Monday, March 16, 2026

अहसास 1 (हो ही जाती है, सजती क्यों हो)

मुहब्बत हो ही जाती है

कोई जो तुम सा हसीन हो
मुहब्बत हो ही जाती है

नज़र से जो मिल जाए नज़र
इबादत हो ही जाती है
तुम्हारी मुस्कुराहट में
अजब सा नूर रहता है
उस नूर के दीदार की
चाहत हो ही जाती है

कोई जो तुम सा हसीन हो
मुहब्बत हो ही जाती है

तुम्हारी बातों में कोई
जादू सा बसता है
इक बार‌ सुन लो अगर
कयामत हो ही जाती है
तुम्हारी मुस्कुराहट में
चाँदनी सी नर्मी है
उसे देख दिल को
राहत हो ही जाती है

कोई जो तुम सा हसीन हो
मुहब्बत हो ही जाती है

तुम्हारी बदन‌ की खुशबू
की बात क्या कहे 'अमित'
हवा छू के भी गुज़रे
इनायत हो ही जाती है
तुम्हारी हर अदा में
बहारों का शहर है बसता,
दिल पर कोई जोर नहीं चलता,
शरारत हो ही जाती हैl

कोई जो तुम सा हसीन हो
मुहब्बत हो ही जाती है

रूठने के अंदाज़ क्या कहने
गजब सी ख़ामोशी छा जाती है
जब खमोशी की सजा देती हो
शिकायत हो ही जाती है।
दूरी को बर्दाश्त करना
हमेशा होता है मुश्किल
जो कभी दूर रह जाएं
हरारत हो ही जाती है

कोई जो तुम सा हसीन हो,
मुहब्बत हो ही जाती है,

फिर सजती क्यों हो?

तुम तो यूं ही हसीन हो,
फिर सजती क्यों हो?

दिल पहले ही क़ाबू में नहीं,
और बेकाबू बनाती क्यों हो?
ये काजल की साज़िश कैसी,
ये लट यूँ गिराती क्यों हो?
हम कहीं और जाने वाले थे,
राह में यूँ चली आती क्यों हो?

तुम तो यूं ही हसीन हो,
फिर सजती क्यों हो?

चाँद भी तुमसे ही रोशन है,
फिर और निखरती क्यों हो?
तुम हंसो तो आफताब में
और भी चमक आ जाए
या रात दिन में बदल जाए
तुम इतना हसंती क्यों हो

तुम तो यूं ही हसीन हो,
फिर सजती क्यों हो?

तुम चल दो तो मुआ
मौसम भी बदल जाए,
तुम जो रूठो तो शायद
शाम फौरन ढल जाए,
गुलदस्ता भी बिखर जाए
तुम इत्ता रूठती क्यों हो

तुम तो यूं ही हसीन हो,
फिर सजती क्यों हो?

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