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वसन्त जब हो मन में उमन्ग समझो आ पहुंचा वसन्त। डालों पर बैठे रति अनन्ग । मधु ले कर आ पहुँचा वसन्त। रंगो छन्दों में भरे प्राण । हे रितुराज तुमको प्रणाम। जब हो मन में उमन्ग समझो आ पहुंचा वसन्त बीता जाए शीतकाल। गृष्म ऋतु देता दस्तक। पूछें कोयल कूक कूक। तुम आओगे अब कबतक। जब हो मन में उमन्ग समझो आ पहुंचा वसन्त मन तन है अब अलसाता दूरी तो अब सहा न जाता । अब आओ सब छोड़ छाड़ तन्हां अब तो रहा न जाता। जब हो मन में उमन्ग समझो आ पहुंचा वसन्त |
चैत की हवा चैत की हवा में अजीब सा रंग है पक्षियों के जोड़े भी उड़ते संग संग हैं आ के छू जा मुझे जब तन में तरंग है मन वीणा में जैसे कोई मधुर राग है फूलों की महक में बसा चैता फाग है डाल-डाल झूमे जैसे प्रेम का उमंग है चैत की हवा में अजीब सा रंग है पक्षियों के जोड़े भी उड़ते संग संग हैं आ के छू जा मुझे जब तन में तरंग है कोयल की कूक में मीठा सा व्यंग है हर धड़कन में बसा तेरा ही प्रसंग है वातावरण में हर ओर तेरी ही सुगंध है चैत की हवा में अजीब सा रंग है पक्षियों के जोड़े भी उड़ते संग-संग हैं आ के छू जा मुझे जब तन में तरंग है आम की बौरों से महका घर आंगन है डालियों पर उतरा अलग सा मधुवन है प्रकृति इस दिलकश नज़ारों पर दंग है चैत की हवा में अजीब सा रंग है, पक्षियों के जोड़े भी उड़ते संग संग हैं आ के छू जा मुझे जब तन में तरंग है |
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Tuesday, April 14, 2026
अहसास 2 (वसन्त, चैत)
Monday, April 6, 2026
शांति दूत खोजती है दुनिया

शांति दूत
परमाणु बम के तोपें के आगे
है आज सारा विश्व खड़ा
कोई तो अब भी आगे आए
कोई तो मध्य हो जाए खड़ा
कोई तो शांति की करे बात
कोई तो करे दिल अपना बड़ा
यह कैसी विडम्बना है भगवन
जब कोई छीनता भूमि गगन
जब त्राहि त्राहि है जग जीवन
क्यों आते नहीं कुछ करके जतन
पर कभी दूत बने थे तुम भी
रूकवा पाए महाभारत का रण?
कौन हूं मैं?
मै एक विशाल पेड़ हूं
मै छाया देता हूं
पर किसी को उगने नहीं देता
मैं सर्व शक्तिमान हूं
पर किसी को आगे बढ़ने नहीं देता
© अमिताभ सिन्हा, प्रगति इंक्लेव, रांची