Saturday, April 29, 2023

चाय को चाय ही रहने दो पार्ट -२

अपने पुराना ब्लॉग "चाय को चाय ही रहने दो" पार्ट-१ में मैंने चाय बनाने की रेसिपी दी है पर आज मैं कबूल करता हूं चाय की कोई रेसीपी नहीं होती।‌‌ या तो क्लास होता है या अहसास होता है। मेरी बात अटपटी लगती हो तो मैं एक दो कहानियां सुनना चाहता हूँ .

IISCO GUEST HOUSE
IISCO बर्नपुर - आसनसोल स्तिथ एक सरकारी कंपनी है . पर यह तब की कहानी है जब यह एक पहले एक प्राइवेट ब्रिटिश ग्रुप मार्टिन बर्न का हिस्सा थी जिसका २००६ में इसका विलय SAIL में हो गया. तब मुझे एक तकनिकी पेपर IISCO में प्रस्तुत करना था . ३ लोगों की एक टीम हमारे सरकारी कंपनी द्वारा वह भेजा गया था . मुझे अपने कंपनी के गेस्ट हाउस में रूम शेयर करने की आदत थी और जब हम तीनो को अलग अलग रूम में रखा गया तो मुझे सुखद आश्चर्य हुआ . रात अधिक हो गई थी हम लोग तुरंत सो गए . जब सुबह सुबह दरवाजे पर नॉक करने की आवाज़ आई तो मैंने उठ कर दरवाज़ा खोला शायद कमरा साफ़ करनेवाला होगा, लेकिन मेरे सामने सफेद ड्रेस में पगड़ी के साथ खड़ा था एक खानसामा एक हाथ में अखबार दूसरे में एक ट्रे . Good Morning Sir , Your Bed Tea . बना दूँ ? दूध ? चीनी कितने चम्मच ? खलिश दार्जीलिंग टी की महक और यह अंदाज़ .उसके ट्रे में थी बोन चाइना के कप और केतली . दूध , चीनी के पात्र और चम्मच चाँदी के थे . अभिजात्य वर्ग का चाय पीने का यह है रेसिपी . हर तरफ सिर्फ क्लास ! खैर जब जब अगली बार IISCO गया हमें ये मेहमान नवाज़ी नहीं मिली . वही मिली जो एक आम भारतीय IISCO अफसर को मिलती थी .

टी टेस्टर चाय फैक्ट्री श्री लंका
हमारी पहली टी फैक्ट्री भ्रमण १९७८ में नील गिरी पहाड़ो में बसी कूनूर में हुआ और हमने देखा कैसे चाय बनती है . फिर २००९ में हमलोग श्री लंका गए और एक टी फैक्ट्री गए यह चाय बनते देखा. देखा कैसे उनकी ग्रेडिंग होती है और चाय भी पी. टी टेस्टिंग के बारे में भी जानकारी मिली . फिर एक यु ट्युब वीडियो में देखा कैसे चाय टी टेस्टर अलग अलग चाय जैसे सफ़ेद (जी हाँ सफ़ेद), पीले , गोल्डन, लाल और काली चाय को टेस्ट करते हैं . सभी चाय में से एक छोटी घूँट मुंह में लेते है थोड़ी देर रखते है , स्वाद , महक का अनुभव करते है और फिर थूक देते है . क्या अंदाज क्या स्वैग. पता चला हम जो रोज रोज चाय पीते है वह सबसे सस्ती वाली या उससे जस्ट एक ग्रेड ऊपर वाली है . सबसे बढ़िया चाय तो सभी विदेशो में चले जाते है . तो यह है रेसिपी क्लास का . मुन्नार (२०१३) में टाटा टी के चाय बगान देखे पर टी फैक्ट्री फिर से देखने के लिए कोई राजी नहीं था, आस पास खूबसूरती बिखेरती प्रकृति में ज्यादा आनन्ददायक था।

अब आता हूँ अहसास पर।
यह गज़ब की रेसिपी है और जो इसमें स्वाद है वो कही नहीं है . आप ने सुना होगा माँ के हाथ का खाना . क्या सबकी की माँ मास्टर शेफ जीत कर आयी है ? तो क्यों वो सबसे यहाँ तक की पत्नियों से भी स्वादिष्ट खाना बना लेती है . यह है अहसास उसके प्यार और परवाह का . उनके खिलाने के अंदाज़ का है . खाते आप हो महसूस वह करती है . आपके चेहरे के सुकून से उसे पता चल जाता है खाना कैसा बना . "खाना कैसा बना ?" ऐसा वह कभी नहीं पूछती . उसे तारीफ नहीं चाहिए .



चाय पीने का अहसास - हमारा अंदाज़ रेसिपी
चाय रिलैक्स करने का एक गजब का साधन है थके हो और दोस्तों ने कहा चलो चाय पीते है, किसी चाय की टपड़ी पर चाय पी ली और बस सब थकान गायब . एक बार मेरी पत्नी ने ठीक कहा था खुद से चाय बना कर पिया तो क्या मज़ा चाय पीने का मज़ा तो तब है जब कोई चाय बना कर पिलाये . सच में कोई भी रेसिपी भी हो मज़ा तब ही आता है. ऐसे हमारी रेसिपी में चाय, दूध , चीनी का कोई भी अनुपात हो बस अहसास मिला हो उसमे .
गजब का स्वाद है . जब मैंने बनाया तो मुझे स्वादिष्ट तो नहीं लगा पर पत्नी जी के मुंह से हमेशा निकला "वाह". जब उन्होंने बनाया तो ? तो क्या वह तो स्वादिष्ट बनती ही है . पर ख़राब चाय यदा कदा कहीं न कहीं पीने को मिल ही जाती है और हम अकेले में कह उठते हैं कैसी रद्दी चाय थी एकदम BM ! BM हमारा कोड वर्ड है - बकरी का मूत . जैसे किसी ने यह पेय भी पिया हो. खैर ज्यादातर हम कह उठाते है एकदम ट्रैन वाली चाय . यानि चाय में सिर्फ पानी और चीनी ही है लेकिन ट्रैन और स्टेशन पर मिलने वाली चाय भी कभी कभी आश्चर्यजनक रूप से स्वादिष्ट होती है .आगे पढ़िए ट्रैन में मिलने वाले "सबसे ख़राब चाय " या "रामप्यारी चाय" - मेरा अगला ब्लॉग !

Friday, April 28, 2023

इंडियन आइडल - म्यूजिकल रियलिटी शो

कई बातें मन में घुमड़ रही है। किस पर आज लिखू यही सोच सोच कर कुछ भी नहीं लिख पाया हूँ। चलिए एक बेजान चीज़ के बारे में बताऊँ। मेरे घर में एक डिनर टेबल हैं पर हम सिर्फ लंच ही करते हैं उस पर नाश्ता और डिनर तो टीवी के सामने ही खाते हैं हम लोग । इसे तो लंच टेबल कहना चाहिए। चलो लिखना तो शुरू किया। पाया हूँ।



इंटरनेट फोटो आभार सहित

अब आगे मैं शायद सोनी टीवी पर हाल में संपन्न हुए इंडियन आइडल के बारे में सोच रहा था। और मैं उसी के बारे में अपने विचार इस ब्लॉग में प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह एक म्यूजिक रियलिटी शो है एक So called competetion! ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि आज तक हुए १३ इंडियन आइडल में सिर्फ २ बार किसी लड़की ने फाइनल जीता है जिसमे एक बार जूनियर आइडल मे। ऐसा नहीं है लड़किया नहीं आती है। इसबार आधे से ज्यादा लड़किया थी कम्पटीशन में। जरुरत से ज्यादा सहानुभूति पाने वाले दृश्य इस प्रोग्राम के असली मकसद से इसे भटका देती है। उसके बाद आती है जनता के वोट वाला ड्रामा। लोग वोट करते है। मैंने भी पिछले दो तीन इंडियन आइडल में किया है और मैं हमेशा सारे वोट सिर्फ एक कॉम्पिटिटर को ही दिए थे। जाहिर है यह वोट पक्षपात पूर्ण होते है राज्य, भाषा , जाति, धर्म सभी का वोट पर असर पड़ता है लेकिन सबसे ज्यादा राज्यों का। अर्थात जिस राज्य से ज्यादा प्रतिभागी होंगे उनके वोट बट जायेंगे। बंगाल से ही संगीत के सबसे ज्यादा प्रतिभागी आते है और प्रतिभा शाली होने पर भी वे फाइनल्स से आगे नहीं जा पाते जैसे नीलांजना रे, अरुणिता कांजीलाल, देबस्मिता रे। (साफ कर दूं मैं बंगाली नहीं हूँ।) ऐसे जो जीते हैं वे भी कम प्रतिभाशाली नहीं है और बधाई के पात्र है। मैं सा रे गा मा पा और राइजिंग स्टार को ज्यादा निष्पक्ष और वैज्ञानिक मनाता हूँ। दूसरा कारण जो मुझे परेशान करता है वह है सभी रियलिटी शो सिर्फ फ़िल्मी गानों को प्राथमिकता देती है । दूसरे तरह के गाने गानेवालों को Not versetile कह कर पहले ही निकल देते है। हमारे शास्त्रीय या सुगम संगीत को तो पूरी तरह दर किनार कर देते है। ऐसे टेटेन्टेड कलाकार जिसने अपनी ही पद्धति में गया वे जल्दी ही बाहर हो जाते है जैसे अनुष्का पात्रा जो महिला और पुरुष दोनों की आवाज़ में गा सकती है या डूडल क्वीन शन्मुख प्रिया।

एक बात जो मुझे अच्छी नहीं लगी की पिछले दो सीजन से इस म्यूजिकल शो किन्ही दो लोगों को कपल की तरह प्रस्तुत करने की कोशिश की गई । शायद कई माँ बाप इस कारण भविष्य में अपने बच्चों को ऐसे प्रोग्राम में जाने ही नहीं दे। ये प्रतिभाशाली गायक गायिका फिल्मों में जाने के लिए ऐसे प्रतियोगिता में भाग लेते है। पर कितने इस में सफल होते है ? कई जो थोड़ा भी आगे न जा सके जैसे नेहा कक्कड़ जीतने वालों से कहीं ज्यादा सफल हुई। लेकिन संगीत के कार्यक्रमों में फाइनलिस्ट होने का फायदा जरूर मिल जाता है। म्यूजिक वीडियो में भी यह भाग्य आजमा लेते है पर कुछ ही साल में ये सितारे टिमटिमाते ही रह जाते है।

Thursday, March 30, 2023

केरल टूर 2013 भाग-1 #(यात्रा)

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जैसा मेरे साथ होता रहा है कहीं घूम आने को जब जब मेरी इच्छा हुई है कोई न कोई बहाना हमें मिल ही गया है और यदि प्लान पहले से बना कर रखा तो पंगा भी हो गया है। 2013 में हम अपने युरोप के 5 देश घूमने के प्लान को postpone कर रहे थे ताकि इसे ऑफिसियल पेरिस ट्रिप के साथ Club कर सके। पर हमारा tourist Visa खत्म होने को आया पर ऑफिसियल ट्रिप का दिन ही तय नही हुआ और हम फ्रांस के बिना 5 देश घूम आए। इसके बाद मैं तीन बार पेरिस ऑफिसियल ट्रिप पर अकेले हो आया था। लगभग हर महिने मे एक टूर। श्रीमती जी बोर हो चुकीं थी और उन्होंने मांग की "चलो कही घूम आते हैं" । जो वाजिब था। हम कुछ प्लान करते उसके पहले ही मेरे छोटे बहनोई कमलेश जी का फोन आया "भैया मुन्नार घूमने चलना है? दिव्या के सिंगापुर की दोस्त सरण्या की शादी गुरूवायूर में है और आप लोग भी आमंत्रित है।" अन्धे के हाथ मानो बटेर लग गई। लेकिन एक समस्या थी। मेरे साले अनिल जी के अमेरिका में रहने वाले सुपुत्र आशीष के शादी की reception पार्टी इस महीने (जुलाई) में ही थी। मै प्लान करने में जुट गया। दोनो आयोजनों के बीच 10 दिनों को gap था और केरल से ही काठमाण्डू चले जाने से समस्या हल हो जाती थी।श्रीमती जी ने कहा थोड़ा सामान जरूर बढ़ जाएगा पर मैनेज कर लेगे। हमनेे निर्णय ले कर कमलेश जी को हामी भर दी। काठमाण्डू शादी के रिसेप्सन पार्टी में जाने से पहले गुरूवायूर, मुन्नार और कोची की 7-8 दिन की यात्रा सम्भव थी । मेरी छोटी बहन दीपा, कमलेश जी, भांजी दिव्या, भांजा अनिमेष और हम दोनो। यानि 6 लोगों का Ideal size वाला ग्रुप बन गया। एकदम एक SUV के लायक। हम टूर के लिए तैयार थे। टूर पैकेज बुक कर कमलेश जी ने बताया कब चेन्नैई पहुंचना है और हम राँची से उसी अनुसार रवाना हो गए। लीजिये टूर पर लेट से ही सही ब्लॉग हाज़िर हैं। कुछ वीडियो यूट्यूब पर डाला हैं उसके लिंक दे रक्खी है ज़रूर देखें।






यात्रा का रुट

गुरवायूर : हम लोग चेन्नई से एलेप्पी Express से केरल के एक मंदिर वाले शहर (Temple town) गुरवायूर के लिए चले और सुबह त्रिसूर पहुचें। दूसरे ट्रेन से हम लोग ९ बजे तक गुरवायूर पहुंच गए। रास्ते में पड़ने वाले दृश्य बहुत मनोरम थे। थोड़ा प्रतिक्षा और एक एक कप कॉफी के बाद हमारे साथ इस टूर में पूरे समय साथ रहने वाली टैक्सी (SUV) आ गई और हमें टूर पैकेज में Included हॉटल नंदनम ले गई। यह एक आरामदायक होटल था। इसके रेस्टोरेंट में पानी में आयुर्वेदिक दवा (Rosewood bark powder) डाल कर लाल रंग का शरबत नुमा गुनगुना पानी ही पीने को देते। पूछने पर पता चला यह सर्दी और अन्य रोगो से बचाता है। केरल में हर जगह ऐसा ही पानी पीने को मिला। हम नाश्ता करके 11 बजे तक शादी में जाने को तैयार हो गए। जैसा मैने पहले बताया कि ऐसे तो हम तो घुमक्कड़ी करने निकले थे पर बहाना था भांजी दिव्या की सहपाठी सारण्या का विवाह । दक्षिण भारतीय विवाह मैंने दो बार पहले देखा था इसमें और उत्तर भारतीयों के शादी के कस्टम एक जैसे ही है। वहाँ दूल्हा कमर के चारों ओर बंधी पतली किनारे वाली एक सफेद सूती या रेशम की धोती पहनता है। वह इसे साथ एक रेशमी दुपट्टा और एक पगड़ी भी पहनता हैं। दुल्हन कांच की चूड़ियाँ, सोने के हार और मांग टीका के साथ एक रंगीन नवारी साड़ी पहनती है। यहाँ भी हल्दी कूटने लगाने का रिवाज़ हैं उसे कहते हैं Pendlikoothuru. काशी यात्रा, मंडप पूजा, वर पूजा, जयमाला, सप्तपदी, धारेधेरु (कन्यादान), विदाई और गृह प्रवेश, के बाद देव कार्य यानी नज़दीक के मदिरों में जा कर भगवान का आशिर्बाद भी लेते है। 'ओखली' में वर वधु और उनके परिवारों के बीच मजेदार खेल खिलवाया जाता है। ये सभी आप उत्तर भारतीय विवाह में भी देख सकते है। सारा समय नाद स्वरम बजता है।सारण्या की शादी का आयोजन करीब 3 कि०मी० दूर सोपनम होटल में था और शादी के बाद गुरुवायूर कृष्णा मंदिर में भी आयोजन था। होटल सोपनम एक अच्छा होटल था। एक छोटे से हाल में सारा कार्यक्रम था। होटल में हाथियों के झुंड और कथकली नर्तक की सुन्दर मूर्तियाँ बनी हैं। रात का खाना डाइनिंग हाल में था। कई व्यंजनों वाला ज़ायके़दार खाना।हमने शादी बहुत एन्जॉय किया। नाद स्वरम अच्छा लगा। यह बहुत तेज आवाज़ वाला शुभ वाद्य हैं। पुरोहित ने नए युगल को कई मजेदार खेल भी खिलवाये। रात का खाना सोपनम में खाने के बाद हम अपने होटल वापस आ गए।




गुरवायुर में विवाह समारोह होटल नन्दनम में

गुरूवायूर का बहुत धार्मिक महत्व है । पैराणिक कथाओं में कहा गया है कि जब द्वारका नगर नष्ट हो रहा था भगवान कृष्ण ने दो साधुओं को द्वारका में अपने मंदिर से मूर्ति ले जा कर केरल में स्थापित करने को कहा । भगवान कृष्ण की मूर्ति वायु देव और ब्रहस्पति द्वारा लाई गई थी और उन्हें गुरुवायुर में रखा गया था। "गुरुवायूर" नाम उनके दोनों नामों ("गुरु" ब्रहस्पति और "वायु" देव) का एक विलय है। इस मंदिर में करवाया विवाह बहुत शुभ माना जाता है और काफ़ी लोग इस कार्य के लिए यहाँ आते हैं। दूसरे दिन मंदिर दर्शन के बाद मुन्नार के लिए रवाना होने का प्रोग्राम था। पता चला काफ़ी मजेदार रास्ता है। रास्ते में कई फॉल पड़ने वाले थे। मंदिर में कैमरा और मोबाइल ले जाना मना है इससे हम मंदिर का फोटो नहीं ले पाए। मंदिर की हाथीशाला भी समयाभाव के कारण जा नहीं पाए। 59 हाथी अभी भी इस मंदिर के पास है। अगले दिन मंदिर में जाने केलिए हमे धोती-सिर्फ़ धोती पहननी थी। महिलाएँ को साड़ी ब्लाउज पहन कर ही दर्शण करना था कोई और परिधान मान्य नहीं था । हम लोग धोती में Bare chest अधनंगे होटल से ही तैयार हो कर दर्शन के लिए मंदिर गए । दर्शन में करीब एक घंटा लग गया। कमलेश जी अनिमेेेेष आपकी ऐसी तस्वीर का उपयोग करने के लिए मुझे क्षमा करें।मन्दिर से वापस आने पर हमने सबसे पहले कपड़े पहने। समय बचाने के लिए नाश्ता रूम में ही मंगा लिया। हमने जल्दी जल्दी अपने सामान पैक किया और आगे की यात्रा के लिए निकल पड़े।



गुरुवायुर मंदिर में हम लोग - गुरुवायुर में हमारा लॉज़

मुन्नार भारत के केरल राज्य में पश्चिमी घाट पर्वत श्रृंखला में स्थित एक शहर है एक अनजाना Hill Station। यह ब्रिटिश राज के अभिजात वर्ग के लिए एक हिल स्टेशन और रिसॉर्ट था। 19 वीं शताब्दी के अंत में स्थापित चाय बागानों के साथ ऊंची पहाड़ियों से घिरा हुआ है यह। एराविकुलम नेशनल पार्क, लुप्तप्राय Mountain Goat नीलगिरी तहर का निवास स्थान, लक्कम और अन्य झरने, लंबी पैदल यात्रा के Trails और 2,695 मीटर ऊंची अनमुदी चोटी (हिमालय के दक्षिण मैं स्थित सबसे ऊंची) का क्षेत्र है यह। मुन्नार लोग ज्यादातर कोची से ही जाते है और गुरूवायूर हो कर कम ही टुरिस्ट जाते है। खैर हम लोग अपने प्रोग्राम के अनुसार गुरूवायूर से मुन्नार की यात्रा पर निकल पड़े। करीब 1 या 2 घन्टे चलने के बाद ईदुक्की जिले में एक बोर्ड पर लिखा दिखा Way to Athirapally falls, Niagra of India. हमारा कौतुहल बढ़ गया। हमे थोड़ा अपने रास्ते से हट कर जाना था ड्राईवर ने कहा 2 घन्टे लग जाएंगे। पर हम सभी जोश से भरे थे और हमने उस निर्देश पट्ट से करीब 30 कि०मी० दूर पड़ने वाले इदुक्की नदी के इस फॉल के लिए गाड़ी मोड़ दी।



अथिरापल्ली फाल्स, इड्डुक्की , केरल

जब हम ऐथिरापल्ली झरने के पास पहुँचे तो पता ही नहीं चला फॉल किधर है। टिकट भी लेना पड़ा था अतः फॉल तो अवश्य होगा। हम रास्ता ढ़ूढने लगे । जंगल ही जंगल था हमने एक हिरण को भी देखा। एक कैंटीन दिखा तो सबने काफ़ी और बिस्किट लिया । झरने की तेज आवाज़ आ रही थी। तब एक बोर्ड पर लिखा दिखा फॉल तक जाने का रास्ता (way to falls) और हमने पाया की सीढ़ियों से नीचे जाना था। मैंने जाने का निश्चय किया और हम दोने नीचे फॉल के लिए चल पड़े। मेरे बहनोई कमलेश जी और भांजा अनिमेष भी साथ हो लिए। कुछ सीढ़ियों के बाद सीढ़ियाँ गायब हो गई Sloping पगडंडी से जाना था । मुझे आगे जाना खतरे से खाली नहीं दिखा और मै वापस मुड़ गया। पर पत्नीजी चल पड़ी नीचे। मुझे भी उनके साथ जाना पड़ा। नीचे पहुँचने पर जो दृश्य दिखा वह मोहित करने वाला आश्चर्य जनक था। एकदम मिनी निआग्रा फॉल। धुन्ध था और पानी के छीटें हमें भिंगोने लगे । हम सब फोटो वीडियो शूट करने में जूट गए। यह फॉल हमेशा ऐसा नहीं रहता है। यह जुलाई था और वर्षा ठीक ठाक हो रही थी और फॉल में काफ़ी पानी था। नहीं जाते तो अफ़सोस रह जाता।
ऐथिरापल्ली से हम मुन्नार के लिए चल पड़े। रास्ते में पड़ने वाले हरे भरे पहाड़ और बहुत सारे छोटे बड़े फॉल दिखने लगे कुछ दूर थे और कुछ रोड के नज़दीक। रास्ता काफ़ी लम्बा और घुमावदार था । फिर भी लुभावने दृश्यों ने सबको जगाए रखा । मुन्नार शाम तक पहुँचे । होम स्टे (Woodpecker होलीडे होम) को ढ़ूढते फोटो खींचते हम पहुँच ही गए अपने अज्ञात वास में। मोबाइल नेटवर्क यहाँ तक नहीं पहुँच रहा था और हम बिना व्यवधान के होम स्टे का मजा ले सकते थे। होम स्टे मनोरम जगह पर था और हमारे कॉटेज बहुत आरामदायक थे। होम स्टे मुख्या सड़क से काफी नीचे था। गाड़ी भी थोड़ी दूर ही पार्क करना पड़ा और कुछ १५-२० सीढिया उतर कर ही हम अपने कॉटेज तक पहुँच सकते थे। होम स्टे दो भागों में था पहला भाग तीन तल्लो का था। इसमें ऑफिस, कमरे रसोई और डाइनिंग रूम थे। दूसरा भाग एक तल्ला था और इसमें कॉटेज थे। हमने तीन कॉटेज ले रखे थे गीज़र थे जो गैस से चलते थे, देख कर शांति मिली की ठण्ढे पानी से नहाना धोना नहीं करना पड़ेगा। काटेज के सामने और पीछे पार्क सा बना था जिसमें खुले में बैठने का मंच बना था। ऊपर बालकनी थी जहाँ खुले में बैठ कर चाय पी सकते थे और सामने के चाय बागानो, पहाड़ो को देख सकते थे। सामने के एक जलाशय और उसमे शिकार करने वाले तैरने वाले पक्षी भी दिखते थे। जलाशय तक पगडण्डी बनी थी और हम एक दो बार वह गए भी। गाने वाली छोटी चिड़ियाँ जिसे whistling thrush कहते है को देखना और फोटो लेना टेड़ी खीर थी। आवाज़ देने पर यह हु बहु नक़ल कर सुना देती जो दूर से ही सुनाई पड़ जाती थी। हमनेे मोबाइल पर वीडियो बनाया पर उसमे भी काफी गौर करने पर ही इसे देख सके। मेढ़क भी गा कर वर्षा के आगमन का स्वागत कर रहे थे। होम स्टे के मैनेजर ने बताया कि मेढ़क की एक प्रजाति भारतीय वैज्ञानिको ने इसी जगह खोज निकली थी। होम स्टे में सिर्फ़ हमारा ग्रुप ही था और हम अपने पसंद का खाना बनवा लेते। सच में मज़ा आया। चूँकि हमने एक पैकेज ले रखा था तो जगह-जगह ट्रांसपोर्ट, होटल खोजने की ज़रूरत नहीं थी।



मुन्नार में हमारा होमस्टे और नज़दीक का एक और होम स्टे का बोर्ड

हम दो रात और तीन दिन रुके और घूमने वाली सभी जगह गए। Echo पॉइंट में कोई Echo न आई पर अच्छी वाली भुनी मुंगफली मिल गई। एराविकुलम नेशनल पार्क भी गए जहाँ Rare नीलगिरि ताहर मिलते है। नेशनल पार्क की बस से ही यहाँ तक जा सकते थे। यहाँ हम लोग काफ़ी ऊपर तक गए पर इस दुर्लभ प्राणी को नहीं देख पाए। दक्षिण भारत के सबसे ऊँची चोटी अनिमुदी भी देख आए। टी गार्डन तो हर तरफ़ थे। टाटा टी के बगान दिख जाते थे। एक टी फैक्ट्री में भी गए पर बारिश जोरों की होने लगी और हम देख नहीं पाए।




ईरवकुलाम नेशनल पार्क (मालाबार ताहिर का घर),पुल पर से एक दृश्य , चाय बागान

कल्लारु पट्टू (Kalaripayattu, Indian Martial Art) का एक प्रोग्राम भी देखने गए। जब दर्शकों के बीच से एक बच्ची को बुलाया को हमारी सांसे अटक गई। क्या इससे ये खतरनाक स्टन्ट करवाएगें? लेकिन बच्ची ने वो सब कर लिया जो उससे करवाया गया। मेरा भांजा अनिमेष ने भी कुछ करतब दिखाया।बहुत रोमांचक और कलेजा मुंह में आ जाय वैसी कलाबाजी या युद्ध कौशल देखने को मिला। कलारी एक पुरातन युद्ध कौशल है और कम से कम 3BC का है। मान्यता है यह कौशल परशुराम ने शिव से सीखा था।
बोटैनिकल गार्डन में कई नए तरह के फूल देखे और हर्बल गार्डन में कई प्रकार के मसाले जड़ी बुटियों के पौधे, पेड़ देखने को मिला। इलायची, लौन्ग, काली मिर्च, स्टार, सुपारी के पेड़ पौधे इन हर्बल गार्डन में मिल जाती है और प्राकृतिक अवस्था में मिलती हैं-बिना किसी रासायनिक प्रक्रिया के. इन मसालों की खुशबू, स्वाद बाज़ार में मिलने वाले मसलों से अलग ही होता है। बांस का चावल भी इन्हीं हर्बल गार्डन में मिलता है। कहते है कोलेस्ट्रोल कम करता है और जोड़ो के दर्द में बहुत फायदेमंद है।
कुछ खरीदारी भी की। मुन्नार चाय के लिए मशहूर है। आप अलग-अलग तरह के मसालों, चाय के साथ यहां घर पर बनी यानी होममेड चॉकलेट भी अपने साथ ले जा सकते हैं। इनके अलावा, जड़ी बूटियां, आयुर्वेदिक दवायें, सुगन्धित तेल, रंगे हुए पारम्परिक केरल के कपड़े की भी यहाँ से ले सकते हैं



कलारिपट्टू और मुन्नार बाजार

एक जगह हम गए जहाँ से सीढियाँ उतर कर आप केरल से तमिलनाडु जा सकते है। पता चला यह जगह शराब की तस्करी के लिए प्रसिद्द हैं । मैंने तो 800-900 सीढ़ियो हो कर जाना है वह भी मिटटी काट कर बनाई सीढ़ियों देख कर सुन कर ही जाने से मना कर दिया। पर मेरी श्रीमती थोड़ा एडवेंचर पसंद करती हैं वह चल पड़ी अकेले। मैं उनको अकेले कैसे छोड़ सकता था। बारिश कभी हो सकती हैं फिर सीढिया फिसलन भरी हो जाती। रेलिंग के नाम पर एक पतली रस्सी बाँध रखी थी (मानों गिरने पर उसे पकड़ कर बच सकते हैं!) वह पतली रस्सी भी 150-200 सीढिया उतरते-उतरते ख़त्म हो गयी। खैर करीब 500 सीढिया उतरने के बाद भी जब तमिलनाडु का कोई गाँव तक न दिखा तो हम लौट आये। बारिश भी तब तक शुरू हो गयी थी।



एक झरना और एक आयुर्वेदिक गार्डन

तमिलनाडु तक जाने वाली सीढियाँ और ईको पॉइंट

मुन्नार से हम तीसरे दिन कोच्चि (कोचीन) के लिए चल पड़े। कोचीन यानि कोच्चि की कथा अगले ब्लॉग में

Wednesday, March 29, 2023

अजंता की गुफाएं, पत्थर पर उकेरा एक कैनवास (#यात्रा)

अजंता: एक विश्व धरोहर स्थल

भारत के गुफा समूह


भारत में गुफाओं के कई समूह हैं, जो ज्यादातर बौद्ध मठों और चैत्यों के रूप में उपयोग किए जाते थे। मुझे ऐसे कम से कम 5 गुफा समूह जैसे अजंता, एलोरा, कन्हेरी (महाराष्ट्र में सभी 3), खंडगिरी और उदयगिरि (उड़ीसा में) की यात्रा  करने का अवसर मिला है।अक्सर बौद्ध गुफाएं चैत्य (ध्यान / अर्चना स्थल) या विहार (निवास) में बटीं रहती है। इस आलेख में हर गुफा का प्रकार देने की कोशिश की गई है।



अजंता के लिए मेरा जुनून


मैं पहली बार 1969 में एक छात्र के रूप में अजंता गया था तब हम जलगांव में रुके थे। मेरे पास फ्लैश के बिना एक एग्फा क्लिक 3 कैमरा था और मैंने शायद केवल एक तस्वीर ली - अजंता का एक ओवरऑल व्यू।मुझे लगता है कि हम तब गुफा संख्या 16 से आगे नहीं बढ़े थे। हालांकि, मैं 1997 में फिर से गया जब हम दोनों अपनी बेटी के साथ भुसावल के रास्ते उसे इंदौर छोड़ने गए थे। तब हमें भुसावल में रात में रुकने की जरूरत पड़ी थी। मैंने ग्रुप को अजंता की यात्रा का सुझाव दिया, जिसे मेरी पत्नी और बेटी ने कृपा पूर्वक स्वीकार कर लिया। मेरे पास उस यात्रा की लगभग मात्रा 8 तस्वीरें हैं। बाद में 2002 में एक बार मैं ऑफिस ट्रिप पर औरंगाबाद गया था और फिर से गुफाओं का दौरा करने से खुद को रोक नहीं पाया। 2012 में नासिक और शिरडी परिवार के साथ यात्रा पर गया तब, हमने औरंगाबाद, दौलताबाद, एलोरा और अजंता की यात्रा की भी योजना बनाई। मैं अपनी पत्नी के साथ हाल ही में इस यात्रा की  तस्वीरों को फिर से देख रहा था और फिर महसूस किया कि गाइड ने पेंटिंग और मूर्तियों के बारे में जो कहानियां सुनाई थीं, वे हम दोनों के सामूहिक स्मृति से लगभग गायब हो गई थीं। अब मैं उनमें से कुछ को याद करने की कोशिश कर रहा हूं।



मेरा कॉलेज ट्रिप 1969

1997 में की गई हमारी यात्रा1997 की यात्रा में देखी गई गुफाओं में से एक

कैसे पहुंचे ?

सड़क मार्ग से। औरंगाबाद अजंता की गुफाओं से केवल 100 किमी और एलोरा की गुफाओं से 30 किमी दूर है। अजंता गुफाओं तक पहुंचने के लिए आप एक स्थानीय टैक्सी किराए पर ले सकते हैं या राज्य द्वारा संचालित बसों से यात्रा कर सकते हैं। ...

अजंता में गुफा देखने के लिए डोली सेवा

रेल /वायु मार्ग द्वारा :- औरंगाबाद रेल, हवाई मार्ग द्वारा मुंबई और पुणे से अच्छी तरह से जुड़ा हुआ है। जलगांव स्टेशन निकटतम रेलवे स्टेशन है। अजंता में विकलांग या बुजुर्गों के लिए डोली सेवा उपलब्ध है।


अजंता की गुफाओं की सरंचना
गुफा की खोज :

अजंता चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएं लगभग 30 पूजा हॉल या चैत्य मठों या विहारों का समूह हैं, जो घोड़े के नाल (Horse shoe) के आकार की खाई के किनारे स्थापित हैं। गुफाओं का निर्माण दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से 480 ईस्वी के बीच किया गया था। 1983 से यह एक विश्व धरोहर स्थल है। गुफाओं की खोज 1819 में ब्रिटिश बॉम्बे प्रेसीडेंसी अधिकारी जॉन स्मिथ द्वारा संयोग से की गई थी, जिन्होंने शिकार अभियान के दौरान गुफा नंबर 10 का प्रवेश द्वार देखा था। हालांकि, उन्होंने एक कॉलम पर अपना नाम और तारीख लिखते समय कुछ भित्ति चित्रों को क्षतिग्रस्त कर दिया। चित्रों को संरक्षित करने के कई प्रयास किए गए। चित्रों की पहली प्रति 1844 में रॉबर्ट गिल द्वारा बनाई गई थी, जो 1866 में लंदन में आग में नष्ट हो गई थी। बाद में जॉन ग्रिफिथ्स, जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स, मुंबई में तत्कालीन प्रिंसिपल, और उनके कुछ छात्रों ने गुफाओं में 2 दशक बिताए और 300 चित्र और बनाये । उन्हें लंदन भेजा गया और इसमें से लगभग 100 फिर से नष्ट हो गए । 166 चित्र अभी भी लंदन में हैं और आखिरी बार 1955 में प्रदर्शित किए गए थे। हालांकि इनमें से 21 पेंटिंग अभी भी जेजे स्कूल ऑफ आर्ट्स में उपलब्ध हैं। Art work का एक फोटोग्राफिक सर्वेक्षण भी 1920 में क्षेत्र के तत्कालीन शासक निजाम द्वारा प्रायोजित किया गया था।

गुफाओं का इतिहास और निर्माण का समय :

गुफाओं को अब नम्बर दिए गए है, हालांकि ये नम्बर किसी भी कालानुक्रम के हिसाब से नहीं डाले गए। गुफाओं को 2 चरणों में बनाया गया था। जबकि सातवाहन या मौर्य काल (इतिहासकार इस पर भिन्न  मत रखते हैं) यानी 200 ईसा पूर्व से 100 ईसा पूर्व के बीच पहले चरण में सात गुफाओं का निर्माण किया गया था। ये गुफाएं बुद्ध की किसी भी मूर्ति के बिना है और हिनायन गुफाएं हैं, जो शायद सामुदायिक प्रयासों से बनाई गई हैं। गुफा संख्या 10 शायद यहां बनी सबसे पुरानी गुफा थी, इन गुफाओं में हिनायन दर्शन के आधार पर कम सजावट है। भित्ति चित्र ज्यादातर जातकों पर आधारित होते हैं। गुफा 8 के बारे में इतिहासकारों में मतभेद हैं, और यह माना जाता है कि संभवतः यह दूसरी अवधि की सबसे पुरानी महायान गुफा थी, जिसे बाद में कुछ सोच कर एक चैत्य का रूप दिया गया था, बुद्ध की मूर्ति तब मोनोलिथ पत्थर से नहीं बनाई गई थी, इसलिए ढीली पड़ गई और टूट कर अब गायब हो गयी है।


Cave-9

Cave 10

बाकी गुफाएं महायन बौद्ध धर्म पर आधारित हैं और आमतौर पर इसमें बुद्ध की मूर्तियां और पूजा के लिए एक अलग क्षेत्र या बुद्ध की प्रतिमा के साथ एक गर्भगृह होता है। ये गुफाएं पहले की गुफाओं के दोनों तरफ बनाई गई थीं और इनमें छतों की दीवारें और स्तंभ अच्छी तरह से सजाए गए हैं। दूसरी अवधि की ये गुफाएं 1–7, 11, 14-29 हैं, जो संभवतः पहले की गुफाओं के विस्तार हैं। 450 ईस्वी और 480 ईस्वी के बीच बनी , इन गुफाओं के लिए धन किसी और ने दिए थे । ऐसा माना जाता है कि वाकाका हिंदू राजा हरिसेन या उनके मंत्रियों ने अधिकांश गुफाओं को बनवाया। कुछ गुफाएं जैसे गुफा संख्या 4 को एक अमीर भक्त द्वारा बनवाया गया था। भारतीय स्वर्ण युग यानी गुप्तवंश काल के प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है, लेकिन 450-480 ईस्वी तक आंतरिक मतभेदों और सफेद हूणों के खिलाफ किए गए प्रयासों के कारण, उनका प्रभाव कम हो रहा था ।हून तोर्माना का बेटा मिहिरगुला ही वास्तव में मलावा क्षेत्र का शासक था।

गुफा नम्बर 1


भित्ति चित्रों से प्रेरित कपड़े के डिजाइन





गुफा नंबर -1 बन कर पूरी होने वाली अंतिम गुफा हो सकती है। इसमें अच्छी तरह से संरक्षित चित्र हैं। जिसमें प्रसिद्ध बोधिसत्व पद्म पाणि भी शामिल हैं। इन चित्रों के माध्यम से कई कहानियों को दर्शाया गया है। इस गुफा के चित्र आज भी कपड़े के डिजाइन को प्रेरित करते है ।


Cave 26

Cave-7

Cave 19

Cave-19


Cave-19- Entrance


Cave-26

Sleeping Buddha- Cave 26



Typical Vihar Layout (Later caves)

गुफा-2 गुफा-1 के समान है। इसकी दीवार चित्र संरक्षण की बेहतर स्थिति में हैं।
गुफा -3 को छोड़ दिया गया।
गुफा -4- मथुरा नाम के एक अमीर भक्त द्वारा प्रायोजित
गुफा -5- परित्यक्त
गुफा-6 डबल स्टोरी विहार जिसमें गर्भगृह और दोनों स्तरों में हॉल है।
गुफा -7 में दो बरामदा के साथ एक भव्य अग्रभाग (Facade) है
गुफा -8 एक अस्थिर खनिज परत की खोज के कारण एक और अधूरा विहार छोड़ दिया गया। आधुनिक समय में लगभग नदी के स्तर पर इस गुफा का उपयोग स्टोर और जनरेटर रूम के रूप में किया जाता है।
गुफा-9 हिनियन काल चैत्य।
गुफा -10 हिनियन काल चैत्य.
गुफा -11- 5 वीं शताब्दी विहार
गुफा -12 हिनियन काल विहार 200 ईसा पूर्व से 100 सीई
गुफा -13 हिनियन काल विहार 200 ईसा पूर्व से 100 सीई
गुफा -14- एक और अधूरा विहार है
गुफा -15- एक अधिक पूर्ण विहार है, इसमें चित्र थे, 15 ए सबसे छोटी हिनियन काल की गुफा है
गुफा -16- हरिसेना के मंत्री वराहदेव द्वारा प्रायोजित (धन इत्यादि से) विहार। इसमें बुद्ध का जीवन रेखाचित्र है।
गुफा -17 इसमें सभी गुफाओं के कुछ सबसे अच्छी तरह से संरक्षित और प्रसिद्ध चित्र हैं।
गुफा-18 छोटी गुफा, इसका उद्देश्य ज्ञात नहीं है।
गुफा -19 पांचवीं शताब्दी ईस्वी का एक महायन चैत्य गृह है, जिसमें बुद्ध की खड़ी मुर्ति हैं।
गुफा-20 पांचवीं शताब्दी का विहार।
गुफा -21-से 25: सभी पांचवीं शताब्दी के विहार हैं







गुफा -26 पांचवीं शताब्दी चैत्य गुफा 19 से बड़ी है, जिसमें पूजा हॉल में बैठे बुद्ध की मुर्तिकार के साथ विहार डिजाइन है। इस गुफा में शयन मुद्रा बुद्ध की मूर्ति भी है।
गुफा -27- इसके दो स्तर क्षतिग्रस्त हैं, ऊपरी स्तर आंशिक रूप से ढह गया है
गुफा-28 अधूरा विहार
गुफा -29 अधूरा चैत्य - उच्च स्तर पर 20-21 गुफाओं के बीच स्थित है।
गुफा-30- 1956 में एक लैंड स्लाइड ने फुटपाथ को गुफा-16 तक बंद कर दिया। मलबे की निकासी के दौरान गुफा 15 16 के बीच निचले स्तर पर एक और हिनायन काल विहार गुफा की खोज की गई थी। यह अजंता की सबसे पुरानी गुफा हो सकती है

आईये अब आधुनिक काल में लौटें चले !