Thursday, October 15, 2020

मेरी पहली नेपाल #यात्रा भाग- १

नारायण हिटी दरबार गोमा गणेश मन्दिर

MENUब्रह्मपुरी मेरा नन-ससुरल बीरगंज बॉर्डर रास्ते के दृश्यअमलेखगंजसीमभंज्याङ्ग और दमनकाठमांडू पहुंचने के बाद

भारत और नेपाल के बीच हमेशा से रोटी बेटी का नाता रहा है । खास कर तराई क्षेत्र में । सन 1973 की बात हैं। दरभंगा में संपन्न हुई हमारी शादी के बाद  पहली बार ससुराल जाने का अनुभव मेरे लिए कुछ अलग-सा था। अलग इसलिए क्योकि मेरी धर्मपत्नी काठमांडू से हैं। वही जन्मी पली पढ़ी। काठमांडू की मेरी पहली यात्रा उत्सुकता भरा था। मेरी पहली विदेश यात्रा। यूँ तो कई देश घूमा हूँ पर मैं कभी वह पहली नेपाल यात्रा भूल नहीं सकता। बस एक हिन्दी फ़िल्म का गाना याद आता हैं "जग घूमया थारे जैसा न कोई"। पहले भाग में मैं यात्रा का वर्णन करूंगा और दूसरे भाग में काठमांडू में प्रथम प्रवास के अन्य अनुभवों का। मैं, पत्नी और माँ बाबूजी (मेरे स्व सास ससुर जी) और मेरे तीन छोटे साले साहेब साथ चले दरभंगा से।यात्रा का पहला भाग तो कोई रोमांच भरा नहीं था ट्रैन से दरभंगा से रक्सौल जाने में क्या रोमांच? छोटी लाइन-मीटर गेज की ट्रैन भीड़ तो होती ही थी। राम-राम कह सफ़र कटा।

ब्रह्मपुरी मेरा नन-ससुरल

रास्ते में बरगैनिया स्टेशन आया तब मेरी पत्नी ने बताया "यही से ब्रह्मपुरी, गौर (नेपाल का एक जिला) जाते हैं जहाँ मेरा नानिहाल हैं"। मैंने तब सोचा मौका लगा तो जाऊँगा वहां । पर मेरे बच्चे तो हो आये मैं ही नहीं गया कभी ।  करीब सात घंटे में यह सफ़र कटा। बड़ी लाइन और तेज़ ट्रेन अब भी पांच घंटे लेती है। मैं, या सच कहूँ तो हम दोनों उत्साहित थे और बिलकुल नहीं थके थे। औरों का पता नहीं ।मेरी पत्नी शादी के पहले करीब छह महीने से दरभंगे में ही थी, और उन्हें भी घर जाने का उत्साह रहा होगा और वह भी पति के साथ ।



ब्रह्मपुरी का घर आज के दिन में 


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बीरगंज बॉर्डर

खैर अब एक नए देश में प्रवेश करने की उत्सुकता मुझ में थी जो लाख छुपाने की कोशिश के वाबजूद जाहिर हो रहीं थी। रात होने वाली थी। यह निश्चित किया गया कि रक्सौल में नहीं रूकेंगे बोर्डर पार कर सीधा बीरगंज जाएगें । इनके पास शादी के लिए काठमांडू से दरभंगा लेकर गए सामान भी था और सुबह-सुबह बीरगंज से निकलना भी था। खैर दो तांगों मे हम सभी आ गए। हमारे साले साहब किशोर और अनिल ने हमे बोर्डर पर चुप ही रहने की हिदायत दी। सभी नेपाली में ही बात कर रहे हो तो चेक पोस्ट पर ज्यादा आसानी होती। हम चल पड़े एक छोटे मैत्री पुल के इस तरफ भारत और दूसरी ओर नेपाल। भारत के तरफ इमीग्रेशन और कस्टम के चेक पोस्ट पास पास ही थे। बाबूजी (मेरे श्वसुर जी) नेपाली कस्टम में कभी कार्यरत थे। जान पहचान भी होगी। तब नेपाल के बहुत से भूभाग के लिए भारत हो कर ही आना जाना पड़ता था। 'गौर'(नेपाल का एक जिला) से आ रहे है कहने भर से और आने वाले कई प्रश्नों से हम बच गए ऐसे भी सभी नेपाली में बात कर ही रहे थे और मैं चुप था। तब आधार कार्ड पैन कार्ड, वोटर कार्ड वैगेरह होते नहीं थे। चूंकि नेपालियों और भारतियों को बोर्डर पर Visa की जरूरत नहीं थी चेक पोस्ट वाले आपकी नागरिगता जाँच करने के लिए कई प्रश्न पूछते थे। कहा से आ रहे है? कहाँ जाना है? क्यों जा रहे है? वैगेरह । नेपाल में कस्टम में थोड़ा सामान के बारे में पूछ ताछ हुई और नेपाल से ही सामान ईन्डिया ले जाया गया था के स्पष्टीकरण के बाद हम आगे बढ़े। नेपाली में लिखे बोर्ड को मै पढ़ता जा रहा था। एक जगह "सटही काउन्टर" लिखा था। मुझे बताया गया यहाँ करेंसी बदल कर नेपाली रुपया दिया जाता है। और साटना मतलब बदलना न कि चिपकाना। मै दौड़ कर 100 भारतीय रुपये के बदले 165 नेपाली रू० ले आया


मै ईधर उधर देखता जा रहा था। साइन बोर्ड पढ़ता जा रहा था। दो तीन नेपाली शब्द तुरतं सीख लिए जैसे भंसार = कस्टम, साटना= Exchange करना, पसल= दुकान। एक जगह लिखा था "यहाँ कुखुरा को मांसु पाईन्छ"। कुखुरा= मुर्गी, आपने क्या सोचा ?  विदेशी समानों से भरे दुकानों को देखते हुए हम बीरगंज के आदर्श नगर बस स्टैन्ड आ पहुचें। काठमांडु के लिए तब सिर्फ त्रिभुवन राजमार्ग ही था। यह एक कठिन पहाड़ी रास्ता है। जबकी अब त्रिसुली नदी के किनारे किनारे सुगम रास्ता बन गया है पर दूरी के हिसाब से पुराना रास्ता काफी छोटा है। उस समय वीरगंज से काठमांडू के लिए सिर्फ तड़के ही बस चलती थी अंतिम बस सुबह दस बजे तक निकल जाती थी। अब तो रात में ही ज्यादातर बसें चलती है। खैर हम तांगे से सीधे बसस्टैंड तक गए। रास्ते में पड़ने वाले सारे प्रतिस्थानो और दुकानों पर राजा और रानी के चित्र अनिवार्य रूप में लगे थे। भारत में भी लोग देवी देवताओ के अलावे नेहरू गाँधी या अन्य राजनीतिज्ञ के चित्र लगते है पर कोई अनिवार्यता नहीं है। 


विंध्यवासिनी मंदिरबीरगंज


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रास्ते के दृश्य

आदर्शनगर बस स्टैंड को अब ओल्ड बस पार्क कहते है और सुना है वह अब भी गाड़ियों का पार्किंग स्थल है। बस स्टैंड पहुंचने पर टमटम वाले के साथ थोड़ी बहस इस बात को लेकर हुई कि किराया Indian currency में देना है या नेपाली में। बाद में पता चला यह हर बार की बात है। बस स्टैंड के चारो और लॉज और होटल्स थे। जल्द ही लॉज बुक कर लिया गया और बस का टिकट भी खरीद लिया गया। हम लोग फ्रेश हो कर बाबु जी के मित्र लाट अंकल से मिल आए और माई थान मन्दिर के दर्शन कर आए। मैं अपनी नई नवेली दुल्हन को भीड़ भाड़ से बचा रहा था, मेरा यह प्रयत्न मम्मी जी की नजरों से छुपी नहीं रह सकी और उनकी मन्द मुस्कुराहट मुझसे छिप न सकी। वापसी पर नजदीक के एक रेस्टॉरेन्ट में डिनर ले कर सो गए। सुबह जल्दी जागना था। सुबह तड़के जल्दी तैय्यार हो गए क्योंकि सभी समान पुलिस यानि प्रहरी से चेक करा कर सील करवाना था बस में चढ़ाने के पहले। शायद आर्म्स या ड्रग के लिए चेक करते होगें। ऐसा करने से रास्ते में जगह-जगह समान खोल कर चेक करवाने से बच जाते थे। सील न किया सामान हर स्टॉप पर खुलवा कर चेक करते थे। अब ऐसा नहीं होता। खैर कचौड़ी जलेबी का लज़ीज नाश्ता कर हम लोग अपनी सीट पर बैठ गए। पहाड़ी रास्ते के कारण छोटी 35 सीट वाली 2x2 बसें ही चलती थी। बस वाले पैैसेन्जर को समय की बहुत याद दिला रहे थे। देर करने पर बस छूटने की धमकी भी दे रहा था। पर बस करीब एक घन्टे देर से खुली। शहर के अन्दर कई जगह रूक कर लोकल सवारी लेते बस आखिर कर बड़े रास्ते पर आ गई।



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अमलेखगंज

हम एक घंटे में अमलेखगंज पहुंच गए। पता चला पहले रेल गाड़ी यहाँ तक आती थी। गूगल करने पर पता चला की नेपाल सरकार रेलवे (NGR) नेपाल का पहला रेलवे था। 1927 में स्थापित और 1965 में बंद हुआ। 47 किमी लंबी ये रेलवे लाइन नैरो गेज थी और भारत में सीमा पार रक्सौल से अमलेखगंज तक था। आगे जाने पर चुरिया माई  मन्दिर के पास सभी बसें रुक रही थी। पूजा करके ही बसें आगे बढ़ती थी । हमारी बस भी रुकी। पुजा कर खलासी ने सबको प्रसाद बाटें। जब बस आगे बढ़ी तो चुरिया माई का महात्म्य पता चला। अब बस टूटते पहाड़ों (Land Sides prone) के ऋंखला से गुजर रही थी।   अगला स्टॉप हेटौंडा था। यह एक औद्योगिक शहर है। अब यहाँ लम्बे पर सहज रास्ते से यानि महेन्द्र राज मार्ग से नारायणघाट और होकर मुंग्लिंग होते हुए भी काठमांडू जाया जा सकते है। तब ऐसा नहीं था। अगले स्टॉप भैसे ( एक जगह का नाम ) में एक छोटे पुल के पार बस रुकी दिन के खाने के लिए। इसके बाद चढ़ाई वाला रास्ता था, सो डर डर कर ताजी मछली भात खाये। अभी तक पुर्वी राप्ती नदी के किनारे किनारे चले जा रहे थे। रोड पर जगह जगह झरने की तरह स्वच्छ पानी गिर रहा था। नेपाली में इसे धारा कहते है। लोग इसी पानी में बर्तन कपडे धोने नहाने से लेकर पीने पकाने का पानी तक ले रहे थे। पानी ठंडा शीतल था और आँखों को बहुत अच्छा लग रहा था।


भैसे ब्रीज काठमाण्डु की पहली कार, कन्धों पर

ड्राईवर रास्ते में  रंग बिरंगी नेपाली पारम्परिक कपड़ो में बस पर चढ़ने वाली मज़दूर युवतियों में चुहल बाज़ी कर रहा था। पत्नी ने बताया कि पहाड़ो में युवक युवतियो के बीच लोक गीतों में सवाल जवाब की प्रतियोगिता चलती है और कोई बुरा नहीं मानता।


च्यायांगबा होइ च्यायांगबा - नेपाली लोक गीत- क्लिक करे !

हम लोग नये जोड़ो के बीच होने वाले बिन मतलब की बातों में लग गए ।रास्ते के बारे में पत्नी जी बताती जा रहीं थी। उन्होंनें बताया कि पहले तराई से काठमाण्डू घाटी लोग भीमफेदी होकर पैदल ही जाते थे। घाटी में पहली कार भी लोगों के कन्धे पर इसी रास्ते ले जाया गया था। 28 किमी का यह पैदल रास्ता लोग तकरीबन तीन दिनों मे पूरा करते थे। यह सोच कर मुझे घबराहट होने लगी कि यदि हमें भी पैदल जाना पड़ा तो कई बार 3000 फीट से 7000-8000 फीट चढ़ाई उतराई (रास्ते का चित्र देखें)   चढाई करते क्या मै सही सलामत पहुंच भी पाता?


भीमफेदीभीमफेदी होकर पैदल रास्ता

नेपाल का सबसे शानदार और रोमांच से भरा राजमार्ग, त्रिभुवन राजपथ है (आमतौर पर जिसे बायरोड या सिर्फ राजपथ (King's way) कहा जाता है, बीरगंज से काठमांडू घाटी की ओर जाता है । कई हेयरपिन मोड़ो की आश्चर्यजनक श्रृंखला के माध्यम से सीधे महाभारत रेंज होते हुए काठमांडू वैली पहुंचाता है यह रास्ता। यह राजमार्ग रोडोडेंड्रोन या गुराँस (नेपाल का राष्ट्रीय फूल, के जंगल से गुजरता है, काफल के बगीचों से भी गुजरता है । हिमालय के शानदार दृश्यों को अपने में समेटे, खासकर दमन से, यह रास्ता अब कम ही उपयोग में आता है और रास्ते में पड़ने वाले गाँवो को जोड़ने वाले रोड बन कर रह गया है। 1950 के दशक के मध्य में भारतीय इंजीनियरों द्वारा निर्मित, राजपथ काठमांडू को बाहरी दुनिया से जोड़ने वाला पहला राजमार्ग है। शायद भारत ने नेपाल हो कर चीनी आक्रमण के जोखिम को कम करने के लिए इस राजमार्ग को कठिन और असुविधाजनक बनाया होगा। चूंकि तेज मुगलिंग / नारायणगढ़ मार्ग ज्यादा लोकप्रिय है, इसलिए इस सड़क से यात्रा अब एक एडवेंचर यात्रा के रूप में बदल गई है, जो इसे माउंटेन बाइकिंग या मोटर साइकिलिंग के लिए एकदम सही बनाता है।


भैसे के बाद चढ़ाई शुरू हो गयी । कई हेयरपिन मोड़ आये। एक जगह गाड़ी आगे जाने के बजाय पीछे भी खिसकने लगी थी जब ड्राइवर ने गियर ब्रेक का सही सही उपयोग कर गाड़ी आगे चलाई।



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सीमभंज्याङ्ग और दमन

सीमभंज्याङ्ग या शिवभंज्यांगदमन से एवेरेस्ट का दृश्य

जल्द ही हम सीमभंज्याङ्ग या शिवभंज्यांग पहुँच गये। सीमभंज्याङ्ग २४८८ मी (८१६० फ़ीट) पर स्थित है और यहाँ  अच्छी ठण्ड लगने लगी। पता चला यहाँ स्नो फॉल भी होता है ।यहाँ से 10-12 कीoमिo बाद हम लोग दमन पहुँच गए जहाँ से एवेरेस्ट का सुन्दर दृश्य मिलता है। टूरिस्ट एवरेस्ट दर्शन के लिए ही यहाँ अब भी आते है। बादल से आकाश ढ़का था। हम तो कुछ देख नहीं पाए पर रुक कर चाय पिए और कुछ स्नैक्स भी खाए। पता चला नेपाली में पीना शब्द प्रयोग में नहीं है,  सभी चीज़े सिर्फ़ खाते है। चुरुट यानी सिगरेट भी खाते है। पानी भी खाते है और चाऊमीन भी खाते है। बिलकुल बंगालियों,की तरह। थोड़ी देर रूक कर बस चल पड़ी। अब उतराइ थी और हम पालूंग घाटी (5700 फ़ीट) पहुँच गए। थोड़ी चहल पहल थी यहाँ। कुछ सवारी भी यहाँ चढ़ी। पहाड़ो का प्रसिद्ध फल जिसे काफल (Bayberry) कहते है और एक चिड़िया जो "काफल पाक्यो" जैसा कुछ बोलता है इस घाटी की विशेषता है। खेत सीढ़ी दार थे। यहाँ से बस खुलने पर फिर चढ़ाई आ गयी और हम तक़रीबन एक घंटे में टीसटुंग देयुराली (६६६० फ़ीट) पहुँच गए। एक छोटा सा क़स्बा था। हर स्टॉप पर सिपाही (प्रहरी) लोग बस पर चढ़ते सील्ड सामान को खलासी की सहायता से चेक करते। हाथ के समान को भी चेक कर रहे थे।


काफल, Bayberry काफल पाक्यो, Cuculus micropterus

अब तक एक जैसे दृश्यों को देख देख कर मैं ऊब सा गया था, और उघंने लगा। थोड़ी देर में शायद झपकी आ गयी। नींद खुली तो तो हम नौबिसे (३१०० फ़ीट) पहुंच रहे थे। आधे से ज्यादा लोग सो या उंघ रहे थे। शाम हो गयी थी। इस घाटी में अँधेरा भी जल्दी ही होता होगा। हम रोड किनारे के झरना या धारा में हाथ मुंह धो कर एक खाने पीने के दुकान में बैठ गए। सभी जरूरत के सामान थे और लेडीज टॉयलेट्स भी था दुकान में। गरमा गरम चावल दाल सब्जी, मीट बना कर दुकानदार ने सभी को खिलाया। शायद दुकनदार से पुरानी पहचान होगी वह हम लोग की विशेष सेवा में लगा था। स्किन सहित मीट पहली बार खा कर करीब ३०-४० मिनट रुकने के बाद हम चल पड़े। पता चला की अब करीब ३० की मी की रास्ता और बचा है । अँधेरे में कई घुमावदार मोड़ आये। जब सामने से ट्रक आते तो वह रुक कर बस को पास दे देता। पहाड़ी रास्ते का यह नॉर्म हर जगह follow किया जाता है। चढ़ने वाली गाड़ी को पास देते है लोग। दूर से ही आने जाने वाली गाड़ियों की लाईट मोड़ पर घूमती दिख जाती है। करीब १२०० फीट की चढ़ाई और बची थी। करीब एक डेढ़ घंटे में हम थानकोट चेक पोस्ट पहुँच गए।




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काठमांडू पहुँचने के बाद

यहाँ सामानो के सील खोल दिए गए और फाइनल चेकिंग हुई।  बहुत सारी बसें चेकिंग के लिए रुकी थी। थोड़ा समय लग गया। असह्य हो चुकि प्रतीक्षा के बाद बस चल पड़ी। कालीमाटी में सामान (सब्जी) उतार कर बस शहर के रास्तो पर चल पड़ी। रास्ते में पड़ने वाले जगहों की जानकारी लगातार मिल रही थी। यह जी पी औ है, बाबुजी का ख़ाम (लिफाफ) बदलने वाला किस्सा भी हो गया जिसमे नेपाली साटना और हिंदी साटना का कन्फ़ुइजान हुआ था। बाबुजी लिफाफ साटने (चिपकाने) के लिए गोंद मांग रहे थे और पोस्ट आफिस वाला सोच रहा था कि पता लिखा लिफाफ लौटाने(नेपाली में साटना) आए है। रत्न पार्क बस अड्डे पर बस रुकी। हम लोग दो टैक्सी ले कर घर (गैरीधारा) के लिए चल पड़े। टैक्सी वाला टूरिस्ट समझ कर ज्यादा पैसा मांग रहा था। सभी को खाँटी नेपाली में बात करते देख सही भाड़े लेने को तैय्यार हो गया। जपानी टोयटा गाड़ी पहली बार देखा और वह भी टैक्सी में चलते हुए। रास्ते में नारायण हिटी दरबार (पुराना राजमहल) और नागपोखरी हो कर हम गैरीधारा पहुचे। नागपोखरी से राजमहल के किनारे किनारे अब एक रोड है, तब नहीं था। पता चला गहरे गढ्ढ़े मे धारा होने के कारण मुहल्ले का नाम गैरीधारा पड़ गया। तब धारा में पानी भी आता था। अब तो प्राय: सूख ही गया है।


हम लोग रात होने बाद घर पहुचें । पहली बार मुझे एक पारंपरिक नेपाली घर को नजदीक से देखने का मौका मिला। घर में दो भाग थे। एक भाग में नाना जी (बुवा) नानू, बड़े मामा, बड़ी मामी, छोटी मामी और मेरे ममेरे छोटे, छोटे साले-सालियाँ रहते थे। कई लोग मेरी शादी में नहीं आ पाए थे। अत: सभी से मिलने और प्रणाम पाती रात में ही करने गए। बड़ी और छोटी मामी बहुत सुन्दर और ग्रेसफुल लगी। बाद में जब मेरे बच्चे हुए तो छोटी मामी को गुड़िया नानी बुलाने लगे। मकान बड़ा सा और तीन तल्लों का था। सबसे नीचे का तल्ला (Ground floor) या झिरी स्टोरेज भूसा वैगरह रखने और गाय बांधने के लिए था। बाथ रूम और नल भी नीचे के तल्ले पर था। पहला, दूसरा तल्ला रहने के लिए था ।

शायद ठण्ड से बचने के लिए ग्राउंड फ्लोर पर बेड रूम नहीं रखते होंगे। सबसे ऊपर attick या नेपाली में ब्यूंगल में रसोई था। एक छोटा कमरा रसोई के सामने था जो मेरे साले साहब बिमल (अब डॉ बिमल) का था। प्रथम तल्ले पर बड़े कमरे में माँ, बाबूजी रहते थे। इसमें धुप अच्छी आती थी और छुट्टी के दिनो में बाबूजी इसी कमरे से ऑफिस का काम भी निपटा लेते थे। ऐसे बाबूजी और मामा जी का ऑफिस वर्मा सिन्हा लॉ कनसर्न नई सड़क के पास था। एक बारदली के पीछे हम लोग का कमरा था। माँ बाबुजी और ३ साले भाइयों के सिवा परिवार में दो और लोग थे। बूढी माई और 'भालू' हमारा कुत्ता। जल्दी ही वह हमें पहचान गया। शायद लोगों का विशेष ध्यान मेरे ऊपर देख वह समझ गया था की मैं इस घर का विशेष सदस्य हूँ।लज़ीज  खाना खा कर हम थोड़ी देर गप्पे मार कर सो गए।


हमारा पारम्परिक नेपाली घर
हमारा पारम्परिक नेपाली घर
नया घर ८०'s में बना

ठण्ड इतनी थी कि जून के महिने में रजाई ओढ़ कर सोये।  मच्छर दानी भी लगाया गया। ज़मीन पर गलीचा बिछा था और छत पर चांदनी लगी थी। बाद में पता लगा फर्श मिटटी की होती है और हर हफ्ते उसे गोबर मिटटी से नीपना पड़ता था. फिर गलीचा और दरी बिछाते है. ड्राइंग रूम में सोफे की जगह पर चारपाटी या ऊंचा गद्दा रखते थे और गलीचे पर झक झक उजाला चादर या जाजीम बिछाया जाता। सब कुछ राजसी लगता। अब तो सब बदल गया है कम ही पारम्परिक घर काठमांडू में होंगे। सारे घर पक्के सीमेंट के बनने लगे और आधुनिक फरनीचर से सजने लगे है।
काठमांडू में अपने बाल सखा और बाल सखियों, यानि मेरे छोटे साले और सालियों के संग बिताये वो दिन बहुत सारी यादगार और मजेदार घटनाओं से भरे पड़े है. मैं उसे दूसरे भाग में लिखने वाला हूँ ! तब तक के लिए bye...

Wednesday, October 7, 2020

बबा जी मामू

कभी कभी खून से गाढ़े रिश्ते भी होते है। हमने यह बाबा जी क रूप में चरितार्थ होते देखा है। हम सबों से मामा भांजा का रिश्ता उन्होंने क्या गजब निभाया। मै तो भीड़ भाड़ में उनके कंधे पर भी बैठा। पापा के साथ साला बहनोई वाली नोक झोंक भी देखी।
मेरे नाना बाबू पुरेन्दर प्रसाद बेगुसराय के प्रमुख वकीलों में थे और उनकी लम्बी चौड़ी जमिन्दारी भी थी। उनके नाम से एक बार-लाइब्रेरी अभी भी जीर्ण अवस्था में कचहरी में मौजूद है। सभी तरह का अनाज, खाने का तेल, आम के दिनों,में आम खेत से आ जाता। शायद ही खाने पीने का कोई सामान दुकान से खरीदना पड़ता। रोज ताजी सब्जियाँ या मछली तो खेत से आ नहीं सकती पीछे बारी में कुछ सब्जियां जैसे कद्दू, ननुआ, भिण्डी, मिर्ची, मूली, गोभी, बैगन, टमाटर उपजा लिया जाता। एक नींबु का पेड़ भी था कुएं के पास। मुझे कुदरूम की याद है जिसकी चटनी बना करती थी। एक पीले (कनैल) फूल का भी पेड़ था जिसका समोसे जैसा फल मैने खा लिया था। जबरदस्ती पानी पिला पिला कर उलटियां करवाई थी लोंगों ने क्योंकि यह जहरीला होता है। मछली सब्जी वाली रोज हमारे आंगन के चक्कर लगा जाती। गाय भी घर पर ही थी, घोड़ा, टमटम, घोड़ेवान भी बाहर के कम्पाऊन्ड में ही थे। हाँ घर पर आलु चॉप या दुकान में बने नमकीन और मिठाई हमारे बड़े मौसेरे भाई बहन जरूर नाना के किरायेदार दुकान वाले से छिप कर मंगा लेते थे। मुझे भी वह आलु चॉप बहुत पसंद था। बबाजी नाना के विश्वस्तों में से थे।
नाना को मैने वृद्ध ही देखा था । उनका व्यक्तित्व आकर्षक था। लम्बा, गोरा रौबदार। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के चेयरमैन रह चुके थे। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का ही अस्पताल भी था और अस्पताल की नर्स दीदी नाना को सुई लगाने घर ही आ जाती। नाना को सुगर की बीमारी थी। नाना की दो शादियाँ थी, या शायद तीन। पहली नानी के बारे में हाल में ही पता चला । मेरी मौसेरी बहन पुष्पा दीदी ने बताया की पहली नानी की कोई निशानी नाना के पास थी जिसे वो अकेले में कभी कभी निकाल कर देखते थे। मेरी अन्य दो नानियों में से बड़ी नानी से बड़ी मौसी जिन्हें हम सभी प्यार से मैय्या कहते थे, और भागलपुर वाली मझली मौसी थी। नानी की मृत्यु के बाद, नाना ने फिर शादी की और छोटी नानी से हुई मेरी माँ। मेरे कोई मामा न थे ।
माँ के छोटे मामा स्व मुनेश्वरबाबू माँ के छोटी मामी
बबाजी या धनुषधारी सिंह रामदिरी के गरीब भुमिहार ब्राह्मण थे। वे कब हमारे परिवार का हिस्सा बने मुझे मालूम नहीं। जबसे होश संभाला उन्हें देखा। यूं तो वे घर में खाना बनाते थे पर घर के किसी सदस्य से न तो उनका रुतबा कम था न हीं उनका स्नेह। हमारे वे ही मामा थे। मेरी माँ को वे किसा (कृष्णा) कहते और बाकी मौसियों को दीदी। कुछ गलत करने पर हमें उनकी डाँट भी सुननी पड़ती। भंसा में हल्ला गुल्ला करने पर उनकी झिड़की "कलमच बैठ" हमें अब भी याद है। नाना की सेवा में वे लगे रहते। खाना देना। दूध देना, दवा देना। उन्हें सभी याद रहता। खाना हम लोग भंसा में जमीन पर पीढ़े पर बैठ कर खाते। रोटियाँ मोटी मीठी मुलायम बनती। हम कुल 18 में से 15 मौसेरे भाई बहन उस समय थे। मेरे तीन और छोटे भाई बहनों का जन्म तब नहीं हुआ था। सबसे छोटी तब मुकुल थी जिसका पहला नाम अस्पाताल में जन्म लेने के कारण अस्पतलनिया पड़ गया था।इतने बड़े कुनबे का खाना बनाने के लिए बाबा जी ने कभी ना नुकुर नहीं की, इसके उलट उन्हें ज्यादा लोंगों का चहल पहल ज्यादा पसंद था। सब लोग बच्चो,सहित काम में हाथ बटा देते, मै तो आँटे की छोटी लोई ले कर साँप या गाय, कुत्ता बनाता रहता । सब्जी काटना, रोटी बेल देना मिल जुल कर हो जाता। बाबाजी हाथ पर ठोक कर  मकई की मोटी रोटी बहुत अच्छी बनाते। फिर वैसी रोटी मैने कभी नहीं खाई। ओल के खट्टे भरता के साथ वह अलौकिक लगता था । नेनुआ के सब्जी मूली से साथ बनता था जो मुझे बहुत पसंद था
एक वक्त वह भी आया जब हम सभी अपने ठौर ठिकाने पर चले गए, पटना, भागलपुर या जमुई। सबसे बड़ी मौसेरी बहन शान्ति दीदी वहीं स्कूल में टीचर थी। बड़े मौसा के गुजर जाने के बाद, अपने बलबूते पर पढ़ाई की नौकरी की भाई बहनो की भी जिम्मेवारी उठाई। दीदी ने जब ग्रेजुएशन किया तब उनका तबादला पटना हो गया। नाना बिल्कुल अकेले हो गए। सज्जन भैय्या कभी कभी नाना के पास आ जाते। यह वो वक्त था जब बाबा जी ने एक बेटे की भांति नाना कि सेवा की बबाजी अक्सर हम लोगों को ननिहाल से घर पहुचाते थे। उनका ममत्व हमेशा हम पर रहा। जब ही आते उनके हाथ की खिचड़ी खाने का लोभ हम संवरन नही कर पाते।
सिमरीया घाट बाबा धाम मंदिर
बाबा जी एक समर्पित शिव भक्त थे। देवघर स्थित बाबाधाम ( 12 ज्योतिर्लिंगों में एक), साल में कई बार जाते और सावन में सुल्तानगंज के बजाय सिमरिया से ही जल भर कांवर ले चल पड़ते। तब कांवर के रास्ते न दुकानों से सजते थे न हीं रास्ता के किनारे बालू वैगेरह डाले जाते। सुईयां पहाड़ सच में सुई का ही पहाड़ था। 8-10 दिन का रसद, ओढ़ने बिछाने के सामान, छाता, लाठी साथ में लिए तिरहुतिया कावंर ले कर 50-60 किमी की अतिरिक्त दूरी तय करते। जगह जगह रुक कर खाना पकाना, नहाना करते दुर्गम यात्रा करनी पड़ती थी । कुछ ही लोग यह कर पाते थे।अब तो कांवर यात्रा पिकनिक की तरह सुगम हो गई है। ईडली, दोसा, समोसा खाते गाना गाते भीड़ रेले की तरह लोग कांवर यात्रा कर लेते है। कांवर यात्रा में खान पान में साफ सफाई या गंदे पानी के उपयोग से बाबा जी क्रोनिक डिसेन्ट्री के मरीज हो गए। इस रोग ने ताजन्म उनका साथ न छोड़ा। फिर भी उन्होंने कांवर ले कर जाना नहीं छोड़ा। हर बार बाबाधाम से लौटते समय वहां काा पेड़ा चूड़ा हम लोगों को जमुई दे जाया करते। बबा जी जी ने अपनी कमाई से थोड़ा थोड़ा बचा कर अपने मृत्यु के कुछ महीने पहले एक शिव मन्दिर अपने गांव में बनवाया था। प्राण प्रतिष्ठा में सबको बुलाया था। अफसोस सिर्फ मै हीं जा पाया । काफी मशक्कत के बाद मै पहुंचा। थोड़ी बारिश में दलदल से भर जाने वाले गांव में जहाँ घुड़सवारी लोकप्रिय थी, मुझे रिक्शा से उतर कर पैदल ही जाना पड़ा ।
कावंर रामदीरी गांव
मन्दिर में बाहर का प्लास्टर लगना अभी भी बाकी था। बबाजी अपने जीवन काल में ही शिव मन्दिर का काम समाप्त कर लेना चाहते थे। मेरे स्वागत में बाबाजी के भतीजे लगे थे। खाना पीना आडंबर रहित था। बाबा जी ने शादी नहीं की थी। उनके गाँव जा कर लगा सारी जमीन हम नाकारो को देने के वजाय नाना काश कुछ जमीन अपने इस निर्धन बेटे को दे जाते। उनका बुढ़ापा तो आराम से कट जाता। ऐसे मै मानता हूँ ऐसा बाबा जी ने भी नहीं चाहा होगा। उन्होंने शायद ही कोई उम्मीद रक्खी होगी। उन्हे हमलोग एक परिवार दे पाए और वे इसमें ही खुश थे। बबाजी के देहांत की कोई खबर समय पर नहीं पहुंची। हमें बिना कुछ कष्ट दिए वो चले गए। काश उनके लिए हम लोग कुछ कर पाते। हम बबाजी के ममत्व के हमेशा ऋणी रहेंगे।

Thursday, September 10, 2020

बचपन में घर से मैं भी भागा था

 सुना था जिन्दगी में हर कोई एक न एक बार घर से जरूर भागता है। यह उसके आत्मनिर्भर होने की प्रक्रिया ही है। न न मै कभी भाग कर मुम्बई, कोलकाता वैगेरह नहीं गया बस दो तीन बार कुछ छोटी मोटी दूरी तय की है। पहले पहल मैं प्राइमरी स्कूल जमुई से भाग जाया करता था और बाजार के आस पास समय काट कर घर लौट जाता। मेरे पास गाँधी टोपी नहीं थी और टोपी नहीं होने से कक्षा में पूरे period खड़ा कर देते थे। मैने घर में टोपी की बात नहीं की क्योंकि दो दो बार टोपियाँ सिलवाई गयी थी और मै दोनो बार स्कूल में भूल आया था। इस बार किसीको बताने से बेहतर मैने हलीम मियाँ, जो हमारे पारिवारिक दर्जी थे, के पीछे पड़ना श्रेयस्कर समझा। एक दिन मैं उनके दुकान में बैठ गया और तब तक घर नहीं गया जब तक उन्होंने किसी और के पैजामे के कपड़े से मेरी टोपी सिल कर नहीं दे दी। तब मैं छ साल का रहा हूँगा। स्कूल से इस तरह भाग जाना तो किसीके नज़र नहीं आया पर तकरीबन एक  साल बाद मैं एक बार फिर घर से भगा था । तब एक प्रदर्शनी 'नूमर '  नाम के गांव में लगी थी जिसे हम भाई बहन कुछ दिनों पहले माँ पापा के साथ देख आए थे । 

Kali Mandir at Jamui StationPatneshar Pahar
यह गांव हमारे घर से नौ मील दूर है। खादी और ग्राम उद्योग की प्रदर्शनी और मेला था। मेले के बाद गावं का नाम ही बदल कर खादीग्राम हो गया है। मेरा बाल मन प्रदर्शनी-मेला घूम कर भरा न था। किस बच्चे का मन कठघोरवा (Merry Go round) और तारा मांची (हिंडोला) पर चढ़ने से भरता है भला ? बहुत सारे दूसरे आकर्षण भी थे मेले में । जब दुबारा मेला घूमने की मेरी इच्छा पूरी होती न दिखी तो मैंने अकेले जाने का फैसला कर लिया। शायद उस दिन रविवार था। मैं नश्ता कर के पैदल ही निकल पड़ा। न ही कुछ पैसा वैगरह लिया न ही किसीकी को बताया। रास्ता सीधा था और मुझे याद भी था। पहली बार तो टमटम (एक तरह का एक्का) से गए थे। पर इस बार यह संभव न था। बालपन के ज़िद या मासुमियत में मै पैदल ही चल पड़ा। रविवार था रास्ता भी खाली था। कचहरी चौक जहाँ हमेशा भीड़ लगी रहती भी सुनसान था। मै चलता गया। पापा काफी लोक प्रिय डॉक्टर थे। इस कारण बहुत सारे लोग मुझे भी पहचानते थे। लोगों ने शायद सोचा होगा लड़का रविवार की सुबह खेलने जा रहा है । किसी ने ध्यान नहीं दिया ना ही टोका पर कुछ लोगों ने पहचाना था और नोटिस भी किया ही होगा। खैर मैं चल पड़ा। तीन मील ( 5 km)  से ज्यादा की दूरी बिना कहीं रुके पूरी कर ली।

Government High School, Jamui Estd 1894
कचहरी चौक, जमुई High School - Old Science block and well
मै चलता चला गया और खैरमा गांव पार कर किउल नदी पर बने पूल पर आ गया । तभी एक टमटम मेरे पास आ कर रुका। टमटम वाला मुझे पहचानता था । पापा के दवाई का पार्सल वहीं मल्लेपूर से हमारे घर तक पहुंचाता था। मैंने उससे कहा मुझे खादीग्राम मेला देखने जाना हैं आप ले जाओगे ? उसने कहा " मेलवा तो कै दिन होलो खतम होय गेलो है, अब जाय के कि करभो" यानि प्रदर्शनी मेला तो कब का खतम हो गया है अब जा कर क्या करोगे ? उसने मुझे साथ वापस चलने को कहा। चूंकि अब मेरे आगे जाने का प्रयोजन ही नहीं रहा और उसके साथ न आता तो पैदल ही वापस आना पड़ता यह सब सोच कर मैं टमटम पर चढ़ गया  और वापस घर आ गया। गाड़ीवान घर तक छोड़ गया और सारी बातें मेरे पिता को बता भी दी ।
मैं करीब दो घंटे से गायब था लोग यह सोच रहे थे कि कहीं खेलने गया होगा । पर जब ट्यूशन पढ़ाने वाले मास्टर जी आये तब लोगों ने खोजना शुरु किया। पड़ोस के मेरे सारे दोस्तों के यहाँ, अंजू दीदी (बड़ी दीदी) और लिल्ली दीदी के सहेलियों के घर में, सभी जगह खोजा जा चुका था मै। पिटना तय था। पापा को गुस्सा तो बहुत आ रहा था स्टेथेस्कोप का पाइप हंटर के तरह प्रयोग के लिए निकाला जा चुका था। बचने के लिए मैं पलंग के नीचे घुस गया। तब तक दो चार थप्पड़ लग चुका था। माँ ने बड़ी मुश्किल से बचा लिया। बस थप्पड़ की ही मार पड़ी। 
मास्टर साहेब का ज़िक्र आने से एक बात याद आ रही है। मैं जन्म से लेफ्ट Hander हूँ । शायद खानदानी असर है। मेरे छोटे चाचा (छोटा बाबू) और मेरी पोती भी लेफ्ट Hander है। मुझे पता नहीं होता था कि दाहिना हाथ कौन है और बायां हाथ कौन है। अभी भी दाँए हाथ के एक तिल देख कर पता लगता हूँ किधर दाँया है और  बाँया किधर है । बचपन में लोग चिढ़ाते बाँये हाथ से क्यों खा रहे हो तब मैं दूसरे हाथ से खाने लगता। लोग फिर चिढ़ाते यही तो हैं बाँया हाथ। तब चिढ़कर मैं दोनों हाथों से खाने लगता। मुझे बाएं हाथ से लिखता देख मास्टर जी का पारा चढ़ जाता। एक दिन उन्होंने एक जोरदार चपत लगा कर पूछा तुम्हारा दाँया हाथ कौन है मैंने शायद गलत बताया। एक चपत और लगी। उन्होंने मुझे दक्षिण के तरफ मुंह करके खड़ा कर दिया और पूछा पश्चिम किधर है। मुझे दिशा ज्ञान था क्योंकि घर के कमरों का नाम थे दखिनवारी घर, पछियारी घर, पुरबारी घर इत्यादि। मैंने बता दिया पश्चिम किधर हैं एक चपत लगा कर बताया गया दक्षिण के तरफ खड़े होने पर जो हाथ पश्चिम की तरफ हैं वो ही दाया हाथ हैं। इसी हाथ से ही लिखा करो इसी हाथ से  खाया करो। एक जन्मजात लेफ्ट Hander को उन्होंने जबरन राइट Hander बना डाला।आज भी मैं खाने लिखने के अलावा अन्य काम बाएँ हाथ से ही करता हूँ। लोगों को दिक् लगता हैं । उन्हें लगता हैं कि कुछ उल्टा कर रहा हूँ। अक्सर सारे उपकरण कैची पीलर वैगेरह दाये हाथ की लिए ही बने होते हैं। काश कोई हमलोगों के लिए भी आंदोलन करता।

भागने की दूसरी घटना मुंगेर की है। लेकिन मेरा मानना है मैं नहीं भागा या खोया पर मेरी मंझली फुआ ही खो गयी। हम लोग परिवार सहित एक शादी में मुंगेर लल्लू पोखर पापा के चचेरे भाई उमेश चाचा के यहाँ गए थे उनकी बेटी प्रेमा दीदी की शादी थी। मेरी स्वर्गीय मंझली फुआ भी साथ थी। कोई रिश्तेदार किसी स्कूल के हॉस्टल में वार्डन थे। उनके यहाँ जाने के लिए फुआ तैयार हुई तो मुझे भी साथ ले लिया। कोई और साथ जाने के लिए फ्री नहीं तो छोटा मोटा मर्द ही सही। मैं आठ नौ साल का। हम एक रिक्शा से गए थे। मुंगेर का मेरा यह पहला सफ़र था।
लाल दरबाज़ा, मुंगेरनीलम सिनेमा, मुंगेर
मै पूरे रास्ते देखता गया कि कौन कौन सी दुकान रास्ते में पड़ी और कहाँ क्या है। मुझे रास्ते में नीलम सिनेमा भी दिखा जहाँ से बाएं मुड़े थे। आखिर हम उनके यहाँ पहुचे जहाँ जाना था। मैने स्कूल के गेट से हॉस्टल वार्डन के घर का रास्ता भी देखता आया था। घर में सिर्फ दो अधेड़ औरते थी। बच्चे स्कूल गए होंगे। हमें कुछ मिठाई वैगेरह दे कर तीनो औरते बातों में लग गई। थोड़ी देर आंगन में बैठा थक कर मै क्वार्टर के गार्डन और आस पास घूमने देखने में थोड़ी देर व्यस्त रहा। जब सब देख दाख कर लौटा तो घर में कोई न था। फुआ लोग किसी कमरे में बातों में लग गई थी पर मुझे लगा फुआ लौट गयी, मै साथ आया हूँ भूल गई होंगी। नहीं नहीं मै किंचित नहीं घबराया थोड़ी देर इंतज़ार किया कोई आवाज़ भी नहीं आ रही थी। मै उठा और वापस चल पड़ा। रास्ता मुझे याद ही था। घर पहुंचने पर भीड़ भाड़ में मै मगन हो गया। बाहर जहाँ मिठाई बन रही थी वहाँ की गतिविधियाँ देखने लगा। अनिल भैया (अनिल भूषण प्रसाद, अवकाश प्राप्त IAS) मुझे बुला कर ले गए और मै बाकी बच्चों के साथ खेलने में व्यस्त हो गया। मुझे फुआ की याद तब तक नहीं आयी जब तक रोते बिलखते वो खुद न आ गयी। मुझे वापस आया देख उन्हें कैसा लगा होगा मैने तब सोचा भी न था, आप ही बताएं उन्हें गुस्सा आया होगा या प्यार। आप यह भी बताए मै खोया था या फुआ खोयी थी।
चौथी बार मै जानबूझ कर योजना बना कर घर से गायब हुआ था। 10-11 साल का था। वाकया जमुई का ही है। गर्मी के दिन थे और मॉर्निगं स्कूल चल रहा था। मै तब शास्त्रीय संगीत सीख रहा था। स्कूल के बाद करीब दो बजे से जमुई हाई स्कूल में ही क्लास चलता था। शिक्षक थे बजरंगी बाबू जो स्कूल में ही क्लर्क थे और किरानी बाबू यानि बैजनाथ चाचा जिनका घर हमारे मोहल्ले में ही था। बैजनाथ चाचा के पिता स्व रामजश पान्डे जी UP के बनारस के आसपास से किसी गांव से आ कर जमुई में ही बस गए थे। मोहल्ले में उस परिवार के पास तीन घर थे। एक में किरानी बाबू का परिवार रहता था। हमारे घर के बाद उनके घर में ही सार्वजनिक उपयोग के लिए कुआँ था। शहर में कई लोगों के यहाँ कुआँ घर के बाहर बने थे ताकि दूसरे भी पानी भर सके। मेरे सहपाठी अवनी सिन्हा (मन्टू) के यहाँ भी कुआँ घर के बाहर ही था। किरानी बाबू के घर के साथ लगे क्वार्टर नुमा घर में कमला दी (अंजु दी की सहेली) रहती थी और सामने वाले घर में PWD का आफिस था। अब सामने वाले घर में किरानी बाबू का छोटा बेटा रहता है। बैजनाथ चाचा स्कूल में हेड क्लर्क थे। तबला बहुत ही अच्छा बजाते थे। बजरंगी बाबू सुरीले गायक थे। शास्त्रिय संगीत का भी अच्छा ज्ञान था। शहर में संगीत के प्रोग्राम का अक्सर आयोजन होता और शायद ही कोई आयोजन बिना दोनों की सहभागिता के पूरा होता। मेरे छोटे संगीत सफर में ये दोनों ही मेरे गाइड और गुरू थे। मुझे याद नहीं मैंने संगीत की इस गैर जरूरी कक्षा में क्यों प्रवेश लिया था। पर अब सोचता हूँ तब दो कारण समझ में आता है एक तो यह नि:शुल्क था, दूजे किरानी बाबू ने पापा को यही परामर्श दिया होगा।

हमारा घरमहादेव सिमरिया
मुझे शुरू में-सा रे गा मा गाने में वही परेशानी हुई जो सुनील दत्त साहेब को पड़ोसन में किशोर कुमार से सरगम सीखने में हुई थी। पर शीघ्र ही मैं सुर में गाने लगा था। तबला तो बजाना सीख नहीं रहा था पर ताल के बारे में तो जानना ही पड़ता है। तीन ताल, एक ताल, झपताल, दादरा कहरवा सब कुछ सीखा था। ताली और खाली पर ताली देनी पड़ती थी। खैर! शहर में एक सर्कस आया हुआ था। रोज़ टमटम पर प्रचार कर रहे थे।
बहुत पहले जमुई में जैमिनी सर्कस आया था पंच मंदिर में टेंट लगा था। पूरे परिवार के साथ देखने गए थे फिर सर्कस आया है जान कर सकुचाते हुए एक दो बार घर पर बात चलायी पर लोगों ने बच्चे को इग्नोर कर दिया। मैंने फिर एक प्लान बनाया । टिकट कुल छह आठ आने का ही थे। मैंने माँ से कुछ बहाने बना कर मांगा। जब दो चवन्निया इकठ्ठा हो गयी तब एक दिन दोपहर संगीत कक्षा जाना है बता कर घर से निकल पड़ा।

पंच मंदिर दुर्गा पूजा मेलानेतुला मंदिर, कुमार, जमुई

सर्कस गिरीश टाकीज़ से आगे भछियार-नीमा मार्ग पर लगा था। प्रशिद्ध पथ्थर काली मंदिर से थोड़ा पहले। पैदल पैदल चल कर मैं वह शो के समय (३ बजे) से काफी पहले २- २:१५ तक पहुंच गया। टुटपुँजिया सर्कस था। मरियल सा बाघ भी था जिसे पिंजरे में बाहर ही रखा हुआ था। टिकट खरीदने गया तो पता चला शो के १५ मिनट पहले टिकट कटना शुरू होगा। प्रतीक्षा करने के सिवा कोई चारा ना था। प्लान था की ५ बजे सर्कस ख़तम हो जायेगा तो ६ बजे के पहले घर पहुँच जाऊंगा और किसीको कुछ पता भी नहीं चलेगा। खैर किसी किसी तरह टिकट खिड़की खुलने का समय हो गया। कुल ६-७ ही लोग टिकट खरीदने की प्रतीक्षा कर रहे थे। टिकट खिड़की वाले ने तब कहा ३ बजे का शो कैंसिल हो गया है। ६ बजे का टिकट लेना है तो ले लो। मैंने फिर एक क्रन्तिकारी निर्णय लिया। कुछ भी हो जाये सर्कस देख कर ही जाऊंगा। सबसे ऊँचे क्लास का टिकट था सात आने। ऐसे चवन्नी वाला क्लास भी था। सबसे आगे बैठना है यह सोच कर ७ आने का टिकट खरीद कर प्रतीक्षा करने लगा। प्रतिक्षा करने के वे  अब तक की सबसे लम्बे तीन घंटे थे। करीब 5:30 पर गेट खुला और हम अंदर गए। अब तक काफ़ी लोग आ गए थे। सबसे आगे वाले लाईन में कॉरिडोर के बगल वाले सीट पर मैं बैठ गया। कुछ फ़िल्मी गानाा बजाया जा रहा था। टनटन-पहली घंटी बजी। आशा जगी। जोकर लोग इधर उधर जा-जा कर चीजों को ठीक जगह पर रख कर तैय्यारी करने लगे। दूसरी घंटी भी बजी। राम-राम कर तीसरी घंटी भी बजी। मेरे कान पर कुछ लगा। मैंने सोचा कीड़ा होगा। झटक कर हटाने लगा। फिर लगा कोई मेरे कान पकड़ रहा है। मैं पीछे मुड़ कर कुछ कहने वाला ही था कि छोटा बाबू दिख गए। वे ही मेरा कान पकड़ रहे थे। आगे आप ख़ुद सोचो क्या हुआ होगा। बस मैने मार नहीं खाई। पर किसी ने सर्कस दिखाने की दरियादिली भी नहीं दिखाई। याद नहीं शायद अगली बार सर्कस मैने अपने बच्चो के साथ बोकारो में देखी थी।

Sunday, August 9, 2020

कुआलालम्पुर #यात्रा - दक्षिण अफ्रीका जाते आते (१९९६)

1996 मई की बात है। मेकॉन से चार इंजीनियरों की एक टीम मेरे नेतृत्व में दक्षिण अफ्रीका जा रही थी। वहाँ 4-6 महीने प्रिटोरिया में रुकना था। ग्राहक Balaji Steel के भी दो इंजीनियर और उनके बॉस साथ थे।  अभी अफ्रीका में रंग भेद ख़त्म हुए दो साल से भी काम समय हुआ था हम आशंकित भी थे। सुना था प्रीटोरिया में सिर्फ़ गोरों को ही रुकने दिया जाता है। हमें वहीं जाना था। ISCOR जो अब लक्ष्मी मित्तल का स्टील प्लांट है से एक पूरी तरह बंद वायर रोड मिल dismantle   कर भारत लाना था और उसे ठीक ठाक कर के चलना भी था।
 हमें मलेशियन एयर लाइन्स से चेन्नई से जोहानसबर्ग जाना था और कुआला लम्पुर हो कर जाना था। दोनों तरफ के टिकट था। और लौटना भी कुआला लम्पुर हो कर ही था। हम सभी काफी उत्साहित थे। चेन्नई से कुआला लम्पुर  का सफर चार घंटे का था। उस समय मलेशियन एयर लाइन्स को top का रैंक मिला था। हम लोग भी उनके सर्विस से काफी प्रभावित थे। कुआला लम्पुर का इंटरनेशनल एयरपोर्ट काफी मनमोहक और आधुनिक था। हमे Kualalumpur में एक दिन रुकना था। Kuala Lumpur एयरपोर्ट पर ही  Visa On Arrival लेना था। हमलोग विंडो शॉपिंग करते हुए वीसा ऑफिस पहुँच गए। मलेशियन एयर लाइन्स का ले ओवर वाला होटल नज़दीक था पर पैदल जाने लायक दूरी नहीं थी  सामान भी था इसलिए एयरलाइन्स की बस से ही जाना तय था। हम जल्दी में थे। ताकि आज भी कुछ घूम सके।

सात लोगों का फॉर्म भरते-भरते काफ़ी समय लग गया। हमारे पास सिर्फ़ दो पेन थे। फॉर्म छोटा ही था पर पासपोर्ट खोलना उसका डिटेल्स लिखना कहाँ रुकेंगे क्यों आये हैं वैगेरह भरने में समय तो लगता ही है। फॉर्म भर कर एक-एक कर जमाकर किया गया और पासपोर्ट पर वीसा स्टाम्प लगा कर जब जाने को हुए तभी छह लोग जो वहाँ हमसे पहले से प्रतीक्षा कर रहे थे ने हमे रोक लिया। वह बांग्ला में कुछ कह रहे थे। रूक कर पूछा तो वह फॉर्म भरने में हमारी मदद चाहते थे। अब समझ आया कि हमलोगों को देख कर उनके चेहरों पर मुस्कराहट क्यों आयी थी। हम फॉर्म में कहाँ क्या भरना हैं कह कर चलने को उद्यत हुए तो उन्होंने बांग्ला में कुछ कहा जो मेरे पल्ले नहीं पड़ा। वे बंगलादेशी थे और अलग ही तरह का बांग्ला बोल रहे थे। मैं और हमारे सहकर्मी श्री अधिकारी ही बंगाला बोल समझ लेते थे। श्री अधिकारी ने बताया कि वे लोग लिख पढ़ नहीं सकते सिर्फ़ दस्तखत ही करना जानते है, यानी वे चाह रहे थे कि हम ही उनका सारा फॉर्म भर दे। उनकी हालत देख हमारे सभी साथी राजी हो गए। हम और श्री अधिकारी उनसे पूछ-पूछ कर फॉर्म भरने लगे। उनकी कुछ कुछ बातें ही मुझे या श्री अधिकारी को ही समझ आ रही थी। श्री अधिकारी ने बताया ये सभी चिटगांव से हैं और चितगावंली बोलते है। मुश्किल-मुश्किल से उनका फॉर्म भर सके। मुझे अनायास उस समय एक वाकया याद आ गया जब एक यात्री ने मुझसे अमेरिका जाते वक़्त disembarkation  फॉर्म भर देने को कहा था। किसी आमिर परिवार का वह आदमी जिसने मुफ्त की शराब काफी पी रखी थी, अपने बेटे के पास जा रहा था। ज़ाहिर था वे भी पढ़ना लिखना नहीं जानते थे पर काम कैसे निकलना है ज़रूर जानते थे। उतरने के बाद उन्हें आपसे कोई मतलब नहीं होता और धन्यवाद की तो आशा ही मत करो। पर ये लोग कृतार्थ थे और बार-बार धन्यवाद कह रहे थे।

कुछ मिनटों में हमलोग सामा सामा एक्सप्रेस होटल पहुचें। काफी भूख लगी थी। रूम में जानें के पहले सबकी इच्छा नाश्ता करने की हुई। डाईनिंग हॉल में snacks के लिए buffet सजा था पर समझ नहीं आ रहा था कि कौन निरामिष खाना है। स्वादिष्ट खाने की बात तो गौण  हो गई थी। बालाजी स्टील (हमारा ग्राहक) के दक्षिण भारतीय वरीय अधिकारी जो साथ ही यात्रा कर रहे थे और vegetarian भी थे वो पहले भी आ चुके थे,  उन्हीं का चुना हुआ कुछ खा कर होटल के shuttle service से हम एक मुख्य चौरहे तक के ड्राप पॉइंट तक निकल पड़े फिर टैक्सी ले ली. । रास्ते में  काफी ज्यादा traffic था। आश्चर्य जनक बात थी two wheeler के लिए अलग लेन। पता चला दो पहिया वाहन जाम लगाने में प्रथम स्थान पर था। अच्छा लगा। एक मलेशियन कार भी दिखी। मलेशिया एक मुस्लिम देश है अब का पता नहीं पर  तब काफी tolerant था। पर्दा का चलन भी कम था। मलय उनकी मुख्य भाषा है पर जान कर अच्छा लगा कि तमिल भी एक आधिकारिक भाषा थी। मंगोल चेहरो के साथ हमारे जैसे दिखने वाले लोग भी थे।अब कुआला लम्पुर में मोनोरेल मेट्रो जैसे सार्वजानिक यातायात के साधन है तब ऐसे नहीं था। बस के विशेष लेन थे। हमलोग करीब 40-50 मिनट में लिटिल इंडिया मार्किट पहुँच गए. दुकानों के नाम अशोका, बालाजी, कुमार, मुरुगन जैसे देख कर बहुत अच्छा लगा। कुछ मोमेंटो खरीद कर हम फल देखने लगे। सभी तरह के भारतीय फल थे। लीची भी। वह भी मुजफ्फरपुर का। पर दाम सुन कर होश उड़ गए. हम रात के खाने के पहले होटल लौट आये। दूसरे दिन का आधा दिन का टूर का प्लान किया खाना खाया और सो गए। टीवी पर एक तमिल फ़िल्म देखने की कोशिश की पर थक कर कब सो गए पता नहीं चला।
Near Little IndiaLittle India

दूसरे दिन हम लोग का फ्लाइट रात का था. हम लोगों ने बाटु गुफा - मुरुगन मंदिर सहित एक टूर ले लिया. कुछ प्राइवेट इन्सेक्ट एंड बटरफ्लाई और हस्तशिल्प म्यूजियम देखे, Petronas ट्विन टावर(तब दुनिया की सबसे ऊँची ईमारत) तो हर जगह से दिख ही रहा था। तब इस टावर को बने कुछ ही महीने हुए थे और टावर की opening भी नहीं हुई थी।
Insect-butterfly museumInsect-butterfly museum



बाटु गुफा मुरुगन मंदिर
रात के फ्लाइट से हम साउथ अफ्रीका चले गए। छह महीने बाद मेकन की टीम लौट आई.लौटते समय टिकट मिलने में दिक्कत हो रही थी। हमारे ज़ोर देने पर कस्टमर ने बिज़नेस क्लास से भेजा। फिर कुआलालम्पुर हो कर ही लौटे। इस लिए बार  KL में ज़्यादा समय मिला तो हम लोग फिर बाटु गुफा गए. पिछले बार पूजा नहीं किये थे इस बार बन्दर से बचते-बचते मुरुगन, शिव पार्वती सभी की पूजा भी किये। पिछली बार सारी सीढ़ियां नहीं चढ़ी थी. इस बार एक दम ऊपर तक गए. टैक्सी वाले के सुझाव पर  एक कांसा (ब्रोंज) और प्युटर फैक्ट्री और रबर प्लांटेशन भी देखने गए ।
इंडिया रबर या प्राकृतिक रबर का मलेशिया पांचवां मुख्य उत्पादक है और यहाँ रबर से बने वस्तुओं की खपत भी काफी ज्यादा है. प्राकृतिक रबर, रबर ट्री से निकला जाता है. मलेशिया में बहुत बड़े क्षेत्रफल में रबर ट्री उगाये जाते है. हमारे लिए भी यह कौतुहल का विषय था और हम रबर ट्री और लेटेक्स कैसे निकलते है देखने गए.

रबर प्लांटेशन के रास्ते में 
लेटेक्स निकलते हुए



Largest beer mug in the world View of Twin Tower
ब्रॉन्ज़ एक टीन और कॉपर का एक मिश्र धातु है. पिउटर टीन एंटीमनी और कॉपर का मिश्र धातु है. मलेशिया में टीन बहुतायत में मिलता है और यहाँ ब्रॉन्ज़ और पिउटर की कई कारखाने हैं. टैक्सी वाला हमें रॉयल सेलेनगर के कारखाने में ले गया. १८८५ में शुरू होने वाली यह फैक्ट्री उस समय तीसरी पीढ़ी चला रही थी. २४ साल पहले की बात है अब तक शायद एक दो पीढ़ी बाद के लोग  चला रहे हो. फॉउंडरी और ढलाई का मशीन देखी. तकनिकी बात पूछने लगे तो हमें कारखाने के हेड के पास ले गए. हमने अपना परिचय दिया कि हम भी मेटल उद्योग है और दोस्ती हो गयी. उन्होंने काफी भी पिलाई. दुनिया की सबसे बड़े पिउटर के बने बियर मग को यही देखा.
Random PhotoFrom top of Batu Cave
तब कैमरे में फिल्म लोड करना होता था. हम सोच समझ कर ही फोटो खींचते थे. कलर फिल्म का चलन शुरू हो गया था. मेरे पास एक यशिका कैमरा था सेमि-आटोमेटिक. उसे मैंने जर्मनी में ख़रीदा था. उसे कही दूसरे देश नहीं ले जाते क्योंकि लौटने पर कस्टम वाले परेशान करते थे. जहाँ गए एक सस्ता सा कैमरा या एक बार युज करने लायक कैमरा ही खरीदते. पर इस बार मैं एक तीन साल पुराना कैमरा ले कर गया था जिसे अमेरिका में ख़रीदा था. शायद Chinon कैमरा था। सारे फिल्म कैमरे अब किसी बक्से में बन्द पड़े है । खैर कैमरा साथ होना ही काफी नहीं था।  कभी रील ले जाना भूल  जाते, रील खतम हो जाता या बैटरी कम पड जाती. रील को दुबारा एक्सपोज़ करने से तो यह कैमरा बचा देता था पर समय पर रील आगे बढ़ा हुआ नहीं मिलता और अच्छे दृश्य निकल जाते. हमारे पास इस ट्रिप की कम ही फोटो हैं पर जितना था उसका उपयोग किया जितना याद था लिखा भी. अब आगे दक्षिण अफ्रीका की बाते अगले ब्लोग में।

Thursday, July 23, 2020

मेरा पहला इंटरव्यू और मेरी पहली नौकरी

Title of the document क्रम-सूची
भूमिका मेरी दिल्ली यात्रा मेरा पहला इंटरव्यू दिल्ली का खाना मेरी पहली नौकरी


भूमिका
हफ्ते भर पहले बोकारो से मेरे एक पुर्व सहयोगी का फ़ोन आया। बोकारो सिंटर प्लांट के बारे में कुछ तकनीकी बातें हुई और मैं अपनी पुरानीं यादों में खोता चला गया। सिटंर प्लान्ट मेरे पेशेवर औद्योगिक जीवन का पहला पड़ाव था । खैर मैं शुरू से शुरू करता हूँ। 1970 में इंजीनियरिंग करने के बाद मैं नौकरी की खोज में था। सबसे पहला इंटरव्यू HAL का आया। BARC का इन्टरव्यु किसी कारण वश जा नहीं पाया। बाद में पता चला काफी कठिन इन्टरव्यु था। HAL का इंटरव्यू दिल्ली में था।दिल्ली के उस ट्रिप में कई मजेदार घटनाये घटी। मेरे फुफेरे भाई रमन भैया जिन्होंने ISM (now an IIT) धनबादप् से applied जिओलॉजी की पढ़ाई की थी और उस समय दिल्ली में एटॉमिक एनर्जी कमिशन में साइंटिस्ट थे। उनके यहाँ ही रुकना था
रमन भैया -अब स्वर्गीय
मेरी दिल्ली यात्रा
दिल्ली इसके पहले एक बार ही आया था। कॉलेज ट्रिप में। तब मोती बाग़ दिल्ली शहर से बाहर की जगह लगती थी। औटो वाले काफी ना नुकुर के बाद जाने को राजी हुए। नई दिल्ली स्टेशन से ऑटो से हम मोती बाग़ आ गए, दूरी ज्यादा  थी और मैं आशंकित था कि कही ऑटो वाला बेवजह घुमा तो नहीं रहा। थोड़ा ढूढ़ने पर रमन भैया का घर मिल गया। उनकी शादी नहीं हुई थी और अकेले ही रहते थे। कॉलोनी में चारो तरफ तीन तल्ले फ्लैट वाले मकान थे और बीच में आंगन जैसा मैदान था बच्चो के खेलने या महिलाओं के मीटिंग्स के लिए अच्छी जगह थी । शाम को काफी चहल पहल हो जाती थी। सुबह-सुबह अजीब अजीब-सी आवाज़ों से नींद खुल गयी। बालकनी में आ कर देखा तो केरोसिन और ब्रेड वाले थे। तेल वाला बोल रहा था "तेअ" "तेअ" । ब्रेड वाला थोड़ी-थोड़ी देर में एक सिटी बजा रहा था। सभी कॉलोनी वाले इसका मतलब समझते होंगे। क्योकि कुछ देर में ही भीड़ लग गई। केरोसिन एक राशन कार्ड में मिलने वाला सामान था, भीड़ लगना लाज़मी था। तब क्या पता था भविष्य में बोकरो में फिर ऐसी आवाज़ों को सुनने का संयोग बन रहा था।

क्रम-सूची
मेरा पहला इंटरव्यू
सुबह ब्रेड बटर का नास्ता कर के मैं इंटरव्यू के लिए निकल पड़ा। कॉलेज में हर साल शैक्षिक यात्रा करते करते बड़े शहरों का मुझमें कोई खौफ नहीं था । यूनिवर्सिटी जाना था और एक रूट की बस जाती भी थी। मोती बाग़ इस बस के लिए लास्ट स्टॉप ही था। बस के लिए लाइन में लग गया। जब बस आई तो स्टॉप से काफी आगे जा कर रुकी। सभी लोग लाइन छोड़ दौड़ पड़े । मुझे देर हो गयी। दूसरी बस जब आई तो फिर  ऐसा ही कुछ हुआ। पर जब तीसरी बस मेरे सामने रुकी और मुझे चढ़ने का मौका मिला तब एक हृष्ट पुष्ट महिला मुझे धक्का देते हुए चढ़ गई।

दिल्ली यूनिवर्सिटी
स्टैन्ड पर औटो वाले सब देख रहे थे। मीटर से जाने को राज़ी ही नहीं हुए और ज़्यादा किराया देना पड़ा। खैर तीन दिन जाना था और अगले दिनों में मैंने बस लेने की कोशिश ही नहीं की और ऑटो वाले मीटर से ही ले गए। बिहार में मेरे कॉलेज को छोड़ इंजीनियरिंग एग्जाम देर से हुआ था और बिहार से सिर्फ़ दो लोग ही इंटरव्यू के लिए आये थे। written टेस्ट पास करने पर डिज़ाइन का एग्जाम हुआ। एक प्रश्न था व्हील बैरौ डिज़ाइन करे। मैं ट्रांसफॉर्मर और मोटर डिज़ाइन करने को पढ कर अया था। खैर समूहिक चर्चा (Group Discussion) के बाद first 20 में आने के बावजूद और आगे नहीं बढ़ पाया जीवन में पहली बार असफल हुआ था। मूड ख़राब हो गया। रमन भैया ने काफी हिम्मत बढ़ाई।

क्रम-सूची
दिल्ली का खाना
अगले दिन घर में अकेला था भैया ऑफिस गए थे। खाने के लिए पास के एक झोपड़ी नुमा होटल में गया। मैंने चावल दाल और सब्जी माँगा। फिर मैंने पाया की सभी मुझे ही घूर रहे हैं। शायद यहाँ लोग चावल नहीं खाते होंगे फिर देखा तो चावल मेनु में लिखा ही नहीं था। मैं तंदूरी रोटी और पनीर की सब्जी खा कर वापस आ गया। शाम को भैया ने कनॉट प्लास जाने का प्रग्राम बनाया। शायद मेरा मूड ठीक कारना चाहते होंगे। खाना खाने के लिए पहले हम एक अच्छे रेस्टोरेंट में घुसे। घुसते ही हम समझ गए की यह कुछ एक महंगा रेस्टोरेंट है। खैर बैठ गए। मेनू पढ़ते ही समझ आ गया की कुछ ज्यादा ही महँगा है । वेटर आया तो हमने काफी या चाय मंगाना ही उचित समझा। कॉफी भी काफी  महंगी थी। जिस टेबल पर बैठा था वह डिनर के लिए सजा था। "Will you mind sitting over there?" वेटर एक छोटे टेबल की और दिखा कर बोला। रमन भैया "We will definitely mind" कहते हुए बाहर आ गये। जरूरत से ज्यादा खर्च करने से बच गए।

फिर पालिका बाजर के पास एक ढाबा दिखा। नाम थी "काके दा होटल।" एक झोपड़ी नुमा रेस्टॉरेन्ट के बाहर खुले में कुर्सी टेबल लगे हुए थे। हमने टेबल खाली होने का ईतंज़ार किया और एक टेबल खाली होते ही बैठ गये। रेट कार्ड एक ब्लैक बोर्ड पर लिखा था। हमने रोटी चिकन खाने का निर्णय लिया। बस छ: रूपये में हमारा चिकन रोटी और एक स्वीट्स का डिनर होगया। यह होटल अब काफी प्रसिद्ध हैं, और इसके Franchise पूरे हिन्दुस्तान में फैले है, पर वो स्वाद और वो सफाई अब कहाँ? याद नहीं उस ट्रिप में  दिल्ली में कहीं और घूमने गये थे या नहीं। पर उस दिन पालिका बजार और जनपथ से कुछ चीजें जिसमें  एक बेल बॉटम पैन्ट और आधी दर्जन टाईया शामिल था, खरीदी ।१९६५ में जब कॉलेज में एडमिशन लिया था तब १३-१४ ईन्च मोहरी वाली और बिना प्लीट वाले ड्रेन पाइप पैंट का फैशन था। पांच साल बाद जब पास हुए चौडी मोहरी वाली बेल बॉटम पैंट का फैशन आ गया था और मैं Latest पोशाक ही पहनता था । टाईया भी थोड़ी महंगी हो गयी थे। १९६८ में जब कॉलेज ट्रिप पर आये थे तब ९ रु के एक दर्जन के अविश्वसनीय मूल्य पर हम सबों ने खरीदी थी। इस बार आधे दर्जन के कुल अट्ठारह रु लगे। लाल किला, कुतुब मीनार वैगरह कॉलेज ट्रिप में ही घूम चुके थे। अतः हम अधिक रात होने के पहले घर वापस आ गए।
उस समय ट्रेनों में तीन क्लास होते थे। आए थे फर्स्ट क्लास में। लौटे III क्लास से। आने जाने का फर्स्ट का पैसा मिल ही गया था। AC क्लास होता ही नहीं था ।

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मेरी पहली नौकरी
लौटने के बाद BIT, सिन्द्री  के M.Tech कोर्स  में एडमिशन ले लिया उन दिनों पी जी में पढ़ने के लिए महिने का रू 250 स्टाईपेन्ड मिलता था जो कि नौकरी में मिलने वाले रू 400 की तनख्वाह से थोड़ा ही कम। सिन्द्री, धनबाद के उस ट्रिप में झरिया के बिहार टॉकीज में  सिनेमा  देखा और बोकारो तक जा कर नियोजन दफ्तर में निबंधन भी कर आया। वापस आने के बाद पटना गया और HSL (हिन्दुस्तान स्टील) का written टेस्ट दे आया। बहुत आसान सा पेपर था। ईन्टरव्यु कॉल का ईतंजार कर रहा था कि पटना युनिवर्सिटी से leave vacancy के लिए लेक्चरर का एपॉईन्टमेन्ट लेटर आ गया। तीन वैकेंसी थी विद्युत् विभाग में। दो यांत्रिकी विभाग में।पटना युनिवेर्सिटी के प्रथम और द्वितीय टॉपर को लिया जाना तय था और विद्युत् विभाग में द्वितीय टॉपर होने के कारण मेरा नंबर आ गया। सत्य प्रकाश नारायण टॉपर था। हम दोनो के अलावा एक बी एच यु के टॉपर  'वर्मा' ने भी हमलोगों के साथ ज्वाईन किया। अब आगे जो लिखने जा रहा हूँ वो सारी कहानियां मैंने अपने करीबियों को कई बार बता चुका हूँ। फिर भी लिखता हूँ।
मैं कदम कुआँ अपनी बड़ी मौसी के यहाँ रहता था। स्कूल की पढाई भी मैंने यही रह कर पूरी की थी। कॉलेज कंपाउंड में स्टाफ के लिए कुछ कमरे थे. पहले सोचा था एक कमरा मिल ही जायेगा। बाद में पता चला छुट्टी पर गए टीचर्स ने कमरा खली ही नहीं किया है। कदम कुआँ से कॉलेज करीब ४ किलोमीटर दूर था। पहले दिन मैने बस लेने का सोचा। हम लोग कॉलेज में नए लेक्चरर लगे हैं छात्र लोग जान गए थे। वो हमें पहचानते भी थे। कॉलेज में काफी डे स्कॉलर्स  थे, और कई लड़के बस से ही जाते थे। बस में चढ़ते ही देखा कुछ लड़को ने टी स्कायर ले रखा था। ये सब मेरे कॉलेज के ही छात्र थे। वे सब काफी असहज दिखे। अचानक से मै एक चिन्ता रहित छात्र से आदरणीय शिक्षक हो गया जिसे गंभीर रहना चाहिए। बिना इधर उधर देखे मैने छोटी सी बस यात्रा तय की। बस स्टाप पर कुछ खरीदने का अभिनय करते हुए तब तक रुका रहा जब तक सभी छात्र चले नहीं गए। फिर धीरे धीरे चलते हुए कॉलेज गया। बस निश्चय कर लिया कि कल से रिक्शा से ही कॉलेज जाउंगा चाहे रोज के 4-5 रु देने ही पड़ जाय। नए लेक्चरर होने के नाते हमें 3rd year का लैब क्लास का काम मिला। महिने भर चाय के लिए टी क्लब में पैसे देने पड़े।सत्य प्रकाश चाय पीता नहीं था। मै कभी कभी पी लेता था और पैसा मै ही वसूल कर पाता था लैब में घटी दो घटनाए याद है। हमारा एक सहपाठी था कन्हैया। मोटा हँसमुख लड़का था। दो बार फेल होने के कारण वह अभी भी 3rd year में ही था। एक दिन उसे क्लास आने में देर हो गई। 75% उपस्थिति आवश्यक होती थी। लड़को के लिए उपस्थिति बनवाने के लिए प्रोक्सी भी करते थे पर लैब क्लास में यह सम्भव नहीं था। कन्हैया मेरे पास हिचकिचाते हुए उपस्थिति बनवाने आया। मै कुछ मज़ाक करने वाला था मेरा मुंह खुले उससे पहले उसके मुंह से निकला "सर"! वह कुछ और कहता उसके पहले ही मैने अटैन्डेन्स दे दी। मेरा काम था घूम कर लैब में छात्रों द्वारा किए जाने वाले प्रयोग की प्रगति को देखना। वर्मा ने जुनियर मोस्ट था, सारे कठिन प्रयोगो की जिम्मेवारी उसे सौंप ब्रिज मेगर का प्रयोग मैनें अपनी लिए रखा था। कई ग्रुप अपना मेगर का प्रयोग कर चुके थे और कॉपी में मुझसे हस्ताक्षर भी करवा लिए । सबको मैने ब्रिज बैलेन्स के लिए सुई को मेगर के बीच में रखने को कहा था। एक दिन दो लड़को के एक ग्रुप कई बार कहने पर भी मेगर के शुन्य पर ही बैलेन्स करते दिखे।मैने देखा तो डॉटने के स्वर में पूछा " ये क्या कर रहे हो?" लड़के ने डरते डरते बताया सर जीरो के पास ही Increase-0-decrease लिखा है। बैलेन्स यही पर करना है सर। मै तुरंत समझ गया मैने ध्यान नहीं दिया था और मैं गलत था । मैने उन्हें शाबाशी दी। फिर मैने उन दोनों कों कहाँ पहले जिसने भी इस प्रयोग को किया है उसको सुधार लेने बोल देना।

मै प्रतिदिन कुछ सीख रहा था। शिक्षण कार्य आसान नहीं है यह अहसास हो चला था। दोपहर का खाना मेस में खा नहीं सकता था। टिफिन लाते थे। एक दिन टिफिन नहीं ला पाए। इसलिए मोड़ पर राम जी के ढ़ाबानुमा नास्ते की दुकान में चले गए। ये वही दुकान थी जहाँ हम हॉस्टल से यदाकदा नास्ता करने आया करता था। छोटी सी दुकान थी। दोनो तरफ बेंच और टेबल लगे थे। राम जी ने हमें पहचान लिया और बैठने को कहाँ और क्या खाएगें पूछने लगे। वहाँ एक दुसरे से रगड़ाते ही बेंच में बैठने के लिए घुसना पड़ता था। दुकान छात्रो से भरा था। सब खड़े हो गए और बैठने का निमन्त्रण देने लगे। कुछ धीरे से खिसक भी लिए। मैं दुकानदार के तरफ देखने लगा। मानों वह भी कह रहा हो "आप यहाँ आए किस लिए।" मैने ने एक चाय पिया और जल्दी निकल लिए। फिर पिन्टू होटल तक गए और पर्स ढ़ीले कर खाना खाया। और पिन्टू का रसगुल्ला भी छोड़ते नहीं बना।
रविवार आया तो एक फिल्म देखने के लिए रिजेन्ट सिनेमा चला गया ठीक ठीक याद नहीं पर फिल्म का नाम शायद 'तलाश' था। मै आदतन रु 1.75 जो स्टुडेन्ड क्लास प्रसिद्ध था के लाईन में टिकट लेने लग गया। थोड़े देर में दो लड़के आए और उनके लिए दो टिकट भी लेने का अनुरोध करने लगे। मैने उनको लाईन में लग कर टिकट लेने दिया। लड़कों ने अक्ल लगाई और मेरा टिकट दुसरे ROW का लिया।
रीजेंट सिनेमा अब
देखते देखते दुर्गा पुजा की छुट्टी शुरू होने को हुआ। एकदिन  मै अपनी तनख्वाह के लिए  कालेज आफिस चला गया। उन्होनें बताया हमें यूनिवर्सिटी के नामित बैंक के चिन्हित ब्रांच में एकाऊन्ट खोलना होगा और एक बिल भी बनाना होगा तभी मेरे एकाउन्ट में पैसा जाएगा । मै फॉर्म ले ही रहा था कि किसीने मेरा पैैन्ट का पायचा पकड़ लिया। मै चौंक पड़ा। वो मेरा सहपाठी था। अरे अमिताभ ये सब नहीं चलेगा, वह मेरा दिल्ली वाले बेल बाटम पैन्ट को पकड़ कर बोल रहा था। मै चारो तरफ देखने लगी कि कोई छात्र देख तो नहीं रहा हैं। मैने निश्चय किया कि अब बेल बाटम पहन कर कॉलेज नहीं आऊंगा। राज कपूर ने सिर्फ तीन ही कसम खाई थी पर यह थी मेरी पाचंवी कसम।
खैर दुर्गा पुजा के लम्बी छुट्टी शुरू हो गई। मै घर चला गया। तभी बोकारो से कॉल आ गया। एक आसान से साक्षात्कार के बाद तुरंत नौकरी ज्याईन करने का पत्र मिल गया। परसनल विभाग ने बताया यदि हम अपने लेक्चरर की नौकरी को सेवा पंजिका (Service Record) में डालना चाहते है तो अनापत्ति प्रमाण पत्र ले कर आईए। मेरी मत तब मारी गई थी और मैं पटना चला गया। इतनी लम्बी चौड़ी प्रक्रिया बताया गया कि मेरे पास बैरंग लौटने के आलावा कोई चारा नहीं बचा। लौटने के पहले मैने ऑफिस के स्टाफ को एक चिठ्ठी लिख कर दे दी कि मेरा जो भी तनख्वाह बाकी होगी वह स्टाफ फंड के लिए दान करता हूँ । बोकारो जल्द वापस आ कर मैने ज्वाईन कर लिया। एक हफ्ते जूनियर होने से कोई और दिक्कत नहीं हुई पर तीन साल बाद जब क्वार्टर मिला तो   सेक्टर 3 में नहीं मिला और मिलने में देर हुई सो अलग।  जैैसा मैनें प्रारम्भ में ही लिख चुका हूँ,  बोकारो में मेरा प्रथम कार्यस्थल था सिंटर प्लांट। कई रोचक घटनाए वहाँ भी घटी। वो फिर कभी।

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Monday, July 13, 2020

ভুল হলে দয়া করে ক্ষমা করুন। हिंदी अनुवाद के साथ


कई मित्रों ने हिंदी अनुवाद का आग्रह किया हैं और मैं उसे नीचे दे रहा हूँ


কিছু দিন আগে আমার মোবাইলে আমার স্ত্রীর জন্য একটি কল এসেছিল। তার বন্ধু মিসেস শিল্পী গুহার ফোন ছিল। আমি তার বাংলোতে লেখা ফেসবুক পোস্টে কমেন্ট করেছিলাম। সেই সময় তিনি জিজ্ঞাসা করেছেন কি আমি লোকডাউনে বাংলা পড়তে শিখেছি ? আমি বললাম বাংলা পড়তে আগে থেকে জানতাম। এখন মোবাইলে বাংলা টাইপ করা শিখছি । তিনি কিছুটা অবাক হয়েছেন।

আমি সিদ্ধান্ত নিলাম বাংলায় একটি ব্লগ লিখব।

তারপরে ভাবতে শুরু করলাম কেন এবং কখন বাংলা শিখেছি। কেন তো জানিনা কিন্তু কবে মনে আছ। বেশি সময় আমার এই প্রশ্নের উত্তর হয় “আমি আমার বেঙ্গালি ফ্রিইন্ডস থেকে বোকারোতে শিখেছি । তবে আমার স্কুল টাইম থেকে এই ভাষাটি শেখার স্বাভাবিক ইচ্ছা ছিল। আমার শৈশবকালে একজন ডাঃ মুখার্জি আমাদের কাছে ছিলেন। উনি LMP (Licensed Medical Practitioner) ডাক্তার ছিলেন আর দেশ বিভাগের সময় তিনি আমাদের শহরে এসেছিলে। আমাদের এরিয়া তে কোনো ডাক্তার ছিলেনন। আমাদের জায়গাটি এমন ডাক্তার জন্য ভাল জায়গা ছিল প্রাকটিস করা জন্য। আমার বাবা তখন এরিয়ার এক মাত্র প্রাইভেট MBBS ডাক্তার ছিলেন। ডাক্তার মুখার্জী কাছে ছিল এক্টৌ Vouxhall কার । যার বাম বা ডান আলো সিগন্যালের জন্য উপরে উঠবে। হাত দেওয়া সংকেত মত। এটি বাচ্চাদের জন্য একটি কৌতূহল পূর্ণ বিন্যাস ছিল। তার ড্রাইভারের নাম ছিল নীলু। নীলু দা ছিলেন ওনার 'আল ইন বন' কম্পউণ্ডার, ড্রাইভর এবং সহায়ক। নীলু বাবুও বাঙালি ছিলেন । বেঙ্গালি সুরটি তাঁর হিন্দিতে স্পষ্ট ছিল। আমি উনাকে প্রায়ঃ কারে ঘোরাতে অনুরোধ করতাম। তিনি সাধারণত ঘুরিয়ে দিতেন। আমার বাংলা আলাপ মাঝে মাঝে হয়ে যেত। আমার বাংলা শেখা শুরু হয়ে গেছিলো।



ডাঃ মুখোপাধ্যায়ের গাড়িটি এরকম ছিল
আমি বোকারোর বাঙ্গালী ফ্রেইন্ডদের আভাড়ি আছি কি ওনাদের আমাকে বাগালী বলার চান্স দিলো । তারা আমার ভুলগুলিও মনে করেনি। এটা আমার আত্মবিশ্বাস টি বাড়িয়ে দিলো। উত্তর বিহারের কয়েকটি Dialect বাংলার সাথে খুব একই রকম । আমাদের মায়ের বাড়িতে বেগূসরায তে " 'कहाँ जा रहे है " জন্য আমরা বলব " कत जायछी " বাংলায় আমরা বলি " কোথায় যাচ্ছো " আগে মৈথিলির লিপিটিও ছিল বাংলা। বাংলা শেখা আমার জন্য স্বাভাবিক ছিল। অনেকে মনে করেন কিশোর বাংলার প্রেমের আগ্রহ হতে পারে। আমি নিশ্চিত করে বলছি যে এর মতো কিছুই ছিল না।
পরে আমি আস্তে আস্তে বাংলোটি পড়া শিখতে শুরু করেছি । দেবনাগরী একটি বৈজ্ঞানিক লিপি। যা লেখা আছে তা বলুন। ইংরেজীতে কিছু লিখুন অন্য কিছু পড়ুন!to=চূ do=ডূ go=গো But= বট put= পূট । বেশি ভারতীয় লিপি দেবনাগরীর মত। বাংলাও। আমার জন্য এই কারণে বংলা লিপি সহজ হয়েছে। বোকারোতে কয়েকটি বাংলা পত্রিকা পড়ার চেষ্টা করার সুযোগ পেয়েছি। আনন্দলোক মত ফিল্মের মাগ্জিনে পড়তে মজা লাগতো। দেশের মতো মূলধারার ম্যাগাজিন পাওয়া যেত। যে শব্দগুলি আমি পড়তে পারতাম না তখন প্রসঙ্গের সাথে বুঝিয়ে নিতাম। আস্তে আস্তে, এখন আমি শিরোনাম এবং ছোট কবিতা পড়তে পারি। কোমেন্টস জোকে আর পোস্ট গুলো পড়তে পারি দীর্ঘ গল্প বা কবিতা পড়ার ধৈর্য নেই। অমার বন্ধু দেবল দাশগুপ্তের দীর্ঘ কবিতাটি পড়তে পারেনি। "আকাশ ভরা সূর্য তারা, এখন আকাশ মেঘে ভরা" থেকে আগে যেতে পাই না। আমি হাতে লেখা বাংলো পড়তে পারি না। মুদ্রিত বাংলো 80-90% পড়তে পারি। এখন মোবাইলে বাংলা কীবোর্ডও রয়েছে। হিন্দি মতোই টাইপ করতে হয় । এখন আমি বাংলায় কিছু লিখতেও পারি। প্ররম্ভে আমি বাংলায কথা বলতে দ্বিধাগ্রস্ত হোতাম। ট্রেনে কিংবা ট্রামে কেই কিছু পূছলে আমি অনেকবার বাংলায উত্তর দিয়েছি যে আমি বাংলা জানি না। জিজ্ঞাসা করা লোক বিরক্ত হোতো ক্রোধ করতো। অন্যদের মজা নেতো। তমিলনাডু তেউ আমি তাই করতাম, "তমিল তেরিযদ" = তমিল জানিন । আম্তে আস্তে আমি ট্রেন ট্রাম ভীতরেউ বংলা বোলতে শূরূ করেছিলাম। তবুও আমার বাংলো পড়ার গতি কম। সম্প্রতি রাঁচিতে আমার প্রতিবেশী মিসেস মুস্তাফি কিছু নিবন্ধ পড়ার জন্য আমাকে অনেক বাংলা ম্যাগাজিন দিয়েছেন।একটি পৃষ্ঠা পড়তে আধ ঘন্টা সময় লাগে। তারপরেউ আমি 5 টি পৃষ্ঠা পড়েছি। তারপর আমার ধৈর্য হারিয়েছে। তবে অন্য যে কোনোউ ভাষায দীর্ঘ পাঠের সংগে এটা হয়।আমি কোনও উপন্যাস পড়তে পারি না। দিল্লী তে আমি এক বছরে বাংলায় একটি শব্দও কথা বলি নি। শেষ বছর আমি ফিজিওথেরেপিস্ট শ্রেওসী যে আমাদের সোসাইটীতে থাকে সংগে বংগলায কথা বোলতাম। তবে আমি এখন সুস্থ আছি তার ক্লিনিকে যাওয়ার দরকার নেই।আমি তার ছেলের সাথে বাংলায় কথা বলার চেষ্টা করেছি। তার ছেলে বাংলা জানে না।আমি জানতে পারলাম যে ছেলে টা বাংলা কথা বলে না। আমি জিজ্ঞাসা করলাম কেন তিনি বাংলায় কথা বলে না? শ্রেওসী বলল তার বাবা একজন হিন্দুস্তানি।আমি হাসে পড়েছি । হিন্দুস্তানি দ্বারা তিনি হিন্দিতে কথা বলার অর্থ করেছিলেন। সাধারণত হিন্দুস্তানির অর্থ হয ভারতীয়।
ব্লগ এখন খুব দীর্ঘ হয়ে উঠছে।আর পারহছিন। কিন্তূ মাঝে মাঝে বংহলায ব্লাহ লেখব। হিন্দী মাতৃভাষা হেলেউ বংলা আমার মাসী মাঁর ভাষা আছে।

আমার জন্য বাংলায় ব্লগ লেখার চেয়ে বড় আর কী হবে ? ভুল হলে দয়া করে ক্ষমা করবেন।



कुछ दिनों पहले मेरे मोबाइल पर मेरी पत्नी के लिए एक कॉल आया। उनकी मित्र श्रीमती शिल्पी गुहा का कॉल था। कुछ दिन पहले मैंने उनके बंगला में लिखे फेसबुक के पोस्ट पर टिप्पणी की थी। उस समय उन्होंने पूछा था कि क्या मैंने लॉकडाउन में बंगला पढ़ना सीखा है? मैंने जवाब में कहा नहीं, मैं पहले से ही बंगली पढ़ना जानता हूँ। और अब मैं मोबाइल पर बांग्ला लिखना सीख रहा हूं। वह थोड़ा आश्चर्यचकित हुई । तभी मैंने फैसला लिया कि बंगला में एक ब्लॉग लिखूंगा ।फिर मैं सोचने लगा कि क्यों और कब मैंने बंगला सीखना शुरू किया था। “क्यों” तो मुझे नहीं पता लेकिन कब याद है। इस सवाल का ज्यादातर मेरा जवाब होता है , "मैंने बोकारो में अपने बंगाली दोस्तों से सीखा।" लेकिन मुझे पता है कि स्कूल के समय से ही इस भाषा को सीखने की स्वाभाविक इच्छा थी। बचपन की बात हैं, हमारे एक पडोसी थे डॉ मुखर्जी । वह एक LMP (लाइसेंस प्राप्त मेडिकल प्रैक्टिशनर) डॉक्टर थे  और विभाजन के समय वह हमारे शहर में आये थे । हमारे इलाके में तब (अस्पताल को छोड़ कर) कोई डॉक्टर नहीं थे । ऐसे में प्राइवेट डॉक्टर के Practice के लिए हमारा शहर एक अच्छी जगह थी । मेरे पिता उस समय इलाके के एकमात्र प्राइवेट एमबीबीएस डॉक्टर थे। डॉ। मुखर्जी के पास एक Vouxhall कार थी। जिसके बाएं या दाएं Signal lights संकेत के लिए ऊपर की ओर उठता था । हाथ के संकेत की तरह। यह बच्चों के लिए एक कौतुहल का विषय था। उनके ड्राइवर का नाम नीलू था। नीलू दा उनके 'ऑल इन वन' कंपाउंडर, ड्राइवर और सहायक थे। नीलू बाबू भी बंगाली थे। उनकी हिंदी में बंगला का पुट स्पष्ट था । मैं अक्सर उन्हें कार से घूमा देने का आग्रह करता । वह ज्यादातर मुझे और अन्य बच्चों को कार में घूमा भी देते । उस समय अनजाने में ही मेरी उनसे बंगला में अक्सर छोटी बात समय-समय पर हो जाती । अब सोचता हूँ तो लगता है मैंने तब से ही बंगला सीखना शुरू कर दिया । मैं बोकारो के अपने बंगाली दोस्तों का आभारी हूं, क्योकि उन्होंने मुझे बंगला में बात करने का मौका दिया । उन्होंने मेरी गलतियों को भी नज़र अंदाज़ किया । इससे मेरा आत्मविश्वास बढ़ता गया । उत्तर बिहार की कुछ बोलियाँ बंगला से बहुत मिलती-जुलती हैं। बेगूसराय में  यानि मेरे ननिहाल   में, ''आप कहाँ जा रहे हैं '' के लिए, हम कहते थे "कत जायछी" या "कहा जय छहो", जबकि बंगला में कहेंगे "कोथाय जच्छो" । बंगाली सीखना मेरे लिए एक सामान्य सी स्वाभाविक बात थी । बाद में मैंने धीरे-धीरे बंगला पढ़ना भी शुरू किया। देवनागरी एक वैज्ञानिक लिपि है। वही बोलते है जो लिखा है । अंग्रेजी में लिखो कुछ ! और पढ़ो कुछ ! To= टु do= डु पर Go= गो Put= पुट पर But= बट । ज्यादातर भारतीय लिपि देवनागरी जैसी है । बांग्ला भी। इस कारण से, बांग्ला स्क्रिप्ट मेरे लिए आसान थी । मुझे बोकारो में कुछ बंगाली पत्रिकाओं को पढ़ने का मौका मिला। आनंदलोक जैसी फिल्मी पत्रिकाओं में पढ़ना मजेदार था। देश जैसी मुख्यधारा की पत्रिकाएँ भी मिल जाती थीं। जिन शब्दों को मैं पढ़ नहीं सकता, उन्हें मैं संदर्भ के साथ मिला कर समझ लेता । धीरे-धीरे, अब मैं शीर्षक और छोटी कविता पढ़ सकता हूं। मैं टिप्पणियों को, पोस्ट को और जोक को ठीक ठाक पढ़ सकता हूं । पर लंबी कहानियों या कविताओं को पढ़ने के लिए मेरे पास धैर्य नहीं है। अपने मित्र देबल दासगुप्ता की लंबी कविता पूरी नहीं पढ़ सकता । मैं पहली लाइन " अकाश भरा सूर्य तारा । एखान अकाश मेघे भरा " से आगे नहीं जा सकता । मैं हस्तलिखित बांग्ला पढ़ नहीं सकता। अब मैं 80-90% मुद्रित बांग्ला को पढ़ सकता हूँ । अब मोबाइल में बांग्ला कीबोर्ड भी है। जिसमे हिंदी की तरह ही टाइप करना होता हैं । अब मैं बांग्ला में कुछ लिख भी सकता हूं। पहले पहल मैं बंगला बोलने में हिचकिचाता था। ट्रेन या ट्राम में कुछ पूछे जाने पर, मैंने कई बार बंगला में जवाब दिया कि “आमि बांग्ला जनि न”। पूछने वाला व्यक्ति नाराज हो जाता । और दूसरे लोग मज़ा लेते । थोड़ा तमिल भी सीखा था पर तमिलनाडु में भी तब मैं ऐसा करता था, कुछ पूछने पर मेरा जवाब होता "तमिल तेरियाद या " "तमिल तेरि इल्ले " = तमिल नहीं जानता। धीरे-धीरे मैंने ट्रेन ट्राम के अंदर भी बंगला बोलना शुरू कर दिया। फिर भी मेरे बांग्ला में पढ़ने की गति कम है। हाल ही में रांची में मेरे पड़ोसी श्रीमती मुस्तफ़ी ने मुझे कुछ लेख पढ़ने के लिए कई बंगला पत्रिकाएँ दीं। एक पृष्ठ को पढ़ने में आधा घंटा लगा । तब भी मैंने 5 पेज पढ़े । फिर मैंने अपना धैर्य खो दिया। लेकिन यह मेरे साथ किसी भी अन्य भाषा में लिखे लंबे पाठ के साथ होता है चाहे वो हिंदी में ही क्यों न हो। मैं कोई उपन्यास नहीं पढ़ सकता। दिल्ली में हूँ और मैंने एक साल में बंगला का एक शब्द भी नहीं बोला। पिछले साल मैं बंगली फिजियोथेरेपिस्ट श्रीमती श्रेयषी, जो हमारे सोसाइटी में ही रहती है के साथ बंगला में बात कर लेता था । लेकिन अब मैं स्वस्थ हूं, उनके क्लिनिक में जाने की कोई जरूरत नहीं है। मैंने उनके बेटे के साथ बंगला में बोलने की कोशिश की थी । पता चला उनका बेटा बंगला नहीं जानता। मैंने आश्चर्य के साथ उनसे पूछा कि वह बंगला में बात क्यों नहीं करता हैं ? श्रेयोसी ने कहा कि मेरा पति एक हिंदुस्तानी हैं। मैं हंसा। हिंदुस्तानी से उनका मतलब हिंदी बोलने वाला । जबकि हिंदुस्तानी का मतलब आमतौर पर भारतीय होता है। ब्लॉग अब बहुत लंबा होता जा रहा है। भविष्य में कभी-कभी बंगला में लिखूंगा इस वादा के साथ समाप्त कर रहा हूँ । हिंदी मातृभाषा तो है पर बंगला भी मेरी मौसी भाषा जैसी है। बंगला में ब्लॉग लिखने से बड़ा मेरे लिए क्या हो सकता है? यदि कोई गलती हुई हो तो प्रथम प्रयास सोच कर, कृपया मुझे क्षमा करें ।

Friday, July 10, 2020

Jagdeep In memoriam

Syed Ishtiaq Ahmed Jafri more popularly known as Jagdeep passed away on 8th July. He was 81. Obviously he lived his life. Through this blog I will like to remember and relive his great work and his struggles. His works can be summarized as an actor who started as child artist grew up as hero and matured as great comedian. His comic timing,his dialogue delivery and facial expressions made one to laugh and laugh. We had comedians like Dhumal, Mukri, Sunder and Rajendra nath, whose getup and few dialogues were enough to make us laugh and we had also comedians like Omprakash,Kanhaiyalal, Kishore Kumar, Mehmood and Asrani who made themselves an important part of the story. Jagdeep fell in second category. As child artist his innocent face helped him to impress. He was doing well as main lead but probably his choice of films post Bhabhi, Barkha etc and his family compulsions forced him to do any film which came his way. This gave us a brilliant comedian. After Sholay he was our beloved Shoorma Bhopali.

उनका जन्म मध्य प्रदेश के दातिया में हुआ था। पिता की मृत्यु बटवारे के पहले हो गयी थी । उनकी माँ कनीज़ जाफरी मुम्बई आ गईं। और एक अनाथालय में कुक का काम करने लगीं। जगदीप भी घर चलाने में माँ की मदद करने के लिए स्कूल छोड़ सड़को पर साबुन वैगरह बेचने लगे। जब 1951 में श्री बी आर चोपड़ा की फिल्म अफसाना में एक बच्चे का रोल मिला तब जा कर घर की हालात कुछ सभंली। फिर दो बीघा जमीन में भी काम मिला। मुझे याद है स्कूल एक फिल्म दिखाई गई थी हम पंछी एक डाल के। जगदीप एक मासूम चेहरे वाले बाल अभिनेता थे और इस फिल्म को देखने के बाद मै दूसरी फिल्मों में भी उन्हें  पहचानने लगा। नेशनल इंट्रीग्रेशन पर बनी इस फिल्म ने जगदीप को एक पहचान दिला दी। उनकी दो और फिल्मों जैसे अब दिल्ली दूर नहीं और मुन्ना भी मैने स्कूल में ही देखी।बाल कलाकार के रूप में निम्नलिखित फिल्मों में जगदीप ने काम किया।
*अब दिल्ली दूर नहीं
*मुन्ना
*दो बीघा जमीन
*हम पंछी एक डाल के
*आर पार
"हम पंछी एक डाल के" एक एवीएम की फिल्म थी। यह फिल्म काफी सफल रही और इसकी तारीफ भी खूब हुई, फिर क्या था एवीएम ने जगदीप को 4-5 फिल्मों में बतौर नायक पेश किया जिसमें सबसे प्रसिद्ध फिल्म थी भाभी। इस फिल्म में जगदीप की नन्दा के संग जोड़ी बहुत जमी और उन पर फिल्माया गाना "चली चली रे पतंग देखो चली रे" बहुत लोकप्रिय हुई अब भी लोकप्रिय है और अक्सर विविध भारती पर बजता भी है। जिन फिल्मों में उन्होंने नायक का किरदार निभाया वो है।
*भाभी
*बरखा
*बिंदिया
*नूरमहल
*पुनर्मिलन
*शूरमा भूपाली, वैगरह
कल जगदीप जी की याद में विविध भारती पर एक कार्यक्रम प्रसारित हुआ। उनके जीवन परिचय के साथ उन पर फिल्माए गाने भी सुनाए गए। मै आश्चर्य में पड़ गया कई ऐसे कई कर्णप्रिय गाने जैसे "मेरे महबूब न जा आज की रात न जा" "पास बैठो तबियत बहल जाएगी मौत भी आ गयी हो तो टल जाएगी" उन फिल्मों के गाने है जिसमे वो हीरो थे। उनके कुछ फिल्मों के पोस्टर का कोलाज़ नीचे देता हूँ कुछ फिल्म हमें फ़्लैश बैक में ले जाएँगी।

नीचे यू ट्यूब पर उनके गानो का और शूरमा भोपाली वाले सीन का लिंक दे रहा हूँ।

इन प्यार की राहों में -फिल्म-पुनर्मिलन
पास बैठो तबियत बहल जाएगी मौत भी आ गयी हो तो टल जाएगी फिल्म-पुनर्मिलन
मेरे मर्हबूब न जा आज की रात न जा - फिल्म नूरमहल
चली चली रे पतंग देखो चली रे - फिल्म भाभी
चल उड़ जा रे पंक्षी अब ये देश हुआ बेगाना- फिल्म भाभी
प्यार किया नहीं जाता - फिल्म बरखा
हम पंछी एक डाल के - फिल्म- हम पंछी एक डाल के
शूरमा भोपाली सीन शोले

जगदीप जी ने ३००- ४०० फिल्मों में छोटे बारे रोल किये. उनकी प्रमुख फ़िल्में है :
1. गली  गाली  चोर  है (2012) 
2. लाइफ पार्टनर (2009) 
3. बॉम्बे टू गोवा  (2007) 
4. कहीं  प्यार  न  हो  जाए (2000)
5. चाइना  गेट (1998) 
6. हसीना  और  नगीना (1996) 
7. अंदाज़  अपना  अपना(1994)
8. इंसान  बना  शैतान (1992)
9. फूल  और  कांटे (1991) 
10. खूनी  पंजा (1991)
11. शूरमा  भोपाली (1988) 
12. शहंशाह (1988) 
13. बात  बन  जाये (1986) 
14. पुराना मंदिर  (1984) 
15. क़ुरबानी (1980)
16. मोर्चा (1980)
17. फिर वही रात (1980)
18. काली घटा (1980) 
19. एक बार कहो (1980)
20. सुरक्षा (1979) 
21. युवराज (1979)
22. स्वर्ग नरक(1978) 
23. एजेन्ट विनोद (1977) 
24. आइना (1977) 
25. शोले (1975)
26. बिदाई (1974)
27. गोरा और काला (1972)
28. सास भी कभी बहू थी (1970)
29. फुद्दु (1970)
30. खिलौना (1970)
31. तीन बहुरानियाँ (1968)
32. ब्रह्मचारी (1967)
33. नौनीहाल(1967)
34. नूर महल (1965)
35. पुनर्मिलन (1964) 
36. बरखा  (1959)
37. भाभी (1957)
38. हम पंक्षी एक डाल के (1957)
39. अब दिल्ली दूर नहीं(1957)
40. किस्मत का खेल (1956)
41. आर पार (1954) 
42. मुन्ना (1954)
43. लैला मजनु (1953) 
44. दो बीघा जमीन (1953)
45. अफसाना(1951)



अंत में दुआ करता हूँ कि ईश्वर उनके आत्मा को शान्ति दे, जन्नत बख़्से।