राम जी लक्ष्मण से कहते है।

तात जनकतनया यह सोई।
धनुषजग्य जेहि कारन होई॥
पूजन गौरि सखीं लै आईं।
करत प्रकासु फिरइ फुलवाईं॥


हे तात! यह वही जनक की कन्या है, जिसके लिए धनुषयज्ञ हो रहा है। सखियाँ इसे गौरी पूजन के लिए ले आई हैं। यह फुलवारी में प्रकाश करती हुई फिर रही है।
सतानंद (जनक जी के पुरोहित) विश्वामित्र से मिलते है और जनक का आमंत्रण उन्हें दिया। विश्वामित्र दोनों भाईयों को लेकर रंग भूमि जाते है। नगर वासी दोनों भाइयों को देखने उत्सुक हो कर आये तो बड़ी भीड़ हो गयी। जनक की ने ऐसा देख अपने विश्वास पात्र सेवको से सबको उचित आसान देकर बैठाने को कहा ।

राज समाज बिराजत रूरे।
उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे॥
जिन्ह कें रही भावना जैसी।
प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥


बहुत सारे राजे , महाराजे रंगभूमि में आये हुए थे पर दोनों राजकुमार राजाओं के समाज में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणों के बीच दो पूर्ण चंद्रमा हों। जिनकी जैसी भावना थी, प्रभु की मूर्ति उन्होंने वैसी ही दिखती है।
स्वयंवर के लिए सभी अथति आसान ले चुके थे। सब सुअवसर जानकर जनक जी ने सीता को बुलवा भेजा। और सखियां उन्हें आदर पूर्वक लिवा ले गयी।

सिय सोभा नहिं जाइ बखानी।
जगदंबिका रूप गुन खानी॥
उपमा सकल मोहि लघु लागीं।
प्राकृत नारि अंग अनुरागीं॥


सीता की शोभा की बखान नहीं किया जा सकता। जगत जननी तो रुप गुण की खान है। कोई उपमा छोटी ही होगी। पर सभी राजा लोग दोनों राजकुमारों को देख कर हतोत्साहित हो जाते है।

प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे।
जनु राकेश उदय भएँ तारे॥
असि प्रतीति सब के मन माहीं।
राम चाप तोरब सक नाहीं॥


प्रभु को देखकर सब राजा हृदय में ऐसे हार गए (निराश एवं उत्साहहीन हो गए) जैसे पूर्ण चंद्रमा के उदय होने पर तारे प्रकाशहीन हो जाते हैं। (उनके तेज को देखकर) सबके मन में ऐसा विश्वास हो गया कि राम ही धनुष को तोड़ेंगे, इसमें संदेह नहीं। सवयंवर में आये राजा शिव धनुष को उठाने तोड़ने की कोशिश करते है।

तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं।
उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं॥
जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं।
चाप समीप महीप न जाहीं॥


सभी राजा तमककर (बड़े ताव से) शिव के धनुष की ओर देखते हैं और फिर निगाह जमाकर उसे पकड़ते हैं, करोड़ों भाँति से जोर लगाते हैं, पर वह उठता ही नहीं। जिन राजाओं के मन में कुछ विवेक है, वे तो धनुष के पास ही नहीं जाते। जब शिव धनुष को कोई राजा उठा तक नहीं सका तब जनक दुखी हो गए।

दीप दीप के भूपति नाना।
आए सुनि हम जो पनु ठाना॥
देव दनुज धरि मनुज सरीरा।
बिपुल बीर आए रनधीरा॥


जनक तब बोले , मैंने जो प्रण ठाना था, उसे सुनकर द्वीप-द्वीप के अनेकों राजा आए। देवता और दैत्य भी मनुष्य का शरीर धारण करके आए तथा और भी बहुत-से रणधीर वीर आए। पर धनुष तोड़कर मनोहर कन्या, बड़ी विजय और कीर्ति को पाने वाला ब्रह्मा ने रचा ही नहीं।

सुकृतु जाइ जौं पनु परिहरऊँ।
कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ॥
जौं जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई।
तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई॥


दुखित जनक बोले यदि प्रण छोड़ता हूँ, तो पुण्य जाता है, इसलिए क्या करूँ, कन्या कुँआरी ही रहे। यदि मैं जानता कि पृथ्वी वीरों से शून्य है, तो प्रण करके उपहास का पात्र न बनता।
जनक के वचन सुन कर सभी दुखी हो गए सिर्फ लक्ष्मण को यह बात खल गयी की रघुवंशियों के रहते पृथ्वी को वीरों से शुन्य कह दिया। उन्होंने कहा की यदि मै चाहूँ तो पृथ्वी को गेंद की तरह उठा डालू और फोड़ डालू। चाहू तो इस धनुष की प्रत्यंचा चढ़ा कर १०० कोस की दौड़ लगा लू। ज्यों ही लक्ष्मण ने यह बात कहीं पृत्वी डगमगा उठी। तब गुरु विश्वामित्र ने राम को धनुष तोड़ने को कहा।

सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा।
हरषु बिषादु न कछु उर आवा॥
ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ।
ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ॥


गुरु के वचन सुनकर राम ने चरणों में सिर नवाया। उनके मन में न हर्ष हुआ, न विषाद और वे खडे हुए उनकी शान देख जवान सिंह को भी लजाते हुए सहज स्वभाव से ही उठ खड़े हुए।राम को धनुष को तोड़ने के लिए उठता देख सीता प्रार्थना करने लगी की राम सफल हो सके।

मनहीं मन मनाव अकुलानी।
होहु प्रसन्न महेस भवानी॥
करहु सफल आपनि सेवकाई।
करि हितु हरहु चाप गरुआई॥


वे व्याकुल होकर मन ही मन प्रार्थना कर रही हैं - हे महेश-भवानी! मुझ पर प्रसन्न होइए, मैंने आपकी जो सेवा की है, उसे सुफल कीजिए और मुझ पर स्नेह करके धनुष के भारीपन को कम कर दीजिए ।श्री राम ने देखा सीता जी अति व्याकुल हो रही थी ।

का बरषा सब कृषी सुखानें।
समय चुकें पुनि का पछितानें॥
अस जियँ जानि जानकी देखी।
प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी॥


राम जी ने सोचा सारी खेती के सूख जाने पर वर्षा किस काम की? समय बीत जाने पर फिर पछताने से क्या लाभ? जी में ऐसा समझकर राम ने जानकी की ओर देखा और उनका विशेष प्रेम देख वे पुलकित हो गए।

गुरहि प्रनामु मनहिं मन कीन्हा।
अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा॥
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ।
पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ॥


राम धनुष तोड़ने के लिए उठे और मन-ही-मन उन्होंने गुरु को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से धनुष को उठा लिया। जब उसे (हाथ में) लिया, तब वह धनुष बिजली की तरह चमका और फिर आकाश में मंडल-जैसा (मंडलाकार) हो गया।

इस भाग में बस इतना ही। बाकि रामायण फिर कभी।

Thursday, January 25, 2024

राम, रामकथा और राम लला

ॐ गणेशाय नमः
मैं मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के विषय में कुछ चर्चा करने की हिम्मत कर रहा हूँ और श्री गणेश को इस लिए साक्षी मान रहा हूँ क्योकि वे ऋषि व्यास रचित महाभारत और गीता को सही सही लिपिबद्ध कर पाए। मुझसे कुछ गलती हो जाय तो क्षमा मांगता हूँ।



राम का अर्थ
कहीं पढ़ा था राम तीन अक्षरों से बना है र आ म । र का मतलब है रसातल , आ यानि आकाश म का मतलब है मृत्यु लोक यानि राम में तीनो लोक समाया है। क्योंकि वे त्रिलोकीनाथ है।
अभी अभी राम लला अपने नए भवन में विराजमान हुए है और ख़ुश हू़ कि भारत के अलावा भी 40 देशो में खुशियां मनाई गयी। कुछ समाचार के हेडलाइंस यूँ दिखे :
MEXICO GETS ITS FIRST RAM MANDIR. ...
MAURITIUS ORGANISED A BIG CAR RALLY. ...
SAN FRANCISCO'S TESLA MUSIC SHOW. ...
CALIFORNIANS WAVING SAFFRON FLAGS. ...
Taiwan organises 'Keertan-Bhajan' ...
KENYA ORGANISE RALLY.
Times Square New York Echo with Jai Shri Ram

मन में प्रश्न उठता है क्या है श्री राम ? उत्तर खुद ही सूझ जाता है : राम एक लोक आस्था है। जन मानस में रचा बसा। कई आधुनिक धर्म से भी प्राचीन आस्था। यह कोई संयोग नहीं है कि हमारे रोज कि बोलचाल कि भाषा में राम शब्द का प्रयोग बहुत प्रचलित है कुछ उदाहरण देता हूँ :
राम राम जी - अभिवादन अन्य अभिवादन जैसे राधे राधे या जय श्री कृष्ण
हे राम : जब भी मुश्किल में हो (महात्मा गाँधी के भी अंतिम शब्द )
राम राम : राम राम कर हम पहुँच ही गए
छी छी राम राम : कोई गन्दी वास्तु देख कर
हाय राम : शर्म लज्जा
राम नाम सत्य है : मृत्यु होने पर
अवश्य आपके पास भी कुछ और उदहारण होंगे।

इतना ही काफी नहीं भारत में करीब १२०० शहर ऐसे है जिनके नाम में राम आता है। निष्कर्ष यह है राम हमारे जीवन में रचा बसा है जैसे वह आत्मा हो हमारे समाज का। एक रामगढ़ तो मेरे शहर से सिर्फ ४० कि० मि० पर ही है।



राम के नाम से मेरा और मेरी अंजू दीदी का परिचय बहुत छोटी उम्र में हो गया था। १९५३ में यानि जब मै तीन वर्ष का था। हमलोग तब अपने ननिहाल बेगूसराय (बिहार) में रहते थे और हमारे मौसेरे भाई बहनों के साथ थे कुल १४ बच्चे । कुछ अवश्य बड़े थे और मेट्रिक या ISc में पढ़ते थे। शाम को सिर्फ ३ लालटेन जलाए जाते थे एक रसोई में बाबाजी के पास एक नाना के पास और एक के आस पास हम सभी भाई बहन। पढ़ाने को एक मास्टर साहब आते थे जिनकी छड़ी कुछ भाई बहनो को अवश्य बड़े होने तक याद रह गई होगी। उनके आने पर ही तीसरी लालटेन जलाई जाती बाहर बरामदे में जहां एक बड़ी दरी बिछाई जाती। हमारी स्व मसेरी बहन डा पुष्पा प्रसाद का एक वीडियो मैं एक बार FB पर डाल चूका हूँ की कैसे तब मास्टर साहेब को परेशान करते थे उनके छात्र और इस काम में हमारे छोटे चाचा जी भी शामिल रहते । मास्टर जी के चले जाने के बाद हममे सबसे बड़ी शांति दीदी रामायण का पाठ शुरू करती । सस्वर पाठ होता। हम दोनों (मैं और अंजू दीदी) को सिर्फ मंगल भवन वाला याद रहता। यह मेरा राम और रामायण से पहला साक्षात्कार था। फिर जब जमुई आ गए हमारी छोटी बहन मुकुल के जन्म के बाद तो दादू से सुनाने को मिला "राम नाम की लूट है लूट सके तो लूट अंत काल पछतायेगा प्राण जब जायेंगे छूट "।

प्रभु से बड़ा प्रभु का नाम

जहाँ अन्य धर्मों में भगवान के दूत , पुत्र या गुरु पूजे या याद किये जाते है हिन्दू धर्म इश्वर के धरती पर जन्म लेने को मानता है और उसे अवतार कहा जाता है । दशावतार में से नौ का धरती पर जन्म हो चुका है । माना जाता है और सिर्फ एक अवतार कल्कि की प्रतीक्षा है। राम विष्णु के सातवें अवतार माने जाते है जिनका जन्म त्रेता युग में हुआ माना जाता है। वे एक सूर्य वंशी राजकुमार थे। इनके वंश में ही गंगा तो धरती पर लाने को विवश करने वाले भगीरथ और सत्यवादी राजा हरिचन्द्र भी हुए । राम एक मर्यादा पुरुषोत्तम अवतार थे। इन्होने मर्यादा का साथ कभी न छोड़ा। गुरु की आज्ञा पर उपद्रवी (यज्ञों का नाश करने वाला ) राक्षसों का वध किया , गुरु आज्ञा पर शिव धनुष तोड़ सीता से विवाह किया , पिता की आज्ञा पर राजगद्दी त्याग चौदह वर्ष की वनवास पर चले गए और एक साधारण मनुष्य के जैसे पत्नी के वियोग में जगह जगह भटके। पत्नी को खोजने में उन्होंने किसी देवता, राजा महाराजा की मदद नहीं ली। मदद ली सुग्रीव की जो खुद सताया हुआ था और बालि से छिपता फिर रहा था। देवत्व सिर्फ तब जाहिर होता है जब समुद्र के पार श्री लंका तक जाने के लिए पर पुल बनाना पड़ा। उसके नाम लिखते ही पत्थर समद्र में तैरने लग गए। जब श्री राम ने ऐसा देखा तो उन्होंने भी एक पत्थर समुद्र में छोड़ दिया और वो डूब गया। राम ने इधर उधर देखा की किसीने देखा तो नहीं, लेकिन हनुमान देख रहे थे। उन्होंने कहा प्रभु आपने जिसे छोड़ दिया वो तो डूबेगा ही। पर राम लिखते ही वे पत्थर भी तैरने लगे । इसने उस कथन को जन्म दिया "प्रभु से बड़ा प्रभु का नाम" ।

रामायण के कई रूप

सुना ही होगा

हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता।
कहहि सुनहि बहु बिधि सब संता ।।

लेकिन प्रभु राम की कथा लिखी किसने। इस संसार में रामायण के 300 से भी अधिक प्रकार है। शायद पहली राम कथा हनुमान ने लिखी फिर महर्षि वाल्मीकि ने और कलमबद्ध देवर्षि नारद ने किया। महर्षि वाल्मीकि राम के समकक्ष थे और उनकी कथा प्रमाणिक मानी जाती है और अन्य सभी रामायण या रामकथा कुछ अंतर को छोड़ इसी रामायण पर आधारित है। मैंने एक बार इस रामायण के अनुवाद के कुछ अंशों को पढ़ा भी था। थोड़ा लय में नहीं पढ़ पाया। २४००० श्लोको वाला यह काव्य सात कांड में बटा हुआ है क्योंकि इसमें उत्तर कांड नहीं है।

रामायण का इतिहास

वाल्मीकि की रामकथा सिर्फ उनके लिखे रामायण तक सीमित नही रही। महर्षि व्यास रचित महाभारत में भी 'रामोपाख्यान' के रूप में आरण्यकपर्व में यह कथा वर्णित हुई है। पवनपुत्र भीम और हनुमान जी वन पर्व में मिलते है और उनका संवाद भी इसी पर्व में है। इसके अतिरिक्त 'द्रोण पर्व' तथा 'शांतिपर्व' में रामकथा के सन्दर्भ उपलब्ध हैं। महाभारत के बाद बौद्ध और जैन परम्पराओं में भी राम कथा का वर्णन मिलता है। परमार राजा भोज ने चम्पू रामायण लिखी थी। जो ११ वीं शताब्दी में लिखी गयी।
रामायण कई भारतीय और विदेशी भाषाओँ में लिखी गई। विकिपीडिया के अनुसार हिन्दी में कम से कम 11, मराठी में 8, बाङ्ला में 25, तमिल में 12, तेलुगु में 12 तथा उड़िया में 6 रामायणें मिलती हैं। हिंदी में लिखित गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरित मानस ने उत्तर भारत में विशेष स्थान पाया। इसके अतिरिक्त भी संस्कृत,गुजराती, मलयालम, कन्नड, असमिया, उर्दू, अरबी, फारसी आदि भाषाओं में राम कथा लिखी गयी। थाईलैंड में एक जगह है अयूथया जिसे वे अयोध्या ही मानते है और यहां के रामायण का नाम है रामकियेन। कम्बोडिया के रामायण का नाम है रामकर , जावा, इंडोनेशिया में तो चार रामायण है सेरतराम, सैरीराम, रामकेलिंग, पातानी रामकथा। नेपाल में भानुभक्त कृत रामायण है।

आईये इसे एक टेबल के रूप में देखें
देश देश का रामायण

नेपाल भानुभक्तकृत रामायण, सुन्दरानन्द रामायण, आदर्श राघव
कंबोडियारामकर
तिब्बततिब्बती रामायण
पूर्वी तुर्किस्तानखोतानी रामायण
इंडोनेशिया ककबिनरामायण
जावासेरतराम, सैरीराम, रामकेलिंग, पातानी रामकथा
इण्डोचायनारामकेर्ति (रामकीर्ति), खमैर रामायण
बर्मा (म्यांम्मार)यूतोकी रामयागन
थाईलैंड रामकियेन

भारतीय भाषाओँ में रामायण

कम से कम 2,000 वर्षों से, भारत और श्रीलंका में रामायण के विभिन्न संस्करण बताए गए है और मध्य और दक्षिण पूर्व एशिया में 1,000 से अधिक वर्षों से; और अब पश्चिम में भी तेजी से बढ़ रहा है और कई विदेशी भाषाओ में अनुवाद हुआ है या लिखे गए हैं। वाल्मीकि कृत रामायण के बाद संस्कृत भाषा में कई रामायण लिखे गए। अध्यात्म रामयण जो संभवतः ऋषि व्यास द्वारा लिखा गया तुलसी दास लिखित रामचरित मानस का आधार माना जाता है। संस्कृत भाषा में कई रामायण लिखे गए और भावविभूति कृत उत्तर राम चरित्र में ही राम के राज्याभिषेक के बाद कि कहानी मिलती है यानि वाल्मीकि के आश्रम में राम और सीता के जुड़वे पुत्रों का जन्म और राम का अश्वमेघ यज्ञ। राजा भोज लिखित चम्पू नारायण के बाद १२ वीं शताब्दी में लिखी गयी तमिल भाषा कि रामायण कम्ब रामायण। गूगल के अनुसार अन्य संस्करणों में कृतिवासी रामायण शामिल है, जो 15वीं शताब्दी में कृतिबास ओझा द्वारा लिखित एक बंगाली संस्करण है; 15वीं सदी के कवि सरला दास द्वारा विलंका रामायण और 16वीं सदी के कवि बलराम दास द्वारा जगमोहन रामायण (जिसे दांडी रामायण भी कहा जाता है), दोनों उड़िया में; 16वीं सदी के कवि नरहरि द्वारा कन्नड़ में तोरवे रामायण; अध्यात्मरामायणम, 16वीं शताब्दी में थुंचत्थु रामानुजन एज़ुथाचन द्वारा लिखित एक मलयालम संस्करण; 18वीं शताब्दी में श्रीधर द्वारा मराठी में; 19वीं सदी में चंदा झा द्वारा मैथिली में; और 20वीं सदी में, कन्नड़ में राष्ट्रकवि कुवेम्पु की श्री रामायण दर्शनम और तेलुगु में विश्वनाथ सत्यनारायण की श्रीमद्रामयण कल्पवृक्षमु, जिन्हें इस काम के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला। झारखण्ड में रामायण का एक संस्करण फादर कामिल बुल्के ने लिखा है जिसका नाम है रामकथा उत्पत्ति और विकास। उनके अनुसार रामकथा अंतर्राष्ट्रीय कथा है जो वियतनाम से लेकर इंडोनेशिया तक फैली है ।

रामायण कि बात हो और तुलसी दास कृत राम चरित मानस के बारे में चर्चा न करूँ ? उत्तर भारत में यह सबसे लोकप्रिय रामायण है। एक तो यह लोकभाषा में लिखा ग्रन्थ है दूसरा यह मीटर में लिखा ग्रन्थ है और सभी चौपईया सुर में गाई जा सकती है। अक्सर इसके सुन्दरकाण्ड का पाठ लोग घर में रखते है खास कर हनुमान जी की भक्ति में। मैं यह दावा नहीं करता कि पूरे ग्रन्थ को कभी पढ़ा है पर यह बहुत सुर में गाया जा सकता है यह मुझे पता है। राम पर भजन तो बचपन में बहुत बार गाया था हमारे नज़दीक के शिव मंदिर में। मंदिर तो शिव जी का था पर भजन राम का ही गाते थे हम लोग।

अब मैं राम के नाम वाले कहावतें लिखता हूँ । आपको कोई याद आ रहा है तो बताये।

  • मुंह में राम बगल में छूरी
  • राम नाम जपना पराया माल अपना
  • जिसका राम धनी उसको कौन कमी
  • आया राम गया राम
  • दुविधा में दोनों गए माया मिली न राम
  • राम मिलाय जोड़ी एक अँधा और एक कोढ़ी
  • राम जी कि माया कहीं धूप कहीं छाया

कुछ विशेषण भी राम या रामायण से हमारे बोलचाल में आ गई है। जैसे
राम जैसा राजा
भरत सा भाई
लखन सा देवर
राम लखन सी जोड़ी
हनुमान सा भक्त
रावण सा ज्ञानी
और अंत में घर का भेदी लंका ढ़ाहे

राम के विषय में कितना भी लिखा पढ़ा जा सकता है लेकिन मेरा सीमित राम ज्ञान से अभी बस इतना ही।