Tuesday, April 14, 2026

अहसास 2 (वसन्त, चैत)

वसन्त

जब हो मन‌ में उमन्ग
समझो आ पहुंचा वसन्त।

डालों पर बैठे रति अनन्ग ।
मधु ले कर आ पहुँचा वसन्त।
रंगो छन्दों में भरे प्राण ‌।
हे रितुराज तुमको प्रणाम।

जब हो मन‌ में उमन्ग
समझो आ पहुंचा वसन्त

बीता जाए शीतकाल।
गृष्म ऋतु देता दस्तक।
पूछें कोयल कूक कूक।
तुम आओगे अब कबतक।

जब हो मन‌ में उमन्ग
समझो आ पहुंचा वसन्त

मन तन है अब अलसाता
दूरी तो अब सहा न जाता ।
अब आओ सब छोड़ छाड़
तन्हां अब तो रहा न जाता।

जब हो मन‌ में उमन्ग
समझो आ पहुंचा वसन्त
चैत की हवा

चैत की हवा में अजीब सा रंग है
पक्षियों के जोड़े भी उड़ते संग संग हैं
आ के छू जा मुझे जब तन में तरंग है

मन वीणा में जैसे कोई मधुर राग है
फूलों की महक में बसा चैता फाग है
डाल-डाल झूमे जैसे प्रेम का उमंग है

चैत की हवा में अजीब सा रंग है
पक्षियों के जोड़े भी उड़ते संग संग हैं
आ के छू जा मुझे जब तन में तरंग है

कोयल की कूक में मीठा सा व्यंग है
हर धड़कन में बसा तेरा ही प्रसंग है
वातावरण में हर ओर तेरी ही सुगंध है

चैत की हवा में अजीब सा रंग है
पक्षियों के जोड़े भी उड़ते संग-संग हैं
आ के छू जा मुझे जब तन में तरंग है

आम की बौरों से महका घर आंगन है
डालियों पर उतरा अलग सा मधुवन है
प्रकृति इस दिलकश नज़ारों पर दंग है

चैत की हवा में अजीब सा रंग है,
पक्षियों के जोड़े भी उड़ते संग संग हैं
आ के छू जा मुझे जब तन में तरंग है

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