
वो है नाराज़ मैं हूं बेबस
हो गई जिंदगी पूरी नीरस
रातों में नींद न दिन में चैन
जिंदगी बोझल पत्थर समान
वो पुरब को तकते रहते
मै पश्चिम को तकता रहता
नैनों से जो कहीं मिल जाय नैन
मोबाइल पर फिर झुक जाते नैन
मै हू बीमार मै हूं पंगु
चलता भी हूं मै ठुम्मक ठू
उनको डर है कहीं गिर न पड़ू
हूं उनकी नजर में गिरा पड़ा
मुझको चिंता अब कैसे उंठू
माफी मांगू चरणो मे गिरूं ?
मुझसे गलती हो गई प्रिए
कुछ जान बुझ कर नहीं किए
कलापानी से बड़ी सजा ?
है तुमने दिए हां तुमने दिए
कुछ न्याय करो कुछ रहम करो
इससे तो अच्छा होता अगर
सौ सौ कोड़े लगवाती
मुंह काला कर सर मुंडवा कर
मुझे सारे शहर में घुमवाती
मुझको मुर्गा बनवाती
उठक बैठक करवाती
हर क्षण में खामोशी है खलती,
मन में बस यादें है पलती
हर कोशिश में आँसू मिलते
हर दिन महिनों से लगते
हो माता तुल्य, है फिक्र तुम्हें
कहीं खो न जाउं
कहीं गिर न पडूं
मै तो हूं वृद्ध मैं बालक हूं
अब बहुत हुआ कर दो भी क्षमा
बाकी की सजा देते रहना
वो है नाराज़ मैं हूं बेबस
जीवन है अनकहा सा बस।
कुछ अन्य कविताएं
मसाइल-ए-मुहब्बत
मुहब्बत में है यारो मसाइल बहुत
कभी सनम तो कभी
अबिद-ए-सनम रूठ जाता है।
मजा तो तब हो जब कोई न मनाए
मजा तो तब हो जब कोई तो मनाए
तसव्वुर, न बाबा तौबा
तसव्वुर से कुछ लिखू
ये मेरा फलसफा नहीं।
शायर मै वो नहीं
किस्सा गोई जो करे।
जो भी मैंने लिखा है,
उसने ही है लिखा
उसने ही है लिखा
और उसने ही है पढ़ा
लिखने को बहुत कुछ था
उसका क्या दूं मैं हिसाब
जो भी लिखा है यारो
वो है खुली किताब।
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Saturday, November 1, 2025
रूठे रब को मनाना आसान है!
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