Thursday, October 22, 2020

मेरी पहली नेपाल #यात्रा भाग-2

मेरे पहले नेपाल प्रवास में दो तरह की रोचक घटनांए हुई। पहली प्रकार की घटना मेरे छोटे और बहुत छोटे साले सालियों के साथ बिताया वक्त था। मेरा उनसे वास्तविक परिचय वहाँ पहुचने के दूसरे सुबह से ही प्रारम्भ हो गया। जब मेरे साले सालियों की फौज आ पहुंची। बड़े मामा स्व जस्टिस कृष्ण कुमार वर्मा की उस समय तीन संताने थी बबली, मिन्टू और गुड्डी। सबसे छोटी सुदीपा का जन्म काफी बाद  में हुआ । गुड्डी तब एक साल की थी। मामी ने उसे मेरे गोद में डालते हुए कहा था। "मेहमान (ज्वाई, या दामाद) ये है आपकी सबसे छोटी साली। यहां बर्णित कुछ घटनाए,मेरे बाद की नेपाल यात्रांओ की भी है। 
बुढ़ी माई के साथबुवा के साथ


मिन्टू जो अब एक संजीदा ईन्सान है सबसे छोटा था और हाथ पैर बहुत चलाता था। उसका खेल हाथ पैर चलाना धक्कम धुक्का करना ही था। हाथ भी कड़े कड़े थे,यह तब पता जब उसने खेल खेल में मुझे एक मुक्का जड़ दिया था। बबली का ससुराल तो अब मेरे ही शहर राँची में है और वह अपने पति संग मेरा Solid Support System है। उसके बचपन की मासुमियत में  एक बार मैने उसे रुला ही दिया था। हम लोग जब काठमाण्डु से पटना हो कर लौट रहा था तब बबली हमें वापस जाने से मना कर रही थी। पत्नी जी ने कहा सासू जी की सेवा के लिए जाना जरूरी है। उसने बालपन की जिद में कहा उसे भी सासू जी (मेरी माँ) की सेवा के लिए जाना है। मना करने पर जीजा जी मेरी बात नहीं मान रहे है कह कर रूठ गई और रोने भी लगी। उसे तत्काल शांत करने के लिए मैंने कह दिया ठीक है तुम भी हम लोग के साथ चलना Indian Airlines का एक पुराना Booklet टिकट भी दिखा कर बोला यह तुम्हारा टिकट है। पर उस दिन उसके स्कूल में जांच (परीक्षा) थी, "जीजाजी दो दिन जांच के बाद चलेगें।" मैंने चिढ़ाने के ख्याल से मना कर दिया। वो मायूस हो कर चली गई और रोने लगी। लोगों को पता भी नहीं चला क्यों । बहुत पूछने पर जब बात पता चली तो उसे किसी तरह मना कर चुप कराया गया। जब हम लोग टैक्सी में बैठने लगे तब बबली मायूस हो गई, और मैं पछता रहा था, कि क्यों बच्चे को रूला दिया। छोटे मामा बिजय मामा के बारे में पत्नी जी ने कई बाते बताई थी। कैसे एक छोटी बिमारी (टेटनस) के बाद उनकी मृत्यु हो गई थी। मामी ने अपने आप को और नवीन को अकेले संभाला था। वो एक बैंक में कार्यरत थी। नवीन अब एक Witty लॉ प्रोफेशनल है तब एक शांत बच्चा था। बच्चे जो भी ग्रुप में करते वह उसमें भाग अवश्य लेता था। सबसे छोटी मौसी (सास), ईन्दु मौसी,और मौसा तब काठमाण्डु में ही रहते थे। मौसा तब भारतीय बीमा निगम के काठमाण्डु कार्यालय में कार्यरत थे। वे लोग एक किराये के मकान में गैरीधीरा चौक के पास रहते थे। सुबह ही मेरे तीनों मौसेरे साले सालियाँ (बबलू, रूपा मुन्ना) आ जाते। सबसे छोटी डिम्पी का जन्म बहुत बाद का है। इस तरह सुबह ही 6 छोटे साले सालियों से मै घिर जाता और तब तक उनके मनोरंजन का प्रयास करता या उनकी कहानियाँ या गप सुनता जब तक खाने का समय न हो जाता। पुनः शाम से रात तक बैठक जमती ।
मेरी पत्नी बहन भाईयों में सबसे बड़ी हैं। बिमल तो चेन्नई में मेडिकल पढ़ रहे थे, उनसे पिछली मुलाकात जमुई में ही हुई थी। उनसे छोटे किशोर ने कॉलेज जाना शुरु किया था, उससे कुछ बातें होती जिसमें मेरा भी कुछ interest होता था। एक पुराना रिकार्ड चेन्जर घर में था जिसके मरम्मत की बात हम लोग करते। उसे भरोसा था की जीजाजी तो इंजीनियर है अवश्य ठीक कर देंगे । पूरी तरह मरम्मत तो नहीं कर पाए पर रिकार्ड बजाने लायक हो गया था। नेपाली लोक संगीत के रिकार्ड में मेरी अभिरुचि इसी रिकॉर्ड changer में बजे रिकॉर्ड से जगी थी । कुमार बस्नेत, अरूणा लामा और नारायण गोपाल के नेपाली रिकॉर्ड हर बार मै बोकारो ले जाने लगा था। कई पुराने अंग्रेजी गानों का रिकार्ड भी हमने बाद में कबाड़ में से खोज निकाला था। बुवा (नाना जी) को फोटोग्राफी में काफी रुचि थी और फोटो की डेवलपिंग प्रिन्टिंग घर पर ही कर लेते थे। श्वेत श्याम फोटो को रंग कर रंगीन फोटो भी बना देते। फोटो रंगने की यह कला किशोर ने भी सीख ली थी । विशेष रंग वाले पेपर ब्रश किशोर के पास था और मैने उससे यह कला न सिर्फ सीखी अपितु रंगो की बुकलेट और ब्रश भी उससे ले लिया।
अनिल जो अब नेपाल उच्चतम न्यायलय में जज हैं उस समय स्कूल जाते थे। तब आसपास घूमने में वही मेरे साथी थे। लैनचौर में डेरी था। वहाँ चीज़ (Cheeze) लाने जाते थे जो मेरे नन्हें दोस्तों की फरमाइश होती थी। चीज़ और दुर्खा (Yak Cheese) की महक और स्वाद मुझे बिल्कुल पसंद न था पर खाना पड़ता था। न्यु रोड अक्सर पैदल और कभी कभी रिक्शा से चले जाते थे। एक बार पेयर फोटो खिचाने एक बार रंजना में फिल्म देखने और एक बार जुजु भाई टेलर मास्टर के यहाँ सूट का नाप देने न्यू रोड गए थे। बाबुजी के साथ उनका शुक्र पथ स्थित आफिस भी गए थेा। अनिल के साथ भी कई बार न्यू रोड गए थे शायद गुदपाक (मिल्क केक के जैसा नेपाली मिठाई) लाने। मुझे,याद है एक बार अनिल के कुछ साथी दूर से आते दिखे तो अनिल ने मुझे हिदायत दी जीजा जी आप सिर्फ अंग्रेजी में बोलिएगा। थोड़ी नेपाली हर ट्रिप में सीख रहा था। एक बार मैने अपनी नेपाली टेस्ट करने के लिए एक दुकान में जाने से पहले यह शर्त रखी की मै ही नेपाली में बोलूंगा। मैने दुकान वाले से कहा "दाई, डॉट पेन छ ?" यनि भइया डॉट पेन है ? दुकान दार नेवार था जिसका नेपाली उच्चारण समझने में कठिनाई होती है। उसने कहा "राटो माट्रे छ"। मैं तो फ्यूज हो गया और बात बिलकुल नहीं समझ सका और बिना ख़रीदे ही लौट गया। बाद में पता चला वह कह रहा था "रातो मात्रे छ"। यानी सिर्फ़ लाल है। सबको हँसने के लिए यह वाकिया काफ़ी था।  और यह एक मजा़क की बात हो गई।
अनिल से छोटा गुड्डू बाकि सभी बहन भाईयों से बड़ा था और उनका लीडर भी। इन बच्चो के लिए तब मै  एकलौता जीजाजी था । एक दोस्त या मनोरजंन का साधन।उन्हें मेरे साथ खेलना था और मुझे उनके लिए छोटे गिफ्ट जैसे पुष्टकारी (नेपाली होम मेड चॉकलेट), तितौरा (एक खट्टे स्वादवाला चीज़) दुर्खा (याक चीज़) या और कुछ लाना पड़ता था। मै भी अपने नन्हें दोस्तो के साथ समय बिताना पसंद करता था।
काठमांडू में हमारा रूममेरी पत्नी अपने दोस्तों के साथ

बिहार में तब कम उम्र में शादी हो जाती थी। मेरी शादी तो दो साल नौकरी करने के बाद हुई थी पर मेरे सहपाठियों मे कइयों की शादी कॉलेज के दिनों में ही हो गई थी और उनके बच्चे भी थे। साले सालियों के संग चुहल बाज़ी की कहानियाँ इन दोस्तों से सुन चुका था। मेरा अनुभव एक दम अलग था। मेरे साले सालियों में से कुछ एक से बड़े तो मेरे इन सहपाठियों के बच्चे थे।
कई मन्दिरों को देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पशुपति नाथ तो गए ही,शोभा भगवती, श्यम्भु (स्तूप) भी घूम आए। बालाज्यू 22 धारा उद्यान सभी लोग गए। बहुत सारी रोहू कतला मछलियाँ यहाँ छोटे छोटे कृत्रिम तलाबों में रखे गए थे। पत्नी जी ने एक कहानी तुरंत फुरंत सुना दी। कभी एक पहचान का एक माड़वाड़ी परिवार काठमाण्डू घूमने आया था। एक बुजुर्ग महिला ने अपनी बहू को मछली दिखाते हुए कहा था देखो कीड़े कैसे कुलबुला रहे है। अब चूंकि हम लोग मछलियाँ खाते है यह टिप्पणी लोगों को दुखी कर गई।
एक दिन मै गुड्डू के साथ टहलने निकला रास्ते में फुटपाथ पर ही लोग कुछ कुछ छोटे मोटे सामान जैसे भटमास, मूगंफली, विदेशी पेन वैगेरह बेच रहे थे। एक जगह 555, Marcopolo और दूसरे विदेशी सिगरेट बिक रहे थे। मैैने ट्राई करने के लिए एक 555 सिगरेट ले कर सुलगा ली। अब तो गुड्डू बाबू फायर हो गये। चलिए बाबुजी से पिटाई लगवाते है कि धमकी पूरे रास्ते देते आए। घर पहुंच कर हंगमा भी कर दिए कि जीजाजी चुरुट खा कर आए है। एक बार गुड्डू बाबू ने जीजा जी को चाय पिलाने का सोची और बड़े मनोयोग से चाय बनाई जिसमें चाय से ज्यादा ईलायची अदरख वैगेरह थे। चाय तीखी गले में लगने वाली बन गई फिर भी मैने उसका दिल नहीं तोड़ा और कहा अच्छी बनी है। पता चला नेपाली में यहाँ पर "चिया राम्रो छ" के बजाय "चिया मिठो छ" ज्यादा appropriate है। मिठो यानि स्वादिष्ट। राम्रै माने सुन्दर। कई ऐसी घटनाए, मजेदार बातें हुई। जैसा मुझे भिनाज्यू पुकारना। भिनाज्यू माने सेव का बीज वाला बेकार हिस्सा।
कई रिश्तेदार और जान पहचान वाले भी मिलने आए। कईयों के यहाँ मिलने भी गए। लक्ष्मी मामू (गाँव के रिश्ते से) से मिलना याद है। वे आँखों के डाक्टर थे। वे पैलेश के भी डाक्टर थे। उनके परिवार से बहुत ही नजदीक का रिश्ता था और अभी भी है। जितने भी लोग तराई से थे उन सबसे सिन्हा परिवार को प्राय: पहचान थी। एक और विशेष व्यक्ति से भी मिले लाला भैय्या से। अब ने नहीं है पर उनका परिवार सिन्हा परिवार से काफी करीब है। घर के हर प्रयोजन में बुजुर्ग भाभी का होना आवश्यक है। उनके सुपुत्र जयन्त और हेमन्त और परिवार से अन्य सदस्यो से अक्सर अब भी भेंट हो जाती है। लाला भैय्या का घर शायद कोई पुराना दरबार का एक हिस्सा था। उनके पिताजी कभी राणा के सलाहकार थे। रहन सहन राजसी था, उनके बात करने के लहजे और खातिर दारी से भी मै प्रभावित था।

पत्नी जी ने बताया की उनकी सहेलियाँ मिलने आएंगी, मै तो उत्सुक था अब किसी हम उम्र साली जी से मुलाकात होगी। सरिता इनकी सबसे करीब सहपाठी थी और प्रमिला पड़ोस में ही रहती थी। सरिता एक राणा राज परिवार से है और पत्नी जी की सहपाठी थी। खैर जब वे आई भाषा बीच में आ गई, मै नेपाली में सिफर, और व हिन्दी में नासमझ। इन सहेलियों से अब भी मिलता हूँ पर आपस में बातचीत Hi, bye में ही सिमट कर रह जाती है। रजंना में सिनेमा देखने हम दोनों के साथ सरिता भी गयीं थी। ससुराल वाले हमें हर जगह घुमा देना चाहते थे। इसी कड़ी में एक पिकनिक का प्रोग्राम बना। गोकर्ण एक रमणीय जगह थी। राज परिवार के आखेट की जगह। वहीं पिकनिक पर जाना था। हम दोनों, पूरे परिवार और सरिता के साथ पिकनिक जाने वाले थे।
लैंड रोवर हम दोनों
हम दोनों  और सरिता पिकनिक का ग्रुप फोटो


बुवा की एक लैंड रोवर गाड़ी थी। उसे गेराज से निकला गया। चेक करने के बाद पानी पेट्रोल डाला गया। स्टार्ट करने के लिए धक्के की ज़रूरत पड़ी। पर फिर पूरे रास्ते ठीक ही चली। गाड़ी इतनी बड़ी थी की पूरा परिवार ठीक ठाक आ गए। मुझे जमुई की पुरानी बात याद आ गयी। शायद 1967 की जब हम लोग अपने परिवार की पहली कार 1949 ऑस्टिन A-40 से बेगुसराय किसी शादी में जा रहे थे। बच्चे बड़े मिला कर 11-12 लोग आ गए थे उस छोटी गाड़ी में। गाड़ी शायद यह अत्याचार सह न सका। फिर जो हुआ वह किसी और कहानी का विषय है। पिकनिक स्पॉट करीब 10 की. मि. दूर था। मुझे पहले ही बता दिया गया था कि देखते रहिएगा। बहुत सारे हिरण दिखेंगे। सच में बहुत सारे थे। शाम को लौटते समय ज़्यादा नज़दीक आ रहे थे। आँखे भी तब हेडलाइट में चमक रही थी। अब इस जगह पर रिसोर्ट और गोल्फ कोर्स बन गया है।
जब तक खाना बन रहा था हम लोग इधर उधर घूम रहे थे। मनोरम जगह थी। खैर थोड़ी देर लगी पर खाना तैय्यार हो गया। भूख सभी को लग रही थी। बच्चे जाहिर भी कर रहे थे। पर मैं तो दामाद था कैसे कहता भूख लगी जल्दी करो। लोगों ने भोजन तैय्यार होने पर लोगों ने ढ़ेर सारा खिला भी डाला। याद नहीं पर शायद कोई गेम खेले। शाम की चाय बिस्कुट के बाद हम लौट आये। सरिता और हम, पत्नी जी को दुभाषिया बना कर थोड़ी बहुत बात कर पाए। मैने realize किया कि हम एक दूसरे की बातें समझ पा रहे थे पर दूसरे की भाषा के अल्प ज्ञान के complex के चलते बात करने में झिझक रहे थे ।
दो तीन फ़िल्में हमने काठमांडू में देखी है। रंजना में शायद हिन्दी फ़िल्म ही देखी थी। नेपाली फ़िल्म्स कम ही आते थे। माला सिन्हा (हिंदी फ़िल्म अभनेत्री) अभिनीत "माईती घर" और उदित नारायण झा (अब हिन्दी फ़िल्म के प्रसिद्ध गायक) अभिनीत "कुसुमे रुमाल" दो नेपाली फ़िल्म्स मैंने वहाँ देखी है। एक और सिनेमा हाल विश्वज्योति में फ़िल्म देखेने गए । पुराना हॉल था। कभी पत्नी जी इन्दु मौसी के साथ इस हॉल में फिल्म देखने गई थी जब सीलिंग फैन का पत्नी जी के बगल के खाली सीट पर गिर गया था। पूरे समय मेरा ध्यान पंखे पर ही लगा रहा ।

नेपाली गाना सुनने में एक त्यौहार सा फील होता है। पता चला नेपाल में मुख्य त्योहारों के साथ इंद्रा जात्रा, मछेन्द्र नाथ यात्रा वैगेरह होता है। दोहर गीतों में लड़को के ग्रुप और लड़कियों के ग्रुप के बीच छेड़ छाड़ चलती है। अब यु-टयुब पर देखने पर पता चला यह नृत्य बहुत ग्रेस के साथ होता है। पहाड़ की संस्कृति मुझे पहले से ही काफ़ी अच्छी लगती थी। शादी के बाद और अधिक अच्छी लगने लगी थी। तीज में काठमांडू लाल रंग से रंग जाता है। सभी औरते लाल साड़ी और हरे पोते (मोती की माला) में सजती हैं। दशैं (दाशहरा) में बड़ों से छोटें आशीर्वाद लेने आते है और बड़ें आशीष (टीका) के साथ पैसे भी देते है, सबसे मजेदार नेपाली प्रथा तिहार (दिवाली) में देखने को मिलता है। भैलो और देउसी जिसे नेपाल के अलावा दार्जिलिंग, सिक्किम, असम और भारत के कुछ हिस्सों में तिहार (दीवाली) के दौरान गाया जाता है। बच्चे और किशोर इन गीतों को गाते हैं और नृत्य करते हैं क्योंकि वे अपने समुदाय के विभिन्न घरों में जाते हैं, धन इकट्ठा करते हैं, मिठाइयाँ खाते हैं और समृद्धि के लिए आशीर्वाद देते हैं। भैलो को आमतौर पर लड़कियों गाती है, जबकि देउसी को लड़कों द्वारा गाया जाता है। गाय पूजा तो हिंदुस्तान में भी करते है पर यहाँ कौआ और कुकुर (कुत्ता) पूजा भी होती है।
अब बस करता हूँ । फिर मिलेंगे ! फेरी भेटाउला ।

Thursday, October 15, 2020

मेरी पहली नेपाल #यात्रा भाग- १

नारायण हिटी दरबार गोमा गणेश मन्दिर

MENUब्रह्मपुरी मेरा नन-ससुरल बीरगंज बॉर्डर रास्ते के दृश्यअमलेखगंजसीमभंज्याङ्ग और दमनकाठमांडू पहुंचने के बाद

भारत और नेपाल के बीच हमेशा से रोटी बेटी का नाता रहा है । खास कर तराई क्षेत्र में । सन 1973 की बात हैं। दरभंगा में संपन्न हुई हमारी शादी के बाद  पहली बार ससुराल जाने का अनुभव मेरे लिए कुछ अलग-सा था। अलग इसलिए क्योकि मेरी धर्मपत्नी काठमांडू से हैं। वही जन्मी पली पढ़ी। काठमांडू की मेरी पहली यात्रा उत्सुकता भरा था। मेरी पहली विदेश यात्रा। यूँ तो कई देश घूमा हूँ पर मैं कभी वह पहली नेपाल यात्रा भूल नहीं सकता। बस एक हिन्दी फ़िल्म का गाना याद आता हैं "जग घूमया थारे जैसा न कोई"। पहले भाग में मैं यात्रा का वर्णन करूंगा और दूसरे भाग में काठमांडू में प्रथम प्रवास के अन्य अनुभवों का। मैं, पत्नी और माँ बाबूजी (मेरे स्व सास ससुर जी) और मेरे तीन छोटे साले साहेब साथ चले दरभंगा से।यात्रा का पहला भाग तो कोई रोमांच भरा नहीं था ट्रैन से दरभंगा से रक्सौल जाने में क्या रोमांच? छोटी लाइन-मीटर गेज की ट्रैन भीड़ तो होती ही थी। राम-राम कह सफ़र कटा।

ब्रह्मपुरी मेरा नन-ससुरल

रास्ते में बरगैनिया स्टेशन आया तब मेरी पत्नी ने बताया "यही से ब्रह्मपुरी, गौर (नेपाल का एक जिला) जाते हैं जहाँ मेरा नानिहाल हैं"। मैंने तब सोचा मौका लगा तो जाऊँगा वहां । पर मेरे बच्चे तो हो आये मैं ही नहीं गया कभी ।  करीब सात घंटे में यह सफ़र कटा। बड़ी लाइन और तेज़ ट्रेन अब भी पांच घंटे लेती है। मैं, या सच कहूँ तो हम दोनों उत्साहित थे और बिलकुल नहीं थके थे। औरों का पता नहीं ।मेरी पत्नी शादी के पहले करीब छह महीने से दरभंगे में ही थी, और उन्हें भी घर जाने का उत्साह रहा होगा और वह भी पति के साथ ।



ब्रह्मपुरी का घर आज के दिन में 


MENU

बीरगंज बॉर्डर

खैर अब एक नए देश में प्रवेश करने की उत्सुकता मुझ में थी जो लाख छुपाने की कोशिश के वाबजूद जाहिर हो रहीं थी। रात होने वाली थी। यह निश्चित किया गया कि रक्सौल में नहीं रूकेंगे बोर्डर पार कर सीधा बीरगंज जाएगें । इनके पास शादी के लिए काठमांडू से दरभंगा लेकर गए सामान भी था और सुबह-सुबह बीरगंज से निकलना भी था। खैर दो तांगों मे हम सभी आ गए। हमारे साले साहब किशोर और अनिल ने हमे बोर्डर पर चुप ही रहने की हिदायत दी। सभी नेपाली में ही बात कर रहे हो तो चेक पोस्ट पर ज्यादा आसानी होती। हम चल पड़े एक छोटे मैत्री पुल के इस तरफ भारत और दूसरी ओर नेपाल। भारत के तरफ इमीग्रेशन और कस्टम के चेक पोस्ट पास पास ही थे। बाबूजी (मेरे श्वसुर जी) नेपाली कस्टम में कभी कार्यरत थे। जान पहचान भी होगी। तब नेपाल के बहुत से भूभाग के लिए भारत हो कर ही आना जाना पड़ता था। 'गौर'(नेपाल का एक जिला) से आ रहे है कहने भर से और आने वाले कई प्रश्नों से हम बच गए ऐसे भी सभी नेपाली में बात कर ही रहे थे और मैं चुप था। तब आधार कार्ड पैन कार्ड, वोटर कार्ड वैगेरह होते नहीं थे। चूंकि नेपालियों और भारतियों को बोर्डर पर Visa की जरूरत नहीं थी चेक पोस्ट वाले आपकी नागरिगता जाँच करने के लिए कई प्रश्न पूछते थे। कहा से आ रहे है? कहाँ जाना है? क्यों जा रहे है? वैगेरह । नेपाल में कस्टम में थोड़ा सामान के बारे में पूछ ताछ हुई और नेपाल से ही सामान ईन्डिया ले जाया गया था के स्पष्टीकरण के बाद हम आगे बढ़े। नेपाली में लिखे बोर्ड को मै पढ़ता जा रहा था। एक जगह "सटही काउन्टर" लिखा था। मुझे बताया गया यहाँ करेंसी बदल कर नेपाली रुपया दिया जाता है। और साटना मतलब बदलना न कि चिपकाना। मै दौड़ कर 100 भारतीय रुपये के बदले 165 नेपाली रू० ले आया


मै ईधर उधर देखता जा रहा था। साइन बोर्ड पढ़ता जा रहा था। दो तीन नेपाली शब्द तुरतं सीख लिए जैसे भंसार = कस्टम, साटना= Exchange करना, पसल= दुकान। एक जगह लिखा था "यहाँ कुखुरा को मांसु पाईन्छ"। कुखुरा= मुर्गी, आपने क्या सोचा ?  विदेशी समानों से भरे दुकानों को देखते हुए हम बीरगंज के आदर्श नगर बस स्टैन्ड आ पहुचें। काठमांडु के लिए तब सिर्फ त्रिभुवन राजमार्ग ही था। यह एक कठिन पहाड़ी रास्ता है। जबकी अब त्रिसुली नदी के किनारे किनारे सुगम रास्ता बन गया है पर दूरी के हिसाब से पुराना रास्ता काफी छोटा है। उस समय वीरगंज से काठमांडू के लिए सिर्फ तड़के ही बस चलती थी अंतिम बस सुबह दस बजे तक निकल जाती थी। अब तो रात में ही ज्यादातर बसें चलती है। खैर हम तांगे से सीधे बसस्टैंड तक गए। रास्ते में पड़ने वाले सारे प्रतिस्थानो और दुकानों पर राजा और रानी के चित्र अनिवार्य रूप में लगे थे। भारत में भी लोग देवी देवताओ के अलावे नेहरू गाँधी या अन्य राजनीतिज्ञ के चित्र लगते है पर कोई अनिवार्यता नहीं है। 


विंध्यवासिनी मंदिरबीरगंज


MENU

रास्ते के दृश्य

आदर्शनगर बस स्टैंड को अब ओल्ड बस पार्क कहते है और सुना है वह अब भी गाड़ियों का पार्किंग स्थल है। बस स्टैंड पहुंचने पर टमटम वाले के साथ थोड़ी बहस इस बात को लेकर हुई कि किराया Indian currency में देना है या नेपाली में। बाद में पता चला यह हर बार की बात है। बस स्टैंड के चारो और लॉज और होटल्स थे। जल्द ही लॉज बुक कर लिया गया और बस का टिकट भी खरीद लिया गया। हम लोग फ्रेश हो कर बाबु जी के मित्र लाट अंकल से मिल आए और माई थान मन्दिर के दर्शन कर आए। मैं अपनी नई नवेली दुल्हन को भीड़ भाड़ से बचा रहा था, मेरा यह प्रयत्न मम्मी जी की नजरों से छुपी नहीं रह सकी और उनकी मन्द मुस्कुराहट मुझसे छिप न सकी। वापसी पर नजदीक के एक रेस्टॉरेन्ट में डिनर ले कर सो गए। सुबह जल्दी जागना था। सुबह तड़के जल्दी तैय्यार हो गए क्योंकि सभी समान पुलिस यानि प्रहरी से चेक करा कर सील करवाना था बस में चढ़ाने के पहले। शायद आर्म्स या ड्रग के लिए चेक करते होगें। ऐसा करने से रास्ते में जगह-जगह समान खोल कर चेक करवाने से बच जाते थे। सील न किया सामान हर स्टॉप पर खुलवा कर चेक करते थे। अब ऐसा नहीं होता। खैर कचौड़ी जलेबी का लज़ीज नाश्ता कर हम लोग अपनी सीट पर बैठ गए। पहाड़ी रास्ते के कारण छोटी 35 सीट वाली 2x2 बसें ही चलती थी। बस वाले पैैसेन्जर को समय की बहुत याद दिला रहे थे। देर करने पर बस छूटने की धमकी भी दे रहा था। पर बस करीब एक घन्टे देर से खुली। शहर के अन्दर कई जगह रूक कर लोकल सवारी लेते बस आखिर कर बड़े रास्ते पर आ गई।



MENU

अमलेखगंज

हम एक घंटे में अमलेखगंज पहुंच गए। पता चला पहले रेल गाड़ी यहाँ तक आती थी। गूगल करने पर पता चला की नेपाल सरकार रेलवे (NGR) नेपाल का पहला रेलवे था। 1927 में स्थापित और 1965 में बंद हुआ। 47 किमी लंबी ये रेलवे लाइन नैरो गेज थी और भारत में सीमा पार रक्सौल से अमलेखगंज तक था। आगे जाने पर चुरिया माई  मन्दिर के पास सभी बसें रुक रही थी। पूजा करके ही बसें आगे बढ़ती थी । हमारी बस भी रुकी। पुजा कर खलासी ने सबको प्रसाद बाटें। जब बस आगे बढ़ी तो चुरिया माई का महात्म्य पता चला। अब बस टूटते पहाड़ों (Land Sides prone) के ऋंखला से गुजर रही थी।   अगला स्टॉप हेटौंडा था। यह एक औद्योगिक शहर है। अब यहाँ लम्बे पर सहज रास्ते से यानि महेन्द्र राज मार्ग से नारायणघाट और होकर मुंग्लिंग होते हुए भी काठमांडू जाया जा सकते है। तब ऐसा नहीं था। अगले स्टॉप भैसे ( एक जगह का नाम ) में एक छोटे पुल के पार बस रुकी दिन के खाने के लिए। इसके बाद चढ़ाई वाला रास्ता था, सो डर डर कर ताजी मछली भात खाये। अभी तक पुर्वी राप्ती नदी के किनारे किनारे चले जा रहे थे। रोड पर जगह जगह झरने की तरह स्वच्छ पानी गिर रहा था। नेपाली में इसे धारा कहते है। लोग इसी पानी में बर्तन कपडे धोने नहाने से लेकर पीने पकाने का पानी तक ले रहे थे। पानी ठंडा शीतल था और आँखों को बहुत अच्छा लग रहा था।


भैसे ब्रीज काठमाण्डु की पहली कार, कन्धों पर

ड्राईवर रास्ते में  रंग बिरंगी नेपाली पारम्परिक कपड़ो में बस पर चढ़ने वाली मज़दूर युवतियों में चुहल बाज़ी कर रहा था। पत्नी ने बताया कि पहाड़ो में युवक युवतियो के बीच लोक गीतों में सवाल जवाब की प्रतियोगिता चलती है और कोई बुरा नहीं मानता।


च्यायांगबा होइ च्यायांगबा - नेपाली लोक गीत- क्लिक करे !

हम लोग नये जोड़ो के बीच होने वाले बिन मतलब की बातों में लग गए ।रास्ते के बारे में पत्नी जी बताती जा रहीं थी। उन्होंनें बताया कि पहले तराई से काठमाण्डू घाटी लोग भीमफेदी होकर पैदल ही जाते थे। घाटी में पहली कार भी लोगों के कन्धे पर इसी रास्ते ले जाया गया था। 28 किमी का यह पैदल रास्ता लोग तकरीबन तीन दिनों मे पूरा करते थे। यह सोच कर मुझे घबराहट होने लगी कि यदि हमें भी पैदल जाना पड़ा तो कई बार 3000 फीट से 7000-8000 फीट चढ़ाई उतराई (रास्ते का चित्र देखें)   चढाई करते क्या मै सही सलामत पहुंच भी पाता?


भीमफेदीभीमफेदी होकर पैदल रास्ता

नेपाल का सबसे शानदार और रोमांच से भरा राजमार्ग, त्रिभुवन राजपथ है (आमतौर पर जिसे बायरोड या सिर्फ राजपथ (King's way) कहा जाता है, बीरगंज से काठमांडू घाटी की ओर जाता है । कई हेयरपिन मोड़ो की आश्चर्यजनक श्रृंखला के माध्यम से सीधे महाभारत रेंज होते हुए काठमांडू वैली पहुंचाता है यह रास्ता। यह राजमार्ग रोडोडेंड्रोन या गुराँस (नेपाल का राष्ट्रीय फूल, के जंगल से गुजरता है, काफल के बगीचों से भी गुजरता है । हिमालय के शानदार दृश्यों को अपने में समेटे, खासकर दमन से, यह रास्ता अब कम ही उपयोग में आता है और रास्ते में पड़ने वाले गाँवो को जोड़ने वाले रोड बन कर रह गया है। 1950 के दशक के मध्य में भारतीय इंजीनियरों द्वारा निर्मित, राजपथ काठमांडू को बाहरी दुनिया से जोड़ने वाला पहला राजमार्ग है। शायद भारत ने नेपाल हो कर चीनी आक्रमण के जोखिम को कम करने के लिए इस राजमार्ग को कठिन और असुविधाजनक बनाया होगा। चूंकि तेज मुगलिंग / नारायणगढ़ मार्ग ज्यादा लोकप्रिय है, इसलिए इस सड़क से यात्रा अब एक एडवेंचर यात्रा के रूप में बदल गई है, जो इसे माउंटेन बाइकिंग या मोटर साइकिलिंग के लिए एकदम सही बनाता है।


भैसे के बाद चढ़ाई शुरू हो गयी । कई हेयरपिन मोड़ आये। एक जगह गाड़ी आगे जाने के बजाय पीछे भी खिसकने लगी थी जब ड्राइवर ने गियर ब्रेक का सही सही उपयोग कर गाड़ी आगे चलाई।



MENU

सीमभंज्याङ्ग और दमन

सीमभंज्याङ्ग या शिवभंज्यांगदमन से एवेरेस्ट का दृश्य

जल्द ही हम सीमभंज्याङ्ग या शिवभंज्यांग पहुँच गये। सीमभंज्याङ्ग २४८८ मी (८१६० फ़ीट) पर स्थित है और यहाँ  अच्छी ठण्ड लगने लगी। पता चला यहाँ स्नो फॉल भी होता है ।यहाँ से 10-12 कीoमिo बाद हम लोग दमन पहुँच गए जहाँ से एवेरेस्ट का सुन्दर दृश्य मिलता है। टूरिस्ट एवरेस्ट दर्शन के लिए ही यहाँ अब भी आते है। बादल से आकाश ढ़का था। हम तो कुछ देख नहीं पाए पर रुक कर चाय पिए और कुछ स्नैक्स भी खाए। पता चला नेपाली में पीना शब्द प्रयोग में नहीं है,  सभी चीज़े सिर्फ़ खाते है। चुरुट यानी सिगरेट भी खाते है। पानी भी खाते है और चाऊमीन भी खाते है। बिलकुल बंगालियों,की तरह। थोड़ी देर रूक कर बस चल पड़ी। अब उतराइ थी और हम पालूंग घाटी (5700 फ़ीट) पहुँच गए। थोड़ी चहल पहल थी यहाँ। कुछ सवारी भी यहाँ चढ़ी। पहाड़ो का प्रसिद्ध फल जिसे काफल (Bayberry) कहते है और एक चिड़िया जो "काफल पाक्यो" जैसा कुछ बोलता है इस घाटी की विशेषता है। खेत सीढ़ी दार थे। यहाँ से बस खुलने पर फिर चढ़ाई आ गयी और हम तक़रीबन एक घंटे में टीसटुंग देयुराली (६६६० फ़ीट) पहुँच गए। एक छोटा सा क़स्बा था। हर स्टॉप पर सिपाही (प्रहरी) लोग बस पर चढ़ते सील्ड सामान को खलासी की सहायता से चेक करते। हाथ के समान को भी चेक कर रहे थे।


काफल, Bayberry काफल पाक्यो, Cuculus micropterus

अब तक एक जैसे दृश्यों को देख देख कर मैं ऊब सा गया था, और उघंने लगा। थोड़ी देर में शायद झपकी आ गयी। नींद खुली तो तो हम नौबिसे (३१०० फ़ीट) पहुंच रहे थे। आधे से ज्यादा लोग सो या उंघ रहे थे। शाम हो गयी थी। इस घाटी में अँधेरा भी जल्दी ही होता होगा। हम रोड किनारे के झरना या धारा में हाथ मुंह धो कर एक खाने पीने के दुकान में बैठ गए। सभी जरूरत के सामान थे और लेडीज टॉयलेट्स भी था दुकान में। गरमा गरम चावल दाल सब्जी, मीट बना कर दुकानदार ने सभी को खिलाया। शायद दुकनदार से पुरानी पहचान होगी वह हम लोग की विशेष सेवा में लगा था। स्किन सहित मीट पहली बार खा कर करीब ३०-४० मिनट रुकने के बाद हम चल पड़े। पता चला की अब करीब ३० की मी की रास्ता और बचा है । अँधेरे में कई घुमावदार मोड़ आये। जब सामने से ट्रक आते तो वह रुक कर बस को पास दे देता। पहाड़ी रास्ते का यह नॉर्म हर जगह follow किया जाता है। चढ़ने वाली गाड़ी को पास देते है लोग। दूर से ही आने जाने वाली गाड़ियों की लाईट मोड़ पर घूमती दिख जाती है। करीब १२०० फीट की चढ़ाई और बची थी। करीब एक डेढ़ घंटे में हम थानकोट चेक पोस्ट पहुँच गए।




MENU

काठमांडू पहुँचने के बाद

यहाँ सामानो के सील खोल दिए गए और फाइनल चेकिंग हुई।  बहुत सारी बसें चेकिंग के लिए रुकी थी। थोड़ा समय लग गया। असह्य हो चुकि प्रतीक्षा के बाद बस चल पड़ी। कालीमाटी में सामान (सब्जी) उतार कर बस शहर के रास्तो पर चल पड़ी। रास्ते में पड़ने वाले जगहों की जानकारी लगातार मिल रही थी। यह जी पी औ है, बाबुजी का ख़ाम (लिफाफ) बदलने वाला किस्सा भी हो गया जिसमे नेपाली साटना और हिंदी साटना का कन्फ़ुइजान हुआ था। बाबुजी लिफाफ साटने (चिपकाने) के लिए गोंद मांग रहे थे और पोस्ट आफिस वाला सोच रहा था कि पता लिखा लिफाफ लौटाने(नेपाली में साटना) आए है। रत्न पार्क बस अड्डे पर बस रुकी। हम लोग दो टैक्सी ले कर घर (गैरीधारा) के लिए चल पड़े। टैक्सी वाला टूरिस्ट समझ कर ज्यादा पैसा मांग रहा था। सभी को खाँटी नेपाली में बात करते देख सही भाड़े लेने को तैय्यार हो गया। जपानी टोयटा गाड़ी पहली बार देखा और वह भी टैक्सी में चलते हुए। रास्ते में नारायण हिटी दरबार (पुराना राजमहल) और नागपोखरी हो कर हम गैरीधारा पहुचे। नागपोखरी से राजमहल के किनारे किनारे अब एक रोड है, तब नहीं था। पता चला गहरे गढ्ढ़े मे धारा होने के कारण मुहल्ले का नाम गैरीधारा पड़ गया। तब धारा में पानी भी आता था। अब तो प्राय: सूख ही गया है।


हम लोग रात होने बाद घर पहुचें । पहली बार मुझे एक पारंपरिक नेपाली घर को नजदीक से देखने का मौका मिला। घर में दो भाग थे। एक भाग में नाना जी (बुवा) नानू, बड़े मामा, बड़ी मामी, छोटी मामी और मेरे ममेरे छोटे, छोटे साले-सालियाँ रहते थे। कई लोग मेरी शादी में नहीं आ पाए थे। अत: सभी से मिलने और प्रणाम पाती रात में ही करने गए। बड़ी और छोटी मामी बहुत सुन्दर और ग्रेसफुल लगी। बाद में जब मेरे बच्चे हुए तो छोटी मामी को गुड़िया नानी बुलाने लगे। मकान बड़ा सा और तीन तल्लों का था। सबसे नीचे का तल्ला (Ground floor) या झिरी स्टोरेज भूसा वैगरह रखने और गाय बांधने के लिए था। बाथ रूम और नल भी नीचे के तल्ले पर था। पहला, दूसरा तल्ला रहने के लिए था ।

शायद ठण्ड से बचने के लिए ग्राउंड फ्लोर पर बेड रूम नहीं रखते होंगे। सबसे ऊपर attick या नेपाली में ब्यूंगल में रसोई था। एक छोटा कमरा रसोई के सामने था जो मेरे साले साहब बिमल (अब डॉ बिमल) का था। प्रथम तल्ले पर बड़े कमरे में माँ, बाबूजी रहते थे। इसमें धुप अच्छी आती थी और छुट्टी के दिनो में बाबूजी इसी कमरे से ऑफिस का काम भी निपटा लेते थे। ऐसे बाबूजी और मामा जी का ऑफिस वर्मा सिन्हा लॉ कनसर्न नई सड़क के पास था। एक बारदली के पीछे हम लोग का कमरा था। माँ बाबुजी और ३ साले भाइयों के सिवा परिवार में दो और लोग थे। बूढी माई और 'भालू' हमारा कुत्ता। जल्दी ही वह हमें पहचान गया। शायद लोगों का विशेष ध्यान मेरे ऊपर देख वह समझ गया था की मैं इस घर का विशेष सदस्य हूँ।लज़ीज  खाना खा कर हम थोड़ी देर गप्पे मार कर सो गए।


हमारा पारम्परिक नेपाली घर
हमारा पारम्परिक नेपाली घर
नया घर ८०'s में बना

ठण्ड इतनी थी कि जून के महिने में रजाई ओढ़ कर सोये।  मच्छर दानी भी लगाया गया। ज़मीन पर गलीचा बिछा था और छत पर चांदनी लगी थी। बाद में पता लगा फर्श मिटटी की होती है और हर हफ्ते उसे गोबर मिटटी से नीपना पड़ता था. फिर गलीचा और दरी बिछाते है. ड्राइंग रूम में सोफे की जगह पर चारपाटी या ऊंचा गद्दा रखते थे और गलीचे पर झक झक उजाला चादर या जाजीम बिछाया जाता। सब कुछ राजसी लगता। अब तो सब बदल गया है कम ही पारम्परिक घर काठमांडू में होंगे। सारे घर पक्के सीमेंट के बनने लगे और आधुनिक फरनीचर से सजने लगे है।
काठमांडू में अपने बाल सखा और बाल सखियों, यानि मेरे छोटे साले और सालियों के संग बिताये वो दिन बहुत सारी यादगार और मजेदार घटनाओं से भरे पड़े है. मैं उसे दूसरे भाग में लिखने वाला हूँ ! तब तक के लिए bye...

Wednesday, October 7, 2020

बबा जी मामू

कभी कभी खून से गाढ़े रिश्ते भी होते है। हमने यह बाबा जी क रूप में चरितार्थ होते देखा है। हम सबों से मामा भांजा का रिश्ता उन्होंने क्या गजब निभाया। मै तो भीड़ भाड़ में उनके कंधे पर भी बैठा। पापा के साथ साला बहनोई वाली नोक झोंक भी देखी।
मेरे नाना बाबू पुरेन्दर प्रसाद बेगुसराय के प्रमुख वकीलों में थे और उनकी लम्बी चौड़ी जमिन्दारी भी थी। उनके नाम से एक बार-लाइब्रेरी अभी भी जीर्ण अवस्था में कचहरी में मौजूद है। सभी तरह का अनाज, खाने का तेल, आम के दिनों,में आम खेत से आ जाता। शायद ही खाने पीने का कोई सामान दुकान से खरीदना पड़ता। रोज ताजी सब्जियाँ या मछली तो खेत से आ नहीं सकती पीछे बारी में कुछ सब्जियां जैसे कद्दू, ननुआ, भिण्डी, मिर्ची, मूली, गोभी, बैगन, टमाटर उपजा लिया जाता। एक नींबु का पेड़ भी था कुएं के पास। मुझे कुदरूम की याद है जिसकी चटनी बना करती थी। एक पीले (कनैल) फूल का भी पेड़ था जिसका समोसे जैसा फल मैने खा लिया था। जबरदस्ती पानी पिला पिला कर उलटियां करवाई थी लोंगों ने क्योंकि यह जहरीला होता है। मछली सब्जी वाली रोज हमारे आंगन के चक्कर लगा जाती। गाय भी घर पर ही थी, घोड़ा, टमटम, घोड़ेवान भी बाहर के कम्पाऊन्ड में ही थे। हाँ घर पर आलु चॉप या दुकान में बने नमकीन और मिठाई हमारे बड़े मौसेरे भाई बहन जरूर नाना के किरायेदार दुकान वाले से छिप कर मंगा लेते थे। मुझे भी वह आलु चॉप बहुत पसंद था। बबाजी नाना के विश्वस्तों में से थे।
नाना को मैने वृद्ध ही देखा था । उनका व्यक्तित्व आकर्षक था। लम्बा, गोरा रौबदार। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के चेयरमैन रह चुके थे। डिस्ट्रिक्ट बोर्ड का ही अस्पताल भी था और अस्पताल की नर्स दीदी नाना को सुई लगाने घर ही आ जाती। नाना को सुगर की बीमारी थी। नाना की दो शादियाँ थी, या शायद तीन। पहली नानी के बारे में हाल में ही पता चला । मेरी मौसेरी बहन पुष्पा दीदी ने बताया की पहली नानी की कोई निशानी नाना के पास थी जिसे वो अकेले में कभी कभी निकाल कर देखते थे। मेरी अन्य दो नानियों में से बड़ी नानी से बड़ी मौसी जिन्हें हम सभी प्यार से मैय्या कहते थे, और भागलपुर वाली मझली मौसी थी। नानी की मृत्यु के बाद, नाना ने फिर शादी की और छोटी नानी से हुई मेरी माँ। मेरे कोई मामा न थे ।
माँ के छोटे मामा स्व मुनेश्वरबाबू माँ के छोटी मामी
बबाजी या धनुषधारी सिंह रामदिरी के गरीब भुमिहार ब्राह्मण थे। वे कब हमारे परिवार का हिस्सा बने मुझे मालूम नहीं। जबसे होश संभाला उन्हें देखा। यूं तो वे घर में खाना बनाते थे पर घर के किसी सदस्य से न तो उनका रुतबा कम था न हीं उनका स्नेह। हमारे वे ही मामा थे। मेरी माँ को वे किसा (कृष्णा) कहते और बाकी मौसियों को दीदी। कुछ गलत करने पर हमें उनकी डाँट भी सुननी पड़ती। भंसा में हल्ला गुल्ला करने पर उनकी झिड़की "कलमच बैठ" हमें अब भी याद है। नाना की सेवा में वे लगे रहते। खाना देना। दूध देना, दवा देना। उन्हें सभी याद रहता। खाना हम लोग भंसा में जमीन पर पीढ़े पर बैठ कर खाते। रोटियाँ मोटी मीठी मुलायम बनती। हम कुल 18 में से 15 मौसेरे भाई बहन उस समय थे। मेरे तीन और छोटे भाई बहनों का जन्म तब नहीं हुआ था। सबसे छोटी तब मुकुल थी जिसका पहला नाम अस्पाताल में जन्म लेने के कारण अस्पतलनिया पड़ गया था।इतने बड़े कुनबे का खाना बनाने के लिए बाबा जी ने कभी ना नुकुर नहीं की, इसके उलट उन्हें ज्यादा लोंगों का चहल पहल ज्यादा पसंद था। सब लोग बच्चो,सहित काम में हाथ बटा देते, मै तो आँटे की छोटी लोई ले कर साँप या गाय, कुत्ता बनाता रहता । सब्जी काटना, रोटी बेल देना मिल जुल कर हो जाता। बाबाजी हाथ पर ठोक कर  मकई की मोटी रोटी बहुत अच्छी बनाते। फिर वैसी रोटी मैने कभी नहीं खाई। ओल के खट्टे भरता के साथ वह अलौकिक लगता था । नेनुआ के सब्जी मूली से साथ बनता था जो मुझे बहुत पसंद था
एक वक्त वह भी आया जब हम सभी अपने ठौर ठिकाने पर चले गए, पटना, भागलपुर या जमुई। सबसे बड़ी मौसेरी बहन शान्ति दीदी वहीं स्कूल में टीचर थी। बड़े मौसा के गुजर जाने के बाद, अपने बलबूते पर पढ़ाई की नौकरी की भाई बहनो की भी जिम्मेवारी उठाई। दीदी ने जब ग्रेजुएशन किया तब उनका तबादला पटना हो गया। नाना बिल्कुल अकेले हो गए। सज्जन भैय्या कभी कभी नाना के पास आ जाते। यह वो वक्त था जब बाबा जी ने एक बेटे की भांति नाना कि सेवा की बबाजी अक्सर हम लोगों को ननिहाल से घर पहुचाते थे। उनका ममत्व हमेशा हम पर रहा। जब ही आते उनके हाथ की खिचड़ी खाने का लोभ हम संवरन नही कर पाते।
सिमरीया घाट बाबा धाम मंदिर
बाबा जी एक समर्पित शिव भक्त थे। देवघर स्थित बाबाधाम ( 12 ज्योतिर्लिंगों में एक), साल में कई बार जाते और सावन में सुल्तानगंज के बजाय सिमरिया से ही जल भर कांवर ले चल पड़ते। तब कांवर के रास्ते न दुकानों से सजते थे न हीं रास्ता के किनारे बालू वैगेरह डाले जाते। सुईयां पहाड़ सच में सुई का ही पहाड़ था। 8-10 दिन का रसद, ओढ़ने बिछाने के सामान, छाता, लाठी साथ में लिए तिरहुतिया कावंर ले कर 50-60 किमी की अतिरिक्त दूरी तय करते। जगह जगह रुक कर खाना पकाना, नहाना करते दुर्गम यात्रा करनी पड़ती थी । कुछ ही लोग यह कर पाते थे।अब तो कांवर यात्रा पिकनिक की तरह सुगम हो गई है। ईडली, दोसा, समोसा खाते गाना गाते भीड़ रेले की तरह लोग कांवर यात्रा कर लेते है। कांवर यात्रा में खान पान में साफ सफाई या गंदे पानी के उपयोग से बाबा जी क्रोनिक डिसेन्ट्री के मरीज हो गए। इस रोग ने ताजन्म उनका साथ न छोड़ा। फिर भी उन्होंने कांवर ले कर जाना नहीं छोड़ा। हर बार बाबाधाम से लौटते समय वहां काा पेड़ा चूड़ा हम लोगों को जमुई दे जाया करते। बबा जी जी ने अपनी कमाई से थोड़ा थोड़ा बचा कर अपने मृत्यु के कुछ महीने पहले एक शिव मन्दिर अपने गांव में बनवाया था। प्राण प्रतिष्ठा में सबको बुलाया था। अफसोस सिर्फ मै हीं जा पाया । काफी मशक्कत के बाद मै पहुंचा। थोड़ी बारिश में दलदल से भर जाने वाले गांव में जहाँ घुड़सवारी लोकप्रिय थी, मुझे रिक्शा से उतर कर पैदल ही जाना पड़ा ।
कावंर रामदीरी गांव
मन्दिर में बाहर का प्लास्टर लगना अभी भी बाकी था। बबाजी अपने जीवन काल में ही शिव मन्दिर का काम समाप्त कर लेना चाहते थे। मेरे स्वागत में बाबाजी के भतीजे लगे थे। खाना पीना आडंबर रहित था। बाबा जी ने शादी नहीं की थी। उनके गाँव जा कर लगा सारी जमीन हम नाकारो को देने के वजाय नाना काश कुछ जमीन अपने इस निर्धन बेटे को दे जाते। उनका बुढ़ापा तो आराम से कट जाता। ऐसे मै मानता हूँ ऐसा बाबा जी ने भी नहीं चाहा होगा। उन्होंने शायद ही कोई उम्मीद रक्खी होगी। उन्हे हमलोग एक परिवार दे पाए और वे इसमें ही खुश थे। बबाजी के देहांत की कोई खबर समय पर नहीं पहुंची। हमें बिना कुछ कष्ट दिए वो चले गए। काश उनके लिए हम लोग कुछ कर पाते। हम बबाजी के ममत्व के हमेशा ऋणी रहेंगे।

Thursday, September 10, 2020

बचपन में घर से मैं भी भागा था

 सुना था जिन्दगी में हर कोई एक न एक बार घर से जरूर भागता है। यह उसके आत्मनिर्भर होने की प्रक्रिया ही है। न न मै कभी भाग कर मुम्बई, कोलकाता वैगेरह नहीं गया बस दो तीन बार कुछ छोटी मोटी दूरी तय की है। पहले पहल मैं प्राइमरी स्कूल जमुई से भाग जाया करता था और बाजार के आस पास समय काट कर घर लौट जाता। मेरे पास गाँधी टोपी नहीं थी और टोपी नहीं होने से कक्षा में पूरे period खड़ा कर देते थे। मैने घर में टोपी की बात नहीं की क्योंकि दो दो बार टोपियाँ सिलवाई गयी थी और मै दोनो बार स्कूल में भूल आया था। इस बार किसीको बताने से बेहतर मैने हलीम मियाँ, जो हमारे पारिवारिक दर्जी थे, के पीछे पड़ना श्रेयस्कर समझा। एक दिन मैं उनके दुकान में बैठ गया और तब तक घर नहीं गया जब तक उन्होंने किसी और के पैजामे के कपड़े से मेरी टोपी सिल कर नहीं दे दी। तब मैं छ साल का रहा हूँगा। स्कूल से इस तरह भाग जाना तो किसीके नज़र नहीं आया पर तकरीबन एक  साल बाद मैं एक बार फिर घर से भगा था । तब एक प्रदर्शनी 'नूमर '  नाम के गांव में लगी थी जिसे हम भाई बहन कुछ दिनों पहले माँ पापा के साथ देख आए थे । 

Kali Mandir at Jamui StationPatneshar Pahar
यह गांव हमारे घर से नौ मील दूर है। खादी और ग्राम उद्योग की प्रदर्शनी और मेला था। मेले के बाद गावं का नाम ही बदल कर खादीग्राम हो गया है। मेरा बाल मन प्रदर्शनी-मेला घूम कर भरा न था। किस बच्चे का मन कठघोरवा (Merry Go round) और तारा मांची (हिंडोला) पर चढ़ने से भरता है भला ? बहुत सारे दूसरे आकर्षण भी थे मेले में । जब दुबारा मेला घूमने की मेरी इच्छा पूरी होती न दिखी तो मैंने अकेले जाने का फैसला कर लिया। शायद उस दिन रविवार था। मैं नश्ता कर के पैदल ही निकल पड़ा। न ही कुछ पैसा वैगरह लिया न ही किसीकी को बताया। रास्ता सीधा था और मुझे याद भी था। पहली बार तो टमटम (एक तरह का एक्का) से गए थे। पर इस बार यह संभव न था। बालपन के ज़िद या मासुमियत में मै पैदल ही चल पड़ा। रविवार था रास्ता भी खाली था। कचहरी चौक जहाँ हमेशा भीड़ लगी रहती भी सुनसान था। मै चलता गया। पापा काफी लोक प्रिय डॉक्टर थे। इस कारण बहुत सारे लोग मुझे भी पहचानते थे। लोगों ने शायद सोचा होगा लड़का रविवार की सुबह खेलने जा रहा है । किसी ने ध्यान नहीं दिया ना ही टोका पर कुछ लोगों ने पहचाना था और नोटिस भी किया ही होगा। खैर मैं चल पड़ा। तीन मील ( 5 km)  से ज्यादा की दूरी बिना कहीं रुके पूरी कर ली।

Government High School, Jamui Estd 1894
कचहरी चौक, जमुई High School - Old Science block and well
मै चलता चला गया और खैरमा गांव पार कर किउल नदी पर बने पूल पर आ गया । तभी एक टमटम मेरे पास आ कर रुका। टमटम वाला मुझे पहचानता था । पापा के दवाई का पार्सल वहीं मल्लेपूर से हमारे घर तक पहुंचाता था। मैंने उससे कहा मुझे खादीग्राम मेला देखने जाना हैं आप ले जाओगे ? उसने कहा " मेलवा तो कै दिन होलो खतम होय गेलो है, अब जाय के कि करभो" यानि प्रदर्शनी मेला तो कब का खतम हो गया है अब जा कर क्या करोगे ? उसने मुझे साथ वापस चलने को कहा। चूंकि अब मेरे आगे जाने का प्रयोजन ही नहीं रहा और उसके साथ न आता तो पैदल ही वापस आना पड़ता यह सब सोच कर मैं टमटम पर चढ़ गया  और वापस घर आ गया। गाड़ीवान घर तक छोड़ गया और सारी बातें मेरे पिता को बता भी दी ।
मैं करीब दो घंटे से गायब था लोग यह सोच रहे थे कि कहीं खेलने गया होगा । पर जब ट्यूशन पढ़ाने वाले मास्टर जी आये तब लोगों ने खोजना शुरु किया। पड़ोस के मेरे सारे दोस्तों के यहाँ, अंजू दीदी (बड़ी दीदी) और लिल्ली दीदी के सहेलियों के घर में, सभी जगह खोजा जा चुका था मै। पिटना तय था। पापा को गुस्सा तो बहुत आ रहा था स्टेथेस्कोप का पाइप हंटर के तरह प्रयोग के लिए निकाला जा चुका था। बचने के लिए मैं पलंग के नीचे घुस गया। तब तक दो चार थप्पड़ लग चुका था। माँ ने बड़ी मुश्किल से बचा लिया। बस थप्पड़ की ही मार पड़ी। 
मास्टर साहेब का ज़िक्र आने से एक बात याद आ रही है। मैं जन्म से लेफ्ट Hander हूँ । शायद खानदानी असर है। मेरे छोटे चाचा (छोटा बाबू) और मेरी पोती भी लेफ्ट Hander है। मुझे पता नहीं होता था कि दाहिना हाथ कौन है और बायां हाथ कौन है। अभी भी दाँए हाथ के एक तिल देख कर पता लगता हूँ किधर दाँया है और  बाँया किधर है । बचपन में लोग चिढ़ाते बाँये हाथ से क्यों खा रहे हो तब मैं दूसरे हाथ से खाने लगता। लोग फिर चिढ़ाते यही तो हैं बाँया हाथ। तब चिढ़कर मैं दोनों हाथों से खाने लगता। मुझे बाएं हाथ से लिखता देख मास्टर जी का पारा चढ़ जाता। एक दिन उन्होंने एक जोरदार चपत लगा कर पूछा तुम्हारा दाँया हाथ कौन है मैंने शायद गलत बताया। एक चपत और लगी। उन्होंने मुझे दक्षिण के तरफ मुंह करके खड़ा कर दिया और पूछा पश्चिम किधर है। मुझे दिशा ज्ञान था क्योंकि घर के कमरों का नाम थे दखिनवारी घर, पछियारी घर, पुरबारी घर इत्यादि। मैंने बता दिया पश्चिम किधर हैं एक चपत लगा कर बताया गया दक्षिण के तरफ खड़े होने पर जो हाथ पश्चिम की तरफ हैं वो ही दाया हाथ हैं। इसी हाथ से ही लिखा करो इसी हाथ से  खाया करो। एक जन्मजात लेफ्ट Hander को उन्होंने जबरन राइट Hander बना डाला।आज भी मैं खाने लिखने के अलावा अन्य काम बाएँ हाथ से ही करता हूँ। लोगों को दिक् लगता हैं । उन्हें लगता हैं कि कुछ उल्टा कर रहा हूँ। अक्सर सारे उपकरण कैची पीलर वैगेरह दाये हाथ की लिए ही बने होते हैं। काश कोई हमलोगों के लिए भी आंदोलन करता।

भागने की दूसरी घटना मुंगेर की है। लेकिन मेरा मानना है मैं नहीं भागा या खोया पर मेरी मंझली फुआ ही खो गयी। हम लोग परिवार सहित एक शादी में मुंगेर लल्लू पोखर पापा के चचेरे भाई उमेश चाचा के यहाँ गए थे उनकी बेटी प्रेमा दीदी की शादी थी। मेरी स्वर्गीय मंझली फुआ भी साथ थी। कोई रिश्तेदार किसी स्कूल के हॉस्टल में वार्डन थे। उनके यहाँ जाने के लिए फुआ तैयार हुई तो मुझे भी साथ ले लिया। कोई और साथ जाने के लिए फ्री नहीं तो छोटा मोटा मर्द ही सही। मैं आठ नौ साल का। हम एक रिक्शा से गए थे। मुंगेर का मेरा यह पहला सफ़र था।
लाल दरबाज़ा, मुंगेरनीलम सिनेमा, मुंगेर
मै पूरे रास्ते देखता गया कि कौन कौन सी दुकान रास्ते में पड़ी और कहाँ क्या है। मुझे रास्ते में नीलम सिनेमा भी दिखा जहाँ से बाएं मुड़े थे। आखिर हम उनके यहाँ पहुचे जहाँ जाना था। मैने स्कूल के गेट से हॉस्टल वार्डन के घर का रास्ता भी देखता आया था। घर में सिर्फ दो अधेड़ औरते थी। बच्चे स्कूल गए होंगे। हमें कुछ मिठाई वैगेरह दे कर तीनो औरते बातों में लग गई। थोड़ी देर आंगन में बैठा थक कर मै क्वार्टर के गार्डन और आस पास घूमने देखने में थोड़ी देर व्यस्त रहा। जब सब देख दाख कर लौटा तो घर में कोई न था। फुआ लोग किसी कमरे में बातों में लग गई थी पर मुझे लगा फुआ लौट गयी, मै साथ आया हूँ भूल गई होंगी। नहीं नहीं मै किंचित नहीं घबराया थोड़ी देर इंतज़ार किया कोई आवाज़ भी नहीं आ रही थी। मै उठा और वापस चल पड़ा। रास्ता मुझे याद ही था। घर पहुंचने पर भीड़ भाड़ में मै मगन हो गया। बाहर जहाँ मिठाई बन रही थी वहाँ की गतिविधियाँ देखने लगा। अनिल भैया (अनिल भूषण प्रसाद, अवकाश प्राप्त IAS) मुझे बुला कर ले गए और मै बाकी बच्चों के साथ खेलने में व्यस्त हो गया। मुझे फुआ की याद तब तक नहीं आयी जब तक रोते बिलखते वो खुद न आ गयी। मुझे वापस आया देख उन्हें कैसा लगा होगा मैने तब सोचा भी न था, आप ही बताएं उन्हें गुस्सा आया होगा या प्यार। आप यह भी बताए मै खोया था या फुआ खोयी थी।
चौथी बार मै जानबूझ कर योजना बना कर घर से गायब हुआ था। 10-11 साल का था। वाकया जमुई का ही है। गर्मी के दिन थे और मॉर्निगं स्कूल चल रहा था। मै तब शास्त्रीय संगीत सीख रहा था। स्कूल के बाद करीब दो बजे से जमुई हाई स्कूल में ही क्लास चलता था। शिक्षक थे बजरंगी बाबू जो स्कूल में ही क्लर्क थे और किरानी बाबू यानि बैजनाथ चाचा जिनका घर हमारे मोहल्ले में ही था। बैजनाथ चाचा के पिता स्व रामजश पान्डे जी UP के बनारस के आसपास से किसी गांव से आ कर जमुई में ही बस गए थे। मोहल्ले में उस परिवार के पास तीन घर थे। एक में किरानी बाबू का परिवार रहता था। हमारे घर के बाद उनके घर में ही सार्वजनिक उपयोग के लिए कुआँ था। शहर में कई लोगों के यहाँ कुआँ घर के बाहर बने थे ताकि दूसरे भी पानी भर सके। मेरे सहपाठी अवनी सिन्हा (मन्टू) के यहाँ भी कुआँ घर के बाहर ही था। किरानी बाबू के घर के साथ लगे क्वार्टर नुमा घर में कमला दी (अंजु दी की सहेली) रहती थी और सामने वाले घर में PWD का आफिस था। अब सामने वाले घर में किरानी बाबू का छोटा बेटा रहता है। बैजनाथ चाचा स्कूल में हेड क्लर्क थे। तबला बहुत ही अच्छा बजाते थे। बजरंगी बाबू सुरीले गायक थे। शास्त्रिय संगीत का भी अच्छा ज्ञान था। शहर में संगीत के प्रोग्राम का अक्सर आयोजन होता और शायद ही कोई आयोजन बिना दोनों की सहभागिता के पूरा होता। मेरे छोटे संगीत सफर में ये दोनों ही मेरे गाइड और गुरू थे। मुझे याद नहीं मैंने संगीत की इस गैर जरूरी कक्षा में क्यों प्रवेश लिया था। पर अब सोचता हूँ तब दो कारण समझ में आता है एक तो यह नि:शुल्क था, दूजे किरानी बाबू ने पापा को यही परामर्श दिया होगा।

हमारा घरमहादेव सिमरिया
मुझे शुरू में-सा रे गा मा गाने में वही परेशानी हुई जो सुनील दत्त साहेब को पड़ोसन में किशोर कुमार से सरगम सीखने में हुई थी। पर शीघ्र ही मैं सुर में गाने लगा था। तबला तो बजाना सीख नहीं रहा था पर ताल के बारे में तो जानना ही पड़ता है। तीन ताल, एक ताल, झपताल, दादरा कहरवा सब कुछ सीखा था। ताली और खाली पर ताली देनी पड़ती थी। खैर! शहर में एक सर्कस आया हुआ था। रोज़ टमटम पर प्रचार कर रहे थे।
बहुत पहले जमुई में जैमिनी सर्कस आया था पंच मंदिर में टेंट लगा था। पूरे परिवार के साथ देखने गए थे फिर सर्कस आया है जान कर सकुचाते हुए एक दो बार घर पर बात चलायी पर लोगों ने बच्चे को इग्नोर कर दिया। मैंने फिर एक प्लान बनाया । टिकट कुल छह आठ आने का ही थे। मैंने माँ से कुछ बहाने बना कर मांगा। जब दो चवन्निया इकठ्ठा हो गयी तब एक दिन दोपहर संगीत कक्षा जाना है बता कर घर से निकल पड़ा।

पंच मंदिर दुर्गा पूजा मेलानेतुला मंदिर, कुमार, जमुई

सर्कस गिरीश टाकीज़ से आगे भछियार-नीमा मार्ग पर लगा था। प्रशिद्ध पथ्थर काली मंदिर से थोड़ा पहले। पैदल पैदल चल कर मैं वह शो के समय (३ बजे) से काफी पहले २- २:१५ तक पहुंच गया। टुटपुँजिया सर्कस था। मरियल सा बाघ भी था जिसे पिंजरे में बाहर ही रखा हुआ था। टिकट खरीदने गया तो पता चला शो के १५ मिनट पहले टिकट कटना शुरू होगा। प्रतीक्षा करने के सिवा कोई चारा ना था। प्लान था की ५ बजे सर्कस ख़तम हो जायेगा तो ६ बजे के पहले घर पहुँच जाऊंगा और किसीको कुछ पता भी नहीं चलेगा। खैर किसी किसी तरह टिकट खिड़की खुलने का समय हो गया। कुल ६-७ ही लोग टिकट खरीदने की प्रतीक्षा कर रहे थे। टिकट खिड़की वाले ने तब कहा ३ बजे का शो कैंसिल हो गया है। ६ बजे का टिकट लेना है तो ले लो। मैंने फिर एक क्रन्तिकारी निर्णय लिया। कुछ भी हो जाये सर्कस देख कर ही जाऊंगा। सबसे ऊँचे क्लास का टिकट था सात आने। ऐसे चवन्नी वाला क्लास भी था। सबसे आगे बैठना है यह सोच कर ७ आने का टिकट खरीद कर प्रतीक्षा करने लगा। प्रतिक्षा करने के वे  अब तक की सबसे लम्बे तीन घंटे थे। करीब 5:30 पर गेट खुला और हम अंदर गए। अब तक काफ़ी लोग आ गए थे। सबसे आगे वाले लाईन में कॉरिडोर के बगल वाले सीट पर मैं बैठ गया। कुछ फ़िल्मी गानाा बजाया जा रहा था। टनटन-पहली घंटी बजी। आशा जगी। जोकर लोग इधर उधर जा-जा कर चीजों को ठीक जगह पर रख कर तैय्यारी करने लगे। दूसरी घंटी भी बजी। राम-राम कर तीसरी घंटी भी बजी। मेरे कान पर कुछ लगा। मैंने सोचा कीड़ा होगा। झटक कर हटाने लगा। फिर लगा कोई मेरे कान पकड़ रहा है। मैं पीछे मुड़ कर कुछ कहने वाला ही था कि छोटा बाबू दिख गए। वे ही मेरा कान पकड़ रहे थे। आगे आप ख़ुद सोचो क्या हुआ होगा। बस मैने मार नहीं खाई। पर किसी ने सर्कस दिखाने की दरियादिली भी नहीं दिखाई। याद नहीं शायद अगली बार सर्कस मैने अपने बच्चो के साथ बोकारो में देखी थी।

Sunday, August 9, 2020

कुआलालम्पुर #यात्रा - दक्षिण अफ्रीका जाते आते (१९९६)

1996 मई की बात है। मेकॉन से चार इंजीनियरों की एक टीम मेरे नेतृत्व में दक्षिण अफ्रीका जा रही थी। वहाँ 4-6 महीने प्रिटोरिया में रुकना था। ग्राहक Balaji Steel के भी दो इंजीनियर और उनके बॉस साथ थे।  अभी अफ्रीका में रंग भेद ख़त्म हुए दो साल से भी काम समय हुआ था हम आशंकित भी थे। सुना था प्रीटोरिया में सिर्फ़ गोरों को ही रुकने दिया जाता है। हमें वहीं जाना था। ISCOR जो अब लक्ष्मी मित्तल का स्टील प्लांट है से एक पूरी तरह बंद वायर रोड मिल dismantle   कर भारत लाना था और उसे ठीक ठाक कर के चलना भी था।
 हमें मलेशियन एयर लाइन्स से चेन्नई से जोहानसबर्ग जाना था और कुआला लम्पुर हो कर जाना था। दोनों तरफ के टिकट था। और लौटना भी कुआला लम्पुर हो कर ही था। हम सभी काफी उत्साहित थे। चेन्नई से कुआला लम्पुर  का सफर चार घंटे का था। उस समय मलेशियन एयर लाइन्स को top का रैंक मिला था। हम लोग भी उनके सर्विस से काफी प्रभावित थे। कुआला लम्पुर का इंटरनेशनल एयरपोर्ट काफी मनमोहक और आधुनिक था। हमे Kualalumpur में एक दिन रुकना था। Kuala Lumpur एयरपोर्ट पर ही  Visa On Arrival लेना था। हमलोग विंडो शॉपिंग करते हुए वीसा ऑफिस पहुँच गए। मलेशियन एयर लाइन्स का ले ओवर वाला होटल नज़दीक था पर पैदल जाने लायक दूरी नहीं थी  सामान भी था इसलिए एयरलाइन्स की बस से ही जाना तय था। हम जल्दी में थे। ताकि आज भी कुछ घूम सके।

सात लोगों का फॉर्म भरते-भरते काफ़ी समय लग गया। हमारे पास सिर्फ़ दो पेन थे। फॉर्म छोटा ही था पर पासपोर्ट खोलना उसका डिटेल्स लिखना कहाँ रुकेंगे क्यों आये हैं वैगेरह भरने में समय तो लगता ही है। फॉर्म भर कर एक-एक कर जमाकर किया गया और पासपोर्ट पर वीसा स्टाम्प लगा कर जब जाने को हुए तभी छह लोग जो वहाँ हमसे पहले से प्रतीक्षा कर रहे थे ने हमे रोक लिया। वह बांग्ला में कुछ कह रहे थे। रूक कर पूछा तो वह फॉर्म भरने में हमारी मदद चाहते थे। अब समझ आया कि हमलोगों को देख कर उनके चेहरों पर मुस्कराहट क्यों आयी थी। हम फॉर्म में कहाँ क्या भरना हैं कह कर चलने को उद्यत हुए तो उन्होंने बांग्ला में कुछ कहा जो मेरे पल्ले नहीं पड़ा। वे बंगलादेशी थे और अलग ही तरह का बांग्ला बोल रहे थे। मैं और हमारे सहकर्मी श्री अधिकारी ही बंगाला बोल समझ लेते थे। श्री अधिकारी ने बताया कि वे लोग लिख पढ़ नहीं सकते सिर्फ़ दस्तखत ही करना जानते है, यानी वे चाह रहे थे कि हम ही उनका सारा फॉर्म भर दे। उनकी हालत देख हमारे सभी साथी राजी हो गए। हम और श्री अधिकारी उनसे पूछ-पूछ कर फॉर्म भरने लगे। उनकी कुछ कुछ बातें ही मुझे या श्री अधिकारी को ही समझ आ रही थी। श्री अधिकारी ने बताया ये सभी चिटगांव से हैं और चितगावंली बोलते है। मुश्किल-मुश्किल से उनका फॉर्म भर सके। मुझे अनायास उस समय एक वाकया याद आ गया जब एक यात्री ने मुझसे अमेरिका जाते वक़्त disembarkation  फॉर्म भर देने को कहा था। किसी आमिर परिवार का वह आदमी जिसने मुफ्त की शराब काफी पी रखी थी, अपने बेटे के पास जा रहा था। ज़ाहिर था वे भी पढ़ना लिखना नहीं जानते थे पर काम कैसे निकलना है ज़रूर जानते थे। उतरने के बाद उन्हें आपसे कोई मतलब नहीं होता और धन्यवाद की तो आशा ही मत करो। पर ये लोग कृतार्थ थे और बार-बार धन्यवाद कह रहे थे।

कुछ मिनटों में हमलोग सामा सामा एक्सप्रेस होटल पहुचें। काफी भूख लगी थी। रूम में जानें के पहले सबकी इच्छा नाश्ता करने की हुई। डाईनिंग हॉल में snacks के लिए buffet सजा था पर समझ नहीं आ रहा था कि कौन निरामिष खाना है। स्वादिष्ट खाने की बात तो गौण  हो गई थी। बालाजी स्टील (हमारा ग्राहक) के दक्षिण भारतीय वरीय अधिकारी जो साथ ही यात्रा कर रहे थे और vegetarian भी थे वो पहले भी आ चुके थे,  उन्हीं का चुना हुआ कुछ खा कर होटल के shuttle service से हम एक मुख्य चौरहे तक के ड्राप पॉइंट तक निकल पड़े फिर टैक्सी ले ली. । रास्ते में  काफी ज्यादा traffic था। आश्चर्य जनक बात थी two wheeler के लिए अलग लेन। पता चला दो पहिया वाहन जाम लगाने में प्रथम स्थान पर था। अच्छा लगा। एक मलेशियन कार भी दिखी। मलेशिया एक मुस्लिम देश है अब का पता नहीं पर  तब काफी tolerant था। पर्दा का चलन भी कम था। मलय उनकी मुख्य भाषा है पर जान कर अच्छा लगा कि तमिल भी एक आधिकारिक भाषा थी। मंगोल चेहरो के साथ हमारे जैसे दिखने वाले लोग भी थे।अब कुआला लम्पुर में मोनोरेल मेट्रो जैसे सार्वजानिक यातायात के साधन है तब ऐसे नहीं था। बस के विशेष लेन थे। हमलोग करीब 40-50 मिनट में लिटिल इंडिया मार्किट पहुँच गए. दुकानों के नाम अशोका, बालाजी, कुमार, मुरुगन जैसे देख कर बहुत अच्छा लगा। कुछ मोमेंटो खरीद कर हम फल देखने लगे। सभी तरह के भारतीय फल थे। लीची भी। वह भी मुजफ्फरपुर का। पर दाम सुन कर होश उड़ गए. हम रात के खाने के पहले होटल लौट आये। दूसरे दिन का आधा दिन का टूर का प्लान किया खाना खाया और सो गए। टीवी पर एक तमिल फ़िल्म देखने की कोशिश की पर थक कर कब सो गए पता नहीं चला।
Near Little IndiaLittle India

दूसरे दिन हम लोग का फ्लाइट रात का था. हम लोगों ने बाटु गुफा - मुरुगन मंदिर सहित एक टूर ले लिया. कुछ प्राइवेट इन्सेक्ट एंड बटरफ्लाई और हस्तशिल्प म्यूजियम देखे, Petronas ट्विन टावर(तब दुनिया की सबसे ऊँची ईमारत) तो हर जगह से दिख ही रहा था। तब इस टावर को बने कुछ ही महीने हुए थे और टावर की opening भी नहीं हुई थी।
Insect-butterfly museumInsect-butterfly museum



बाटु गुफा मुरुगन मंदिर
रात के फ्लाइट से हम साउथ अफ्रीका चले गए। छह महीने बाद मेकन की टीम लौट आई.लौटते समय टिकट मिलने में दिक्कत हो रही थी। हमारे ज़ोर देने पर कस्टमर ने बिज़नेस क्लास से भेजा। फिर कुआलालम्पुर हो कर ही लौटे। इस लिए बार  KL में ज़्यादा समय मिला तो हम लोग फिर बाटु गुफा गए. पिछले बार पूजा नहीं किये थे इस बार बन्दर से बचते-बचते मुरुगन, शिव पार्वती सभी की पूजा भी किये। पिछली बार सारी सीढ़ियां नहीं चढ़ी थी. इस बार एक दम ऊपर तक गए. टैक्सी वाले के सुझाव पर  एक कांसा (ब्रोंज) और प्युटर फैक्ट्री और रबर प्लांटेशन भी देखने गए ।
इंडिया रबर या प्राकृतिक रबर का मलेशिया पांचवां मुख्य उत्पादक है और यहाँ रबर से बने वस्तुओं की खपत भी काफी ज्यादा है. प्राकृतिक रबर, रबर ट्री से निकला जाता है. मलेशिया में बहुत बड़े क्षेत्रफल में रबर ट्री उगाये जाते है. हमारे लिए भी यह कौतुहल का विषय था और हम रबर ट्री और लेटेक्स कैसे निकलते है देखने गए.

रबर प्लांटेशन के रास्ते में 
लेटेक्स निकलते हुए



Largest beer mug in the world View of Twin Tower
ब्रॉन्ज़ एक टीन और कॉपर का एक मिश्र धातु है. पिउटर टीन एंटीमनी और कॉपर का मिश्र धातु है. मलेशिया में टीन बहुतायत में मिलता है और यहाँ ब्रॉन्ज़ और पिउटर की कई कारखाने हैं. टैक्सी वाला हमें रॉयल सेलेनगर के कारखाने में ले गया. १८८५ में शुरू होने वाली यह फैक्ट्री उस समय तीसरी पीढ़ी चला रही थी. २४ साल पहले की बात है अब तक शायद एक दो पीढ़ी बाद के लोग  चला रहे हो. फॉउंडरी और ढलाई का मशीन देखी. तकनिकी बात पूछने लगे तो हमें कारखाने के हेड के पास ले गए. हमने अपना परिचय दिया कि हम भी मेटल उद्योग है और दोस्ती हो गयी. उन्होंने काफी भी पिलाई. दुनिया की सबसे बड़े पिउटर के बने बियर मग को यही देखा.
Random PhotoFrom top of Batu Cave
तब कैमरे में फिल्म लोड करना होता था. हम सोच समझ कर ही फोटो खींचते थे. कलर फिल्म का चलन शुरू हो गया था. मेरे पास एक यशिका कैमरा था सेमि-आटोमेटिक. उसे मैंने जर्मनी में ख़रीदा था. उसे कही दूसरे देश नहीं ले जाते क्योंकि लौटने पर कस्टम वाले परेशान करते थे. जहाँ गए एक सस्ता सा कैमरा या एक बार युज करने लायक कैमरा ही खरीदते. पर इस बार मैं एक तीन साल पुराना कैमरा ले कर गया था जिसे अमेरिका में ख़रीदा था. शायद Chinon कैमरा था। सारे फिल्म कैमरे अब किसी बक्से में बन्द पड़े है । खैर कैमरा साथ होना ही काफी नहीं था।  कभी रील ले जाना भूल  जाते, रील खतम हो जाता या बैटरी कम पड जाती. रील को दुबारा एक्सपोज़ करने से तो यह कैमरा बचा देता था पर समय पर रील आगे बढ़ा हुआ नहीं मिलता और अच्छे दृश्य निकल जाते. हमारे पास इस ट्रिप की कम ही फोटो हैं पर जितना था उसका उपयोग किया जितना याद था लिखा भी. अब आगे दक्षिण अफ्रीका की बाते अगले ब्लोग में।