Sunday, February 22, 2026

घी के लड्डू टेढों भलो


चित्र विकी से साभार

आप सोच रहे होंगे इतने दिनों बाद लिख रहे हैं जाने क्या विषय चुना होगा ! और जब विषय जानेंगे तो कहेंगे ये क्या विषय चुना है ब्लॉग के लिए ? अब मैंने विधा भी लेख चुना है कविता नहीं। क्योंकि कालेज के दिनों में मैं भी अच्छी कविता लिख‌‌ लेता था, अब मैं कैसा लिखता हूं नीचे देखें‌।

"भज राम कृष्ण गोपाल रे
मेरा हुआ बुरा हाल रे
बोल राम कृष्ण हरे
राम नाम जप ले रे"

अब ऐसी कविताएं लिखूं और अपने को कवि समझने लगूं और नाम में कोई तखल्लुस जोड़ लू या नाम के आगे या पीछे "कवि" जोड़ दू जैसे "कवि आमंताभ सिन्हा" ? अच्छा है आम आदमी की तरह गद्य में ही लिखूं। ऐसे कैसी लगी मेरी कविता ?
और विषय ? मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि मेरा लेख पढ़ने के बाद आप मानेंगे कि विषय समसामयिक है। मेरे मस्तिष्क चलने वाले अन्य विषयों जैसे ट्रंप-पुतिन या कोहली के शतकों के रिकार्ड से भी महत्वपूर्ण और समसामयिक है यह मुहावरा। कैसे? आइए समझें ।
इतिहास
सबसे पहले मैं इस शोध में जुटा कि इस मुहावरे का इतिहास क्या है? जाहिर है मियां यह बहुत पुरातन तो नहीं हो सकता। उस जमाने का तो कतई नहीं जब असली घी के बिना लड्डू बनते ही नहीं होंगे। क्योंकि तुलना के लिए कुछ दूसरा लड्डू तो होना ही चाहिए। अब सोचिए सरसों, तीसी, अलसी के तेल में तो लड्डू बनते न होंगे (और रिफाइंड तब था नहीं) तो बचा कौन? अपना सर्वमान्य शुद्ध देशी असली घी । शुद्ध देशी विशेषण लगने का मतलब ही है कि अशुद्ध घी भी होगा। हां भैया था न! हमारे बचपन यानि.. नहीं मैं अपना उम्र नहीं बताउंगा, पर भैया यह घी था और है वनस्पति घी यानि डालडा यानि । घी जैसा दिखने वाला नकली घी‌। साधारण तापक्रम पर जमा रहने वाले इस घी में बना लड्डू भी जमा जमा और गोल रह जाता है। करीब 70 वर्ष पहले एक तहलके की तरह तब असली घी के आधे दामों में बिकने वाला यह नकली घी हमारे जिंदगी को खुशहाल बनाने आ गया। अब तो रिफाइन्ड तेल भी है। अब समझते हैं यह समसामयिक कैसे है।
समसामयिकता
इस मुहावरे के सबसे ज्यादा उपयोग लड़के के जन्म पर होता है। जब लड़का दुबला, मोटा या बदसूरत हो या कोई और एब हो तब लोग अक्सर कहते मिलेंगे "घी का लड्डू है, टेढ़ो भलो" । पर आज के परिप्रेक्ष्य में यह कहावत तब बेमानी होती दिखती है जब अच्छे भले eligible or very eligible कुंवारों को कोई लड़की नहीं मिलती। कारण समाज में लड़कियों का घटता अनुपात। गुगल के अनुसार "2011 की जनगणना के अनुसार भारत का समग्र लिंग अनुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर 943 महिलाओं का था। यह आँकड़ा देश में लैंगिक संतुलन की स्थिति को दर्शाता है, हालांकि राज्यवार स्तर पर इसमें उल्लेखनीय भिन्नताएँ देखने को मिलती हैं। दक्षिण भारत का राज्य केरल इस मामले में सबसे आगे रहा, जहाँ प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,084 महिलाएँ दर्ज की गईं — जो बेहतर सामाजिक सूचकांकों और महिला सशक्तिकरण की दिशा में प्रगति को इंगित करता है।इसके विपरीत, हरियाणा में यह अनुपात 879 रहा, जबकि केंद्र शासित प्रदेश दमन और दीव में यह मात्र 618 था।"

ये आँकड़े कुछ क्षेत्रों में लंबे समय से जारी लैंगिक असंतुलन की चुनौती को उजागर करते हैं। स्पष्ट है कि भारत में लिंग अनुपात केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं, बल्कि सामाजिक सोच, शिक्षा, स्वास्थ्य और समान अवसरों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण संकेतक है। संतुलित समाज की दिशा में निरंतर प्रयास ही इस अंतर को कम कर सकते हैं।

स्पष्ट है कि प्रति हजार लड़को म हरियाणा के 121 और दमन दीव के 382 लड़के अविवाहित रह जाने के लिए ही पैदा हुए हैं। इसके उपर आज जब समाज में लड़कियों के लिए बढ़ते शिक्षा और नौकरियों के कारण जहां कई लड़कियां विदेशी लड़को के साथ विवाह बंधन में बंध जा रही है। पहले ज़्यादातर लड़कियों के लिए विवाह ही एक carrier option होता था। अब वो स्वावलंबी हो चुकी है और कभी कभी समाज में दिखने वाले toxic विवाह बंधन से घबराकर अविवाहित रह जाना ही पसंद कर लेती है। इस तरह कुछ और घी के लड्डू अविवाहित ही रह जाते हैं। बेटों के माता-पिता शायद मुझसे सहमत होंगे कि आजकल बहुएं ढूंढना कितना मुश्किल काम है और बेटों को घी का लड्डू कहना समझना कितना बेमानी हो गया है।

बस मित्रों आज बस इतना ही।